Wednesday, April 20, 2011

भारत में चुनाव सुधार नहीं चाहते राजनीतिक दल




भोपाल, 20 april 2011,
कुन्दन पाण्डेय MAMC IV SEM



तमिलनाडु में अब तक चुनाव आयोग 42 करोड़ रुपए जब्त कर चुका है, साथ ही चुनाव समाप्ति से पूर्व ही आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के 57 हजार से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं। दरअसल तमिलनाडु में वोटों के लिए महंगे गिफ्ट एवं नकदी बांटने की परम्परा से वहां का मतदाता इस बार भी कुछ पाने की आशा कर रहा है, दल इस बार भी उपहार देना चाहते हैं। लेकिन, चुनाव आयोग इस बार बहुत अधिक सख्त हो गया है। देश का चुनाव आयोग चुनाव सुधार करने के लिए सतत प्रयत्नशील है क्या? इस बार चुनाव आयोग ने सभी प्रत्याशियों को अपने समस्त चुनाव खर्च एक नये बैंक खाते खोलकर करना अनिवार्य कर दिया है।
इसके बावजूद करोड़ों रुपए का पकड़ा जाना गंभीर चिंता का विषय किसके लिए है? चिंतनीय विषय यह भी है कि देश में चुनाव जीतने के लिए 3-एम को पहली आवश्यकता माना जा रहा है वह है- माफिया, मनी और मैन पॉवर। यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे विकृत स्वरुपों में से एक है। आइवर जेनिंग्स ने लोकतंत्र को एक खर्चीली व्यवस्था कहा है, लेकिन यह तो पूर्ण भ्रष्ट व्यवस्था है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन द्वारा मतदाताओं के पहचान पत्र बनवाने की व्यवस्था से फर्जी मतदान पर काफी हद तक रोक लग चुकी है। लेकिन, राजनीतिक दलों में शुचिता के लिए चुनाव आयोग को अभी बहुत कुछ करना बाकी है। खासकर चुने हुए जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने तथा चुनावों में खड़े सभी प्रत्याशियों को नकार करके नकारात्मक वोट देने की व्यवस्था जल्द करने की आवश्यकता है।
देश की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस की एक ही व्यक्ति कुछ सालों से निर्विरोध अध्यक्ष बन रही है। जिस घर रुपी कांग्रेस पार्टी में ही लोकतंत्र कभी नहीं रहा, वह घर के बाहर के विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का लगातार गला घोंटने पर आमादा रहती है। जब तक दलों के आंतरिक चुनाव पूर्ण शुचिता से चुनाव आयोग के नियंत्रण में नहीं होंगे, तब तक सारे चुनाव सुधार निरर्थक ही सिद्ध होंगे। क्या कांग्रेस, भाजपा तथा अन्य दलों के अध्यक्षों का चुनाव, चुनाव आयोग करायेगा तो नतीजे न केवल शुद्ध होंगे बल्कि चौंकाने वाले भी हो सकते हैं। लेकिन, ऐसी व्यवस्था से गांधी परिवार की जागीरदारी कांग्रेस से समाप्त हो जाएगी और भाजपा हाईकमान के चंगुल से स्वतंत्र हो जाएगी। क्योंकि हाईकमान के लिए पार्टी विद ए डिफरेंस वाली भाजपा में संसदीय दल अध्यक्ष का नया-अनोखा पद सृजित कर दिया गया।
इसके अतिरिक्त दलों के चंदों का तिमाही या छमाही लेखा-जोखा अखबारों में व्यावसायिक कम्पनियों की तरह प्रकाशित कराने के विषय पर दलों को अपने पाक-साफ न होने का अटूट भरोसा क्यों हैं? क्योंकि गड़बड़ी की संभावना प्रबल है। संविधान की भावना के खिलाफ लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग कराने की परंपरा इंदिरा गांधी ने अपने फायदे के लिए शुरु कर दी, जो आज चुनाव आयोग के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका है। अब प्रत्येक 6 माह या प्रत्येक महीने कोई न कोई चुनाव होता रहता है।
दोनों राष्ट्रीय दल महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए जी-जान लगा देने की नौटंकी करते हैं। परन्तु दोनों ही 33 प्रतिशत महिलाओं को अपना प्रत्याशी क्यों नहीं बनाते, दोनों को रोकता कौन है? केवल एक चीज, नीयत। नीयत ठीक नहीं है, दोनों राजनीतिक दलों की ही नहीं, बल्कि पूरे तंत्र के अधिकतर जिम्मेदार लोगों की। देश की अधिकांश समस्या नेता और नीति नहीं, बल्कि नेताओं की खराब नीयत है। धनबल नहीं कम होने का एक और कारण ग्राम पंचायत स्तर पर दलों के संगठन का शून्य होना है, जबकि सबसे अधिक वोट पोल वहीं से होते हैं। अत: गांवों के वोटों की जंग को जीतने के लिए उम्मीदवार साड़ी-कपड़े, शराब और नकद पैसों का सहारा लेते हैं।
धनबल को एक और तरीके से समाप्त किया जा सकता है, वह ऐसे कि चुनावों में खड़े सभी प्रत्याशियों को चुनाव आयोग अपने खर्चे से साझे मंच की ऐसी व्यवस्था करे जिससे सभी प्रत्याशी अपना-अपना प्रचार कर सकें। चुनाव आयोग सभी प्रत्याशियों के विचारों-चुनावी घोषणाओं का एक साझा पत्रक या फोल्डर भी अपने खर्चे पर बंटवा सकता है, इससे सभी प्रत्याशियों को कार्यकर्ताओं की व्यवस्था करने की चिन्ता से भी कुछ निजात मिलेगी।
चुनाव संबंधी अपराधों के लिए भारतीय दंड संहिता में 171 (क) से 171 (झ) में सजा का प्रावधान हैं। चुनाव सुधार के लिए 1972 में संयुक्त संसदीय समिति 1975 में तारकुन्डे समिति तथा 1990 में दिनेश गोस्वामी समिति का गठन किया गया था। गोस्वामी समिति ने संस्तुति की थी कि राज्य चुनाव का खर्च वहन करे। इस विषय में 1998 में गठित इन्द्रजीत गुप्त समिति कि सिफारिशों का विशेष महत्व है। गुप्त समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि राजनीतिक दल लोकतंत्र के संचालन में विशेष भूमिका निभाते हैं, इसलिए दलों को चुनावों में खर्च करने के लिए धन तथा अन्य संबंधित सामानों की व्यवस्था राज्य द्वारा दी जाय। मेरा मानना है कि यदि पिता को यह पता है कि बेटे को व्यवसाय करने के लिए धन न दिया तो वह घर की तिजोरी से चुरा लेगा और लोक-भय से पिता रिपोर्ट भी नहीं लिखा पायेगा।
ठीक वैसे ही जब सत्ता पाते ही पार्टियां, पार्टी के लिए सरकारी धन की लूट करके रख लेती हैं, तो, इस शर्त पर चुनाव खर्च की स्टेट फंडिंग ठीक है कि धनबल का चुनावों में प्रयोग पूरी तरह बंद हो जाय, जो की किसी क्रांति से पहले संभव नहीं लगता। जयप्रकाश नारायण और मधु लिमये जैसे विचारकों का यह तक मानना था कि राजकोष से चुनाव खर्च तभी कराए जाय जब पार्टियों के आय-व्यय सरकारी या आयोग की निगरानी में हो। कांग्रेस के बुराड़ी अधिवेशन में सोनिया गांधी भी राजकोष से व्यय का सुझाव दे चुकी हैं। लेकिन, दलों के किसी बड़े नेता ने अब तक आय-व्यय के सरकारी जांच या पारदर्शिता को गारंटीशुदा करने के विषय पर कुछ नहीं कहा है। क्या चुनाव सुधार पर दलों को कुछ नहीं कहना है?

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