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Wednesday, January 19, 2011

“गण”से दूर होता “तंत्र”


- अंकुर विजयवर्गीय
“26 जनवरी को मैंने सोचा है कि आराम से सुबह उठूंगा, फिर दिन में दोस्तों के साथ फिल्म देखने जाना है, इसके बाद मॉल में जाकर थोड़ी शॉपिंग और फिर रात में दोस्तों के साथ दारू के दो-दो घूंट। क्यूं तुम भी आ रहे हो ना अंकुर।”

अब आप बताएं कि इतना अच्छा मौका कोई हाथ से जाने देगा। हालांकि मेरे संपादक ने मुझे राष्ट्रपति के भाषण का अनुवाद करने के लिए ऑफिस आने को कहा है लेकिन, फिर भी मैंने इस कार्यक्रम के लिए हामी भर दी है। अधिकांश लोग शायद मुझे गाली देंगे कि देश अपना 62वां गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारियां कर रहा है और ये महाशय फिल्म ओर दारू पर ही अटके हुए हैं। पर जनाब कौनसा गण और कौनसा तंत्र। मेरे जैसे युवा ही नहीं बल्कि देश की आधी आबादी को भी शायद अब इन राजकीय उत्सवों से ज्यादा सरोकार नहीं है। लेकिन इसके जिम्मेदार देश का गण नहीं अपितु तंत्र है। लोगों के अंदर गुस्सा है, प्याज और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों से, अफजल को फांसी न होने से, आदर्श सोसायटी और कॉमनवेल्थ घोटालों से, राजा और नीरा राडिया की दलाली से और यहां तक की नेताओं की शक्ल से लेकर उनकी अक्ल तक। लेकिन सब चुप हैं। क्यूंकि बोलने की आजादी हमें सिर्फ संविधान में ही दी गई है, वास्तविक जिंदगी में नहीं। आप बोल सकते हैं लेकिन सरकार के हक में। खिलाफत शासन को भी मंजूर नहीं है। आप घर के बाहर आवाज उठाइये और घर के अंदर आपकी बीबी या बहन के साथ बलात्कार हो जायेगा या फिर आपकी सड़क चलती बेटी को नेता के गुंडे उठाकर कार में गैंग रेप कर डालेंगे या फिर आपके जवान बेटे की लाश आपको चौराहे पर टंगी मिल जायेगी। और ये सब नहीं तो निपटाने के लिए तो आप हैं ही। कब तक साहब कब तक। कब तक तंत्र अपनी तानाशाही चलाता रहेगा और गण चुपचाप सहता रहेगा। ये गुस्सा किसी पत्रकार का नहीं है जनाब बल्कि ये गुस्सा तंत्र की तानाशाही में पिसते एक आम आदमी का है।

जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर हिंदुस्तान तथा हिंदुस्तानियों को बांटते रहनेवाले अवसरवादी राजनेता अपनी घिनौनी हरकतें करते ही रहेंगे। केवल वोट की राजनीति करनेवाले भ्रष्ट, चरित्रहीन तथा स्वार्थी राजनेता अपना स्वयं का हित करने के चक्कर में देश और देशवासियों का अहित करते ही रहेंगे। झोपड़ी बनवाना, झोपड़ी बढ़वाना, फेरीवालों को जमा करना, अनधिकृत निर्माण कार्य करवाना, असामाजिक तत्वों तथा गुंडों को संरक्षण देना तथा ऐसे ही ग़ैर-क़ानूनी कार्यों को बढ़ावा देना उन्हीं राजनेताओं का मुख्य उद्देश्य बन गया है, जो दूसरों के लिए क़ानून बनाते हैं, परंतु अपने आपको क़ानून के दायरे से दूर ही रखते हैं। शायद विश्वभर में हिंदुस्तान ही एक ऐसा महत्वपूर्ण गणतंत्रीय राष्ट्र होगा, जहां के अधिकतर राजनेता बलात्कार, दुराचार, हत्या, भ्रष्टाचार, व्यभिचार आदि में ही लिप्त रहते हैं फिर भी अपने आपको चरित्रवान, निष्ठावान, समाजसेवी, राष्ट्रसेवी तथा ईमानदार ही घोषित करते रहते हैं। यह भी एक अति कड़वी सच्चाई है कि आतंकवादी, नक्सली तथा अन्य इसी प्रकार के उग्रवादियों के जन्मदाता तथा पालनकर्ता वास्तव में हमारे सफ़ेदपोश शांति के पुजारी कहलानेवाले राजनेता ही तो होते हैं। आजकल के दिखावे के समय में नागरिकों और देश की सुरक्षा के स्थान पर अपनी निजी सुरक्षा के प्रति अत्यधिक चिंतित रहनेवाले राजनेता पता नहीं क्यों, उन्हीं लोगों से डरे हुए रहने लगे हैं, जो उन्हें वोट देकर चुनते रहते हैं। ये राजनेता ही अधिकांश शिक्षा संस्थानों के प्रमुख होते हैं और इन्होंने ही शिक्षा को व्यापार बना रखा है। मैं यह समझ नहीं पाता हूं कि जो स्वयं संस्कारहीन होते हैं, वो दूसरों को किन संस्कारों की शिक्षा दे सकेंगे और जो खुद ही पथभ्रष्ट हो गये हैं, वो दूसरों का मार्गदर्शन कैसे कर सकते हैं। इन्हीं के प्रोत्साहन के कारण हिंदुस्तान जैसे महान गणतंत्र को `गण तंत्र' बना देनेवाले लोग फल-फूल रहे हैं। ग़रीब लोग देश के अनेक भागों में आत्महत्या करने पर मजबूर होते जा रहे हैं। कर्ज के बोझ के तले अनगिनत परिवार दबे हुए हैं। बढ़ती महंगाई ने आम आदमी की कमर ही तोड़ दी है, परंतु फिर भी दावा यही किया जा रहा है कि हिंदुस्तान और हिंदुस्तानी प्रगति कर रहे हैं। बेरोज़गारी बढ़ती ही जा रही है, परंतु आंकड़ों के जरिये यही प्रमाणित किया जा रहा है कि अधिकतर लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराये जा रहे हैं। अनेक प्राकृतिक आपदाओं के कारण खेती को भीषण नुकसान उठाना पड़ रहा है, परंतु दावा यही किया जाता रहा है कि हिंदुस्तान में कृषि पैदावार बढ़ रही है। आवश्यक वस्तुओं के दाम सारी सीमाएं तोड़ते जा रहे हैं, परंतु घोषणा यही की जाती है कि मूल्यों को नियंत्रण में रखा जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाएं हिंदुस्तान में अचानक आसानी से धन लूटने का साधन बनती जा रही हैं। कुपोषण के कारण लाखों बच्चे और बड़े असहाय तथा जर्जर अवस्था में पड़े हैं और मृत्यु का इंतजार कर रहे हैं और राजनेता चिल्ला-चिल्लाकर यही कहते रहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को भूख या कुपोषण का शिकार नहीं होने दिया जायेगा।

भारत के 58 साल गणतंत्र की अनेक उपलब्धियों पर हम फक्र कर सकते हैं। लोकतंत्र में हमारी चरित्रगत आस्था का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है कि दुनिया के सबसे बड़े और जटिल समाज ने सफलतापूर्वक 15 राष्ट्रीय चुनाव संपन्न किए। सरकारों को बनाया और बदला। विशाल और सशक्त सेना जनप्रतिनिधियों के आदेश पर चलने के अलावा कुछ और सोच भी नहीं सकती। पिछले एक दशक से हमारी आर्थिक विकास की रफ्तार लगभग 9 फीसदी बनी हुई है। 1975 के आपातकाल के कुछ महीनों के अलावा देश के नागरिक अधिकारों और मीडिया की स्वतंत्रता पर कोई राष्ट्रीय पाबंदी नहीं लग सकी, आदि।

दूसरी ओर, गैर बराबरी और भूख से हुई मौतों, किसानों द्वारा आत्महत्याओं, महिलाओं की असुरक्षा और बलात्कार, जातिवाद, सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, अशिक्षा आदि कलंक भी हमारे लोकतांत्रिक चेहरे पर खूब दिखाई देते हैं, किंतु इन सबमें सबसे अधिक शर्मनाक देश में चलने वाली बच्चों की गुलामी और बाल व्यापार जैसी घिनौनी प्रथाएँ हैं। बाल वेश्यावृत्ति, बाल विवाह, बाल मजदूरी, बाल कुपोषण, अशिक्षा, स्कूलों, घरों और आस-पड़ोस में तेजी से हो रही बाल हिंसा से लगाकर शिशु बलात्कार जैसी घटनाएँ हमारी बीमार और बचपन विरोधी मानसिकता की परिचायक हैं। भारत में लगभग दो तिहाई बच्चे किसी न किसी रूप में हिंसा के शिकार हैं। 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 47 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। गैर सरकारी आँकड़ों के अनुसार 6 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी और आर्थिक शोषण के शिकार हैं औरइतने ही बच्चे स्कूलों से बाहर हैं।

कभी-कभी लगता है कि हम आज भी गुलाम हैं। बस पराधीनता का स्वरूप बदल गया है। हजारों साल पुरानी हमारी इस सभ्यता को कई बार गुलाम बनाया गया और कई वंशों और सभ्यताओं ने हम पर शासन किया। पर कभी-कभी ऐसा लगता है कि आज भी कोई हम पर शासन कर रहा है। शायद हमारी अपनी ही बनाई व्यवस्था के अधीन कभी-कभी हम अपने आप को जकड़ा हुआ महसूस करते हैं। पता नहीं हमारे सत्ताधीशों को इस पर शर्म आएगी कि नहीं? वे गणतंत्र दिवस समारोह की चकाचौंध में उस गण की दशा की ओर शायद ही देखना चाहें, जिसके बूते वे भारतीय गणतंत्र के स्तंभ बनने का दंभ पाले हुए हैं। वास्तव में देश भी महान है, देशवासी भी महान हैं, देशवासियों की सहनशीलता भी महान है और अत्याचार करनेवालों की कर्तव्यपरायणता भी महान है। अपनी लाचारी, मजबूरी, निष्क्रियता, संवेदनहीन आलसीय प्रवृत्ति, टालने की आदत और अपने भाग्य को कोसते रहने की आदत को नतमस्तक हो प्रणाम करनेवाले हम सब हिंदुस्तानियों को एक और गणतंत्र दिवस की ``हार्दिक बधाई''।

क्रमश: - हाल ही में मेरे प्रिय कवि विनीत चौहान की कुछ पंक्तियां यू-टयूब के माध्यम से मुझे सुनने को मिली । इस गणतंत्र के मौके पर पंक्तियां सटीक बैठती हैं-

सांप, नेवले और भेडिये एक दूजे के मीत मिले,

सारे सिंह मुलायम निकले मिमियाते सुरजीत मिले,

चरण चाटते हुए मिले सब राजनीति की ड्योडी पर,

और पीएम शीश झुकाये बैठे दस जनपथ की सीढ़ी पर ।।।



e-mail-
ankur.vijaivargiya@gmail.com
ankur.media01@gmail.com
(लेखक जनसंचार विभाग के पूर्व छात्र हैं)

Tuesday, November 23, 2010

Should prostitution be made legal?



NITISHA KASHYAP
MAMC III SEM
BHOPAL,23 NOVEMBER 2010


We all know that India has an oldest past of prostitution in the world. It was started by the kings and at that time they were called “nagar vadhu”. They exist even today and now they are called prostitutes or sex workers. The question is should their work be legalized or not.
Sonagachi in Kolkata and Malishahi in Orissa are quite famous red light areas. According to reputed English daily there were more than 10, 0000 sex workers, in the year 1990, in Mumbai, Kolkata, Bangalore, Hyderabad and Delhi. The major reason for women to join this field is poverty and lack of money. Other reasons being family dispute, trafficking, rape etc. Once they enter it becomes difficult and almost impossible for them to get out of that cobweb. In fact, finding no way out they actually start compromising in that situation and in the later stage they help in bringing more girls to this profession.
If we neglect the morality issue, the sex workers are doing nothing wrong. They are simply earning their livelihood. Obviously no woman willingly comes to this field. As they cannot find a way to earn they get into this business. For the survival purpose they start selling themselves. They give service for which they earn money, a means for surviving. It might be surprising to know that, though they come here for money, they are deprived of money. Their money is handled by the pimps and dalals. For a client they get Rs 8. (as told by a sex worker of Sonagachi in her interview. ) also they can earn till the age of 30 only, after that either they marry the pimps and get involved in this business or they buy a room and rent it to other prostitutes, or start selling betel leaves or cigarette in that red light area.
Just like any other work their work should also get recognition in the eyes of law. In India, the prostitution work is illegal. The sex workers face many problems. They can’t hold a bank account, can’t buy any property or a hospital card for checkups. Why? Literally they are a non-entity for the administration. Society neglects them. Ironically our society never neglects or looks down upon men who pay their visit to them. ( May be because we live in a patriarchal society).
Health happens to be one of the concerns. If this work is legalized they can have property, bank account, and can even file complaints against the harassment. The child prostitutions will get a hold. The workers would be provided a proper medication. At present maximum of them are suffering from AIDS. The NGOs provide them condoms but they are not able to control the increase in HIV positive cases. So if this work is made legal they would get a proper health facility, pimps will be curbed, trafficking will be controlled and the most important the child prostitution will stop.
But the question is will legalizing stop the flourishment of this business. No, what I think is “prostitution breeds prostitution”. Legalizing will not help. Even if it is legalized the social construct will not accept them. We may provide them rights (as we are in a democratic state it is unfair not to give them equal rights.) but we cannot change people’s perception nor can we ask society to give them respect as it becomes a personal matter whom to respect and whom to not. Secondly, even if it is legalized there is no guarantee that the clients will use condoms. As that interview red, though they are provided condoms manyatimes the clients refuse to use it and since they have to earn they agree. So there will be no curb on AIDS.
As far as owning a property is concerned they would not get out of that place or of that business. There is a place called Sukha, in Madhya Pradesh (few kilometers away from Sagar). It is a red light village. Each and every member of this village is involved in this business. Fathers, husbands and brothers get the client for the females in their house. The government under the Indra Awaas Yojna has allotted all of them a house to live. Shockingly they have rented them for the purpose of prostitution. The land given to them for farming have been sold out and alcoholic drinks were brought out. This means that they don’t want to get out of that business (Off course we cannot generalize). So legalizing their business will, instead of eradicating, make it more intense.
Thirdly, why cannot we teach those, who want to get out of that hell, how to make candles, handicraft works, pappad making or pickles etc. We can also educate them. If government can provide houses and lands for farming they can obviously provide funds for this noble cause. Also the NGOs fighting for their legalization can also help them by educating them and by making them learn.
Though it might sound little rude but in order to give them social respect (which we are not going to achieve in the near future) we cannot legalise the work and hence leave the business to grow like a quagmire.

Monday, October 25, 2010

WOMEN EMPOWERMENT



Vikas Mishra
MAMC I SEM
25 october,2010
Our religious scriptures enjoin upon us the duty to accord due respect to women. God live where women are worshipped. The need to incorporate the injunction into the constitution of India arose due to the prevailing atmosphere in which women are denied the rightful place in society and are subjected to humiliations, galore which reduce them to a position inferior to men.
The average women have always led a life not better than that of a slave. At all the stages of life, right from childhood to the old age, she have been in a subordinate position to man. She has never been recognized as an independent entity free to select a course of her life at her own choice. Her good has always been said to be associated with the good of the husband whose service alone has been recognized as a way for deliverance. For wife the only God worth worshipping is her husband regardless of the fact that he treats her well or not. The irony is that “man is born of woman and yet the latter is dominated by the former“. Women have been enslaved, degraded and subjected to various types of atrocities and tyrannies at the hand of men and the men have dominated society. Even the modern times have not brought liberation of them. The gift of democracy which we have received from our generation is denied to women. Not to speak of the women of India, their counterparts in some advanced countries too were never treated on a footing of equality with their men folk - for example the united kingdom adult franchise to women was as late in coming as 1928 . Women in France were enfranchised as late as 1956.
Education has always been regarded as the sole preserve of men. All this is highly derogatory for women. Most parents treats a girl as an inferior being and consider them an unwanted burden. There is a clear discrimination in favour of boys and against the girls in their upbringing. In matter of education again girls are blatantly discriminated. That is why women’s education in India as well as in other countries lag behind men’s education. Women are subjected to various kinds of harassments and atrocities if they dare to come out of the four walls of their household.
But certain measures for the empowerment of women are being taken like reservation for women in jobs and in legislative assemblies and other democratic institutions right from the parliament down to the village panchayats is round the corner. Steps are being taken in government services to allow out of turn promotion to women. Girl’s education is receiving top priority with a number of Indian already having made female education up to intermediate level free. Thinking is also a foot to make degree and university education also free for women. Measures are also being taken to make women self- reliant economically in the rural India. Excellence in every field of life is no longer a man’s preserve. Women power is asserting itself surely.
To conclude I would say, “Women are the maker and moulder for the destiny of every society “.

Wednesday, October 20, 2010

सामाजिक बदलाव के माध्यम बन सकते हैं हमारे उत्सव




-प्रो. बृजकिशोर कुठियाला
भोपाल, 20 अक्टूबर 2010

अक्टूबर का महीना त्यौहारों व उल्लास का समय है। चारों तरफ आस्था- पूजा संबंधी आयोजन हो रहे हैं और पूरा समाज भक्तिभाव में डूबा हुआ है। न केवल मंदिरों में बाजारों और मोहल्लों में भी स्थान-स्थान पर नवरात्रों के उपलक्ष्य में दुर्गा, लक्ष्मी व सरस्वती की आराधना से वातावरण चौबीसों घंटे गूंजता है। समाज का लगभग हर व्यक्ति, कुछ कम कुछ ज्यादा इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेता है। सामाजिक उल्लास व सार्वजनिक सहभागिता का ऐसा उदाहरण और कहीं मिलता नहीं है। बच्चे, किशोर, युवा, वृद्ध, स्त्री, पुरूष, मजदूर, किसान, व्यापारी, व्यवसायी सभी इन सामाजिक व धार्मिक कार्यों में स्वयं प्रेरणा से जुड़े हैं। इन कार्यक्रमों के आयोजन के लिए और लोगों की सहभागिता के लिए कोई बहुत बड़े विज्ञापन अभियान नहीं चलते, छोटे या बड़े समूह इनका आयोजन करते है और स्वयं ही व्यक्ति और परिवार दर्शन -पूजन के लिए आगे आते हैं। कहीं भी न तो सरकारी हस्तक्षेप है और ना ही प्रशासन का सहयोग। उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम सभी महानगरों, नगरों और गांवों में धार्मिक अनुष्ठानों की गूंज है।
केवल यह अक्टूबर में होता है ऐसा नहीं है, पूरे वर्ष छोटे या बड़े अंतराल से कुछ न कुछ आस्था व पूजा संबंधी कार्यक्रम पूरे देश में चलते रहते हैं। वर्ष में दो बार तो रोजों का ही चलन है, दो बार नवरात्रों में 20 दिन के लिए समारोह होते हैं। अक्टूबर के नवरात्रों का अन्त दशहरे के विशाल आयोजन से होता है और दिवाली के 20 दिनों की गिनती प्रारंभ हो जाती है। ईदज्जुहा पर भी सामूहिकता का परिचय होता है। बीच में करवा चौथ का त्यौहार पड़ता है जो कहने के लिए तो महिलाओं के लिए है परन्तु पूरा परिवार ही उसमें उत्साहित होता है। हर पति करवा चौथ के दिन सामान्य से अधिक प्रेम व महत्व प्राप्त करता है, जिससे पारिवारिक संबंध दृढ़ होते हैं। दिसम्बर में क्रिसमस, जनवरी में लोहड़ी, फरवरी में शिवरात्रि, मार्च में फिर से नवरात्र व होली, अप्रैल में वर्ष प्रतिप्रदा, गुड फ्रायडे व बाद में जन्माष्टमी, रक्षाबंधन और इसी तरह सिलसिला चलता रहता है। संक्रांति, अमावस्या, पूर्णिमा यह सभी हमारे समाज में कुछ न कुछ महत्व रखते हैं और अनुष्ठान, सरोवरों में नहाने आदि की अपेक्षा रखते है।
इन पारंपरिक उत्सवों का रूप और भव्यता दिन पर दिन बढ़ती जा रही है और विशेष कर युवा वर्ग तो इनका आनंद सर्वाधिक लेता है। इसकी तुलना में स्वतंत्रता के बाद तीन राष्ट्रीय पर्वों में जनता की सहभागिता लगभग नगण्य है। गणतंत्र दिवस ( 26 जनवरी) तो केवल सरकारी कार्यक्रम बनकर रह गया है। स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में दिल्ली व अन्य प्रान्तों की राजधानियों में झांकियों आदि के कार्यक्रम होते थे और उसमें लोग उत्साह से जाते थे परन्तु वह उत्साह लगभग समाप्त हो गया है और ये कार्यक्रम केवल प्रशासनिक स्तर पर मनाये जाते हैं और जिनको उनमें होना आवश्यक है वही जाते है। इनमें आम जनता की उपस्थिति कम होती जा रही है। स्वतंत्रता दिवस यानि 15 अगस्त का भी यही हाल है। गणतंत्र दिवस और 15 अगस्त के दिन राष्ट्रीय ध्वज यदि घर-घर पर दिखता, तो कह सकते थे कि आम व्यक्ति की भावना इन उत्सवों से जुड़ी है परन्तु ये दोनों दिन एक अवकाश के रूप में तो स्वागत योग्य होते है, परन्तु इनके महत्व को जानकर सामूहिक कार्यक्रमों का ना होना चिन्ता का विषय है। इसी प्रकार गांधी जयन्ती के दिन औपचारिक कार्यक्रम तो गांधी जी से संबंधित संस्थानों में हो जाते हैं परन्तु आम व्यक्ति गांधी को स्मरण कर उनके प्रति श्रद्धा भाव प्रकट करे ऐसा होता नहीं है। 30 जनवरी को प्रातः 11.00 बजे सायरन तो बजता है परन्तु कितने लोग उस समय मौन होकर गांधीजी को श्रृद्धांजलि देते हैं, यह सब जानते ही हैं। राष्ट्रीय उत्सवों में सहभागिता नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि समाज में राष्ट्रभाव की कमी है, परन्तु इन उत्सवों का सामाजिक चेतना से सम्बन्ध नहीं बन पाया है। इनके कारण एकता और समरसता का वातावरण नहीं हुआ है।
हमारे समाज के पारंपरिक उत्सवों में भी बहुत परिवर्तन आये हैं, झांकियों में आधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग करके उनको अधिक आकर्षक बनाया जाता है, कलाकार मूर्तियों को गढ़ने में नित नए-नए प्रयोग करते हैं, गीतकार नए शब्दों, भावों व धुनों से खेलते हैं, गायक गीतों को आम आदमी के गुनगुनाने वाले गानों में बदलते हैं। अब तो इवेन्ट प्रबंधन के कई व्यवसायी संस्थान इन कार्यक्रमों का दायित्व लेते हैं। दांडियां व गरबा जिस प्रकार गुजरात से निकलकर पूरे देश में प्रचलित हो रहा है यह इस बात का द्योतक है कि आम भारतीय उत्सव प्रिय है व समारोहों में स्वप्रेरणा से सहभागिता करने का उसे शौक है। ऐसा इसलिए है कि हर त्यौहार व पूजन का कहीं न कहीं आम आदमी से जीवन की अपेक्षाओं से संबंध है। हर त्यौहार का कोई न कोई सामाजिक उद्देश्य भी है जो कहीं न कहीं इतिहास और परम्पराओं से भी जुड़ता है। जहां होली पूरे समाज को एक रस करती है उसमें सत्य की विजय का भी भाव है। दशहरा समाज की विध्वंसकारी शक्तियों के नाश का द्योतक है और दिवाली परिवारों में वापसी का त्यौहार।
इन सभी त्यौहारों का संबंध भूतकाल में होते हुए भी इनकी प्रासंगिकता वर्तमान की परिस्थितियों से भी है। हजारों या सैकड़ों वर्ष पूर्व समाज में जो घटा उससे मिलता जुलता आज के समाज में भी हो रहा है। दशरथ के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए रावण ने वनों में आश्रमों पर आक्रमण करने के लिए अपने साथियों को भेजा, जिससे दशरथ के राज्य का संबंध उन ऋषि- मुनियों से टूट जाए जहां से राज्य की नीतियों का निर्धारण होता था। आज का आतंकवाद और माओवाद भी इसी श्रेणी में आते हैं। विश्वामित्र सरीखे न तो बुद्धिजीवी आज हैं और न ही अपने प्रिय पुत्रों को राक्षसों के संहार के लिए भेजने का का साहस करने वाले प्रशासक। वास्तव में तो संकल्प शक्ति ही नहीं है। विजयादशमी को आतंक के विरोध में दृढ़ संकल्प का रूप दिया जा सकता है। ऐसा करने से समाज का सहयोग देश के अंदर की अराष्ट्रीय शक्तियों से निपटने के लिए किया जा सकता है। केवल भावनात्मक संवेदनाओं को पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता है।इसी प्रकार होली को सामाजिक समरसता के उत्सव के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास होना चाहिए जिससे कि जाति, वर्ण व गरीबी अमीरी का भेद मिटकर समाज राष्ट्र बोध के रंग में ही रंग जाए। पश्चिम व कई अन्य प्रभावों के कारण आज देश में परिवारों का विघटन हो रहा है और सामाजिक भीड़ में व्यक्ति अकेला होता जा रहा है। सर्वमान्य है कि यह समाज के लिए घातक है। करवाचौथ, रक्षाबंधन व भाईदूज जैसे त्यौहार है जिनको फिर से परिवार, विशेषकर संयुक्त, परिवार की स्थापना के लिए प्रयोग किया जा सकता है। रोजे व नवरात्र व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास के साधन हैं, उन्हें इस रूप में और प्रचारित करने की भी आवश्यकता है। स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस राष्ट्र के प्रति बार-बार समर्पण के त्यौहार होने चाहिए जहां व्यक्ति प्रान्त और क्षेत्र से ऊपर उठकर राष्ट्र की सोच से जुड़े। गांधी जयंती के दिन समाज अहिंसा का पाठ तो पढ़े ही, परन्तु गांधी द्वारा स्वदेशी के आग्रह को वैश्वीकरण के संदर्भ में व्यवहारिक रूप में लाने की प्रेरणा भी ले। त्यौहारों के इस देश में उत्सव न केवल सामाजिक परिवर्तन के द्योतक है परन्तु वे सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक विकास के साधन भी हैं। करोड़ों के विज्ञापनों के द्वारा जो मानसिक परिवर्तन नहीं हो पाता है वह इन त्यौहारों के माध्यम से सहज ही होगा। इस बात के प्रमाण भी हैं, देश के पश्चिमी भाग में गणेश पूजन के कारण सामाजिक क्रांति लाई गई थी। राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय मार्केटिंग के प्रयास इन त्यौहारों में बखूबी होते है और वस्तुओं व सेवाओं को बेचने का काम प्रभावी रूप से होता है। यदि ये व्यापारिक कार्य हो सकता है तो सामाजिक कार्य इन त्यौहारों के माध्यम से अवश्य ही हो सकता है। केवल मन बनाकर योजनाबद्ध प्रयास करने की आवश्यकता है।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं)

संपर्कः कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र)

Saturday, April 10, 2010

याद आये वो पल


-साकेत नारायण, एमए-जनसंचार-सेकेंड सेमेस्टर
कहते है वो यादें ही है जो हमेशा हमारे साथ रहती है। समय के साथ पुराने रिश्ते खत्म होते है और कई नये रिश्ते बनते है, पर वो यादें ही है जो हर बीतते समय के साथ और मजबूत हो जाती है।
बात जब कॉलेज लाइफ के यादों की हो तो मजा दुगना हो जाता है। कई स्मृतियाँ और मस्ती के पल आँखो के सामने एक फीचर फिल्म की तरह चलने लगते है। कुछ हँसने के पल, कुछ मस्ती के लम्हें, वो रुठना, वो मनाना, वो सारे अनकहे लम्हें यादों के झरोखे में आ जाते है। साथ ही जब हमें एक ऐसा मंच मिल जाये जो कि हमारी उन यादों को ताजा कर दे और हमें उन यादों से जोड़ दे तो मजा बढ़ जाता है। कुछ ऐसा ही हुआ 4 अप्रैल 2010 को जब माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पुराने छात्रों का सम्मेलन हुआ। वह दृश्य इतना मनोरम था कि सारे लोग अपनी यादों की दुनिया में खो गये। वो सारी यादें ताजा हो गई। मानो वो सारे लोग दुबारा अपनी युवा अवस्था में आ गये हो और अपने कॉलेज लाइफ को जी उठे। सारे पुराने छात्र अपनी पुरानी यादें हम सब से बाँट रहे थे और वही हम सब नये छात्र अपने पुराने कॉलेज की यादों में खो गए थे।कोई व्यक्ति कुछ भी बन जायें, वह कितना भी सफल हो जायें परंतु अपने पुराने कॉलेज के दोस्तों के आगे उसकी एक नही चलती। हमारी सारी शेखी उन महान पुरूषों के आगे धरी की धरी रह जाती है। आख़िर हो भी क्यों न ये हमारे उस सुख दुःख के साथी है जिनके साथ हमने अपने सारे राज बाटे, अपनी खुशियों का जश्न मनाया और दुःख के समय इन्ही कंधो पर रोए भी। हमारे ये दोस्त हमेशा हमारे साथ रहें या न रहें पर उनकी सारी यादें हमेशा हमारे साथ थी, हैं और रहेगी। दोस्तो, हमेशा याद आयेगें वो पल।

Monday, March 29, 2010

जाति प्रथा- एक अभिशाप


प्रस्तुतिःशिशिर सिंह
जनसंचार सेमेस्टर-II

आधुनिक भारत के इतिहास के आरंभ से ही समाजसुधारक, राजनेता और चिन्तक यहां तक की अब भारत का सर्वोच्च न्यायालय इस तथ्य को रेखांकित करता रहा है कि भारत के चौतरफा विकास के लिए जाति प्रथा का अंत होना जरूरी है। सर्वोच्च न्यायलय की इस मान्यता के पीछे यह कड़वी सच्चाई काम कर रही है कि, जाति प्रथा और जातिवादी चेतना ने भारतीयों के जीवन के हर क्षेत्र में विध्वंसकारी भूमिका अदा की है। आजादी के साठ वर्ष के बाद भी तथा देश के संविधान और कानून में उसके निराकरण के लिए किए गए प्रावाधानों के बावजूद यह व्यवस्था कमजोर पड़ने के बजाए और ढृढ ही होती दिखाई दे रही है। आज देश में एक भी जाति ऐसी नहीं है जो जातिवादी चेतना से ग्रस्ति न हो। एक आम रुझान यह देखने को मिलता है कि जातिवाद के सभी अभिव्यक्तियों को एक समान मानकर उनकी एक ढंग से निन्दा व आलोचना की जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि जातिवादी चेतना के विभिन्न रंग रुपों में अंतर स्पष्ट किया जाए और उनके मूर्त सार तत्व को पकड़ा जाए।
जाति एक विभाजक शक्ति
जाति प्रथा और जातिवाद देश के अंदर एक विभाजनकारी शक्ति के रुप में काम कर रही हैं। इसमें इस व्यवस्था ने देश के अंदर की एकता को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आजादी के बाद से ही बिहार में गुजरात में, हाल ही में राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश आदि स्थानों पर आरक्षण के सवाल पर एक जाति के लोग दूसरी जाति के विरुद्ध खड़े हो गए हैं। आज बाह्मण हो या क्षत्रिय, वैश्य हो या दलित या पिछड़ी जातियां हों, कोई भी ऐसी जाति नहीं है जिसका अपना एक या एक से अधिक जाति संगठन मौजूद न हो। ब्राह्मण सभा, क्षत्रिय सभा, पाल समाज, खटीक समाज, आदि सभी समाजों के अपने संगठन है और सभी अपनी जाति के तंग दायरे में रहकर ही सोचते हैं।
जाति की विभाजनकारी भूमिका से प्रशासनिक सेवायें भी अछूती नहीं रही है। जाति के आधार पर गोलबंदी पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों तथा कर्मचारियों के अंदर भी देखने को मिल जाती है। जातिवादी उभार ने जाति पंचायतों को विशेषकर उत्तर प्रदेश व हरियाणा में सक्रिय तथा मजबूत किया है। ये जाति पंचायतें देश के संविधान, कानून तथा मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हुए व्यक्ति की स्वतंत्रता व जीवन के अधिकार पर हमला कर बर्बर युग की याद दिला देती है। वह युवक-युवतियों को अंतर्जातीय विवाह करने पर मौत की सजा सुना देती है। गोत्र नियमों के उल्लंघन के नाम पर वह पति-पत्नी को अपना रिश्ता तोड़कर भाई-बहन के रुप में रहने का तुगलकी फरमान जारी कर देती हैं। ऐसा करते समय वह देश के कानून और संविधान को मुंह चिढ़ा रही होती है। जाति पंचायतें जाति की विभाजनकारी भूमिका को और गहरा करने का काम करती है।
सवर्णों के अंदर पाई जाने वाली जाति चेतना
सवर्णों के अंदर पायी जानी वाली जातिवादी चेतना का एक रुप वह है जो उनकी सामंती-शोषक मनोवृत्ति का परिचायक है। एक समय था जब दबंग जातियों के रुप में सवर्ण जमीन के मालिक थे, सरकारी नौकरियों पर एक तरह से उनका एकाधिकार था। उद्योग व्यापार उनके हाथ में थे। सरकार पर उनका वर्चस्व था तथा सामाजिक क्षेत्र में वह विशेष अधिकार संपन्न समुदाय के रुप में थे। आजादी के बाद सीमित रुप में ही सही पर उनकी इस स्थिति में प्रतिकूल बदलाव आया। उनके वर्चस्व और विशेष अधिकरों को चुनौती मिलने लगी। इस परिस्थिति में सामंती-शोषक मनोवृत्ति से ग्रस्त सवर्णों का यह तबका हर कीमत पर अपने राजनीतिक आर्थिक एवं सामाजिक विशेष अधिकरों को बनाये रखने के लिए कृत संकल्प हो आक्रमक रुख अपना लेता है। बराबरी तथा न्याय के लिए दलितों की आवाज को वह बल प्रयोग द्वारा कुचल देना चाहता है। दलितों की ह्त्यायें, उनकी बस्तियों में लूट और आगजनी, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार आदि जघन्य अपराध इसी जातिवादी सोच से निकलते हैं।
दूसरा पहलू है सरकार की गलत नीतियां : आर्थिक तबाही के चलते आजकल अधिकांश सवर्ण नौजवानों के सामने शिक्षा एवं रोजगार की गंभीर समस्या पैदा हो गई है। शिक्षा पाने के अवसरों से वंचित होना और बेरोजगारी का शिकार होना यह वर्तमान सरकार और विकास के सत्यानाशी नीतियों का परिणाम है।
लेकिन जातिवादी नेताओं ने उसे यह कहकर गुमराह कर दिया कि उसे शिक्षा और रोजगार के अवसर से इसलिए वंचित होना पड़ा रहा है क्योंकि आरक्षण के व्यवस्था के चलते यह अवसर दलितों और पिछड़ो को आरक्षित कर दिये गये हैं। जातिवादी ताकतों के बहकावे में आकर यह नौजवान आरक्षण की नीति को अपनी बर्बादी का कारण मान लेता है और अपनी जाति के स्वार्थी नेताओं के द्वारा बहकाया जाकर जातीय दंगो व संघर्षों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगता है।
पिछड़ो के अंदर जातिगत चेतना
जहां तक पिछड़ो और दलितों का संबंध है यह याद रखना होगा कि वह जातियां तो है ही, लेकिन इसके साथ ही आजादी के साठ वर्ष के अंदर होने वाले सामाजिक, आर्थिक परिवर्तनों ने उनके अंदर भी वर्ग विभाजन को पैदा कर दिया है। आजादी के बाद के भू-सुधारों ने चाहे वह कितने ही अधूरे और सतही क्यों न रहे हो। ग्रामीण क्षेत्र में पिछड़ी जातियों की आर्थिक स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। आजादी से पूर्व इन पिछड़ी जातियों के पास कृषि भूमि का मात्र आठ प्रतिशत था। लेकिन आजादी के बाद के सुधारों के फलस्वरुप वह वर्तमान में लगभग चालीस फीसदी कृषि भूमि के मालिक हैं। ग्राम सभा, जंगल और नजूल की जमीन पर जो अवैध कब्जा किया हुआ है वह अलग। इसके फलस्वरुप हिन्दी भाषी क्षेत्र में जाट, यादव, कुर्मी आदि भू-स्वामी अर्थात् गांव में वर्चस्ववादी जाति के रुप में उभर कर सामने आये हैं। इन जातियों के इस भू-स्वामी तबके में वही शोषक सामंती जातिवादी सोच पैदा हो गयी है जो ग्रामीण सवर्णों में पाई जाती है।
जातिवाद और राजनीति
जातिप्रथा ने देश की संसदीय जनतांत्रिक पद्धति को प्रदूषित करने का ही काम किया है। उसने एकीकरण की चेतना को कमजोर बना करके उसके स्थान पर जाति आधारित राजनीतिक चेतना को स्थापित किया है। यह राजनीतिक जातिवादी चेतना कई रूपों में काम कर रही है। एक स्वस्थ राजनीति में राजनीतिक दलों की पहचान उनके राजनीतिक कार्यक्रम तथा राजनीतिक विचारधारा से होती है। लेकिन जातिवादी की मेहरबानी के कारण भारत में विशेषकर हिन्दी भाषी क्षेत्र में अधिकांश राजनीतिक दलों को उनके जातीय जनाधार के आधार पर चिन्हित करने और उसी रुप में उनके प्रति रुख अपनाने का रुझान बढ़ा है। इस तरह बहुजन समाज पार्टी मूलतः दलितों की पार्टी हो जाती है जो अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए दूसरी जातियों के साथ समीकरण बैठाने का काम करती है। समाजवादी पार्टी का मूल जातीय जानाधार पिछड़ों में यादव जाति है। उत्तर प्रदेश में अपना दल कुर्मियों की राजनीतिक पार्टी है। राजनीति में इस क्षेत्र में जाति का आधार कोई नयी बात नहीं है। न केवल हिन्दी भाषी क्षेत्र में बल्कि देश के पैमाने पर सत्ता में अपनी इजारेदारी को कांग्रेस ने जो एक राष्ट्रीय दल कहा जाता है, ब्राह्मण, दलित जातियों के गठजोड़ के साथ अल्पसंख्यकों को लेकर स्थापित किया था। चौधरी चरण सिंह जब कांग्रेस से अलग हुए तो उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में वर्चस्व रखने वाली जातियों अहीर, जाट, गुर्जर तथा राजपूतों को साथ लेकर अपने राजनीतिक दल का गठन किया था। हिन्दुत्व के एजेंडे को लेकर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी और उसका आदि रुप जनसंघ पार्टी स्वाभाविक तौर पर सवर्ण जातियों की पार्टी के रुप में पहचान रखती है। जाति आधारित राजनीतिक दल केवल हिन्दी भाषी क्षेत्र की ही विशिष्टता नहीं है। सुदूर दक्षिण में तमिलनाड़ु में पीएमके तथा एनडीएमके पार्टियां भी जातिवादी पार्टिय़ां होने के अलावा और कुछ भी नहीं है। आंध्र प्रदेश हो या कर्नाटक, गुजरात हो या महाराष्ट्र इन सभी स्थानों पर अधिकांश राजनीतिक दल (केवल वामदलों को अपवाद के रुप में छोड़कर) जातिवादी के चश्मे से देखने, संगठित होने और काम करने की बीमारी के शिकार है।
जब राजनीतिक दल ही जाति के विषाणु से ग्रस्त है तो फिर राजनीतिक चुनाव पद्धति कैसे उससे बच सकती है। चुनाव के दौरान, वह चुनाव चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का हो अथवा स्थानीय संस्थाओं का हो, जाति की अहम भूमिका हो जाती है। राजनीतिक दलों के लिए जातियां वोट बैंक में तब्दील हो जाती है। जिनको अपने कब्जे में लेने के लिए वह किसी भी तरह के अवसरवादी कदम उठाने से नहीं हिचकिचाते हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान में विधानसभा चुनाव जीतने के लिए एक आम चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने जाटों को आरक्षण का लाभ देने के लिए उन्हें ‘पिछड़ा’ घोषित कर दिया, इसका लाभ उन्हें चुनाव में मिला। अगले अर्थात आगामी चुनाव में इसी कार्यनीति पर अमल करते हुए गुर्जरों को ‘अनुसूचित जाति’ घोषित करने का वायदा किया गया। इस वायदे के पूरा न होने से राजस्थान में सरकार और गुर्जरों के बीच में तो टकराव हुआ ही इसने गुर्जर और मीणा जाति को भी जातियुद्ध में आमने सामने खड़ा कर दिया। समानता पर विश्वास रखने वाले ‘समाजवाद’ में आस्था रखने वाली समाजवादी पार्टी जाति प्रथा को नष्ट करने के लिए संघर्ष न चलाकर, वोट बैंक के खातिर विभिन्न जातियों के ‘समाजवादी’ संगठन बना रही है। इस तरह समाजवादी क्षत्रिय सभा आदि जातिवादी संगठन अस्तित्व में आकर सक्रिय हो जाते हैं। विभिन्न पार्टियां चुनाव के लिए अपने प्रत्याशियों का चयन करते समय उनकी योग्यता से पहले जाति को देखती हैं। यह देखा जाता है कि उस क्षेत्र के मतदाताओं से वह कितने जाति वोट पा सकता है। चुनाव प्रचार के समय चुनाव घोषणा पत्र हाथी के दिखाने के दांत की तरह होते हैं। असली प्रचार स्थानीय स्तर के जाति नेताओं को मोलतोल कर अपने पक्ष में करने का होता है ताकि उनके माध्यम से एकमुश्त जाति वोट प्राप्त हो सके। इसलिए एक चुनाव विश्लेषक ने टिप्पणी की थी भारत में लोग वोट नहीं करते हैं अपितु अपनी जाति के लिए वोट करते हैं (Do Not Caste vote but vote their caste).
जाति आधारित उत्पीड़न और अपराध
जाति प्रथा के बढ़ते कुप्रभाव ने समाजिक न्याय के प्रश्न को एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना दिया है। संविधान के प्रावधानों तथा देश के कानूनों को मुंह चिढ़ाते हुए दलितों के प्रति अत्याचार, अपराध और भेदभाव कम होने के स्थान पर बढ़ ही रहे हैं। गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकडे इस कड़वी सच्चाई को सामने लाते हैं। 2006 के लिए गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकडे दलितों पर अपराधों की एक भयावह तस्वीर पेश करते हैं। इस वर्ष उत्तर प्रदेश में अनसूचित जातियों के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या 4960 थी, जो देश में सबसे अधिक थी। दूसरे स्थान पर मध्यप्रदेश था जहां 4214 अपराध दर्ज किए गए। पूरे देश में दर्ज किए गए अपराधों में से आधे से अधिक हिन्दी भाषी क्षेत्र में ही थे। दक्षिण और पश्चिम भारत भी कोई अपवाद नहीं रहे। दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा अपराध आंध्र प्रदेश में हुए जहां इनकी संख्या 3891 थी। चिन्ता की बात यह है कि अपराधों की यह संख्या साल-दर-साल कम होने के बजाए बढ़ती ही जा रही है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में 2004 में यह संख्या 3785 थी, 2005 में बढ़कर 4397 हो गयी और जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है 2006 में 4960 पहुंच गयी है।
उ.प्र. में इटावा के एक गांव में पूरे दलित परिवार की हत्या करने की, फतेहपुर में ग्राम प्रधान दलित महिला की हत्या की घटना चर्चा में रही तो आगरा में दलित बस्ती में आग लगाये जाने का काम हुआ। उत्तर प्रदेश के बाहर महाराष्ट्र के खेरालांजी में दलित हत्याकांड़ ने पूरे देश को ही एक तरह से हिलाकर रख दिया था।
इन अपराधों का सबसे क्रूर पहलू दलित महिलाओं के प्रति अपनायी गयी विकृत मानसिक सोच है। भारतीय समाज में महिला को जाति और परिवार की प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। अतः दलितों पर हमले करते समय उनकी मान प्रतिष्ठा को धूल-धूसारित करने के लिए महिलाओं को खासतौर पर निशाना बनाया जाता है। दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनायें हिन्दी भाषी क्षेत्र में आए दिन की बात है। पश्चिम उत्तर प्रदेश और उससे सटे हुए इलाके में दलित महिलाओं के प्रति प्रचलित वाक्य ‘बकरी को कभी भी दुहा जा सकता है और दलित महिला के साथ कहीं भी और कभी भी सोया जा सकता है’ इस इलाके की दलित और महिला विरोधी विकृत रुग्ण मानसिकता को उजागर करने के लिए पर्याप्त है। दलितों को सिर्फ अत्याचार, उत्पीड़न और अनाचार का ही सामना नहीं करना पड़ रहा है। छूआछूत निवारक कानून के बावजूद वह आज भी समाजिक भेदभाव और असमानता के शिकार है। यह भेदभाव कई रुपों में देखने को मिलता है। आज भी उन्हें कई स्थानों पर मंदिरों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। यदि कानून की शक्ति के बल पर एक कद्दावर राष्ट्रीय नेता जगजीवन राम बनारस में विश्वनाथ के मंदिर में प्रवेश कर भी जाते हैं तो उस मंदिर को धार्मिक अनुष्ठानों के द्वारा पुनः पवित्र किया जाता है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश में सार्वजनिक ढाबों और चाय की दुकानों में दो ग्लास की परंपरा(दलितों के लिए अलग ग्लास, उच्च जातियों के लिए अलग ग्लास) का आज भी पालन होता है। राजस्थान के अंदरुनी ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में दलित बच्चों को आज भी घड़े से सीधे पानी निकालकर पीने की अनुमति नहीं है। हिन्दी भाषी क्षेत्र के लगभग सभी प्रदेशों में यह देखने को मिला है कि जहां भी स्कूलों में ‘मिड़ डे मील’ योजना के अंतर्गत दलित महिला के द्वारा भोजन पकाया गया तो उसे ऊंची जाति के छात्रों ने खाने से इंकार कर दिया। उड़ीसा में एक दलित छात्रा को साइकिल पर सवार होकर स्कूल जाने की अनुमति उच्च जाति के लोगों ने नहीं दी। पुलिस के संरक्षण में ही लड़की साइकिल से यात्रा कर सकी। दलितों के साथ भेदभाव यहीं तक सीमित नहीं है। नौकरियों के मामले में भी उनके साथ भेदभाव हो रहा है। अकसर यह तर्क दिया जाता है कि नौकरियां योग्यता के आधार पर होती है और भेदभाव योग्यता उन्नमुख होता है जाति उन्नमुख नहीं। इस ढकोसले का पर्दाफाश हाल ही में किए गए एक शोध से हो जाता है। इस शोध में एक ही योग्यता को दर्शाने वाले आवेदन पत्र दलित, अल्पसंख्यक और सवर्ण आवेदनकर्ता के रुप में भेजे गए। साक्षात्कार के लिए अधिकांश जगह से केवल सवर्णों को बुलाया गया । उसी योग्यता के होने के बावजूद दलित को साक्षात्कर के लिए भी नहीं बुलाया गया। यह समाज में मौजूद भेदभाव पर आधारित दलित विरोधी चेतना का परिचायक है। यही चेतना है जसके चलते आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद आज भी सरकारी और सार्वजनिक संस्थाओं में दलितों को जितनी नौकरियां प्राप्त होना चाहिए थी उसकी आधी भी प्राप्त नहीं हुई है।
जातिवादी उभार का लाभ उठाकर दलितों एवं पिछड़ो के अंदर के बुर्जुआ सामंती शोषक तत्व अपनी जनता के अधिकांश को अपने पीछे लामबंद करने में सफल हो जाते हैं, इस शोषित जनता के वास्तविक हितों और संघर्षों की उपेक्षा करते हुए सामाजिक न्याय के नारे से भ्रमित कर अपने पीछे गोल बंद कर लेते हैं। देश में सामाजिक न्याय तथा समानता पर आधारित समाज की स्थापना की कल्पना भी जाति प्रथा के रहते नहीं की जा सकती ह। जातिप्रथा अपने जन्म से ही शोषण का हथियार रही है। जातिप्रथा का इतिहास इसका गवाह है ।
जातिवाद से लड़ने का रास्ता
जातिप्रथा और जातिवाद के विरुद्ध प्राचीनकाल से ही आवाज उठती रही है। प्राचीन भारत में गौतम बुद्ध और महावीर मध्यकाल में कबीर और नानक जैसे संत तथा आधुनिक भारत में 19वीं सदी के समाजसुधारक एवं 20वीं सदी में अम्बेडकर जैसे योद्धा जातिप्रथा के विरुद्ध संघर्ष करते आये हैं। किन्तु इन सभी संघर्षों के बावजूद जातिप्रथा आज भी बनी हुई है। यह बताता है इन सुधारकों के प्रयास निष्फल रहे। इन प्रयासों की निष्फलता का कारण यह था कि वह जाति प्रथा की वास्तविकता की पूर्णरुप से ग्रहण नहीं कर सके। उन्होंने इसे केवल विकृत चेतना के रुप में देखा और यह माना कि उसके विरुद्ध मात्र वैचारिक संघर्ष चलाकर उसे समाप्त किया जा सकता है। यह मानते समय वह यह भूल गए कि जातिप्रथा की जड़े शोषणमूलक समाज में मौजूद संपत्ति के संबंधों पर आधारित है तथा संपत्ति के इन संबंधों को समाप्त किए बगैर जाति प्रथा को समाप्त नहीं किया जा सकता। वैचारिक संघर्ष जाति प्रथा को कुछ सीमा तक उदार और कमजोर भर बना सकता है उसे समाप्त नहीं कर सकता।
यह भी मानना कि जाति प्रथा को समाप्त करने के लिए संपत्ति के संबंधों पर चोट करना ही पर्याप्त है यह एक संकीर्णतावादी रुख होगा। जाति प्रथा सामाजिक आर्थिक संरचना का हिस्सा होने के साथ-साथ उससे पैदा होने वाली ऐसी वैचारिक चेतना है जो हजारों वर्षों से लोगों को मिलती रही है और इस तरह वह अपने आप में एक मजबूत शक्ति के रुप में स्थापित हो गयी है। अतःएक स्वस्थ शिक्षा ही इस बुराई को खत्म करने में सहायक हो सकती है।
Biblography:-
Loksambaad fortnightly Newspaper
Caste: A social evil, Author: S.R.TOPPO; Rajat publication