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Saturday, May 14, 2011

मीडिया को नई राह बताते हैं नारद के भक्ति सूत्र


नारद जयंती (19 मई) पर विशेष\
- प्रो.बृज किशोर कुठियाला

सभी पुराणों में महर्षि नारद एक अनिवार्य भूमिका में प्रस्तुत हैं। उन्हें देवर्षि की संज्ञा दी गई, परन्तु उनका कार्य देवताओं तक ही सीमित नहीं था। वे दानवों और मनुष्यों के भी मित्र, मार्गदर्शक, सलाहकार और आचार्य के रूप में उपस्थित हैं। परमात्मा के विषय में संपूर्ण ज्ञान प्रदान करने वाले दार्शनिक को नारद कहा गया है। महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा कि नारद आदर्श व्यक्तित्व हैं। श्री कृष्ण ने उग्रसेन से कहा कि नारद की विशेषताएं अनुकरणीय हैं।

पुराणों में नारद को भागवत संवाददाता के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह भी सर्वमान्य है कि नारद की ही प्रेरणा से वाल्मीकि ने रामायण जैसे महाकाव्य और व्यास ने भागवत गीता जैसे संपूर्ण भक्ति काव्य की रचना की थी। ऐसे नारद को कुछ मूढ़ लोग कलह प्रिय के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं, परन्तु नारद जब-जब कलह कराने की भूमिका में आते हैं तो उन परिस्थितयों का गहरा अध्ययन करने से सिद्ध होता है कि नारद ने विवाद और संघर्ष को भी लोकमंगल के लिए प्रयोग किया है। नारद कई रूपों में श्रेष्ठ व्यक्तित्व प्रदर्शित करते हैं। संगीत में अपनी अपूर्णता ध्यान में आते ही उन्होंने कठोर तपस्या और अभ्यास से एक उच्च कोटि के संगीतज्ञ बनने को भी सिद्ध किया। उन्होंने संगीत गन्धर्वों से सीखा और ‘नारद संहिता’ ग्रंथ की रचना की। घोर तप करके विष्णु से संगीत का वरदान प्राप्त किया। वे तत्व ज्ञानी महर्षि थे। नारद के भक्ति सूत्रों में उनके परमात्मा व भक्त के संबंधों की व्याख्या से वे एक दार्शनिक के रूप में सामने आते हैं। परन्तु नारद अन्य ऋषियों, मुनियों से इस प्रकार से भिन्न हैं कि उनका कोई अपना आश्रम नहीं है। वे निरंतर प्रवास पर रहते हैं। परन्तु यह प्रवास व्यक्तिगत नहीं है। इस प्रवास में भी वे समकालीन महत्वपूर्ण देवताओं, मानवों व असुरों से संपर्क करते हैं और उनके प्रश्न, उनके वक्तव्य व उनके कटाक्ष सभी को दिशा देते हैं। उनके हर परामर्श में और प्रत्येक वक्तव्य में कहीं-न-कहीं लोकहित झलकता है। उन्होंने दैत्य अंधक को भगवान शिव द्वारा मिले वरदान को अपने ऊपर इस्तेमाल करने की सलाह दी। रावण को बाली की पूंछ में उलझने पर विवश किया और कंस को सुझाया की देवकी के बच्चों को मार डाले। वह कृष्ण के दूत बनकर इन्द्र के पास गए और उन्हें कृष्ण को पारिजात से वंचित रखने का अहंकार त्यागने की सलाह दी। यह और इस तरह के अनेक परामर्श नारद के विरोधाभासी व्यक्तित्व को उजागर करते दिखते हैं। परन्तु समझने की बात यह है कि कहीं भी नारद का कोई निजी स्वार्थ नहीं दिखता है। वे सदैव सामूहिक कल्याण की नेक भावना रखते हैं। उन्होंने आसुरी शक्तियों को भी अपने विवेक का लाभ पहुंचाया। जब हिरण्य तपस्या करने के लिए मंदाक पर्वत पर चले गए तो देवताओं ने दानवों की पत्नियों व महिलाओं का दमन प्रारंभ कर दिया, परन्तु दूरदर्शी नारद ने हिरण्य की पत्नी की सुरक्षा की जिससे प्रहृलाद का जन्म हो सका। परन्तु उसी प्रहृलाद को अपनी आध्यात्मिक चेतना से प्रभावित करके हिरण्य कशिपु के अंत का साधन बनाया।इन सभी गुणों के अतिरिक्त नारद की जिन विशेषताओं की ओर कम ध्यान गया है वह है उनकी ‘संचार’ योग्यता व क्षमता। नारद ने ‘वाणी’ का प्रयोग इस प्रकार किया। जिससे घटनाओं का सृजन हुआ। नारद द्वारा प्रेरित हर घटना का परिणाम लोकहित में निकला। इसलिए वर्तमान संदर्भ में यदि नारद को आज तक के विश्व का सर्वश्रेष्ठ ‘लोक संचारक’ कहा जाये तो कुछ भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। नारद के हर वाक्य, हर वार्ता और हर घटनाक्रम का विश्लेषण करने से यह बार-बार सिद्ध होता है कि वे एक अति निपुण व प्रभावी ‘संचारक’ थे। दूसरा उनका संवाद शत-प्रतिशत लोकहित में रहता था। वे अपना हित तो कभी नहीं देखते थे, उन्होंने समूहों पर जातियों आदि का भी अहित नहीं साधा। उनके संवाद में हमेशा लोक कल्याण की भावना रहती थी। तीसरे, नारद द्वारा रचित भक्ति सूत्र में 84 सूत्र हैं। प्रत्यक्ष रूप से ऐसा लगता है कि इन सूत्रों में भक्ति मार्ग का दर्शन दिया गया है और भक्त ईश्वर को कैसे प्राप्त करे ? यह साधन बताए गए हैं। परन्तु इन्हीं सूत्रों का यदि सूक्ष्म अध्ययन करें तो केवल पत्रकारिता ही नहीं पूरे मीडिया के लिए शाश्वत सिद्धांतों का प्रतिपालन दृष्टिगत होता है। नारद भक्ति सूत्र का 15वां सूत्र इस प्रकार से हैः
तल्लक्षणानि वच्यन्ते नानामतभेदात ।।
अर्थात मतों में विभिन्नता व अनेकता है, यही पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है। इसी सूत्र की व्याख्या नारद ने भक्ति सूत्र 16 से 19 तक लिखी है और बताया है कि व्यास, गर्ग, शांडिल्य आदि ऋषिमुनियों ने भक्ति के विषय में विभिन्न मत प्रकट किए हैं। अंत में नारद ने अपना मत भी प्रकट किया है, परन्तु उसी के साथ यह भी कह दिया कि किसी भी मत को मानने से पहले स्वयं उसकी अनुभूति करना आवश्यक है और तभी विवेकानुसार निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। वर्तमान में भी एक ही विषय पर अनेक दृष्टियां होती हैं, परन्तु पत्रकार या मीडिया कर्मी को सभी दृष्टियों का अध्ययन करके निष्पक्ष दृष्टि लोकहित में प्रस्तुत करनी चाहिए। यह ‘आदर्श पत्रकारिता’ का मूल सिद्धांत हो सकता है। आज की पत्रकारिता में मीडिया को सर्वशक्तिमान और सर्वगुण सम्पन्न संवाद के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सबको मालूम है कि यह भ्रम है। मीडिया पूरे सामाजिक संवाद की व्यवस्थाओं का केवल एक अंश हो सकता है और मीडिया की अपनी सीमाएं भी है। भक्ति सूत्र 20 में नारद ने कहा है कि:
अस्त्येवमेवम् ।।

अर्थात यही है, परन्तु इसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। यह पत्रकारिता की सीमा का द्योतक है। इसी प्रकार सूत्र 26 में कहा गया कि:
फलरूपत्वात् ।।
अर्थात पत्रकारिता संचार का प्रारंभ नहीं है यह तो सामाजिक संवाद का परिणाम है। यदि पत्रकारिता को इस दृष्टि से देखा जाए तो पत्रकार का दायित्व कहीं अधिक हो जाता है। सूत्र 43, पत्रकारिता के लिए मार्गदर्शक हो सकता है:
दुःसंङ्गः सर्वथैव त्याज्यः
नकारात्मक पत्रकारिता को अनेक विद्वानों और श्रेष्ठजनों ने नकारा। जबकि पश्चिम दर्शन पर आधारित आज की पत्रकारिता केवल नकारात्मकता को ही अपना आधार मानती है और ‘कुत्ते को काटने’ को समाचार मानती है। पत्रकार की भूमिका को भी प्रहरी कुत्ते (वाच डाग) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परन्तु नारद ने इस श्लोक में कहा कि हर हाल में बुराई त्याग करने योग्य है। उसका प्रतिपालन या प्रचार-प्रसार नहीं होना चाहिए। नकारात्मक पत्रकारिता की भूमिका समाज में विष की तरह है। सूत्र 46 में:
कस्तरति कस्तरति मायाम् ? यः सड्ढांस्त्यजाति यो महानुभावं सेवते, निर्ममो भवति ।।
नारद ने कहा कि बुराई लहर के रूप में आती है परन्तु शीघ्र ही वह समुद्र का रूप ले लेती है। आज समाचार वाहिनियों में अपराध समाचार की यही कहानी बनती दिखती है। सूत्र 51 में नारद अभिव्यक्ति की अपूर्णता का वर्णन करते हैं:
अनिर्ववनीयं प्रेमस्वरूपम् ।।
अर्थात वास्तविकता या संपूर्ण सत्य अवर्णनीय है इसलिए पत्रकारिता में अधूरापन तो रहेगा ही। पाठक, दर्शक व श्रोता को पत्रकारिता की इस कमी की यदि अनुभूति हो जाती है तो समाज में मीडिया की भूमिका यथार्थ को छूयेगी। इसी बात को सूत्र 52 में नारद ने अलग तरह से प्रस्तुत किया है:
मूकास्वादनवत् ।।
नारद का कहना है कि इस सृष्टि में अनेक अनुभव ऐसे हैं जिनकी अनुभूति तो है परन्तु अभिव्यक्ति नहीं है। व्याख्या करने वाले विद्वानों ने इसे ‘गूंगे का स्वाद’ लेने की स्थिति की तरह वर्णन किया है। नारद भक्ति के सूत्र 63 से मीडिया की विषय-वस्तु के बारे में मार्गदर्शन प्राप्त होता है:
स्त्रीधननास्तिकवैरिचरित्रं न श्रवणीयम् ।।

नारद ने संवाद में कुछ विषयों को निषेध किया है। वह हैं (1) स्त्रियों व पुरुषों के शरीर व मोह का वर्णन (2) धन, धनियों व धनोपार्जन का वर्णन (3) नास्तिकता का वर्णन (4) शत्रु की चर्चा । आज तो ऐसा लगता है कि मीडिया के लिए विषय-वस्तु इन चारों के अतिरिक्त है ही नहीं। सूत्र 72 एकात्मकता को पोषित करने वाला अत्यंत सुंदर वाक्य है जिसमें नारद समाज में भेद उत्पन्न करने वाले कारकों को बताकर उनको निषेध करते हैं।
नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः ।।

अर्थात जाति, विद्या, रूप, कुल, धन, कार्य आदि के कारण भेद नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता किसके लिए हो व किन के विषय में हो यह आज एक महत्वपूर्ण विषय है। जिसका समाधान इस सूत्र में मिलता है। राजनेताओं, फिल्मी कलाकारों व अपराधियों का महिमा मंडन करती हुई पत्रकारिता समाज के वास्तविक विषयों से भटकती है। यही कारण है कि जेसिकालाल की हत्या तो न केवल पत्रकारिता की लगातार ब्रेकिंग न्यूज बनती है, उसके संपादकीय लेख और यहां तक की फिल्म भी बनती है, परन्तु एक आम किसान की आत्महत्या केवल एक-दो कालम की खबर में ही सिमट जाती है। जब आत्महत्या का राजनीतिकरण होता है तो वह फिर से मुख्य पृष्ठ पर लौट आती है। आज की पत्रकारिता व मीडिया में बहसों का भी एक बड़ा दौर है। लगातार अर्थहीन व अंतहीन चर्चाएं मीडिया पर दिखती हैं। विवाद को अर्थहीन बताते हुए नारद ने सूत्र 75, 76 व 77 में परामर्श दिया है कि वाद-विवाद में समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए। क्योंकि वाद-विवाद से मत परिवर्तन नहीं होता है। उन्होंने कहा:
बाहुल्यावकाशादनियतत्वाच्च ।।

भक्तिशास्त्राणि मननीयानि, तदुदृबोधककर्माण्यपि च करणीयानि ।।

सुखदुःखेच्छालाभादित्यक्ते काले प्रतीक्ष्यमाणे क्षणार्द्धमपि व्यर्थ न नेयम्

सूत्र 78 में नारद ने कुछ गुणों का वर्णन किया है जो व्यक्तित्व में होने ही चाहिए। पत्रकारों में भी इन गुणों का समावेश अवश्य लगता है।
अहिंसासत्यशौचदयास्तिक्यादिचारिन्न्याणि परिपालनीयानि ।।
यह गुण है अहिंसा, सत्य, शुद्धता, संवेदनशीलता व विश्वास।सूत्र 71 अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीत होता है इसमें नारद बताते हैं कि यह सब कुछ हो जाये (अर्थात नारद के परामर्श को पूर्ण रूप से मान लिया जाए) तो क्या होगा? नारद के अनुसार इस स्थिति में आनन्द ही आनन्द होगा। पितर आनन्दित होते हैं, देवता उल्लास में नृत्य करते हैं और पृथ्वी मानो स्वर्ग बन जाती है। आज के मीडिया की यह दृष्टि नहीं है, यह हम सब जानते हैं। पत्रकारिता से ही सारे मीडिया में सृजन की प्रक्रिया होती है परन्तु सृजन के लिए किस प्रकार की प्रवृत्तियां होनी चाहिए? आज तो सारा सृजन साहित्य, कला, चलचित्र निर्माण, विज्ञापन या पत्रकारिता सभी अर्थ उपार्जन की प्रवृत्ति से होता है। जिसमें असत्य, छल, कपट, दिखावा व बनावटीपन मुख्य हैं। नारद के भक्ति सूत्र 60 में सृजनात्मक प्रवृत्तियों की चर्चा है, सृजनात्मकता की प्रक्रिया का उल्लेख इस तरह है:
शान्तिरूपात्परमानन्दरूपाच्च ।।
‘सत्’ अर्थात अनुभव ‘चित्’ अर्थात चेतना और ‘आनन्द’ अर्थात अनुभूति। अर्थात पत्रकारिता की प्रक्रिया भी ऐसी ही है। वह तथ्यों को समेटती है। उनका विश्लेषण करती है व उसके बाद उसकी अनुभूति करके दूसरों के लिए अभिव्यक्त होती है परन्तु इसका परिणाम दुख, दर्द, ईष्या, प्रतिद्वंद्धिता, द्वेष व असत्य को बांटना हो सकता है या फिर सुख, शांति, प्रेम, सहनशीलता व मैत्री का प्रसाद हो सकता है। कौन सा विकल्प चुनना है यह समाज को तय करना हैं। नारद के भक्ति सूत्रों का संक्षिप्त विश्लेषण पत्रकारिता की दृष्टि से यहां किया गया है। आवश्यकता है कि इन विषयों का गहन अध्ययन हो और एक वैकल्पिक पत्रकारिता के दर्शन की प्रस्तुति पूरी मानवता को दी जाए। क्योंकि वर्तमान मीडिया ऐसे समाज की रचना करने में सहायक नहीं है। पत्रकारिता की यह कल्पना बेशक श्रेष्ठ पुरुषों की रही हो परन्तु इसमें हर साधारण मानव की सुखमय और शांतिपूर्ण जीवन की आकांक्षा के दर्शन होते हैं।
( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं)

Wednesday, December 29, 2010

बात तो साफ हुई कि मीडिया देवता नहीं है


-संजय द्विवेदी
यह अच्छा ही हुआ कि यह बात साफ हो गयी कि मीडिया देवता नहीं है। वह तमाम अन्य व्यवसायों की तरह ही उतना ही पवित्र व अपवित्र होने और हो सकने की संभावना से भरा है। 2010 का साल इसलिए हमें कई भ्रमों से निजात दिलाता है और यह आश्वासन भी देकर जा रहा है कि कम से कम अब मीडिया के बारे में आगे की बात होगी। यह बहस मिशन और प्रोफेशन से निकलकर बहुत आगे आ चुकी है।
इस मायने में 2010 एक मानक वर्ष है जहां मीडिया बहुत सारी बनी-बनाई मान्यताओं से आगे आकर खुद को एक अलग तरह से पारिभाषित कर रहा है। वह पत्रकारिता के मूल्यों, मानकों और परंपराओं का भंजन करके एक नई छवि गढ़ रहा है, जहां उससे बहुत नैतिक अपेक्षाएं नहीं पाली जा सकती हैं। कुछ अर्थों में अगर वह कोई सामाजिक काम गाहे-बगाहे कर भी गया तो वह कारपोरेट्स के सीएसआर (कारपोरेट सोशल रिस्पांस्बिलिटी) के शौक जैसा ही माना जाना चाहिए। मीडिया एक अलग चमकीली दुनिया है। जो इसी दशक का अविष्कार और अवतार है। उसकी जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन के गर्भनाल में मत खोजिए, यह दरअसल बाजारवाद के नए अवतार का प्रवक्ता है। यह उत्तरबाजारवाद है। इसे मूल्यों, नैतिकताओं, परंपराओं की बेड़ियों में मत बांधिए। यह अश्वमेघ का धोड़ा है,जो दुनिया को जीतने के लिए निकला है। देश में इसकी जड़ें नहीं हैं। वह अब संचालित हो रहा है नई दुनिया के,नए मानकों से। इसलिए उसे पेडन्यूज के आरोपो से कोई उलझन, कोई हलचल नहीं है, वह सहज है। क्योंकि देने और लेने वालों दोनों के लक्ष्य इससे सध रहे हैं। लोकतंत्र की शुचिता की बात मत ही कीजिए। यह नया समय है,इसे समझिए। मीडिया अब अपने कथित ग्लैमर के पीछे भागना नहीं चाहता। वह लाभ देने वाला व्यवसाय बनना चाहता है। उसे प्रशस्तियां नहीं चाहिए, वह लोकतंत्र के तमाम खंभों की तरह सार्वजनिक या कारपोरेट लूट में बराबर का हिस्सेदार और पार्टनर बनने की योग्यता से युक्त है।
मीडिया का नया कुरूक्षेत्रः
मीडिया ने अपने कुरूक्षेत्र चुन लिए हैं। अब वह लोकतंत्र से, संवैधानिक संस्थाओं से, सरकार से टकराता है। उस पर सवाल उठाता है। उसे कारपोरेट से सवाल नहीं पूछने, उसे उन लोगों से सवाल नहीं पूछने जो मीडिया में बैठकर उसकी ताकत के व्यापारी बने हैं। वह सवाल खड़े कर रहा है बेचारे नेताओं पर,संसद पर जो हर पांच साल पर परीक्षा के लिए मजबूर हैं। वह मदद में खड़ा है उन लोगों के जो सार्वजनिक धन को निजी धन में बदलने की स्पर्धा में जुटे हैं। बस उसे अपना हिस्सा चाहिए। मीडिया अब इस बंदरबांट पर वाच डाग नहीं वह उसका पार्टनर है। उसने बिचौलिए की भूमिका से आगे बढ़कर नेतृत्व संभाल लिया है। उसे ड्राइविंग सीट चाहिए। अपने वैभव, पद और प्रभाव को बचाना है तो हमें भी साथ ले लो। यह चौथे खंभे की ताकत का विस्तार है। मीडिया ने तय किया है कि वह सिर्फ सरकारों का मानीटर है, उसकी संस्थाओं का वाच डाग है। आप इसे इस तरह से समझिए कि वह अपनी खबरों में भी अब कारपोरेट का संरक्षक है। उसके पास खबरें हैं पर किनकी सरकारी अस्पतालों की बदहाली की, वहां दम तोड़ते मरीजों की,क्योंकि निजी अस्पतालों में कुछ भी गड़ब़ड़ या अशुभ नहीं होता। याद करें कि बीएसएनएल और एमटीएनएल के खिलाफ खबरों को और यह भी बताएं कि क्या कभी आपने किसी निजी मोबाइल कंपनी के खिलाफ खबरें पढ़ी हैं। छपी भी तो इस अंदाज में कि एक निजी मोबाइल कंपनी ने ऐसा किया। शिक्षा के क्षेत्र में भी यही हाल है। सारे हुल्लड़-हंगामे सरकारी विश्वविद्यालयों, सरकारी कालेजों और सरकारी स्कूली में होते हैं- निजी स्कूल दूध के धुले हैं। निजी विश्वविद्यालयों में सारा कुछ बहुत न्यायसंगत है। यानि पूरा का पूरा तंत्र,मीडिया के साथ मिलकर अब हमारे जनतंत्र की नियामतों स्वास्थ्य, शिक्षा और सरकारी तंत्र को ध्वस्त करने पर आमादा है। साथ ही निजी तंत्र को मजबूत करने की सुनियोजित कोशिशें चल रही हैं। मीडिया इस तरह लोकतंत्र के प्रति, लोकतंत्र की संस्थाओं के प्रति अनास्था बढ़ाने में सहयोगी बन रहा है, क्योंकि उसके व्यावसायिक हित इसमें छिपे हैं। व्यवसाय के प्रति लालसा ने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है। मीडिया संस्थान,विचार के नकली आरोपण की कोशिशों में लगे हैं ।यह मामला सिर्फ चीजों को बेचने तक सीमित नहीं है वरन पूरे समाज के सोच को भी बदलने की सचेतन कोशिशें की जा रही हैं। शायद इसीलिए मीडिया की तरफ देखने का समाज का नजरिया इस साल में बदलता सा दिख रहा है।
यह नहीं हमारा मीडियाः
इस साल की सबसे बड़ी बात यह रही कि सूचनाओं ने, विचारों ने अपने नए मुकाम तलाश लिए हैं। अब आम जन और प्रतिरोध की ताकतें भी मानने लगी हैं मुख्यधारा का मीडिया उनकी उम्मीदों का मीडिया नहीं है। ब्लाग, इंटरनेट, ट्विटर और फेसबुक जैसी साइट्स के बहाने जनाकांक्षाओं का उबाल दिखता है। एक अनजानी सी वेबसाइट विकिलीक्स ने अमरीका जैसी राजसत्ता के समूचे इतिहास को एक नई नजर से देखने के लिए विवश कर दिया। जाहिर तौर पर सूचनाएं अब नए रास्तों की तलाश में हैं. इनके मूल में कहीं न कहीं परंपरागत संचार साधनों से उपजी निराशा भी है। शायद इसीलिए मुख्यधारा के अखबारों, चैनलों को भी सिटीजन जर्नलिज्म नाम की अवधारणा को स्वीकृति देनी पड़ी। यह समय एक ऐसा इतिहास रच रहा है जहां अब परंपरागत मूल्य, परंपरागत माध्यम, उनके तौर-तरीके हाशिए पर हैं। असांजे, नीरा राडिया, डाली बिंद्रा,, राखी सावंत, शशि थरूर, बाबा रामदेव, राजू श्रीवास्तव जैसे तमाम नायक हमें मीडिया के इसी नए पाठ ने दिए हैं। मीडिया के नए मंचों ने हमें तमाम तरह की परंपराओं से निजात दिलाई है। मिथकों को ध्वस्त कर दिया है। एक नई भाषा रची है। जिसे स्वीकृति भी मिल रही है। बिग बास, इमोशनल अत्याचार, और राखी का इंसाफ को याद कीजिए। जाहिर तौर पर यह समय मीडिया के पीछे मुड़कर देखने का समय नहीं है। यह समय विकृति को लोकस्वीकृति दिलाने का समय है। इसलिए मीडिया से बहुत अपेक्षाएं न पालिए। वह बाजार की बाधाएं हटाने में लगा है। तो आइए एक बार फिर से हम हमारे मीडिया के साथ नए साल के जश्न में शामिल हो जाएं।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

Sunday, October 10, 2010

वाड्.मय पुरस्कार से नवाजे गए संजय सर


मध्यप्रदेश के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने किया सम्मान

भोपाल,10 अक्टूबर। मध्यप्रदेश के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने रविवार को भोपाल स्थित हिंदी भवन के सभागार में आयोजित समारोह में युवा पत्रकार एवं लेखक संजय द्विवेदी को उनकी नई किताब ‘मीडियाः नया दौर- नई चुनौतियां’ के लिए इस वर्ष के वाड्.मय पुरस्कार से सम्मानित किया। स्व. हजारीलाल जैन की स्मृति में प्रतिवर्ष किसी गैर साहित्यिक विधा पर लिखी गयी किताब पर यह पुरस्कार दिया जाता है।
मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा आयोजित इस सम्मान समारोह की अध्यक्षता प्रदेश के नगरीय विकास मंत्री बाबूलाल गौर ने की और विशिष्ट अतिथि के रूप में सांसद रधुनंदन शर्मा मौजूद थे। कार्यक्रम के प्रारंभ में स्वागत भाषण समिति के अध्यक्ष रमेश दवे ने किया और आभार प्रदर्शन कैलाश चंद्र पंत ने किया। संजय की यह किताब यश पब्लिकेशन, दिल्ली ने छापी है और इसमें मीडिया के विविध संदर्भों पर लिखे उनके लेख संकलित हैं। सम्मान समारोह में वितरित पुस्तिका में कहा गया है कि- “वर्ष 2010 में प्रकाशित इस कृति में लेखक के आत्मकथ्य सहित 27 लेख हैं। इन लेखों में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की दशा व दिशा का आज के बाजारवाद के परिप्रेक्ष्य में विशद् तार्किक विवेचन किया गया है। पुस्तक के लेखक संजय द्विवेदी स्वयं पत्रकारिता को जी रहे हैं, इसलिए पुस्तक के लेखों में विषय की गहराई, सूक्ष्मता और अनुभवपरकता तीनों मौजूद है। पुस्तक मीडिया से जुड़े कई अनदेखे पृष्ठ खोलने में सफल है।” श्री द्विवेदी अनेक प्रमुख समाचार पत्रों के अलावा इलेक्ट्रानिक और वेबमीडिया में भी महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। उनकी अब तक आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और छः पुरस्कार भी मिल चुके हैं। संप्रति वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।

पुस्तक परिचयः
पुस्तक का नामः मीडियाः नया दौर नई चुनौतियां
लेखकः संजय द्विवेदी
प्रकाशकः यश पब्लिकेशन्स, 1 / 10753 सुभाष पार्क, गली नंबर-3, नवीन शाहदरा, नीयर कीर्ति मंदिर, दिल्ली-110031, मूल्यः 150 रुपये मात्र

संजय सर हुए सम्मानित


भोपाल,10 अक्टूबर,2010। जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी सर का सम्मान करते हुए मप्र के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर। साथ में हैं मप्र सरकार के नगरीय विकास मंत्री बाबूलाल गौर, सांसद रधुनंदन शर्मा, कैलाशचंद्र पंत और प्रो. रमेश दवे।

Saturday, March 13, 2010

विकासमूलक संचार की तलाश


- जगदीश्वर चतुर्वेदी
विकासमूलक सम्प्रेषण का लक्ष्य है शोषण से मुक्ति दिलाना। व्यक्तिगत और सामुदायिक सशक्तिकरण। इस अर्थ में विकासमूलक सम्प्रेषण सिर्फ संदेश देने का काम नहीं करता बल्कि ‘मुक्तिकामी सम्प्रेषण’ है। आम लोगों में यह भाव पैदा करता है कि वे स्वयं भविष्य निर्माता बनें। इस प्रक्रिया में सभी शामिल हों। न कि सिर्फ लक्ष्यीभूत ऑडिएंस। इस परिप्रेक्ष्य की समझ यह है कि जब लोग शोषण और शक्ति को जान जाते हैं तो अपने आप समाधान खोज लेते हैं।
मुक्तिकामी विकासमूलक सम्प्रेषण की प्रकृति सब जगह एक जैसी नहीं होती। बल्कि इसमें अंतर भी हो सकता है। विकासमूलक सम्प्रेषण में मास कम्युनिकेशन और सूचना तकनीकी रूपों का कनवर्जन या समावेशन होता रहता है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि विकासमूलक सम्प्रेषण रणनीति में धार्मिक और आध्यात्मिक रणनीति मददगार साबित हो सकती है। विकासमूलक सम्प्रेषण में सभी किस्म के सवाल शामिल किए जा सकते हैं।
के.बालिस ने ”डिसपोजेविल पीपुल’ न्यू स्लेवरी इन दि ग्लोबल इकोनॉमी” में विभिन्न अनुसंधान निष्कर्षों को आधार बनाकर लिखा है कि सारी दुनिया में अभी दो करोड़ सत्तर लाख लोग गुलामी में जी रहे हैं। इनमें बच्चे और औरतें शामिल हैं जिन्हें हिंसा या हिंसा की धमकी के आधार पर गुलाम बनाया हुआ है। इनमें ऐसे लोग भी हैं जो वस्तु पाने के दले गुलामी में जी रहे हैं।
बालिस ने अपनी पुस्तक में एक अध्याय में बताया है कि थाईलैण्ड में जबरिया जिस्म की तिजारत हो रही है। पुस्तक में इसका शीर्षक ही रखा है ‘वन डॉटर इक्वल्स वन टेलीविजन। ‘यदि 21वीं शताब्दी में दुनिया का अभी भी यह हाल है तो हमें गंभीरता से भारत के संदर्भ में विकासमूलक सम्प्रेषण के मुक्तिकामी परिप्रेक्ष्य का निर्माण करना होगा। हमें यह तय करना होगा कि भारत के लिए विकासमूलक सम्प्रेषण धार्मिक मुक्ति का नजरिया प्रासंगिक है या मुक्ति का मार्क्सवादी नजरिया प्रासंगिक है।
विकासमूलक सम्प्रेषण के मुक्तिकामी धार्मिक नजरिए की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें सामाजिक इकाईयों को धार्मिक इकाईयों के रूप में देखा जाता है। वैषम्य को समाधानरहित मान लिया गया है। विकास की सफलता का श्रेय ईश्वर को दिया जाता है। विकास की सफलता के लिए ईश्वरोपासना को महत्वपूर्ण करार दिया जाता है। भारत में विकास के लिए धर्म का इस तरह का इस्तेमाल कारपोरेट घरानों से लेकर तमाम धार्मिक स्वैच्छिक संगठनों की आम रणनीति का हिस्सा है। वे इसे मनोबल बढ़ानेवाली रणनीति के रूप में व्याख्यायित करते हैं। साथ ही विकास के केन्द्र में मनुष्य की केन्द्रीय भूमिका की बजाए ईश्वर या ईश्वरोपासना को प्रतिष्ठित करते हैं।
नए कारपोरेट जगत के साथ पैदा हुए कारपोरेट धर्म की उत्पत्ति का यही रहस्य है। यह रणनीति अंतत: साम्प्रदायिक सामाजिक विभाजन और तनावों को जन्म देती है। यहां व्यक्ति का महत्व है। वह एक अनैतिहासिक कोटि के रूप में सामने आता है। इस मॉडल पर आधारित संचार संकीर्णताओं और अविवेकपूर्ण मानसिकता में इजाफा करता है। ग्राम्शी ने इटली में प्रेस में इसी तरह की प्रवृत्तियों का जिक्र करते हुए लिखा कि ‘लोकप्रिय प्रेस पाठक की संस्कृति को नियंत्रित करने के लिए भूत-प्रेत की कहानियों,अंधविश्वास आदि पर केन्द्रित कथाएं छापते रहते हैं;परिणामत: ये पत्र मौजूदा राष्ट्र का गैर-प्रान्तीकरण करते हैं। इसे रोकने के लिए विज्ञान की खबरें बेहद जरूरी हैं। ”
विकासमूलक मीडिया का नजरिया मनोरंजन के व्यवसायीकरण अथवा मनोरंजन प्राप्ति के अधिकार को लेकर उतना चिन्तित नहीं है। क्योंकि यह दोनों तत्व- व्यवसाय और मनोरंजन- पहले के समाजों में भी थे। विकासमूलक संचार मॉडल की चिन्ता है उच्च कला का वर्तमान आम जनता से अलगाव और दुराव कैसे दूर हो। लम्बे समय से पूंजीवादी समाज में उच्च कलाओं की मौजूदगी सिर्फ कलाकारों के लिए रह गई है। आज हममीडिया में जो कला रूप देख रहे हैं उनमें जनता के प्रति सम्मान का दिखावटी भाव है।
मजेदार बात यह है कि हमारे समाज में दो तरह के आलोचक हैं पहली कोटि ऐसे आलोचकों की है जो मीडिया की आदर्श भूमिका की बातें करते हैं। समाज में घटित प्रत्येक अच्छी-बुरी चीज के लिए मीडिया को कोसते रहते हैं। असल में ये ऐसे लोग हैं जो सामाजिक अलगाव के शिकार हैं। वे ऐसी भाषा और तर्क का इस्तेमाल करते हैं जो किसी के गले नहीं उतरता। इन्हें आदर्शवादी माध्यम विशेषज्ञ कह सकते हैं। दूसरी ओर ऐसे भी आलोचक हैं जो मीडिया को गरियाते हुए कलाओं के अतीत में जीते हैं। इन्हें अतीतजीवी माध्यम विशेषज्ञ कह सकते हैं। ये दोनों ही नजरिए मीडिया के वस्तुगत अध्ययन,समझ और अंतर्वस्तु के मूल्यांकन से वंचित हैं। इन दोनों ही रूझानों से बचा जाना चाहिए।
आमतौर पर मीडिया के मालिक या उत्पादक के खिलाफ यह आरोप लगाया जाता है कि वे तो वही दिखाते हैं जो जनता मांग करती है। साथ ही यह भी आरोप लगाया जाता है कि मीडिया नई तरह की चीजों के लिए नकली मांग पैदा कर रहा है। अर्थात उपभोग में वृद्धि के लिए मांग पैदा कर रहा है। प्रसिध्द कला सिद्धान्तकार गेओर्ग जीम्मल ने लिखा है ‘ऐसा नहीं है कि चीजें पहले पैदा हों फिर फैशन में आएं; चीजें पैदा ही फैशन चालू करने के लिए की जाती हैं। ‘
अर्नाल्ड हाउजर ने लिखा कि ”जिन तथ्यों पर ध्यान देना है,जिन मुद्दों पर निर्णय लेना है,जन समाधानों को स्वीकार करना है -ये सब जनता के सामने इस रूप में परोसे जाते हैं कि वह इन्हें पूरी तरह निगल ले। सामान्य तौर पर उसके समक्ष चुनाव का कोई अवसर नहीं है और वह इससे संतुष्ट भी है। ”
”भीड़ संस्कृति के उत्पाद केवल यही नहीं करते कि लोगों की रूचि बरबाद कर दें,उन्हें स्वयं के बारे में सोचने न दें,समरूपता की शिक्षा दें;वे बहुसंख्यक लोगों की आंखों के सामने पहलीबार जीवन के उन क्षेत्रों को भी खोल देते हैं जिनके सम्पर्क में वे पहले कभी नहीं आए थे। अकसर उनके पूर्वाग्रहों का अनुमोदन होता है। फिर भी आलोचना और विरोध का एक रास्ता तो खुलता ही है। जब कभी कला के उपभोक्ताओं का घेरा विस्तृत हुआ है,उसका तात्कालिक परिणाम कला उत्पादन के स्तर में गिरावट ही निकला है। ”
आम तौर पर मीडिया के बारे में जिस कॉमनसेंस का हमारा हिन्दी बुद्धिजीवीवर्ग शिकार है और मीडिया के मूल्यांकन के नाम पर गैर-मीडिया सैध्दान्तिकी के रास्ते पर चल रहा है वह विकास का सही लक्षण नहीं कहा जा सकता। मीडिया मूल्यांकन के नाम पर साहित्यिक पत्रिकाओं में जिस तरह का दृष्टिकोण परोसा जा रहा है वह मीडिया समीक्षा का घटिया नमूना है। ये लोग मीडिया को षडयंत्रकारी और शैतान के रूप में चित्रित कर रहे हैं। ऐसी आलोचना का मीडिया की सही समझ से कोई लेना-देना नहीं है।
(लेखक प्रख्यात संचार चिंतक एवं कोलकाता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर हैं)