Friday, April 9, 2010

हमें भी है मुल्क से मोहब्बत


- शेख मुहम्मद मुद्दसर
दिल्ली का नजारा ही ऐसा था कि माथे पर सिलवटे व आँखो से आँसू का आना मुनासिब था। नजारा था इन्टरनेट कैफे का। जहाँ रोज सैकड़ों लोगों का आना जाना लगा रहता है। यह वही जगह है जहाँ कोई व्यक्ति बैठ कर देश के हर कोने के इन्सान से रुबरु हो सकता है। लोगों का आना जाना रोज इस जगह लगा रहता है।
दिन का समय था मैं भी उसी जगह बैठ कर इन्टरनेट से अपना टिकट करा रहा था। तभी मेरी आँखों के सामने एक ऐसी घटना घटी की मेरे दिल ने मेरे इन्सान या यूँ बोले कि मेरे मुसलमान होने पर प्रश्न चिह्न लगा दिया हो। जब मैं कैफ़े मे बैठा तो मुझसे मेरी आई. डी. ली गई और मुझे एक कम्प्यूटर दे दिया गया पर जब एक दाढ़ी रखे हुए 40-45 वर्ष के बुज़ुर्ग ने कैफ़े में इन्टरनेट करने के लिए आया तो दुकान मालिक ने उससे सवालों का ढेर लगा दिया। हमारे और उनमें अन्तर केवल इतना था कि हम दोनों थे तो मुसलमान परन्तु उनके पास दाढ़ी थी और मैं क्लीन सेव। उनकी दाढ़ी ने उनके इन्सान होने पर प्रश्न चिह्न लगा कर उनके आतंकवादी होने का संशय पैदा कर दिया था।
आखिर ऐसा क्यो है कि दाढ़ी रखना उनके इन्सानियत को खतरे में डालती है। इसका कारण वह इन्सान स्वयं वह नही है। कारण है पड़ोसी मुल्क में बसे आतंकवादी। ये आतंकवादी जिनका कोई धर्म और ईमान नहीं होता। जिनकी इन्सानियत मर चुकी है। ये आतंकवादी मुसलमान अपने स्वार्थ के लिए भारत के आम मुसलमानों को बदनाम कर रहे हैं। इन आतंकवादियों के कारण ही आज भारत के मुसलमान अपने को मुसलमान कहने में भी एक बार सोचते हैं।
इन आतंकवादियों को कोई समझाता क्यों नहीं है कि इनके कारण ही आज हमारी इन्सानियत पर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं। हम भी एक वतनपरस्त मुसलमान हैं। हम भी वतन में अमन व चैन चाहते हैं। कोई इन असमझ लोगों को समझाता क्यों नहीं कि हर दाड़ी रखने वाला शख्स आतंकवादी नहीं होता। हम भी अपने मुल्क से बहुत प्यार करते हैं। इसलिए हमें भी मुल्क से प्यार चाहिए ना कि सौतेला व्यवहार। ( लेखक जनसंचार एमए- सेकेंड सेमेस्टर के छात्र हैं)

1 comment:

  1. अदम गोण्डवी की एक पंक्ति है कि गलती बाबर ने की तो जुम्मन का घर क्यों जले..। हालात कुछ वैसे ही हो गए हैं। राज ठाकरे मुंबई को उत्तर भारतीयों से खाली करवाना चाहते हैं। उत्तर भारतीय राज के खिलाफ अपना गुस्सा उतार नहीं पा रहे हैं। खामियाजा भुगतना पड़ता है महाराष्ट्र से अलग रह रहे मराठियों को। गेंहू के साथ घुन भी पिस रहे हैं। आपेने अच्छा लिखा है। आपकी अपनी कौम के प्रति नजरिया अच्छा लगा। उम्मीद है आगे भी अच्छा लिखते रहेंगे।

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