Sunday, November 28, 2010

आज भी जब मुम्बई को याद करता हूँ

ओम प्रकाश
भोपाल, 28 नवम्बर 2010

कभी ओबेराय तो कभी,
नरीमन में हुए धमाके को याद करता हूँ।
कभी गोलिओं की बोछार तो कभी,
ताज में दहकती आग को याद करता हूँ।
आज भी जब मै उस मुंबई के दर्दनाक हमले को याद करता हूँ,
कभी खून की नदियाँ तो कभी,
आसुओं के सागर को याद करता हूँ।
कभी लोगो के ड़र तो कभी,
उनकी चीख को याद करता हूँ।
आज भी जब मै आतंकवाद से लडती मुंबई को याद करता हूँ,

कभी बेगुनाहों के ड़र तो कभी,
उनके दर्द को महसूस करता हूँ।
कभी भारतवासी के उमड़ते गुस्से को तो कभी,
लाचारी को महसूस करता हूँ।
आतंकवाद की इस गहरी चोट से अपने देश को कभी,
अपाहिज तो कभी मजबूर सा महसूस करता हूँ।

अपनी जान की बाजी लगाकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाले,
भारतीय को सलाम करता हूँ,
हिंसा के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने वाले भारतीयों में आज भी छिपी एकता
को सलाम करता हूँ,

उनकी देश भक्ति को सलाम करता हूँ।

Tuesday, November 23, 2010

जनसंचार विभाग में नए व्याख्याता अभिजीत वाजपेयी का स्वागत समारोह

भोपाल, 23 नवंबर,2010। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विवि के जनसंचार विभाग में नवनियुक्त अस्सिटेंट प्रोफेसर अभिजीत वाजपेयी के स्वागत में आयोजित कार्यक्रम में श्री वाजपेयी का स्वागत करते हुए विभागाध्यक्ष संजय द्विवेदी। इस अवसर पर विभागाध्यक्ष ने श्री वाजपेयी के सुखद भविष्य की कामना की। कार्यक्रम में डा. मोनिका वर्मा, संदीप भट्ट, शलभ श्रीवास्तव विशेष रूप से मौजूद थे।

आपकी शान में पेश है ये गजल

भोपाल, 23 नवंबर,2010। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विवि के जनसंचार विभाग में नवनियुक्त अस्सिटेंट प्रोफेसर अभिजीत वाजपेयी के स्वागत में आयोजित कार्यक्रम में गजल गाते हुए बीए-मास काम की छात्रा योगिता राठौर।

मुझे कुछ कहना है

भोपाल, 23 नवंबर,2010। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विवि के जनसंचार विभाग में नवनियुक्त अस्सिटेंट प्रोफेसर अभिजीत वाजपेयी के स्वागत में आयोजित कार्यक्रम में अपना वक्तव्य देते हुए वाजपेयी सर।

अभिजीत वाजपेयी सर का स्वागत समारोह

भोपाल, 23 नवंबर,2010। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विवि के जनसंचार विभाग में नवनियुक्त अस्सिटेंट प्रोफेसर अभिजीत वाजपेयी के स्वागत में आयोजित कार्यक्रम में उपस्थिति डा. मोनिका वर्मा, विभागाध्यक्ष संजय द्विवेदी और अभिजीत वाजपेयी।

कार्यक्रम में उपस्थित विद्यार्थी

भोपाल, 23 नवंबर,2010। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विवि के जनसंचार विभाग में नवनियुक्त अस्सिटेंट प्रोफेसर अभिजीत वाजपेयी के स्वागत में आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित विद्यार्थी।

हम साथ-साथ हैं

भोपाल, 23 नवंबर,2010। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विवि के जनसंचार विभाग में नवनियुक्त अस्सिटेंट प्रोफेसर अभिजीत वाजपेयी के स्वागत में आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित विद्यार्थी।

सर आपको नमन

भोपाल। अभिजीत वाजपेयी सर के स्वागत समारोह में उनका स्वागत करते हुए दीपक त्यागी।

स्वागत है आपका

भोपाल, 23 नवंबर,2010। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विवि के जनसंचार विभाग में नवनियुक्त अस्सिटेंट प्रोफेसर अभिजीत वाजपेयी के स्वागत में आयोजित कार्यक्रम में स्वागत भाषण करते हुए एमएएमसी की छात्रा नीतिशा कश्यप।

Should prostitution be made legal?


We all know that India has an oldest past of prostitution in the world. It was started by the kings and at that time they were called “nagar vadhu”. They exist even today and now they are called prostitutes or sex workers. The question is should their work be legalized or not.
Sonagachi in Kolkata and Malishahi in Orissa are quite famous red light areas. According to reputed English daily there were more than 10, 0000 sex workers, in the year 1990, in Mumbai, Kolkata, Bangalore, Hyderabad and Delhi. The major reason for women to join this field is poverty and lack of money. Other reasons being family dispute, trafficking, rape etc. Once they enter it becomes difficult and almost impossible for them to get out of that cobweb. In fact, finding no way out they actually start compromising in that situation and in the later stage they help in bringing more girls to this profession.
If we neglect the morality issue, the sex workers are doing nothing wrong. They are simply earning their livelihood. Obviously no woman willingly comes to this field. As they cannot find a way to earn they get into this business. For the survival purpose they start selling themselves. They give service for which they earn money, a means for surviving. It might be surprising to know that, though they come here for money, they are deprived of money. Their money is handled by the pimps and dalals. For a client they get Rs 8. (as told by a sex worker of Sonagachi in her interview. ) also they can earn till the age of 30 only, after that either they marry the pimps and get involved in this business or they buy a room and rent it to other prostitutes, or start selling betel leaves or cigarette in that red light area.
Just like any other work their work should also get recognition in the eyes of law. In India, the prostitution work is illegal. The sex workers face many problems. They can’t hold a bank account, can’t buy any property or a hospital card for checkups. Why? Literally they are a non-entity for the administration. Society neglects them. Ironically our society never neglects or looks down upon men who pay their visit to them. ( May be because we live in a patriarchal society).
Health happens to be one of the concerns. If this work is legalized they can have property, bank account, and can even file complaints against the harassment. The child prostitutions will get a hold. The workers would be provided a proper medication. At present maximum of them are suffering from AIDS. The NGOs provide them condoms but they are not able to control the increase in HIV positive cases. So if this work is made legal they would get a proper health facility, pimps will be curbed, trafficking will be controlled and the most important the child prostitution will stop.
But the question is will legalizing stop the flourishment of this business. No, what I think is “prostitution breeds prostitution”. Legalizing will not help. Even if it is legalized the social construct will not accept them. We may provide them rights (as we are in a democratic state it is unfair not to give them equal rights.) but we cannot change people’s perception nor can we ask society to give them respect as it becomes a personal matter whom to respect and whom to not. Secondly, even if it is legalized there is no guarantee that the clients will use condoms. As that interview red, though they are provided condoms manyatimes the clients refuse to use it and since they have to earn they agree. So there will be no curb on AIDS.
As far as owning a property is concerned they would not get out of that place or of that business. There is a place called Sukha, in Madhya Pradesh (few kilometers away from Sagar). It is a red light village. Each and every member of this village is involved in this business. Fathers, husbands and brothers get the client for the females in their house. The government under the Indra Awaas Yojna has allotted all of them a house to live. Shockingly they have rented them for the purpose of prostitution. The land given to them for farming have been sold out and alcoholic drinks were brought out. This means that they don’t want to get out of that business (Off course we cannot generalize). So legalizing their business will, instead of eradicating, make it more intense.
Thirdly, why cannot we teach those, who want to get out of that hell, how to make candles, handicraft works, pappad making or pickles etc. We can also educate them. If government can provide houses and lands for farming they can obviously provide funds for this noble cause. Also the NGOs fighting for their legalization can also help them by educating them and by making them learn.
Though it might sound little rude but in order to give them social respect (which we are not going to achieve in the near future) we cannot legalise the work and hence leave the business to grow like a quagmire.

Saturday, November 20, 2010



You say you love me but
You never gave me roses to hold
Nor, like Romeos, promises told.
You never took me to parks
Tryst for you was a concept dark.
And you say you love me.
I know, you have feelings true
At least you must feel free
To tell how much you love me.
But they are confined to your soul.
And you say you love me.
Why did you hurt me?
Not once but twice and thrice
Its reverie alone makes me shiver.
But I love you more than ever.
Just want to know
If you feel the same
Do say and let me know
If we share the feeling same

Tuesday, November 16, 2010

शब्द-बाणों का राजनैतिक संग्राम

प्रो. बृज किशोर कुठियाला
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता,
एवं संचार विश्वविद्यालय,

भोपाल,16 नवंबर,2010

शब्द तो ब्रह्म ही है, परन्तु कुछ लोग शब्दों को भ्रम बना लेते हैं। हमारे देश के एक प्रतिष्ठित राजनेता ने पिछले दिनों एक अन्य उभरते हुए राजनेता को गंगा में फेंक देने की घोषणा की। वैसे तो भारतीय संस्कृति में गंगा मोक्ष का द्वार है और गंगा की शरण में जो भेजे उसे शुभचिंतक ही मानना चाहिए। परन्तु जिस संदर्भ में यह वाक्य कहा गया उसके आगे व पीछे नकारात्मकता ही थी, इसलिए गंगा में फेंक देने का अर्थ यह लगाया गया कि श्री राहुल गांधी को राजनीति से विदाई दे देनी चाहिए। सार्वजनिक संवाद में इस तरह की घोषणाएं उचित हैं या अनुचित यह तो श्रोता, पाठक व दर्शक स्वयं तय करेंगे। परन्तु विरोधियों के बीच में संवाद की मर्यादाएं तो राजनीतिज्ञ ही तय करेंगे।
कश्मीर के विषय पर एक सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता का बयान आजकल आम चर्चा का विषय है। लगभग पूरा का पूरा सामाजिक संवाद बयान के विरोध में है। परन्तु उसी सभा में लेखिका ने अपने देश की जो व्याख्या की वह भी भ्रमित मस्तिष्क की द्योतक है। लेखिका ने अपने देश को ‘भूखे नंगों का देश’ कहा। एक अर्द्ध सदी से पूर्व भारत की ऐसी व्याख्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित थी। उस दौर में फ़िल्मकार पैसा फेंकते और जब ग़रीब उस पैसे को उठाने के लिये छीना झपटी करते थे तो उसकी फ़िल्म बनाकर देश विदेश में भारत की छवि का निर्माण करते थे, पर आज ऐसा नहीं है। भारतीय अर्थशास्त्रियों और कूटनीतिज्ञों से अधिक विदेशी विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में जो पिछले 60 वर्षों में विकास किया है, वह अद्वितीय है, क्योंकि यह विकास प्रजातंत्र के वातावरण में हुआ है।
आज भारत के करोड़ों युवक-युवतियाँ पूरे विश्व में अनेक तरह के तकनीकी व सृजनात्मक कार्यों में लगे हैं। आम समृद्धि बढ़ी है, देश में नवसृजन का वातावरण चारों ओर है। कुछ भूख और नंगापन भी है, परन्तु हमारी दृष्टि कहाँ है ? क्या विकास की सकारात्मकता को प्रसारित करके सुख और प्रेरणा का वातावरण बनाना है या निर्धनता को असफलताओं के भ्रम के रूप में प्रस्तुत करना है। लेखिका में कहीं न कहीं दृष्टि-दोष है। पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों पर फौजी अत्याचार और मानवाधिकारों का उल्लंघन उन्हें नहीं दिखता है और शहीद सैनिकों के शव उन्हें कुछ ही जातियों के दिखते हैं। वे चश्मा भी पहनती है, परन्तु खोजी पत्रकारिता का विषय यह होना चाहिए कि उनका चश्मा कहाँ बना है ? और उसके लैंस किस रंग के हैं ? उनका बचपन कैसा था ? और किस प्रकार से उन्हें ‘बुकर सम्मान’ मिला। यह भी सामान्य जन को पता लगाना चाहिए।
शब्दों का ब्रह्म होना या भ्रम होना, बोलने व सुनने वालों पर तो निर्भर है ही परन्तु संदर्भ भी महत्वपूर्ण होता है। भारत के एकमात्र फ़ील्ड मार्शल ज. मानेक शा ने पाकिस्तानी सेना के लिए अँगरेज़ी के शब्द ‘बैन्डीक्यूट्स’ का प्रयोग किया था। उनसे पाकिस्तान सेना की बढ़ती हुई संख्या के बारे में पूछा गया था। यह शब्द अधिक प्रचलित नहीं है और अधिकतर लोगों ने इसे शब्द कोष में देखा। ‘बैन्डीक्यूट्स’ वो जंगली चूहे हैं जो खेतों में पाये जाते हैं। शब्द ने ब्रह्म होने को सिद्ध किया और भ्रम की कोई गुंज़ाइश नहीं है। इसी तरह से लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ की घोषणा करके सारे देश को एक माला में पिरो दिया था। श्रीमती इंदिरा गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा देकर राष्ट्र के सम्मुख एक केन्द्रित उद्देश्य रखा था और कई वर्षों तक योजना बनाकर इस लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास हुआ। परन्तु राजनीति के ही कुछ खिलाड़ियों ने ग़रीबी शब्द से आखरी ‘ई’ की मात्रा हटाकर शब्दों का भ्रम पैदा कर दिया।
हिटलर ने शब्द जाल बिछाकर ही उस समय की जर्मन जनता को इतना भ्रमित कर दिया था कि उन्हें हिटलर ही ब्रह्म है का भ्रम हो गया। उनके जनसम्पर्क मंत्री गोयबल्स तो शब्दों के भ्रम के विशेषज्ञ थे। बार-बार असत्य बोलने से भ्रम भी सत्य के रूप में स्थापित हो जाता है के सिद्धांत का उन्होंने बख़ूबी प्रयोग किया। आज भी इस सिद्धांत के प्रयोग के कई उदाहरण सामने आते हैं। गांधी की हत्या में एक विशेष संस्था का हाथ नहीं है, यह कई बार न्यायालयों में सिद्ध हो चुका है, परन्तु राजनीति के खेल में इस असत्य को भी कई बार दायित्ववान राजनीतिज्ञ प्रयोग करते रहे हैं। हमारी दृष्टि का रंग कोई भी हो परन्तु भगवा रंग को आंतकवाद से जोड़ना भी एक भ्रम जाल बुनने का ही प्रयास लगता है।
ऐसा नहीं है कि शब्दों का दुरूपयोग हर बार जानबूझकर ही होता हो, हाल ही में एक भारतीय उदघोषक ने अल्पज्ञानी होने के कारण अफ्रीका के एक देश के विषय में अपमानजनक टिप्पणी कर दी। परन्तु समय रहते उसने अपनी ग़लती को माना और देश के प्रतिष्ठित व्यक्ति को क्षमा मांगनी पड़ी। आस्ट्रेलिया के एक टेलीविजन उद्घोषक ने भारतीय खिलाड़ी के बारे में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया और उसे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। एक भूतपूर्व मंत्री ने तो राष्ट्रमण्डल खेलों के असफल होने की कामना सार्वजनिक रूप से कर डाली। वह महानुभाव आज अपने ही शब्दों के घाव सहला रहे हैं।
आधुनिक मानव समाज में तो शब्दों का अंतरताना हर समय अधिक से अधिक गहन हो रहा है। पूरा का पूरा मीडिया शब्दों का ही खेल है। चित्र होने के बावजूद भी शब्दों के बिना संचार व संवाद की स्थिति नहीं बनती। छोटे समूहों में सार्वजनिक वार्ता भी मीडिया के द्वारा विश्वव्यापी हो जाती है और एक शब्द का बाण अनेकों घाव करता है। शब्द मरहम का भी काम करते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शब्दों ने बालक नरेन्द्र के उद्वेलित मन को शान्त किया और विवेकानन्द का जन्म हुआ। डॉक्टर व वैद्य के आशावादी शब्द ‘दवाई’ से अधिक प्रभावकारी हो जाते हैं। बुद्धिशील व्यक्ति शब्दों के द्वारा समाज में सुख, सहयोग और समरसता सजाता है और यदि बुद्धि कम हुई या भ्रमित हुई तो अपने ही साथी को गंगा में फेंकने का विचार आता है और अपना ही देश भूखा नंगा नजर आता है।
किसी भी समाज में शब्दों को तीखे चुभते और विध्वंशकारी बाणों के रूप में प्रयोग करने वाले लोग तो रहेंगे ही, परन्तु क्या इन शब्द बाणों को प्रचालित व प्रसारित कर उनकी घाव बनाने की क्षमता को कई गुणा वृद्धि करने का प्रयास मीडिया को करना चाहिए ? कहीं न कहीं मीडिया को समाज का ध्यान तो रखना ही पडेगा कि वह अधिक भ्रमित व्यक्तियों द्वारा प्रसारित जहरीले शब्दों को सम्पादित करे या उनका वितरण करे?

Thursday, November 4, 2010

अंधकार को क्यों धिक्कारें, अच्छा है एक दीप जला लें।

रोशनी का त्यौहार दीपावली आपकी जिंदगी में भी ऐसा उजाला लाए जिसकी चमक कभी कम न हो। आप व आपके परिवार को भारतीय समाज के महापर्व दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
-जनसंचार विभाग के छात्र, कर्मचारी एवं अध्यापक

Tuesday, November 2, 2010

शाबाश मध्य प्रदेश

रुपेन्द्र सिंह चौहान
भोपाल,2 नवंबर,2010

सरकारों के लिए नई-नई योजनाएँ लाना कोई नई बात नहीं है पर पिछले दिनों मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पहल पर लोकसेवा प्रदाय गारंटी अधिनियम लागू किया गया। यह मुख्यमंत्री की सराहनीय पहल है, क्योंकि यह बेहद महत्वपूर्ण और अपने प्रकार का एकमात्र अधिनियम है। जो भारत के किसी अन्य राज्य में अभी तक लागू नही है। यह अधिनियम आम जनता को सुनिश्चित करता है कि कोई भी सेवा जो सरकारी विभागों से सम्बन्धित हो निर्धारित किये गए समय में मिल पाए। हालांकि इसे अभी सिर्फ 9 विभागों की 26 सेवाओं के लिये किया गया है परन्तु उसे बाद में पूर्णरूप से सभी विभागों में सभी सेवाओं के लिए लागू किया जाएगा जिसके दायरें में हर मंत्री-अधिकारी आयेंगे। इससे कुछ हद तक तो जरूर भ्रष्टाचार, आम लोगों की तकलीफें और अधिकारियों की मनमानी है कम होगी। नागरिकों को बेवजह सरकरी दफ्तरों के चक्कर नही लगाना होगा, फिर शायद कोई किसान कलेक्टरेट पर आत्महत्या की कोशिश न करें, फिर शायद नागरकों के रिश्वत के पैसे बच जाएँ, फिर शायद वृद्ध जनों को पेंशन के लिए सालों तक चक्कर न काटनें पडे, फिर शायद बीपीएल कार्ड भी गारिबों को मिल जाएँ। पर अब अधिनियम के आने से न भी मिल पाएँ तो भी ज्यादा दिक्कत नहीं होगी क्योंकि इसी अधिनियम में एक विशेष प्रवधान के तहत अगर अधिकारी निश्चित समय पर सेवा नहीं दे पाता है, तो उसके प्रतिदिन के हिसाब से 250 रूपए काटे जाएँगे जो अधिकतम 5000 रूपए तक होंगे और यह राशि उस आवेदक को मिलेगी जिसका समय बर्बाद हुआ है । पर फिर भी एक डर है कि कहीं यह भी बाकी ढेरो कानूनों की तरह ही न निकले, जिनमें चार दिन की चाँदनी और फिर अँधेरी रात हो। पर यह केवल मेरा अनुमान मात्र है, मैं किसी नतीजे पर नहीं जाना चाहता पर हाँ इतना कहूँगा कि मध्यप्रदेश सरकार ने इस अधिनियम को लाकर बहुत साहसिक कदम उठाया है क्योंकि इसके दायरे में मंत्रियों के आने से भ्रष्ट तंत्र में सुधार आने की उम्मीद है। पर शुरू में तो तलवार अधिकारियों के सर ही लटकनी है और ये जरूरी भी थी क्योंकि वे कैसा भी काम करें उन्हें कोई हटा नहीं सकता और उनकी पदोन्नति भी नहीं रोकी जा सकती है। इतनी छूट तो सिर्फ हमारे देश में ही मिलती है । वहीं दूसरी ओर फ्राँस में पदोन्नति के लिए भी विशेष परिक्षा से गुजरना होता है । और चीन में भी जब पिछले साल एक सर्वे रिपोर्ट छपी जिसमें 90 प्रतिशत अधिकारियों को भ्रष्ट बताया गया के वहाँ की सरकार ने तुरंत एक अलग विभाग का गठन कर दिया । विभाग ने यह नियम बना दिया कि लगातार दो वार्षिक समिक्षाओं में अयोग्य साबित होने वाले अधिकारी को पद से हटा दिया जाएगा । पर हमें कम-से-कम लोकसेवा प्रदाय गारंटी अधिनियम से अफसरों की मनमानी कम होने का तो पूरा विश्वास है।
लेकिन अब केन्द्र सरकार को भी जाग जाना चाहिए और मध्यप्रदेश से सबक लेकर इस कानून को पूरे देश में लागू करवाना चाहिए जिसके दायरे में सभी प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर नेता मंत्री आ जाए । और अगर ऐसा कानून नहीं आता है तो केन्द्र सरकार से निकला एक रूपया जनता के पास दस पैसे के रूप में ही पहुँचेगा, हम हमेशा विकास दर में चीन से पीछे ही रहेंगे , हम पिछले साल भ्रष्ट देशों की सूची में 74वें स्थान पर थे और आगे भी इसी आँकडे के आसपास झूलते रहेंगे, हम आगे भी कामनवैल्थ गेम्स की तैयारी में फिनीशिंग टच गेम्स शुरु होने के आखिरी दिन ही देंगे । पर हमारी सरकार की कोशिशें कई बदलाव ला सकती है। पिछलें दिनों अमेरिका की एक मैग्जीन का सर्वे छपा जिसमें भारत को 2025 तक दुनिया का अमेरिका और चीन के बाद तीसरा सबसे ताकतवर देश माना गया, जिससे हमारा सरकारी तंत्र खुशी से उछल पड़ा। पर हम अगर आज की अव्यवस्थाओं के बीच भी 2025 तक दुनिया की तीसरी सबसे बडी ताकत बनने का दम रखते है तो थोड़े बदलाव से सबसे बड़ी ताकत भी बन सकते है। आज जररूत सिर्फ एक पहल की है । ताकि हम बदलाव ला सके अपने आप में, फिर चीन क्या हम 2025 तक अमेरिका को भी पिछे छोड सकते है।

Monday, November 1, 2010

मीडिया की आचार संहिता बनाएगा पत्रकारिता विश्वविद्यालय

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल की महापरिषद की बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसले

- डा. नंदकिशोर त्रिखा, प्रो. देवेश किशोर, रामजी त्रिपाठी और आशीष जोशी बने प्रोफेसर
भोपाल, 1 नवंबर, 2010।

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल की पिछले दिनों सम्पन्न महापरिषद की बैठक में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। महापरिषद के अध्यक्ष और प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में हुयी इस बैठक का सबसे बड़ा फैसला है मीडिया के लिए एक आचार संहिता बनाने का। इसके तहत विश्वविद्यालय मीडिया और जनसंचार क्षेत्र के विशेषज्ञों के सहयोग से तीन माह में एक आचार संहिता का निर्माण करेगा और उसे मीडिया जगत के लिए प्रस्तुत करेगा। पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.बीके कुठियाला के कार्यकाल की यह पहली बैठक है, जिसमें विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए महापरिषद ने अपनी सहमति दी और कहा है कि इसे मीडिया, आईटी और शोध के राष्ट्रीय केंद्र के रूप में विकसित किया जाए।
नए विभाग- नई नियुक्तियां- विश्वविद्यालय में शोध और अनुसंधान के कार्यों को बढ़ावा देने के लिए संचार शोध विभाग की स्थापना की गयी है। जिसके लिए प्रोफेसर देवेश किशोर की संचार शोध विभाग में दो वर्ष के लिये प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति का फैसला लिया गया है। इस विभाग में मौलिक शोध व व्यवहारिक शोध के कई प्रोजेक्ट डॉ. देवेश के मार्गदर्शन में चलेंगें। प्रोफेसर (डॉ.) नंदकिशोर त्रिखा की दो वर्ष के लिये सीनियर प्रोफेसर पद पर नियुक्ति की गयी है। अगले दो वर्ष में डॉ. त्रिखा के मार्गदर्शन में मीडिया की पाठ्यपुस्तकें हिन्दी व अंग्रेजी में लिखी जाएंगी। इस काम को अंजाम देने के लिए विश्वविद्यालय में अलग से पुस्तक लेखन विभाग की स्थापना होगी। इसी तरह विश्वविद्यालय में प्रकाशन विभाग की स्थापना की गयी है। जिसमें प्रभारी के रूप में वरिष्ठ पत्रकार एवं पीपुल्स समाचार के पूर्व स्थानीय संपादक राधवेंद्र सिंह की नियुक्ति की गयी है, विभाग में सौरभ मालवीय को प्रकाशन अधिकारी बनाया गया है। अल्पकालीन प्रशिक्षण विभाग की स्थापना की गयी है, जिसके तहत श्री रामजी त्रिपाठी, केन्द्रीय सूचना सेवा (सेवानिवृत्त), पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक, प्रसार भारती (दूरदर्शन) की दो वर्ष के लिये प्रोफेसर के पद पर अल्पकालीन प्रशिक्षण विभाग में नियुक्ति की गयी है। श्री त्रिपाठी जिला और निचले स्तर के मीडिया कर्मियों के लिये प्रशासन में कार्यरत मीडिया कर्मियों के लिये व वरिष्ठ मीडिया कर्मियों के लिये प्रशिक्षण व कार्यशालाओं का आयोजन करेंगे। इसी तरह श्री आशीष जोशी, मुख्य विशेष संवाददाता, आजतक की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग में प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति की गयी है। श्री आशीष जोशी, भोपाल परिसर में टेलीविजन प्रसारण विभाग में कार्यरत रहेंगे।
टास्क कर्मचारियों को दीपावली का तोहफा- विश्वविद्यालय में कार्यरत दैनिक वेतन पाने वाले लगभग 85 कर्मचारियों के वेतन में 25 प्रतिशत वृद्धि करने का फैसला किया गया है। इसी तरह शिक्षकों के लिए ग्रीष्मकालीन व शीतकालीन अवकाश की व्यवस्था भी एक बड़ा फैसला है। अब तक विश्वविद्यालय में जाड़े और गर्मी की छुट्टी (अन्य विश्वविद्यालयों की तरह) नहीं होती थी। आपात स्थिति के लिये 10 करोड़ रूपये का कार्पस फंड बनाया गया है , जिसमें हर वर्ष वृद्धि होगी। शिक्षक कल्याण कोष की स्थापना भी की गयी है। इसके अलावा चार प्रोफेसर, आठ रीडर व आठ लेक्चरार (कुल 20) अतिरिक्त शैक्षणिक पदों का अनुमोदन किया गया है, जिसपर विश्वविद्यालय नियमानुसार नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करेगा।
बनेगा स्मार्ट परिसरः विश्वविद्यालय के लिये भोपाल में 50 एकड़ भूमि पर ‘‘ग्रीन’’ व ‘‘स्मार्ट’’ परिसर बनाने के कार्यक्रम की शुरूआत की जाएगी। जिसके लिए भवन निर्माण शाखा की स्थापना भी की गयी है।
आगामी दो वर्षों में टेलीविजन कार्यक्रम निर्माण, नवीन मीडिया, पर्यावरण संवाद, स्पेशल इफैक्ट्स व एनीमेशन में श्रेष्ठ सुविधाओं का निर्माण के लिए यह परिसर एक बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके साथ ही आगामी पांच वर्षों में आध्यात्मिक संचार, गेमिंग, स्पेशल इफैक्ट्स, एनीमेशन व प्रकृति से संवाद के क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने की तैयारी है।इस बैठक में प्रबंध समिति के कार्यों व अधिकारों का स्पष्ट निर्धारण भी किया गया है। बैठक में महापरिषद के अध्यक्ष मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, कुलपति प्रो. बीके कुठियाला, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर के कुलपति प्रो. रामराजेश मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार राधेश्याम शर्मा (चंडीगढ़), साधना(गुजराती) के संपादक मुकेश शाह, विवेक (मराठी) के संपादक किरण शेलार, सन्मार्ग- भुवनेश्वर के संपादक गौरांग अग्रवाल, स्वदेश समाचार पत्र समूह के संपादक राजेंद्र शर्मा, काशी विद्यापीठ के प्रोफेसर राममोहन पाठक, दैनिक जागरण भोपाल के संपादक राजीवमोहन गुप्त, जनसंपर्क आयुक्त राकेश श्रीवास्तव, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के सलाहकार अशोक चतुर्वेदी, विश्वविद्यालयय के रेक्टर प्रो.चैतन्य पुरूषोत्तम अग्रवाल, नोयडा परिसर में प्रो. डा. बीर सिंह निगम शामिल थे।

कॉमनवेल्थ में छाई स्वर्णिम शतकीय दबंगाई

संजय शर्मा
भोपाल 1 नवंबर,2010

दिल्ली में चल रहा कॉमनवेल्थ फीवर रंगारंग समापन के साथ ख़त्म हुआ! २०१४ में होने वाले कॉमनवेल्थ के लिए ग्लासगो (स्कॉट्लैंड ) के प्रतिनिधियों को ध्वज प्रदान करके औपचारिक पूर्ति की गई! खेलों के इस अर्द्ध कुम्भ ने भारतीय खेल पटल पर एक नया अध्याय सकुशल पूरा किया! १९८२ में दिल्ली में हुए एशियाड के बाद २८ साल के बाद यह हमारे देश में खेलों का अब तक का सबसे बड़ा आयोजन था! कॉमनवेल्थ खेलों में हो रहे भ्रष्टाचार की परत खुल जाने से यह मुद्दा ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटिश मीडिया में लगातार छाया रहा! खेलों के दौरान अर्थात खेलों से पहले कलमाड़ी का भ्रष्टाचार में दबंग और खेलों के अंत तक हमारे देश के खिलाड़ी अपने सुनहरे पदकों का दबंग दिखाते नजर आए। हमारे देश के लिए यह पहला मौका था जब हम विश्व के ७१ देशों के ८००० से अधिक खिलाड़ियों के इस अर्द्ध कुम्भ का आयोजन करने में जुटे थे! खिलाड़ियों के ठहरने के लिए खेल गाँव को दुल्हन की तरह सजाया गया लेकिन फिर भी खेल शुरू होने से पहले हम खेलगांव की आलोचनाओं के शिकार
हुए! ब्रिटिश मीडिया ने तो इसे खेलों का सबसे नकारात्मक पहलु बताया जबकि ब्रिटिश मीडिया या अन्य देशों का मीडिया यह भूल गया की वर्ष २००२ में मेनचेस्टर कॉमनवेल्थ में हमारे देश की कई खेलों की टीमो को खेलगांव के दर्शन तक नही हुए! खैर यह खेलों की आलोचनात्मक दास्ताँ थी जो वक़्त के साथ गुजर चुकी है! दिल्ली कॉमनवेल्थ में हमे वो सब कुछ मिला जिसके लिए हम अब तक सोच रहे थे! इन खेलों में हमने ३८ स्वर्ण सहित १०१ पदक हासिल करके पदकों का शतक लगाया! २००६ मेलबोर्न में हुए कॉमनवेल्थ में हम चोथे स्थान पर थे लेकिन यहाँ हमने दूसरा स्थान पाया! यह पहला मौका था जब हमने पदकों का शतक लगाकर मेनचेस्टर कॉमनवेल्थ में जीते ६९ पदकों का रिकॉर्ड तोडा! भारोत्तोलक सोनिया चानू ने रजत पदक जीतकर अभियान की शुरुआत पहले दिन ही कर दी थी अब इस अभियान में सुनहरी चमक बिखरने का समय था जिसे पूरा किया ओलंपिक स्वर्ण विजेता अभिनव बिंद्रा और गगन नारंग की स्टार जोड़ी ने! जिन्होंने २५ मीटर युगल निशानेबाजी में भारत को पहला सोना दिला सुनहरी सफलता का अहसास कराया! बिंद्रा- नारंग के द्वारा जीते सोने की सुनहरी महक ने भारत के रणबांकुरों में सोना पाने की लालसा को दुगना कर दिया जिससे भारत कॉमनवेल्थ खेलों में अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहा! १९वें कॉमनवेल्थ खेलों में जहाँ हमारे देश के रणबांकुरों ने कई खेलों में रिकॉर्ड कायम किये वही कई खेलों ने हमें आशा के अनुरूप परिणाम नही दिए! डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पुनिया ने ट्रेक एवं फिल्ड एथलीट प्रतिस्पर्धा में जहाँ हमे ५२ साल बाद स्वर्ण दिलाया वही बीजिंग ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता विजेंद्र से स्वर्ण की आस लगाये प्रशंसकों को उस समय निराशा मिली
जब वो इन उम्मीदों पर खरा नही उतरे और मुकाबले से बाहर हो गए! क्रिकेट की लोकप्रियता के साए में जी रहे भारतीय दर्शकों को इन खेलों ने अपने साए में भरने की कोशिश तो भरपूर की लेकिन फिर भी कुश्ती, निशानेबाजी,
बोक्सिंग, हॉकी को छोड़ कर अधिकतर खेल दर्शकों के लिए तरसते रहे! १९वें कॉमनवेल्थ खेलों में कुल मिलाकर ७५ रिकॉर्ड नए बने जिनमे कुछ रिकॉर्ड भारतीय खिलाडियों के हिस्से में भी आये! तीरंदाजी में झारखंड के एक ऑटो चालक की लाडली बेटी ने व्यक्तिगत व टीम स्पर्धा में दोहरी स्वर्णिम कामयाबी हासिल की! १७ साल की दीपिका ने इतनी छोटी उम्र में स्वर्णिम निशाना लगा कर कॉमनवेल्थ खेलों में तीरंदाजी का स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला होने का गौरव हासिल किया! उनकी इस स्वर्णिम दास्ताँ ने उन्हें एक ही दिन में तीरंदाजी का नया स्टार बना दिया! कॉमनवेल्थ खेलों में हॉकी की चमक एक बार फिर देखने को मिली जब राजपाल सिंह के नेतृत्व में टीम इंडिया ने पाक को ७-४ से हराकर बाहर का रास्ता दिखाया! चक दे इंडिया की गूंज अब हर तरफ गूंजने लगी थी ऐसा लग रहा था मानो टीम इंडिया के स्वर्णिम दिन फिर लौट आये है! टीम इंडिया को सेमी फ़ाइनल का टिकट कटाने के लिए बस एक और जीत की दरकार थी लेकिन इस बार मुकाबला अंग्रेजों से होने वाला था मैच के शुरू होने से लेकर अंत तक दोनों ही टीमों के खिलाड़ी एक दूसरे पर हावी रहे नतीजा मैच ट्राई बेकर पर आ टिका और इस समय अंतिम गोल करने का दारोमदार टीम इंडिया के फॉरवर्ड खिलाड़ी शिवेंद्र सिंह पर था लेकिन शिवेंद्र ने भरोसे को हकीकत में तब्दील करके अपनी स्टिक से अंतिम समय में गोल करके फ़ाइनल में टीम इंडिया को प्रवेश कराया लेकिन जो चमक टीम इंडिया की हॉकी में अब तक नजर आ रही थी मानो ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ फ़ाइनल में वो चमक कही खो सी गई थी नतीजा हमे ८-० से अब तक की सबसे बड़ी हार झेलनी पड़ी! खैर गुमनामी के साए में डूब रहा हमारा राष्ट्रीय खेल कुछ चमक छोड़ने में तो कामयाब रहा ही साथ ही साथ हमे कॉमनवेल्थ में पहला पदक भी मिला! इन खेलों ने भारतीय नारी सब पर भारी जुमले को भी सच्चाई प्रदान की! महिलाओं ने अपनी शक्ति का परचम दिखाते हुए १०१ पदकों में से ३६ पदकों पर अपना दाव लगाया! खेलों के अंत तक एक खुली चुनौती भी देखने को मिली जब ऑस्ट्रेलिया की डिस्कस थ्रोअर में विश्व चैम्पियन रह चुकी डैनी सेमुअल्स ने कॉमनवेल्थ स्वर्ण पदक विजेता कृष्णा पुनिया को ये कहकर अपनी प्रतिक्रिया जताई की कृष्णा पुनिया ने मेरी अनुपस्थिति में स्वर्ण जीता है यदि मैं इन खेलों में प्रतियोगी होती तो मुकाबला टक्कर का होता! विश्व चैम्पियन ने कृष्णा को इस सम्बन्ध में ये कहकर पल्ला झाड दिया की मैं किसी कारणवश इन खेलों में नही आ सकी लेकिन हमारे पास अभी मौका है, कृष्णा अगर मेरी चुनौती को स्वीकार करती है तो ये मुकाबला फिर हो सकता है! खैर कृष्णा इस चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है और संभवत ये मुकाबला फरवरी में हो सकता है! डैनी सेमुअल्स और कृष्णा पहले भी कई बार आमने सामने हो चुकी है जिसमे कृष्णा ने विश्व चैम्पियन को एक बार हराया भी है! कॉमनवेल्थ में मिली इन उपलब्धियों ने एशियाड में हमारी पदक जीतने की सम्भवनाएं बढ़ाई है जो अगले माह चीन के ग्वागंझू शहर में होने वाला है।