Wednesday, October 28, 2009

अंगरेज़ी की श्रेष्ठ कविताएं हिन्दी में


समीक्षक- गिरीश पंकज



अंगरेज़ी साहित्य और उसकी प्रभावोत्पादकता से किसे इंकार हो सकता है। भारतीय समाज के ऊपर अगरेज़ी साहित्य एक दबाव की तरह भी विद्यमान रहा है। साहित्य न भी रहा हो, पर एक भाषा तो रही है। मजबूरी में ही सही, अंगरेज़ी जीवन का हिस्सा बनती चली गयी। भाषा या भाषा को हथियार बनाकर हमें गुलाम बनाने वाली प्रकृतियों की बात न भी करें तो अंगरेज़ी साहित्य का अपना मूल्य है। इस भाषा के साहित्य में कुछ बात तो है कि इसकी हस्ती अब तक नहीं मिट पायी है। हालत यह है कि धीरे-धीरे भारत में भी अंगरेज़ी साहित्य रचने वालों की तादाद बढ़ी है। हिंदी लेखकों में भी लिखने, छपने और अनूदित होने की ललक बढ़ी है। यह शायद वैश्विक होने के अहसास का ही एक हिस्सा है। अंगरेज़ी की श्रेष्ठ कविताएँ बरबस अपनी ओर खींचती है। यही कारण है कि हिंदी का अंगरेज़ी पढ़ा-लिखा लेखक समाज उससे बहुत जल्दी प्रभावित भी होता रहा है। अनेक हिंदी साहित्कारों की कविताएँ अंगरेज़ी के कवियों की छापाओं से ग्रस्त दीखती हैं। यह हिंदी कवियों की कमजोरी हो सकती है, लेकिन निर्विवाद रूप से अंगरेज़ी की श्रेष्ठता का प्रमाण तो है ही। ऐसी श्रेष्ठ कविताओं का एक संकलन प्रकाशित होकर हिंदी के पाठकों तक पहुँचा है। अनुवादक कुलदीप सलिल के संपादन में “अंगरेज़ी की श्रेष्ठ कवि और उनकी श्रेष्ठ कविताएँ” नामक इस पुस्तक में अगरेज़ी के महत्वपूर्ण कवियों की रचनाओं के अनुवाद प्रस्तुत किए गए हैं।



कुलदीप सलिल की अनेक अनूदित कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही है। वे दक्ष अनुवादक हैं। उनके अनुवाद अनुवाद जैसे नहीं लगते। समझ में आते हैं। (जबकि समकालीन हिंदी कविताएँ अनुवाद-सरीखी लगती हैं और समझ में भी नहीं आतीं) कुलदीप जी ने भूमिका में एक महत्वपूर्ण बात कही है कि “अनुवादक का कवि होना भी जरूरी है” सचमुच कवि ही मूल कविता की ध्वन्यात्मकता को, लयता को, उसकी समस्त प्रभविष्णुता को गहराई से समझ सकता है। कविता की ध्वनि, कविता का प्रवाह और कविता की आत्मा को एक कवि ही बेहतर समझ सकता है। अंगरेज़ी का जानकार कविता का मशीनी अनुवाद करेगा, मगर कवि उसी कविता का आत्मिक अनुवाद करेगा। अनुवाद अनुवाद न लगे, वह अनुरचना (यानी ट्रांस्क्रिएशन) लगे तभी उसकी सार्थकता है। तभी उसकी पठनीयता है। और उपादेयता भी। अनुवाद एक तरह से पुनर्सर्जना भी है। इसलिए कहा जा सकता है कि ये अनुवाद नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे। भाव की गहराई है और डूब के जाना है। कुलदीप सलिल ने डूबकर अनुवाद किया है।



समीक्षा पुस्तक में जिन अठारह कवियों का चयन किया गया है उनमें विलियम शेक्सपियर, बेन जान्सन, जॉन मिल्टन, विलियम वर्डसवर्थ, पीबी शेली, जॉन कीट्स, राबर्ट ब्राउनिंग, विलियम बटलर गेट्स, राबर्ट फ्रॉस्ट, टी.एस.एलविट जैसे वैश्विक रूप से बेहद लोकप्रिय कवि शामिल हैं। जॉन डन, एलेक्जैंडर पोप, विलियम ब्लैक एस.टी.कॉलरिज, एल्फ्रेड टेनीसन, मैथ्यू अर्नाल्ड, एमिली डिकिन्सन और डब्ल्यू. एच. ऑडेन भी कम नहीं हैं। अनुवादक ने इन कवियों का सारगर्भित परिचय दिया है। कवियों की मूल रचनाएँ भी दी हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए साफ समझ में आता है कि उस दौर की अंगरेज़ी भाषा और वर्तमान दौर की अंगरेज़ी में कितने परिवर्तन हुए हैं। भाषा को हमारे यहाँ बहता नीर कहा गया है। नीर अपने साथ अनेक उपयोगी चीजें बहाकर लाता है। अनुवादक ने ठीक किया है कि उस वक्त जो भाषा थी, शब्द की जो स्पेलिंग प्रचलित थी, उसे जस का तस रख दिया है। इससे अंगरेज़ी साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों एवं विद्यार्थियों को भाषा के क्रमिक विकास एवं परिवर्तन होने की सहज प्रवृत्ति का पता चलेगा। मेरे जैसे पाठकों को भी अच्छा लगेगा जिन्होंने बहुत ज्यादा अंगरेज़ी कविताएँ नहीं पढ़ी हैं।



शेक्सपियर की मशहूर पंक्ति “दुनिया एक मंच है और हम सब कठपुतली” से हिंदी समाज भी परिचित है। बहुतों को पता भी नहीं कि यह कथन शेक्सपियर का है। अनुवादक ने शेक्सपियर के “आल द वर्ल्ड’स ए स्टेज” का हिंदी अनुवाद “सारी दुनिया एक मंच है” करते हुए कुछ इस तरह अनुवाद किया है कि “सारी दुनिया एक मंच है, नर नारी अभिनेता/ सात अवस्थाएँ जीवन की/ सात अंकों के नाटक में/ अपना-अपना खेल दिखा हर इनसान चला जाता है” इस भावभूमि पर एक फिल्मी गीत भी कभी लिखा गया था। अनुवाद से बेहतर था यह कि “रंगमंच है दुनिया सारी/ हर इंसां अभिनेता है/ अपना-अपना अभिनय करके/ हर कोई चल देता है”। कुलदीप सलिल ने भी अनुवाद में मेहनत की है, अगर वह इन्हें और करीने से छंदबद्ध कर सकते तो अनुवाद का लालित्य द्विगुणित हो जाता। फिर भी तमाम अनुवाद बाँधने की ताकत रखते हैं।



पंद्रहवीं शताब्दी के कवि हों या उन्नीसवीं शताब्दी के, मानवीय संवेदनाएँ विरासत के रूप में ही स्थानांतरित होती दिखती है। भाषा भले ही परिवर्तित होती गयी, भावनाएँ वहीं हैं। परिदृश्य बदला है, लेकिन प्रवृत्तियाँ जस की तस हैं। संग्रह की रचनाओं को पढ़ते हुए हम अंगरेज़ी कविता के क्रमिक विकास, उसके चिंतन से भी परिचित होते चलते हैं। कविताओं में प्रयुक्त मुहावरे बदलते हैं और दृश्य बंध भी। विषयवस्तु भी परिवर्तित होती चलती है। जॉन डन या जॉन मिल्टन अपने दौर में (यानी पाँच सौ साल पहले) अगर मौत या आँखों की ज्योति चले जाने पर ईश्वर से प्रश्न करते हैं तो बीसवीं शताब्दी के आते-आते डब्ल्यू.एच. ऑडेन का मनुष्य रेडियो, टेलीफोन, फ्रिज, कार के साथ आधुनिक आदमी बन जाता है। लेकिन वह प्रेम गीत जरूर गाता है।



संग्रह की कविताएँ पढ़कर हिंदी का पाठक सहज भाव से तुलनात्मक अध्ययन पर भी विवश हो जाता है। इस कृति के बहाने अंगरेज़ी और हिंदी कविता का तुलनात्मक अध्ययन का मौका भी मिलता है। समझ में आ जाता है कि अंगरेज़ी कविता किस भाव-भूमि पर खड़ी है और हिंदी का काव्यकौशल कहाँ है। हिंदी का पाठक महसूस करता है कि हिंदी की उस दौर की कविता अंगरेज़ी कविताओं से काफी आगे रही है। आज स्थिति उलट है। जो भी हो, कुलदीप सलिल के चयन की तारीफ करनी पड़ती है। चालीस-पैंतालीस साल से अनुवाद कर्म में रत कुलदीप जी ने हिंदी के पाठकों को अनमोल तोहफा दिया है। इस कृति के बहाने अंगरेज़ी साहित्य का सत्व सामने आ जाता है। और पता चलता है कि सोच का मानवीय चेहरा कितना भावुक है। उसके चिंतन के औजार क्या हैं। यह संग्रह अंगरेज़ी और श्रेष्ठ कविताओं की तलाश के लिए व्याकुल करता है।



कृति - अंगरेज़ी के श्रेष्ठ कवि

अनुवादक - कुलदीप सलिल

प्रकाशक - राजपाल एंड सन्स,

कश्मीरी गेट, दिल्ली मूल्य - 190/-

साभार सृजनगाथा

बाजार की चुनौतियों से बेजार हिन्दी पत्रकारिता



- संजय द्विवेदी
आज भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी पत्रकारिता की चुनौतियां न सिर्फ बढ़ गई हैं वरन उनके संदर्भ भी बदल गए हैं। पत्रकारिता के सामाजिक उत्तरदायित्व जैसी बातों पर सवालिया निशान हैं तो उसकी नैसर्गिक सैद्धांतिकता भी कठघरे में है। वैश्वीकरण और नई प्रौद्योगिकी के घालमेल से एक ऐसा वातावरण बना है जिससे कई सवाल पैदा हुए हैं। इनके वाजिब व ठोस उत्तरों की तलाश कई स्तरों पर जारी है। वैश्वीकरण व बाजारवाद की इन चुनौतियों ने हिन्दी पत्रकारिता को कैसे और कितना प्रभावित किया है इसका अध्ययन किया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समूची भारतीय पत्रकारिता के संदर्भ में बात करने के पहले इसे तीन हिस्सों में समझने की जरूरत है। पहली अंग्रेजी पत्रकारिता, दूसरी हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के बड़े अखबारों की पत्रकारिता और तीसरी नितांत क्षेत्रीय अखबारों की पत्रकारिता। पहली, अंग्रेजी की पत्रकारिता तो बाजारवाद की हवा को आंधी में बदलने में सहायक ही बनी है, और कमोवेश इसने सारे नैतिक मूल्यों व सामाजिक सरोकारों को शीर्षासन करा दिया है। दूसरी श्रेणी में आने वाले हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के बहुसंस्करणीय अखबार हैं। वे भी बाजारवादी हो हल्ले में अंग्रेजी पत्रकारिता के ही अनुगामी बने हुए हैं। उनकी स्वयं की कोई पहचान नहीं है और वे इस संघर्ष में कहीं ‘लोक’ से जुड़े नहीं दिखते। तीसरी श्रेणी में आने वाले क्षेत्रीय अखबार हैं, जो अपनी दयनीयता के नाते न तो खास अपील रखते हैं न ही उनमें कोई आंदोलनकारी-परिवर्तनकारी भूमिका निभाने की इच्छा शेष है। यानि मुख्यधारा की पत्रकारिता ने चाहे-अनचाहे बाजार की ताकतों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है।
व्यावसायिक दृष्टि से देखें तो यह घाटे का सौदा नहीं है। अखबारों की छाप-छपाई, तकनीक-प्रौद्योगिकी के स्तर पर क्रांति दिखती है। वे ज्यादा कमाऊ उद्यम में तब्दील हो गए हैं। अपने कर्मचारियों को पहले से ज्यादा बेहतर वेतन, सुविधाएं दे पा रहे हैं। बात सिर्फ इतनी है कि उन सरोकारों का क्या होगा, उन सामाजिक जिम्मेदारियों का क्या होगा-जिन्हें निभाने और लोकमंगल की भावना से अनुप्राणित होकर काम करने के लिए हमने यह पथ चुना था? क्या अखबार को ‘प्रोडक्ट’ बनने और संपादक को ‘ब्रांड मैनेजर’ या ‘सीईओ’ बन जाने की अनुमति दे दी जाए? बाजार के आगे लाल कालीन बिछाने में लगी पत्रकारिता को ही सिर माथे बिठा लिया जाए? क्या यह पत्रकारिता भारत या इस जैसे विकासशील देशों की जरूरतों, आकांक्षाओं को तुष्ट कर पाएगी? यदि देश की सामाजिक आर्थिक जरूरतों, जनांदोलनों को स्वर देने के बजाए वह बाजार की भाषा बोलने लगे तो क्या किया जाए? यह चिंताएं आज हमें मथ रही हैं?

आप लाख कहें लेकिन ‘विश्वग्राम’ के पीछे जिस आर्थिक चिंतन और नई प्रौद्योगिकी पर जोर है क्या उसका मुकाबला हमारी पत्रकारिता कर सकती है? बाजारवाद के खिलाफ गूंजें तो अवश्य हैं, लेकिन वे बहुत बिखरी-बिखरी, बंटी-बंटी ही हैं। वह किसी आंदोलन की शक्ल लेती नहीं दिखतीं। बिना वेग, त्वरा और नैतिक बल के आज की हिन्दी या भाषाई पत्रकारिता कैसे उदारीकारण के अर्थचिंतन से दो-दो हाथ कर सकती है?
बढ़ती उपभोक्तावादी संस्कृति, चैनलों पर अपसंस्कृति परोसने की होड़, बढ़ती सौन्दर्य प्रतियोगिताएं, जीवन में हासिल करने के बजाए हथियाने का बढ़ता चिंतन, भाषा के रूप में अंग्रेजी का वर्चस्ववाद, असंतुलित विकास और असमान शिक्षा का ढांचा कुछ ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे हम रोजाना टकरा रहे हैं और समाज में गैर बराबरी की खाई बढ़ती जा रही है। इसके साथ ही मूल्यहीनता के संकट अलग हैं। भारत की दुनिया के सात बड़े बाजारों में एक होना एक संकट को और बढ़ाता है। दुनिया की सारी कम्पनियां इस बाजार पर कब्जा जमाने कुछ भी करने पर आमादा हैं।
असंतुलित विकास भी इसी व्यवस्था की नई देन है। शायद इसलिए अर्थशास्त्री प्रो. ब्रम्हानंद मानते है कि आने वाले वर्षों में ‘स्टेट बनाम मार्केट’ (राज्य बनाम बाजार) का गंभीर टकराव होगा। सो विकसित राज्यों व बाजारवादी व्यवस्था से लाभान्वित हुए राज्यों औसे आंध्र, कनोटक, गुजरात, महाराष्ट्र के खिलाफ अविकसित राज्यों का एक स्वाभाविक संघर्ष शुरू हो गया है। प्रो. ब्रम्हानंद के मुताबिक ‘‘उदारीकरण के बाद स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क, सार्वजनिक यातायात, शिक्षा हर जगह दोहरी व्यवस्था कायम हो गई है। एक व्यवस्था निजीकरण से जुड़ी है, जहां उपभोक्ताओं के पास समृद्धि है और ‘निजीकरण’ से लाभ लेने की क्षमता भी। दूसरी ओर व्यवस्था, सार्वजनिक क्षेत्र की सुविधाओं से जुड़ी हैं, जहां निवेश के लिए सरकार के पास जैसा नहीं है पर करोड़ों लोग इससे जुड़े हैं। केन्द्र की नीतियों से भी भेदभाव प्रायोजित हो रहा है। बीमारू राज्य और बीमारू होते जा रहे हैं।’’ ये संकट देश के भी हैं और पत्रकारिता के भी।
दुर्भाग्य है बीमारू राज्यों के अधिकांश क्षेत्रों में बोले जानी वाली भाषा हिन्दी है। अंग्रेजी के मुकाबले उसकी दयनीयता तो जाहिर है ही परन्तु सूचना की भाषा बनने की दिषा में भी हिन्दी बहुत पीछे है। साहित्य-संस्कृति, कविता-कहानी के क्षेत्रों में शिखर को छूने के बावजूद ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों पर हिन्दी में बहुत कम काम हुआ है। विज्ञान, प्रबंधन, प्रौद्योगिकी, उच्च वाणिज्य, उद्योग आदि क्षेत्रों में हिन्दी बेचारी साबित हुई है, जबकि यह युग सत्य है कि आज के दौर में जब तक भाषा बहुआयामी अभिव्यक्ति व विशेष सूचना की भाषा न बने उसे सीमा से अधिक महत्व नहीं मिल सकता। वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश की मानें तो - ‘‘हिन्दी को आज देश, काल, परिस्थितियों के अनुरूप सूचना की सम्पन्न भाषा बनाना जरूरी है। आज की हिन्दी पत्रकारिता के लिए यही सीमा ही सबसे बड़ी चुनौती है। बाजारवाद की चुनौतियों के खिलाफ हिन्दी पत्रकारिता का यह सृजनात्मक उत्तर होगा। आधुनिक राजसत्ता, तंत्र, बाजारवाद, विश्वग्राम की सही अंदरूनी तस्वीर लोगों तक पहुंचे, यह सायास कोशिश हो। इसके अंतर्विरोध-कुरूपता को हिन्दी या भाषाई पाठक जानें, यह प्रयास हो। यह काम अंग्रेजी प्रेस नहीं कर सकता। अंग्रेजी की नकल कर रहे भाषाई अखबार भी नहीं कर सकते, क्योंकि ये सभी माडर्न सिस्टम की उपज हैं। यही बाजारवाद इनका शक्तिस्रोत हैं।’’
अंग्रेजी के वर्चस्ववाद के खिलाफ हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं की शक्ति को जगाए व पहचाने बिना अंधेरा और बढ़ता जाएगा। अंग्रेजी अखबार इस लूटतंत्र के हिस्सेदार बने हैं तो मुख्यधारा की हिन्दी-भाषाई पत्रकारिता उनकी छोड़ी जूठी पत्तलें चाट रही हैं। हिन्दी की ताकत सिर्फ सिनेमा में दिखती है, जबकि यह भी बाजार का हिस्सा है। सच कहें तो हिन्दी सिर्फ मनोरंजन और वोट मांगने की भाषा बनकर रह गयी है।
बाजारवाद में मुक्त बेचने वाले हाते हैं - खरीदने वाले नहीं। हमारा पाठक यहीं ठगा जा रहा है। उसे जो कुछ यह कहकर पढ़ाया जा रहा है कि यह तुम्हारी पंसद है - दरअसल वह उसकी पसंद नहीं होती। जिस तरह एक ओर बाजार इच्छा सृजन कर रहा है, आपकी जरूरतें बढ़ी हैं और नाजायज चीजें हमारी जिन्दगी में जगह बना रही हैं। अखबार भी बाजार के इस षडयंत्र का हिस्सा बन गया है। सो पाठक केन्द्र में नहीं है, विज्ञापनदाता को मदद करने वाला ‘संदेश’ केन्द्र में है। हमने कहा - ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ पूरा विश्व एक परिवार है। ‘विश्वग्राम’ कहता है - ‘पूरा विश्व एक बाजार है।’ जाहिर है चुनौती कठिन है। विज्ञापन दाता ‘कंटेंट’ को नियंत्रित करने की भूमिका में आ गया है - यह दुर्भाग्य का क्षण है। आज हालात यह है कि पाठक ही यह तय नहीं करते कि उन्हें कौन सा अखबार पढ़ना है, अखबार ही यह भी तय कर रहे हैं कि हमें किस पाठक के साथ रहना है। कई अंग्रेजी अखबार इसी भूमिका का काम कर रहे हैं।
हिन्दी व भारतीय भाषाओं के अखबारों के सामने यह चुनौती है कि वे अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करें। वे यह सोचें कि क्या वे सूचना देने, शिक्षित करने और मनोरंजन करने के अपने बुनियादी धर्म का निर्वाह करते हुए कुछ ‘विशिष्ठ’ कर सकते हैं? क्या हमने अपने प्रस्थान बिन्दु से नाता तोड़ लिया है, क्या हम जनोन्मुखी और सरोकारी पत्रकारिता से हाथ जोड़ लेंगे। देह और भोग (बाडी एंड प्लेजर) की पत्रकारिता के पिछलग्गू बन जाएंगे? अपने समाज जीवन को प्रभावित करने वाले सवालों से मुंह चुराएंगे? उदारीकरण के नकारात्मक प्रभावों पर चर्चा तक नहीं करेंगे। अपने पाठकों तक सांस्कृतिक पतन की सूचनाएं नहीं देंगे? क्या हम यह नहीं बताएंगे कि मैक्सिकों का यह हाल क्यों हुआ? थाईलैंड की वेश्यावृत्ति का बाजावाद से क्या नाता है? पत्रकारिता सार्थक भूमिका के निर्वहन में हमारे आड़े कौन आ रहा है?
हमारे एकता-अखंडता क्या पश्चिमी सांचों की बुनावट पर कायम रह सकेगी? सुविधाओं एवं सुखों के नाम पर क्या हम आत्म-समर्पण कर देंगे? ऐसे तमाम सवाल पत्रकारिता के सामने खड़े हैं। उनके उत्तर भी हमें पता है लेकिन ‘बाजावाद’ की चकाचैंध में हमें कुछ सूझता नहीं। इसके बावजूद रास्ता यही है कि हम अपने कठघरों से बाहर आकर बुनियादी सवालों से जूझें। हवा के खिलाफ खड़े होने का साहस पालें। हिन्दी पत्रकारिता की ऐतिहासिक भावभूमि हमें यही प्रेरणा देती है। यही प्रस्थान बिन्दु हमें जड़ों से जोड़ेगा और ‘वैकल्पिक पत्रकारिता’ की राह भी बनाएगा।
( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)
- संपर्कः अध्यक्ष , जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र)

Tuesday, October 27, 2009

Tolstoy's words..







Leo Tolstoy (1828-1910)
Russian novelist, philosopher






Hypocrisy in anything whatever may deceive the cleverest and most penetrating man, but the least wide-awake of children recognizes it, and is revolted by it, however ingeniously it may be disguised.

हिन्दी की आर्थिक पत्रकारिता: पहचान बनाने की जद्दोजहद




- संजय द्विवेदी



वैश्वीकरण के इस दौर में ‘माया’ अब ‘महागठिनी’ नहीं रही। ऐसे में पूंजी, बाजार, व्यवसाय, शेयर मार्केट से लेकर कारपोरेट की विस्तार पाती दुनिया अब मीडिया में बड़ी जगह घेर रही है। हिन्दी के अखबार और न्यूज चैनल भी इन चीजों की अहमियत समझ रहे हैं। दुनिया के एक बड़े बाजार को जीतने की जंग में आर्थिक पत्रकारिता एक साधन बनी है। इससे जहां बाजार में उत्साह है वहीं उसके उपभोक्ता वर्ग में भी चेतना की संचार हुआ है। आम भारतीय में आर्थिक गतिविधियों के प्रति उदासीनता के भाव बहुत गहरे रहे हैं। देश के गुजराती समाज को इस दृष्टि से अलग करके देखा जा सकता है क्योंकि वे आर्थिक संदर्भों में गहरी रूचि लेते हैं। बाकी समुदाय अपनी व्यावसायिक गतिविधियों के बावजूद परंपरागत व्यवसायों में ही रहे हैं। ये चीजें अब बदलती दिख रही हैं। शायद यही कारण है कि आर्थिक संदर्भों पर सामग्री के लिए हम आज भी आर्थिक मुद्दों तथा बाजार की सूचनाओं को बहुत महत्व देते हैं। हिन्दी क्षेत्र में अभी यह क्रांति अब शुरू हो गयी है।



‘अमर उजाला’ समूह के ‘कारोबार’ तथा ‘नई दुनिया’ समूह के ‘भाव-ताव’ जैसे समाचार पत्रों की अकाल मृत्यु ने हिन्दी में आर्थिक पत्रों के भविष्य पर ग्रहण लगा दिए थे किंतु अब समय बदल रहा है इकोनामिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड और बिजनेस भास्कर का हिंदी में प्रकाशन यह साबित करता हैं कि हिंदी क्षेत्र में आर्थिक पत्रकारिता का एक नया युग प्रारंभ हो रहा है। जाहिर है हमारी निर्भरता अंग्रेजी के इकानामिक टाइम्स, बिजनेस लाइन, बिजनेस स्टैंडर्ड, फाइनेंसियल एक्सप्रेस जैसे अखबारों तथा बड़े पत्र समूहों द्वारा निकाली जा रही बिजनेस टुडे और मनी जैसे पत्रिकाओं पर उतनी नहीं रहेगी। देखें तो हिन्दी समाज आरंभ से ही अपने आर्थिक संदर्भों की पाठकीयता के मामले में अंग्रेजी पत्रों पर ही निर्भर रहा है, पर नया समय अच्छी खबरें लेकर आ रहा।



भारत में आर्थिक पत्रकारिता का आरंभ ब्रिटिश मैनेजिंग एजेंसियों की प्रेरणा से ही हुआ है। देश में पहली आर्थिक संदर्भों की पत्रिका ‘कैपिटल’ नाम से 1886 में कोलकाता से निकली। इसके बाद लगभग 50 वर्षों के अंतराल में मुंबई तेजी से आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र बना। इस दौर में मुंबई से निकले ‘कामर्स’ साप्ताहिक ने अपनी खास पहचान बनाई। इस पत्रिका का 1910 में प्रकाशन कोलकाता से भी प्रारंभ हुआ। 1928 में कोलकाता से ‘इंडियन फाइनेंस’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। दिल्ली से 1943 में इस्टर्न इकानामिक्स और फाइनेंसियल एक्सप्रेस का प्रकाशन हुआ। आजादी के बाद भी गुजराती भाषा को छोड़कर हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में आर्थिक पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई बहुत महत्वपूर्ण प्रयास नहीं हुए। गुजराती में ‘व्यापार’ का प्रकाशन 1949 में मासिक पत्रिका के रूप में प्रारंभ हुआ। आज यह पत्र प्रादेशिक भाषा में छपने के बावजूद देश के आर्थिक जगत की समग्र गतिविधियों का आइना बना हुआ है। फिलहाल इसका संस्करण हिन्दी में भी साप्ताहिक के रूप में प्रकाशित हो रहा है। इसके साथ ही सभी प्रमुख चैनलों में अनिवार्यतः बिजनेस की खबरें तथा कार्यक्रम प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं लगभग दर्जन भर बिजनेस चैनलों की शुरूआत को भी एक नई नजर से देखा जाना चाहिए। जी बिजनेस, सीएनबीसी आवाज, एनडीटीवी प्राफिट आदि।



वैश्वीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन से पैदा हुई स्पर्धा ने इस क्षेत्र में क्रांति-सी ला दी है। बड़े महानगरों में बिजनेस रिपोर्टर को बहुत सम्मान के साथ देखा जाता है। इसकी तरह हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में वेबसाइट पर काफी सामग्री उपलब्ध है। अंग्रेजी में तमाम समृद्ध वेबसाइट्स हैं, जिनमें सिर्फ आर्थिक विषयों की इफरात सामग्री उपलब्ध हैं। हिन्दी क्षेत्र में आर्थिक पत्रकारिता की दयनीय स्थिति को देखकर ही वरिष्ट पत्रकार वासुदेव झा ने कभी कहा था कि हिन्दी पत्रों के आर्थिक पृष्ठ ‘हरिजन वर्गीय पृष्ट’ हैं। उनके शब्दों में - ‘भारतीय पत्रों के इस हरिजन वर्गीय पृष्ठ को अभी लंबा सफर तय करना है। हमारे बड़े-बड़े पत्र वाणिज्य समाचारों के बारे में एक प्रकार की हीन भावना से ग्रस्त दिखते हैं, अंग्रेजी पत्रों में पिछलग्गू होने के कारण हिन्दी पत्रों की मानसिकता दयनीय है। श्री झा की पीड़ा को समझा जा सकता है, लेकिन हालात अब बदल रहे हैं। बिजनेस रिपोर्टर तथा बिजनेस एडीटर की मान्यता और सम्मान हर पत्र में बढ़ा है। उन्हें बेहद सम्मान के साथ देखा जा रहा है। पत्र की व्यावसायिक गतिविधियों में भी उन्हें सहयोगी के रूप में स्वीकारा जा रहा है। समाचार पत्रों में जिस तरह पूंजी की आवश्यकता बढ़ी है, आर्थिक पत्रकारिता का प्रभाव भी बढ़ रहा है। व्यापारी वर्ग में ही नहीं समाज जीवन में आर्थिक मुद्दों पर जागरूकता बढ़ी है। खासकर शेयर मार्केट तथा निवेश संबंधी जानकारियों को लेकर लोगों में एक खास उत्सुकता रहती है।



ऐसे में हिन्दी क्षेत्र में आर्थिक पत्रकारिता की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है, उसे न सिर्फ व्यापारिक नजरिए को पेश करना है, बल्कि विशाल उपभोक्ता वर्ग में भी चेतना जगानी है। उनके सामने बाजार के संदर्भों की सूचनाएं सही रूप में प्रस्तुत करने की चुनौती है। ताकि उपभोक्ता और व्यापारी वर्ग तमाम प्रलोभनों और आकर्षणों के बीच सही चुनाव कर सके। आर्थिक पत्रकारिता का एक सिरा सत्ता, प्रशासन और उत्पादक से जुड़ा है तो दूसरा विक्रेता और ग्राहक से। ऐसे में आर्थिक पत्रकारिता की जिम्मेदारी तथा दायरा बहुत बढ़ गया है। हिन्दी क्षेत्र में एक स्वस्थ औद्योगिक वातावरण, व्यावसायिक विमर्श, प्रकाशनिक सहकार और उपभोक्ता जागृति का माहौल बने तभी उसकी सार्थकता है। हिन्दी ज्ञान विज्ञान के हर अनुशासन के साथ व्यापार, वाणिज्य और कारर्पोरेट की भी भाषा बने। यह चुनौती आर्थिक क्षेत्र के पत्रकारों और चिंतकों को स्वीकारनी होगी। इससे भी भाषायी आर्थिक पत्रकारिता को मान-सम्मान और व्यापक पाठकीय समर्थन मिलेगा।

( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

- संपर्कः अध्यक्ष , जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र)

मोबाइलः 098935-98888 e-mail- 123dwivedi@gmail.com

Web-site- www.sanjaydwivedi.com

Monday, October 26, 2009

यूटोपिया



नीलेश रघुवंशी

जन्म
04 अगस्त, 1969, गंज बासौद(म.प्र.)





यूटोपिया

उसने अपनी जेब में
इतने अहंकार से हाथ डाला कि
उस पल मुझे लगा
काश! किसी के पास जेब न होती
तो कितना अछ्छा होता
आख़िर क्यों हो किसी के पास जेब?
मैं एक यूटोपिया में प्रवेश करने जा रही हू`ं
बंजारा खानबदोश जिप्सी नो मेंस लैण्ड
कुछ भी कह लो मुझे
अपने इस यूटोपिया में
बिना जेब के हूँ मैं
खालीपन मुझे अच्छा लगता है
तिस पर
जेब के खालीपन के तो कहने ही क्या...
क्यों बढ़ा रही हूँ बात को इतना
कहना चाहिए कभी-कभी
कलेजे को चीरती
सीधी-सच्ची दो टूक बात
आख़िर क्यों हो किसी के पास जेब?

Saturday, October 24, 2009

दोहे


यश मालवीय





कौन चतुर चालाक है और कौन मासूम,
सब कह देता आपका, अपना ड्राइंगरूम।।

साँसों का चुकने लगा, खाता और हिसाब,
पढी न पूरी जंदगी, पढते रहे किताब।।

पढते अपना नाम ही, लिखते अपना नाम,
हम अपने ही इस कदर, अब हो गए गुलाम।।

सुबह नहीं अपनी रही, रही न अपनी शाम,
ओवरटाइम जो मिला, किया काम, बस काम।।

सुबह सुबह माथा गरम, कंधे पर वैताल,
लहर उठाए किस तरह, उम्मीदों का ताल।।

थकने की क्या बात हो, जीना हमें जहान,
कंधे पर सामान है, पाँव पाँव प्रस्थान।।

दिल में है दरियादिली, पर खाली है जेब,
बिन घुँघरू कैसे बजे, खुशियों की पाजेब।।

मरहम पट्टी संग रखें, संग रखें रूमाल,
सपने ही अब आपको, करने लगे हलाल।।

है उडान की जद मगर, बिछा हुआ है जाल,
कैसे कोई हल करे, इतना बडा सवाल।।

झुलसा अपनी आग में, राहत का सामान,
बादल भागे छोडकर, जलता हुआ मकान।।

आने को आती नहीं, कभी साँच को आँच,
सपने है ताजा लहू, सपने टूटा काँच।।

साहित्य का भी गढ़ है छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ राज्य के स्थापना दिवस ( 1 नवंबर पर विशेष)
-संजय द्विवेदी
छत्तीस गढ़ों से संगठित जनपद छत्तीसगढ़ । लोकधर्मी जीवन संस्कारों से अपनी ज़मीन और आसमान रचता छत्तीसगढ़। भले ही राजनैतिक भूगोल में उसकी अस्मितावान और गतिमान उपस्थिति को मात्र आठ वर्ष हुए हैं, पर सच तो यही है कि अपने सांस्कृतिक हस्तक्षेप की सुदीर्घ परंपरा से वह साहित्य के राष्ट्रीय क्षितिज में ध्रुवतारा की तरह स्थायी चमक के साथ जाना-पहचाना जाता है । यदि उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि से हिंदी संस्कृति के सूरज उगते रहे हैं तो छत्तीसगढ़ ने भी निरंतर ऐसे-ऐसे चाँद-सितारों की चमक दी है जिससे अपसंस्कृति के कृष्णपक्ष को मुँह चुराना पड़ा है ।जनपदीय भाषा- छत्तीसगढ़ी के प्रति तमाम श्रद्धाओं और संभ्रमों के बाद यदि हिंदी के व्यापक वृत में छत्तीसगढ़ धनवान बना रहा है तो इसमें उस छत्तीसगढ़िया संस्कार की भी भूमिका भी रेखांकित होती है जिसकी मनोवैज्ञानिक उत्प्रेरणा के बल पर आज छत्तीसगढ़ सांवैधानिक राज्य के रूप में है । कहने का आशय यही कि ब्रज, अवधी आदि लोकभाषाओं की तरह उसने भी हिंदी को संपुष्ट किया है । कहने का आशय यह भी कि लोकभाषाओं के विरोध में न तो राष्ट्रीय हिंदी रही है न ही छत्तीसगढ़ की हिंदी । इस वक्त यह कहना भी ज़रूरी होगा कि छत्तीसगढ़ की असली पहचान उसकी सांस्कृतिक अस्मिता है, जिसमें भाषायी तौर पर हिंदी और सहयोगी छत्तीसगढ़ी दोनों की सांस्कृतिक उद्यमों, सक्रियताओं, प्रभावों और संघर्षों को याद किया ही जाना चाहिए।
आज जब समूची दुनिया में (और विडम्बना यह भी कि भारतीय बौद्धिकी में भी) अपने इतिहास, अपने विरासत और अपने दिशाबोधों को बिसार देने का वैचारिक चिलम थमाया जा रहा है । पृथक किन्तु उज्ज्वल अस्मिताओं को लीलने के लिए वैश्वीकरण को खड़ा किया जा रहा है । अपनी सुदीर्घ उपस्थितियों को रेखांकित करते रहना ज़रूरी हो गया है ।
पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक वल्लभाचार्य ने पूर्व मीमांसा, भाषा उत्तर मीमांसा या ब्रज सूत्र भाषा, सुबोधिनी, सूक्ष्मटीका, तत्वदीप निबंध तथा सोलह प्रकरण की रचना की, जो रायपुर जिले के चम्पारण (राजिम के समीप) में पैदा हुए थे। अष्टछाप के संस्थापक विट्ठलाचार्य उनके पुत्र थे। मुक्तक काव्य परम्परा की बात करें तो राजा चक्रधर सिंह सबसे पहले नज़र आते हैं । वे छत्तीसगढ़ के गौरव पुरुष हैं। उनके जैसा संस्कृति संरक्षक राजा विरले ही हुए हैं । वे हिन्दी साहित्य के युग प्रणेता पं महावीर प्रसाद द्विवेदी का जीवनपर्यन्त नियमित आर्थिक सहयोग करते रहे। रम्यरास, जोश-ए-फरहत, बैरागढ़िया राजकुमार, अलकापुरी, रत्नहार, काव्यकानन, माया चक्र, निकारे-फरहत, प्रेम के तीर आदि उनकी ऐतिहासिक महत्व की कृतियां हैं। उनकी कई कृतियाँ 50 किलो से अधिक वजन की हैं ।
भारतेन्दु युग का जिक्र करते ही ठाकुर जगमोहन सिंह का नाम हमें चकित करता है, जिनकी कर्मभूमि छत्तीसगढ़ ही रहा और जिन्होंने श्यामा स्वपन जैसी नई भावभूमि की औपन्यासिक कृति हिन्दी संसार के लिए रचा। वे भारतेन्दु मंडल के अग्रगण्य सदस्य थे। जगन्नाथ भानु, मेदिनी प्रसाद पांडेय, अनंतराम पांडेय को इसी श्रृंखला मे याद किया जाना चाहिए । यहाँ सुखलाल प्रसाद पांडेय का विशेष उल्लेख करना समीचीन होगा कि उन्होंने शेक्सपियर के नाटक कॉमेडी ऑफ एरर्स का गद्यानुवाद किया, जिसे भूलभुलैया के नाम से जाना जाता है।
द्विवेदी युग में भी छत्तीसगढ़ की धरती ने अनेक साहित्य मनीषियों की लेखनी के चमत्कार से अपनी ओजस्विता को सिद्ध किया। इस ओजस्विता को चरितार्थ करने वालों में लोचन प्रसाद पांडेय का नाम अग्रिम पंक्ति में है। आपकी प्रमुख रचनाएं हैं – माधव मंजरी, मेवाड़गाथा, नीति कविता, कविता कुसुम माला, साहित्य सेवा, चरित माला, बाल विनोद, रघुवंश सार, कृषक बाल सखा, जंगली रानी, प्रवासी तथा जीवन ज्योति। दो मित्र आपका उपन्यास है। पंडित मुकुटधर पांडेय, लोचन प्रसाद के लघु भ्राता थे जिन्होंने छायावाद काव्यधारा का सूत्रपात किया। वे पद्मश्री से सम्मानित होने वाले छत्तीसगढ़ के प्रथम मनीषी हैं। पदुमलाल पन्नालाल बख्शी की झलमला को हिन्दी की पहली लघुकथा मानी जाती है। इन्होंने ग्राम गौरव, हिन्दी साहित्य विमर्श, प्रदीप आदि कृति रचकर हिन्दी साहित्य में अतुलनीय योगदान दिया। छत्तीसगढ़ के शलाका पुरुष बख्शी जी विषय में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि उन्होंने सरस्वती जैसी महत्वपूर्ण पत्रिका का सम्पादन किया। रामकाव्य के अमर रचनाकार डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र ने कौशल किशोर, साकेत संत, रामराज्य जैसे ग्रंथ लिखकर चमत्कृत किया। निबंधकार मावली प्रसाद श्रीवास्तव का कवित्व छत्तीसगढ़ की संचेतना को प्रमाणित करती है। इंग्लैंड का इतिहास और भारत का इतिहास उनकी चर्चित कृतियाँ हैं। उनकी रचनाएँ सरस्वती, विद्यार्थी, विश्वमित्र, मनोरमा, कल्याण, प्रभा, श्री शारदा जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में समादृत होती रही हैं । छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास निबंध सरस्वती के मार्च १९१९ में प्रकाशित हुआ था, जो छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय पहचान प्रदान करता है । प्यारेलाल गुप्त छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ रचनाकारों में एक हैं जिन्होंने सुधी कुटुम्ब (उपन्यास) आदि उल्लेखनीय कृतियाँ हमें सौंपी। द्वरिका प्रसाद तिवारी विप्र की किताब गांधी गीत, क्रांति प्रवेश, शिव स्मृति, सुराज गीत (छत्तीसगढ़ी) हमारा मार्ग आज भी प्रशस्त करती हैं। काशीनाथ पांडेय, धनसहाय विदेह, शेषनाथ शर्मा शील, यदुनंदन प्रसाद श्रीवास्तव, पंडित देवनारायण, महादेव प्रसाद अजीत, शुक्लाम्बर प्रसाद पांडेय, पंडित गंगाधर सामंत, गंभीरनाथ पाणिग्रही, रामकृष्ण अग्रवाल भी हमारे साहित्यिक पितृ-पुरुष हैं।
टोकरी भर मिट्टी का नाम लेते ही एक विशेषण याद आता है और वह है – हिन्दी की पहली कहानी। इस ऐतिहासिक रचना के सर्जक हैं – माधव राव सप्रे। पंडित रविशंकर शुक्ल मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री मात्र नहीं थे, उन्होंने आयरलैण्ड का इतिहास भी लिखा था। पंडित राम दयाल तिवारी एक योग्य समीक्षक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। शिवप्रसाद काशीनाथ पांडेय का कहानीकार आज भी छत्तीसगढ़ को याद आता है।
गजानन माधव मुक्तिबोध हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले कवि हैं। वे कहानीकार भी थे और समीक्षक भी। उनकी विश्व प्रसिद्ध कृतियाँ हैं – चांद का मुँह टेढा है, अंधेरे में, एक साहित्यिक की डायरी। इस कालक्रम के प्रमुख रचनाकार रहे - घनश्याम सिंह गुप्त, बैरिस्टर छेदीलाल । आधुनिक काल में श्रीकांत वर्मा राष्ट्रीय क्षितिज पर प्रतिष्ठित कवि की छवि रखते हैं, जिनकी प्रमुख कृतियाँ माया दर्पण, दिनारम्भ, छायालोक, संवाद, झाठी, जिरह, प्रसंग, अपोलो का रथ आदि हैं। हरि ठाकुर सच्चे मायनों में छत्तीसगढ़ के जन-जन के मन में बसने वाले कवियों में अपनी पृथक पहचान के साथ उभरते हैं। जिनका सम्मान वस्तुतः छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के संघर्ष का सम्मान है। उन्होंने कविता, जीवनी, शोध निबंध, गीत तथा इतिहास विषयक लगभग दो दर्जन कृतियों के माध्यम से इस प्रदेश की तंद्रालस गरिमा को जगाया है। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – गीतों के शिलालेख, लोहे का नगर, अंधेरे के खिलाफ, हँसी एक नाव सी। गुरुदेव काश्यप, बच्चू जांजगीरी, नारायणलाल परमार, हरि ठाकुर के समकालीन कवि हैं। प्रमोद वर्मा की तीक्ष्ण और मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि का जिक्र न करना बेमानी होगा । हिंदी रंग चेतना में हबीब तनवीर की रंग चेतना की गंभीर हिस्सेदारी स्थायी जिक्र का विषय हो चुका है ।
छत्तीसगढ़ के रचनाकारों ने सिर्फ़ कविता, कहानी ही नहीं उन तमाम विधाओं में अपनी सार्थक उपस्थिति को रेखांकित किया है जिससे हिंदी भाषा और उसकी संस्कृति समृद्ध होती रही है । आज की लोकप्रिय विधा लघुकथा का जन्म यहीं हुआ । हिंदी की पहली लघुकथा इसी ज़मीन की उपज है । खास तौर पर उर्दू की समानान्तर धारा की बात करें तो जिन्होंने देवनागरी को आजमाकर अपनी हिंदी-भक्ति को चरितार्थ किया । इसमें ग़ज़लकार मौलाना अब्दुल रउफ महवी रायपुरी, लाला जगदलपुरी, स्व. बंदे अली फातमी, स्व. मुकीम भारती, स्व. मुस्तफा हुसैन मुश्फिक, शौक जालंधरी, रजा हैदरी, अमीर अली अमीर की शायरी को आम आदमी भुला नहीं सकता है । खैर.... हिन्दी के साथ हम छत्तीसगढ़ी भाषा के रचनाकारों का स्मरण न करें तो यह अस्पृश्य भावना का परिचायक होगा। कबीर दास के शिष्य और उनके समकालीन (संवत 1520) धनी धर्मदास को छत्तीसगढ़ी के आदि कवि का दर्जा प्राप्त है, छत्तीसगढ़ी के उत्कर्ष को नया आयाम दिया – पं. सुन्दरलाल शर्मा, लोचन प्रसाद पांडेय, मुकुटधर पांडेय, नरसिंह दास वैष्णव, बंशीधर पांडेय, शुकलाल पांडेय ने। कुंजबिहारी चौबे, गिरिवरदास वैष्णव ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में अपनी कवितीओं की अग्नि को साबित कर दिखाया। इस क्रम में पुरुषोत्तम दास एवं कपिलनाथ मिश्र का उल्लेख भी आवश्यक होगा। वर्तमान में छत्तीसगढ़ी रचनात्मकता भी लगातार जारी है । पर उसे समय के शिला पर कसौटी में कसा जाना अभी प्रतीक्षित है ।
इसी तरह आज के दौर में हिंदी साहित्य में अपनी बड़ी जगह बना चुके नौकर की कमीज के लेखक विनोद कुमार शुक्ल, जया जादवानी, आनंद हषुर्ल, लोकबाबू, परितोष चक्रवर्ती, सतीश जायसवाल, राजेश्वर दयाल सक्सेना, रमेश चंद्र मेहरोत्रा, चित्तरंजन कर, जयप्रकाश, कनक तिवारी, ललित सुरजन, जयप्रकाश मानस, सुधीर शर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, स्व. विभु कुमार डा.राजेंद्र सोनी, परदेशी राम वर्मा, लाला जगदलपुरी जैसे तमाम नाम गिनाए जा सकते हैं जिनपर समूचे हिंदी संसार को गर्व हो सकता है । सिर्फ इतना ही नहीं यहाँ ऐसे रचनाकार भी बैठे हुए हैं जिन्हें भले ही आज की कथित भारतीय रचनाकार बिरादरी नहीं जानती पर वे भी कई देश की सीमाओं को लाँघकर दर्जनों देशों के हजारों पाठकों के बीच जाने जाते हैं । ये सब के सब हमारे वर्तमान के ही संस्कृतिकर्मी नहीं बल्कि हमारे अतीत में पैठे हुए उन सभी नक्षत्रों की तरह हैं जो भावी समय के खरे होने की गारंटी देते हैं ।
- अध्यक्षः जनसंचार विभाग माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र)
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