Wednesday, September 7, 2011

सोशल नेटवर्किंगः नए समय का संवाद


-संजय द्विवेदी

तेजी से बदलती दुनिया, तेज होते शहरीकरण और जड़ों से उखडते लोगों व टूटते सामाजिक ताने बाने ने इंटरनेट को तेजी से लोकप्रिय किया है। कभी किताबें,अखबार और पत्रिकाएं दोस्त थीं आज का दोस्त इंटरनेट है क्योंकि यह दुतरफा संवाद का भी माध्यम है। सो पढ़े या लिखे हुए की तत्काल प्रतिक्रिया ने इसे लोकप्रिय बनाया है। आज का पाठक सब कुछ तुरंत चाहता है-इंस्टेंट। टीवी और इंटरनेट उसकी इस भूख को पूरा करते हैं। यह गजब है कि आरकुट, फेसबुक, ट्यूटर जैसी सोशल साइट्स का प्रभाव हमारे समाज में भी महसूस किया जाने लगा है। यह इंटरनेट पर गुजारा गया वक्त अपने पढ़ने के वक्त से लिया गया है। जाहिर तौर पर यह सामाजिकता के खिलाफ है और निजता को स्थापित करने वाला है।

निजता का माध्यमः सूचना और संचार के अभी तक प्रकट सभी माध्यम कहीं न कहीं सामूहिकता को साधते हैं। किंतु इंटरनेट व्यक्ति की निजता को स्थापित करता है। इसका समाज पर गहरा असर देखा जा रहा है। सूचनाएं अब मुक्त हैं। वे उड़ रही हैं इंटरनेट के पंखों। कई बार वे असंपादित भी हैं, पाठकों को आजादी है कि वे सूचनाएं लेकर उसका संपादित पाठ स्वयं पढ़ें। सूचना की यह ताकत अब महसूस होने लगी है। यह बात हमने आज स्वीकारी है, पर कनाडा के मीडिया विशेषज्ञ मार्शल मैकुलहान को इसका अहसास साठ के दशक में ही हो गया था। तभी शायद उन्होंने कहा था कि ‘मीडियम इज द मैसेज’ यानी ‘माध्यम ही संदेश है।’ मार्शल का यह कथन सूचना तंत्र की महत्ता का बयान करता है। आज का दौर इस तंत्र के निरंतर बलशाली होते जाने का समय है। संचार क्रांति ने इसे संभव बनाया है। नई सदी की चुनौतियां इस परिप्रेक्ष्य में बेहद विलक्षण हैं। इस सदी में यह सूचना तंत्र या सूचना प्रौद्योगिकी ही हर युद्ध की नियामक है, जाहिर है नई सदी में लड़ाई हथियारों से नहीं सूचना की ताकत से होगी। मंदीग्रस्त अर्थव्यवस्था से ग्रस्त पश्चिमी देशों को बाजार की तलाश तथा तीसरी दुनिया को देशों में खड़ा हो रहा, क्रयशक्ति से लबरेज उपभोक्ता वर्ग वह कारण हैं जो इस दृश्य को बहुत साफ-साफ समझने में मदद करते हैं । पश्चिमी देशों की यही व्यावसायिक मजबूरी संचार क्रांति का उत्प्रेरक तत्व बनी है। हम देखें तो अमरीका ने लैटिन देशों को आर्थिक, सांस्कृतिक रूप से कब्जा कर उन्हें अपने ऊपर निर्भर बना लिया। अब पूरी दुनिया पर इसी प्रयोग को दोहराने का प्रयास जारी है। निर्भरता के इस तंत्र में अंतर्राट्रीय संवाद एजेंसियां, विज्ञापन एजेसियां, जनमत संस्थाएं, व्यावसायिक संस्थाए मुद्रित एवं दृश्य-श्रवण सामग्री, अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार कंपनियां, अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियां सहायक बनी रही हैं। लेकिन ध्यान दें कि सूचनाएं अब पश्चिम के ताकतवर देशों की बंधक नहीं रह सकती। उन्होंने अपना निजी गणतंत्र रच लिया है। विजय कुमार लिखते हैं- “ हम एक ऐसे समय में रह जी रहे हैं जब एक ओर आदमी के भीतर का अकेलापन लगातार बढ़ रहा है तब दूसरी ओर उसके भीतर नए-नए संबंधों को खोजने और पाने की ललक भी है। एक अधिक व्यापक सूचना से भरी हुयी अधिक उष्मा और अधिक मानवीय संबंधों वाली दुनिया की तलाश मनुष्य के भीतर सदा रही से रही है। ”1

एक वर्चुअल दुनियाः इसी संचार क्रांति का एक प्रभावी हिस्सा है- सोशल नेटवर्किंग साइट्स, जिन्होंने सही मायने में निजता के एकांत को एक सामूहिक संवाद में बदल दिया है। अब यह निजता, निजता न होकर एक सामूहिक संवाद है, वार्तालाप है, जहां सपने बिक रहे हैं, आंसू पोछे जा रहे हैं, प्यार पल रहा है, साथ ही झूठ व तिलिस्म का भी बोलबाला है। यह वर्चुअल दुनिया है जो हमने रची है, अपने हाथों से। इस अपने रचे स्वर्ग में हम विहार कर रहे है और देख रहे हैं फेसबुक,ट्विटर और आरकुट की नजर से एक नई दुनिया। इन तमाम सोशल साइट्स ने हमें नई आँखें दी हैं, नए दोस्त और नई समझ भी। यहां सवाल हैं, उन सवालों के हल हैं और कोलाहल भी है। युवा ही नहीं अब तो हर आयु के लोग यहां विचरते हैं कि ज्ञान और सूचना ना ही सही, रिश्तों के कुछ मोती चुनने के लिए। यह एक एक नया समाज है, यह नया संचार है, नया संवाद है, जिसे आप सूचना या ज्ञान की दुनिया भी नहीं कह सकते। यह एक वर्चुअल परिवार सरीखा है। जहां आपके सपने, आकांक्षाएं और स्फुट विचारों, सबका स्वागत है। दोस्त हैं जो वाह-वाह करने, आहें भरने और काट खाने के लिए तैयार बैठे हैं। यह सारा कुछ भी है तुरंत, इंस्टेंट। तुरंतवाद ने इस उत्साह को जोश में बदल दिया है। यानि आपकी लिखी एक पंक्ति पर तत्काल हल्लाबोल हो सकता है। शशि थरूर को याद कीजिए। केंद्रीय मंत्री का पद अपने इसी ट्विटर प्रेम के नाते छोड़ना पड़ा। एक वाक्य का विचार यहां क्रांति बन रहा है। विचार की ताकत तो देखिए। यह ट्वीट करना अब एक फैशन है। विचार किस तरह एक कीमती समाज बना रहा है, इसे देखिए। वहां लिखे एक वाक्य की कीमत तमाम पोथियों से बड़ी है। ट्विटर कम्युनिटी में होना एक बड़ी बात है। आप ट्विटर पर नहीं, फेसबुक पर नहीं, आरकुट पर भी नहीं- क्या आदमी हो यार। ये सोशल साइट्स हमें नई सामाजिकता का बोध दे रही हैं। ये बता रही हैं इनके बिना आप कुछ भी नहीं। यह सारा कुछ इतना लुभावना है कि काम के घंटों से वक्त चुराकर भी, आप वहां जाते हैं। ताजा खबर है कि हमारे केंद्रीय मंत्रियों की घोषणाएं भी अब ट्विटर पर होंगी। जेपीसी पर मचे धमाल पर डा. मुरली मनोहर जोशी की भूमिका पर सफाई भाजपा की ओर से नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने ट्विटर पर ही दी। सारे सितारों, खिलाड़ियों और सेलिब्रटीज की ट्वीट के लिए अब अखबारों में कालम शुरू हो चुके हैं। जाहिर तौर पर यह सोशल साइट्स को यह मीडिया और अधिकारिक क्षेत्रों की स्वीकृति सरीखा ही है। उसे मिलती मान्यता का प्रतीक है।

शादियों में बदलते रिश्तेः फेसबुक अब रिश्ते ही नहीं बना रहा है, वे रिश्ते शादियों में तब्दील हो रहे हैं। व्यक्ति की निजता के साथ ये साइट्स नए रिश्ते बना रही हैं। फेसबुक एक नया राज्य है जिसका नागरिक होना एक गर्व का विषय है। उसने सबको आवाज दी है। वाणी दी है। तमाम भाषाओं के हजारों-हजार शब्द लगातार वहां अपनी जगह बना रहे हैं। चित्रों, चलचित्रों को उसने जगह दी है। देश में दस करोड़ से ज्यादा कम्प्यूटर वाले हैं, इंटरनेट वाले हैं। अगर नहीं हैं तो बाकी तमाम मोबाइल वाले हैं। अब मोबाइल से भी यह खेल आसान हो चला है। मोबाइल के यंत्र खुद को अपडेट कर रहे हैं। वे भी फेसबुक के साथ होना चाहते हैं। यानी वह वर्चुअल दुनिया जो आपने रची है वह आपके साथ-साथ है। शायद अपने परिवेश के प्रति आपमें वह आग और जागरूकता न हो, किंतु आप साइबर के खिलाड़ी हैं, एक वर्चुअल दुनिया के सक्रिय नागरिक हैं। वरिष्ठ पत्रकार मधुसूदन आनंद इस राय से इत्तेफाक नहीं रखते। वे मानते हैं कि “ जो लोग सैंकड़ों हजारों दोस्त होने का दावा करते हैं, वे सच्ची दोस्ती और जतन-संपर्क के बीच या तो भेद नहीं करना चाहते या जानबूझकर उसे नजरंदाज करते हैं। ये कामकाजी दोस्तियां होती हैं जिनका प्रदर्शन अपने विशाल प्रभामंडल के लिए किया जाता है। ये दोस्तियां आदमी की ताकत बताती हैं कि इस आदमी की पहुंच कहां-कहां है। इस तरह की दोस्तियां विरोधियों को डराने के काम भी आती हैं और समर्थकों का काम कराने में भी। इन दोस्तियों से आदमी का अहम तुष्ट होता है और उसमें सुरक्षा भाव बढ़ता है।”2

हालांकि दुनिया के तमाम देशों में चल रहे जनांदोलनों में फेसबुक और सोशल नेटवर्किंग साइट्स का खासा असर देखा जा रहा है। भारत में भी अन्ना हजारे के आंदोलन में फेसबुक और टिवटर का खासा इस्तेमाल देखा गया। इसके चलते इस आंदोलन पर ये आरोप भी लगे कि यह देश के खाए-अधाए मध्यवर्ग का आंदोलन है। किंतु सही यह है कि यह आज नई पीढ़ी के बीच संवाद का माध्यम बन गया है। सोशल मीडिया पर राजनेता भी अपनी टिप्पणियां करते हैं और उसके महत्व को रेखांकित करते हुए पीयूष पांडेय लिखते हैं-“अमेरिकी सोशल मीडिया की दुनिया में ताजा बहस यह है कि सोशल मीडिया पर लिखे जा रहे शब्दों को किस तरह लिया जाए? यह बहस अब आवश्यकता है। उमर के ट्वीट के संदर्भ में एक बात गौर करने लायक है कि यदि उन्होंने अपना बयान किसी अखबार या टेलीविजन चैनल को दिया होता तो शायद वे तोड़-मरोड़कर छापने या प्रसारित करने की बात भी कह सकते थे, लेकिन ट्विटर पर आपका खाता सिर्फ और सिर्फ आपका है। इसे संचालित करने की जिम्मेदारी आपकी है। अगर आपका ट्विटर या फेसबुक खाता हैक न हुआ हो तो आप इस पर लिखे शब्द से मुकर नहीं सकते।”3

बहुत कुछ घट रहा है इस दुनिया में- अब विचार के अलावा भी बहुत कुछ इस दुनिया में घट रहा है। वह मनोरोगियों और मनोविकारियों के हाथ में भी ताकत दे रहा है तो तमाम को विकारी भी बना रहा है। इसके सामाजिक प्रभावों का अध्ययन होना प्रारंभ हुआ है। तमाम प्रकार के दिखते हुए लाभों के अलावा सामाजिक संकट भी खड़े होने लगे हैं। उसने तमाम युवक-युवतियों को वह वर्चुअल दुनिया दी है जो उन्हें अपने परिवेश से काटकर एक ऐसी जमीन पर ले जा रही है जहां अवसाद और मनोरोग साथ-साथ जकड़ते हैं। नकली प्रोफाइल बनाकर किए जाने वाले छल और भावनाओं के व्यापार यहां भी हैं। छली जा रही तमाम कहानियां सुनाई देने लगी हैं। यह सुनना दुखद है किंतु सारा कुछ घट रहा है।

जनांदोलनों में खास भूमिकाः नया मीडिया किस तरह से उपयोगी बना है और सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने अपनी उपयोगिता साबित की है वह एक अध्ययन का विषय है। खासकर जनांदोलनों में उसने एक कारगर भूमिका का निर्वहन किया है। अनेक खतरों के साथ उसके सामाजिक लाभों का मूल्यांकन होना अभी शेष है। कथादेश के मीडिया वार्षिकी में इसी ताकत को स्वीकार करते हुए इस अंक के संपादकीय में संपादक द्वय दिलीप मंडल और अविनाश लिखते हैं-“ 21वीं सदी के मौजूदा दौर में परंपरागत मीडिया जब उम्मीद की कोई रोशनी नहीं दिखा रहा है, तब वैकल्पिक मीडिया के कुछ नए रूप सामने आए हैं। इनमें इंटरनेट पर खासतौर नजर रखने की जरूरत है। मिश्र और दूसरे अरब देशों में विद्गोह के कई कारण हैं, लेकिन इंटरनेट ने विद्रोहियों को संगठित होने में मदद की। दुनिया ने देखा कि फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट ने खासकर मिस्र में किस तरह संगठनकर्ता की भूमिका निभाई।”4

पीछे हुआ पारंपरिक मीडियाः किंतु पारंपरिक मीडिया अब चाहकर भी इसका मुकाबला नहीं कर सकता क्यों कि इसकी तेजी सब पर भारी है। सबसे बड़ी बात है इसकी गति और त्वरा। सिरिल गुप्ता की मानें तो-“ पारंपरिक मीडिया कितना भी तेज से अधिक तेज होने का दावा करता हो और चाहे खबर किसी भी कीमत पर लाता हो, नए मीडिया के सामने पानी मांगता है। लीबिया में पारंपरिक मीडिया पैठ न बना सका, लेकिन नए मीडिया साधनों जैसै ब्लाग,. ट्विटर, फेसबुक , यू-ट्यूब के जरिए पल-पल की खबर दुनिया देखती रही। नौबत यह आ गयी कि गद्दाफी सरकार ने पूरे देश में इंटरनेट की सुविधा बंद कर दी। फिर भी सैटलाइट कनेक्शन के जरिए लोगों को खबर मिलती रही। ” 5

पर सेहत तो बचा लीजिएः इसके सामाजिक प्रभावों के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी अब असर दिखाने लगीं हैं। तमाम प्रकार की बीमारियों के साथ अब कंप्यूटर सिड्रोम का खतरा आसन्न है। जिसने नई पीढ़ी ही नहीं, हर कंप्यूटर प्रेमी को जकड़ लिया है। अब यहां सिर्फ काम की बातें नहीं, बहुत से ऐसे काम हैं जो नहीं होने चाहिए, हो रहे हैं। एकांत अब आवश्यक्ता में बदल रहा है। समय मित्रों, परिजनों के साथ नहीं अब यहां बीत रहा है। ऐसे में परिवारों में भी संकट खड़े हो रहे हैं। यह खतरा टेलीविजन से बड़ा दिख रहा है, क्योंकि लाख के बावजूद टीवी ने परिवार की सामूहिकता पर हमला नहीं किया था। साइबर की दुनिया अकेले का संवाद रचती है, यह सामूहिक नहीं है इसलिए यह स्वप्नलोक सरीखी भी है। यहां सामने वाले की पहचान क्या है यह भी नहीं पता, उस नाम का कोई है या नहीं यह भी नहीं पता, किंतु कहानियां चल रही हैं, संवाद हो रहा है, प्यार घट रहा है, क्षोभ बढ़ रहा है। एक वाक्य के विचार किस तरह कमेंट्स में और पल की दोस्ती किस तरह प्यार में बदलती है- इसे घटित होता हम यहां देख सकते हैं। यानी खतरे आसमानी भी हैं और रूहानी भी।

संदर्भः

1. कुमार विजयः कहां पहुंचा रहे हैं अतंरंगता के नए पुल, नवनीत हिंदी डायजेस्ट (मुंबई), फरवरी, 2011 पेज-18
2. आनंद मधुसूदनः कितनी लंबी हो सकती है एक क्लिक की दूरी, नवनीत हिंदी डायजेस्ट (मुंबई) फरवरी, 2011, पेज-22
3. पांडेय पीयूषः ट्विटर पर उमर वाणी, दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण, नई दिल्ली, 4 सितंबर, 2011
4. मंडल दिलीप एवं अविनाश, संपादकीय, कथादेश,दिल्ली, अप्रैल-2011
5. गुप्त सिरिलःपुराने मीडिया की विदाई के दिन, कथादेश, दिल्ली, अप्रैल-2011

3 comments:

  1. परिवर्तन के सिव्व्य सब कुछ परिवर्तनीय है किसी ने कहा है....मिडिया भी अपना स्वरूप बदल रहा है...

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  2. कल 17/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. आप ट्विटर पर नहीं, फेसबुक पर नहीं, आरकुट पर भी नहीं- क्या आदमी हो यार। ये सोशल साइट्स हमें नई सामाजिकता का बोध दे रही हैं। ये बता रही हैं इनके बिना आप कुछ भी नहीं।

    समसामयिक अच्छा लेख

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