Friday, June 24, 2011

आपातकालीन दमन के अमिट व्रणचिह्न


कुन्दन पाण्डेय
24 june 2011
BHOPAL


कहते हैं वक्त हर जख्म को भर देता है, लेकिन जख्म के चिह्न को वक्त मिटा नहीं पाता, धुंधला अवश्य कर देता है। भारतीय लोकतंत्र में आपातकाल का व्रणचिह्न, एक ऐसा ही चिह्न है। आज से ठीक 36 वर्ष पूर्व देश पर 25 जून, 1975 की मध्य रात्रि को आपातकाल थोपा गया था। लोकतंत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र 100 वर्षों में परिपक्व होता है। इस आधार पर हमारा भारतीय लोकतंत्र 1975 में परिपक्वता वर्ष से 75 वर्ष कम था। दरअसल 1971 के आम चुनाव में दो तिहाई बहुमत से चुनाव जीतने वाली इंदिरा गांधी के खिलाफ रायबरेली से समाजवादी राजनारायण चुनाव हार गये थे। परन्तु राजनारायण के इंदिरा गांधी की जीत को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून, 1975 को श्रीमती गांधी का चुनाव रद्द करने का आदेश घोषित कर दिया।
दरअसल 25 जून, 1975 की शाम छह बजे से जयप्रकाश नारायण ने रामलीला मैदान पर एकत्रित तकरीबन 1 लाख के उत्साही जनसमूह को संबोधित करते हुए इंदिरा गांधी से इस्तीफा देने का आग्रह किया और कहा कि अन्यथा भारत की जनता को उन्हें शांतिपूर्वक इस्तीफा देने को बाध्य करना चाहिए। इतना सुनने के बाद, इंदिरा गांधी ने लगभग 11.30 बजे आपातकाल के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए। आपातकाल की घोषणा पर राष्ट्रपति ने बिना मंत्रीमंडल की सिफारिश के ही हस्ताक्षर कर दिए थे। 25 जून की रात्रि को 3 बजे जेपी को गिरफ्तार करने गयी पुलिस, 5 बजे तक पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने ले आई। फौरन मिलने पहुंचे युवा तुर्क कहे जाने वाले कांग्रेसी नेता ‘चन्द्रशेखर’ तक को पुलिस ने वहीं गिरफ्तार कर लिया। चन्द्रशेखर की गिरफ्तारी समस्त कांग्रेसी सांसदों को यह चेतावनी थी कि जो विरोध करेगा, विपक्ष की तरह जेल में होगा।
“मेंटीनेंस ऑफ इंटरनल सिक्युरिटी एक्ट” यानी मीसा जैसा काला कानून लागू करके, प्रख्यात समाजवादी नायक रघु ठाकुर के अनुसार आपातकाल में लगभग 2 लाख लोगों को हिरासत में रखा गया था। ताज्जुब की बात है कि, यह संख्या 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय कारावास में रखे गये लोगों की संख्या से अधिक थी। तत्कालीन महान्यायवादी (अटार्नी जनरल) ने कहा था कि, “राज्य किसी की भी हत्या बिना दंडित हुए कर सकता है”। यह वाक्य निश्चित ही इस समय भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे सिविल सोसायटी के सदस्यों व समर्थकों के अंतस-मानस में सिहरन पैदा करने के लिए काफी है।
आपातकाल के दौरान सत्ता के नशे में मदांध संजय गांधी की मंडली का उत्साहित नारा था कि ‘एक राष्ट्र, एक पार्टी और एक नेता’। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने ‘इंडिया इज इंदिरा’ व ‘इंदिरा इज इंडिया’ कहकर के चाटुकारिता को जबर्दस्त बढ़ावा दिया। बरूआ का यह कथन इसलिए सत्य प्रतीत होता है कि इंदिरा गांधी अपना लोकसभा निर्वाचन रद्द होने तथा कांग्रेस संसदीय दल में नये नेता के चुनाव की मांग से मानसिक रूप से अपने राजनीतिक जीवन में सबसे अशांत थी। बस फिर क्या था, ‘इंदिरा इज इंडिया’ के कारण इंदिरा ने अपनी नितांत निजी अशांति को पूरे देश पर थोप दिया। इंदिरा गांधी के सामान्य विरोध तक को देशद्रोही मानकर पूरे विपक्ष सहित जेलों में मीसा के तहत ठूंसकर, संविधान के 53 अनुच्छेद बदल दिए गए। 42 वां संविधान संशोधन इसी समय विपक्ष की अनुपस्थिति में हुआ था। पीएम के लोकसभा निर्वाचन को कोर्ट में चुनौती न देने का अकल्पनीय, निराधार एवं हास्यास्पद कानून संसद द्वारा बनाया गया। और तो और पं. नेहरू द्वारा प्रस्तावित एवं संविधान सभा द्वारा पारित ‘संविधान की प्रस्तावना’ में ‘पंथनिरपेक्ष व समाजवादी’ शब्द जोड़कर, इंदिरा ने नेहरू की समझ व विद्वता पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिए।
राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक ‘मदरलैंड’ के कार्यालय पर तोड़-फोड़ करके इसके संपादक मलकानी को गिरफ्तार किया गया। अनगिनत अखबार जो ऐसी स्थिति नहीं झेल सके, बंद हो गये। दैनिक जागरण ने अपने संपादकीय का स्थान खाली रखकर, नये तरह की पत्रकारीय अभिव्यक्ति की इबारत लिखी। प्लेटो का यह कथन इंदिरा गांधी पर सटीक बैठता है कि, “लोकतंत्र में आक्रामक और साहसी लोग नेता बन जाते हैं। दब्बू और चापलूस लोग इन नेताओं के अनुयायी।” 1971 की युद्ध विजय से अपनी आक्रामकता और साहसीपन पर श्रीमती गांधी जनता से मुहर लगवा चुकी थीं। पीएम इंदिरा ने तानाशाह के जैसे कहा कि, “मैं ही वह हूं जो देश को एकताबद्ध रखे है।” इसका तो यही अर्थ है न, कि इनके पहले नेहरू युग व इनके बाद के युग में देश में एकता नहीं थी। जेपी आन्दोलन में जनसंघ से अधिक अत्याचार सहकर संघ परिवार ने अद्वितीय व स्वर्णिम यश-ख्याति अर्जित की।
भारतीय लोकतंत्र के सभी संस्थाओं को अपूर्णनीय आघात पहुंचाया गया। आपातकाल के नाम पर किए गए दमन-शोषण और ज्यादतियों की जांच के लिए शाह आयोग का गठन किया गया। इस आयोग की गवाही में नौकरशाहों और अन्य अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया कि अपने-अपने पद की रक्षा ही हमारे कार्य का एकमात्र आधार था। आपातकाल में इंदिरा गांधी ने सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके पहली बार लोकसेवकों को नौकरशाह बना डाला। ऐसा आभास होता है कि देश पर आपातकाल थोपने वाला शासक यह कह रहा हो कि “ऐ लोकसेवकों तुम जनता के लिए शाह जरूर हो, परन्तु एकमात्र मेरे लिए तो नौकर (शाह नहीं) ही हो”। आपातकाल ने राष्ट्र-समाज-शासन में जो धर्म-अधर्म, सही-गलत, अच्छा-बुरा, संवैधानिक-असंवैधानिक एवं नैतिक-अनैतिक का भेद बचा-खुचा था, उसे भी हमेशा-हमेशा के लिए अधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया। अब तो भारत की प्रशासनिक मशीनरी के अंतस-मानस, चाल-चेहरा-चरित्र में आपातकाल के दुर्गुण शाश्वत अंग बन गये हैं।
परन्तु यक्ष प्रश्न यह है कि क्या आज की सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक परिदृश्य वाले समाज में जे पी जैसा कोई व्यक्तित्व हो सकता है? जो मंत्री, प्रधानमंत्री तो बहुत बड़ी बात है, सांसद या विधायक तक न बना हो। लेकिन केन्द्रीय सत्ता (इंदिरा गाँधी) के खिलाफ आन्दोलन को सफल करने के लिए लाखों लोगों को जोड़ने की क्षमता रखता हो। जो व्यक्ति, समाज या राष्ट्र इतिहास से सबक नहीं सीखता, वो इतिहास में ही दफ्न हो जाता है। लेकिन भारतीय राष्ट्र, समाज, सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस, भाजपा सहित सभी विपक्षी दलों ने शायद ही आपातकाल से कोई सबक सीखा है। अब यह भविष्य ही बतायेगा कि पूर्व उल्लिखित सभी इकाईयों का इतिहास कैसा होता है?
(लेखक युवा पत्रकार हैं।)

Friday, June 17, 2011

क्या रंग लाएगा शिष्टाचार का भ्रष्टाचार से संघर्ष


-प्रो. बृजकिशोर कुठियाला

भ्रष्टाचार के विरोध में उठी जनमानस की आवाज को जिस प्रकार से वर्तमान राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था ने कुचला है वह अप्रत्यक्षित था। अन्ना हजारे देश के विशिष्ठ और नगरीय जनता की आवाज को लेकर उठे। उनके साथ कुछ और भी प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सहयोग किया। कुटिलता से सरकार ने अन्ना हजारे की टीम को लुभाया और आन्दोलन टाय-टाय फिस हो गया। वार्ता के चक्रों में फंसाकर कुछ राजनेताओं ने तो स्थापित प्रतिष्ठा वाले अन्ना हजारे की छवि को भी धूमिल करने का प्रयास किया।
बाबा रामदेव की आवाज में निम्न मध्यवर्ग और ग्रामीण जनता की पीड़ा और विरोध शामिल था। भ्रष्टाचार की व्यापकता और उसकी विराटता से आम आदमी न केवल क्षुब्ध है बल्कि कुछ कर गुजरने की इच्छा भी रखता है। श्रीमती गांधी ने भी जयप्रकाश के नेतृत्व में युवा आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया था। जिसके कारण से भारत के प्रजातन्त्र के स्वर्णिम इतिहास में 19 महीने का एक काला अध्याय जुड़ा।
कुटिल परन्तु सफल प्रयास यह भी हुआ कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आन्दोलन एक- दूसरे के सहयोगी नहीं बन पाये। दोनों ही व्यक्ति राजनीति के गठजोड़ के दांवपेच के खिलाड़ी नहीं है। परन्तु दूसरे पाले में ऐसे ही लोग सक्रिय और मुखर हैं जिनका राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन झूठ, धोखे और ईर्ष्या का उदाहरण है। भ्रष्टाचार को रोकने, अपनी सम्पत्ति को देश में वापस लाने और सड़ी हुई व्यवस्था को बदलने के लिये आन्दोलन तो उठेंगे ही परन्तु इनका सूत्रपात राजनीति नहीं करेगी, क्योंकि जो व्यक्ति उस शाखा को काटता है जिस पर वह स्वयं बैठा है उसे शेखचिल्ली कहा गया है। हमारे राजनीतिक कार्यकर्ता सब कुछ हो सकते है, परन्तु वह मूर्ख नहीं है। इसलिये व्यवस्था परिवर्तन का कार्य तो नागरिक समाज को ही करना होगा।
नागरिक समाज के समक्ष भी प्रश्न रणनीति का उठना चाहिए। भ्रष्ट व्यवस्था को समाप्त करने का आन्दोलन तर्क संगत है परन्तु क्या नागरिक समाज विकल्प प्रस्तुत करने की स्थिति में है ? भ्रष्टाचार का सबसे परिचय है परन्तु इसके स्थान पर जिस शिष्टाचार को लाना चाहते है उसकी रचना और कल्पना हमारे पास नहीं है। आम आदमी को यह समझ में नहीं आता कि भ्रष्ट व्यवस्था द्वारा स्थापित लोकपाल की संस्था भ्रष्टाचार को कैसे समाप्त कर सकती है। केन्द्र में और राज्य सरकारों में विजिलेन्स आयोग और आर्थिक अपराधों से निपटने के लिये अनेक संस्थाएं है, वे कितनी कारगर हैं यह प्रश्न हर आन्दोलनकारी के मन में है। बाबा रामदेव भी व्यवस्था में परिवर्तन की बात तो करते हैं परन्तु नई व्यवस्था की आसानी से समझ में आने वाली परिकल्पना या मॉडल उनके पास नहीं है।
आज भारतीय समाज तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है पहला भाग संख्या में छोटा परन्तु बहुत अधिक प्रभावी है जो न केवल भ्रष्ट है परन्तु बेईमानी और अपराध से ही विकास करने की प्रक्रिया पर उसे पूरा विश्वास है। दुर्भाग्य से समाज का अत्यन्त सूक्ष्म यह भाग ही देश को चलाता है।
एक बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो भ्रष्ट तो नहीं है परन्तु शिष्टाचारी भी नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर वे भ्रष्ट व्यवस्था के साथ भी हो लेते हैं और मन ही मन उसका विरोध भी करते हैं। लाइसेन्स जल्दी बने इसके लिये रिश्वत दे देते है, टैफिक का चालान हो तो चालान की जगह रिश्वत दे कर बचने में उन्हे कोई बुराई नहीं लगती। परीक्षा में अध्यापक को सिफारिश करना उन्हें उचित लगता है और बिजली की चोरी करना वह अपना अधिकार मानते है। कहा जाये तो यह वर्ग भ्रष्ट नहीं है परन्तु शिष्टाचारी भी नहीं है। इस समूह को हम छद्म शिष्टाचारी की संज्ञा दे सकते है।
आशा की किरण इस भयानक काली रात में यह दिखाती है कि भारतीय जनता का एक वर्ग न केवल भ्रष्टाचार के विरोध में मुखर है परन्तु अपने व्यवहार से वह शिष्टाचारी भी है। सूचना प्रौद्योगिकी की बड़ी संस्था के प्रमुख की यह छवि है कि उन्होंने अपने संस्था को आज अन्तरराष्ट्रीय स्तर का बनाया है और उन्होंने कभी भी कानून को नहीं तोड़ा है रिश्वत नहीं दी है और ‘गुड प्रेक्टिसेस’ अर्थात् आदर्श व्यवहार का पालन किया है। आज का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग अधिकतर शिष्टाचारी है उसे अपने सामने ऐसे अवसर दिखते है जिनमें वह आदर्श सामाजिक व्यवस्था में रहते हुए भी वह आगे बढ़ सकता है। आगे बढ़ने के लिये वह पीछे के द्वार, ’लाइन जम्पिंग’ और विशिष्ट देखभाल के शाटर्कट्स वह नहीं लेता। यह वर्ग देश और समाज के भविष्य के लिये चिंतित दिखता है और भ्रष्टाचार को निपटाने के लिये न केवल प्रयास परन्तु त्याग करने के लिये भी तत्पर है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के हाल ही में हुए आयोजनों से यह बात स्पष्ट होती है कि जब देश का शिष्टाचारी वर्ग आन्दोलित होगा तो छद्म शिष्टाचारियों का बड़ा हिस्सा उनके साथ आयेगा क्योंकि इन छद्म शिष्टाचारियों के मन में भी भ्रष्टाचार और अनाचार के प्रति विपरीत भाव है वे समाज की आदर्श व्यवस्थाओं और नैतिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं परन्तु उनका पालन करने का साहस नहीं कर पाते। मौका मिलने पर और विश्वसनीय नेतृत्व द्वारा प्रोत्साहित करने पर वे शिष्टाचार के संरक्षक बनकर ऊभर सकते है।
देश में अनेक अन्ना हजारे और बाबा रामदेव हैं। अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन ऐसे है जो केवल मात्र शिष्टाचार का ही संस्कार देते हैं। ऐसे संगठनों का प्रभाव भारतीय जीवन के हर पहलू पर पड़ रहा है। एक बड़ा कारण यह भी है कि भारत के नागरिक को सत्य, अहिंसा और नैतिकता का पाठ हजारों वर्षों से विरासत में मिला है। इसलिये भारत में ईमानदारी को श्रेष्ठ नीति नहीं माना गया है (ओनेस्टी इज द बेस्ट पॉलिसी) परन्तु एक अनपढ़ ग्रामीण भारतीय को भी बचपन से ही बताया जाता है कि धर्म का पालन अनिवार्य है और धर्म के पालन के लिए सत्य का आचरण अनिवार्य है। जैसा कि 1974-75 में हुआ था एक बार फिर देश में छोटे-छोटे आन्दोलन उठेंगे और मिलकर एक विराट आन्दोलन बनेगा जो अभारतीय और अव्यवहारिक व्यवस्था को परिवर्तित करेगा। आवश्यकता वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था के रखवालों से बेहतर रणनीति बनाने की है। इसके लिये अनेक हजारे और अनेक रामदेव मिलकर प्रयास करेंगे। शिष्टाचारी समाज के हर सज्जन व्यक्ति को अन्ना और बाबा बनना पड़ेगा।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं)

Wednesday, June 1, 2011

नक्सलवाद से कौन लड़ना चाहता है ?

दुनिया के सबसे निर्दोष लोगों को खत्म करने का पाप कर रहे हैं हम
-संजय द्विवेदी

उनका वहशीपन अपने चरम पर है, सोमवार की रात (23 मई,2011) को वे फिर वही करते हैं जो करते आए हैं। एक एडीशनल एसपी समेत 11 पुलिसकर्मियों को छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में वे मौत के घाट उतार देते हैं। गोली मारने के बाद शवों को क्षत-विक्षत कर देते हैं। बहुत वीभत्स नजारा है। माओवाद की ऐसी सौगातें आए दिन छ्त्तीसगढ़, झारखंड और बिहार में आम हैं। मैं दो दिनों से इंतजार में हूं कि छत्तीसगढ़ के धरतीपुत्र और अब भगवा कपड़े पहनने वाले स्वामी अग्निवेश, लेखिका अरूंघती राय, गांधीवादी संदीप पाण्डेय, पूर्व आईएएस हर्षमंदर या ब्रम्हदेव शर्मा कुछ कहेंगें। पुलिस दमन की सामान्य सूचनाओं पर तुरंत बस्तर की दौड़ लगाने वाले इन गगनविहारी और फाइवस्टार समाजसेवियों में किसी को भी ऐसी घटनाएं प्रभावित नहीं करतीं। मौत भी अब इन इलाकों में खबर नहीं है। वह बस आ जाती है। मरता है एक आम आदिवासी अथवा एक पुलिस या सीआरपीएफ का जवान। नक्सलियों के शहरी नेटवर्क का काम देखने के आरोपी योजना आयोग में नामित किए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर नक्सलवाद से क्या हमारी राजनीति और राज्य लड़ना चाहता है। या वह तमाम किंतु-परंतु के बीच सिर्फ अपने लोगों की मौत से ही मुग्ध है।
दोहरा खेल खेलती सरकारें-
केंद्र सरकार के मुखिया हमारे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री नक्सलवाद को इस देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बता चुके हैं। उनके ही अधीन चलने वाला योजना आयोग अपनी एक समिति में नक्सल समर्थक होने के आरोपों से घिरे व्यक्ति को नामित कर देता है। जबकि उनपर राष्ट्रद्गोह के मामले में अभी फैसला आना बाकी है। यानि अदालतें और कानून सब बेमतलब हैं और राजनीति की सनक सबसे बड़ी है। केंद्र और राज्य सरकारें अगर इस खतरे के प्रति ईमानदार हैं तो इसके समाधान के लिए उनकी कोशिशें क्या हैं? लगातार नक्सली अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार कर रहे हैं और यह तब हो रहा है जब उनके उन्मूलन पर सरकार हर साल अपना बजट बढ़ाती जा रही है। यानि हमारी कोशिशें ईमानदार नहीं है। 2005 से 2010 के बीच 3,299 नागरिक और 1,379 सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं। साथ ही 1,226 नक्सली भी इन घटनाओं में मारे गए हैं- वे भी भारतीय नागरिक ही हैं। बावजूद इसके नक्सलवाद को लेकर भ्रम कायम हैं। सरकारों में बैठे नौकरशाह, राजनेता, कुछ बुद्धिजीवी लगातार भ्रम का निर्माण कर रहे हैं। टीवी चैनलों और वातानुकूलित सभागारों में बैठकर ये एक विदेशी और आक्रांता विचार को भारत की जनता की मुक्ति का माध्यम और लोकतंत्र का विकल्प बता रहे हैं।
आदिवासियों की मौतों का पाप-
किंतु हमारी सरकार क्या कर रही है? क्यों उसने एक पूरे इलाके को स्थाई युद्ध क्षेत्र में बदल दिया है। इसके खतरे बहुत बड़े हैं। एक तो यह कि हम दुनिया के सबसे सुंदर और सबसे निर्दोष इंसानों (आदिवासी) को लगातार खो रहे हैं। उनकी मौत सही मायने में प्रकृति के सबसे करीब रहने वाले लोगों की मौत है। निर्मल ह्रदय आदिवासियों का सैन्यीकरण किया जा रहा है। माओवादी उनके शांत जीवन में खलल डालकर उनके हाथ में बंदूकें पकड़ा रहे हैं। प्रकृतिपूजक समाज बंदूकों के खेल और लैंडमाइंस बिछाने में लगाया जा रहा है। आदिवासियों की परंपरा, उनका परिवेश, उनका परिधान, उनका धर्म और उनका खानपान सारा कुछ बदलकर उन्हें मिलिटेंट बनाने में लगे लोग आखिर विविधताओं का सम्मान करना कब सीखेंगें? आदिवासियों की लगातार मौतों के लिए जिम्मेदार माओवादी भी जिम्मेदार नहीं हैं? सरकार की कोई स्पष्ट नीति न होने के कारण एक पूरी प्रजाति को नष्ट करने और उन्हें उनकी जमीनों से उखाड़ने का यह सुनियोजित षडयंत्र साफ दिख रहा है। आदिवासी समाज प्रकृति के साथ रहने वाला और न्यूनतम आवश्यक्ताओं के साथ जीने वाला समाज है। उसे माओवादियों या हमारी सरकारों से कुछ नहीं चाहिए। किंतु ये दोनों तंत्र उनके जीवन में जहर घोल रहे हैं। आदिवासियों की आवश्यक्ताएं उनके अपने जंगल से पूरी हो जाती हैं। राज्य और बेईमान व्यापारियों के आगमन से उनके संकट प्रारंभ होते हैं और अब माओवादियों की मौजूदगी ने तो पूरे बस्तर को नरक में बदल दिया है। शोषण का यह दोहरा चक्र अब उनके सामने है। जहां एक तरफ राज्य की बंदूकें हैं तो दूसरी ओर हिंसक नक्सलियों की हैवानी करतूतें। ऐसे में आम आदिवासी का जीवन बद से बदतर हुआ है।
शोषकों के सहायक हैं माओवादीः
नक्सलियों ने जनता को मुक्ति और न्याय दिलाने के नाम पर इन क्षेत्रों में प्रवेश किया किंतु आज हालात यह हैं कि ये नक्सली ही शोषकों के सबसे बड़े मददगार हैं। इन इलाकों के वनोपज ठेकेदारों, सार्वजनिक कार्यों को करने वाले ठेकेदारों, राजनेताओं और उद्योगों से लेवी में करोड़ों रूपए वसूलकर ये एक समानांतर सत्ता स्थापित कर चुके हैं। भ्रष्ट राज्य तंत्र को ऐसा नक्सलवाद बहुत भाता है। क्योंकि इससे दोनों के लक्ष्य सध रहे हैं। दोनों भ्रष्टाचार की गंगा में गोते लगा रहे हैं और हमारे निरीह आदिवासी और पुलिसकर्मी मारे जा रहे हैं। राज्य पुलिस के आला अफसररान अपने वातानुकूलित केबिनों में बंद हैं और उन्होंने सामान्य पुलिसकर्मियों और सीआरपीएफ जवानों को मरने के लिए मैदान में छोड़ रखा है। आखिर जब राज्य की कोई नीति ही नहीं है तो हम क्यों अपने जवानों को यूं मरने के लिए मैदानों में भेज रहे हैं। आज समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारों के यह तय करना होगा कि वे नक्सलवाद का समूल नाश चाहते हैं या उसे सामाजिक-आर्थिक समस्या बताकर इन इलाकों में खर्च होने वाले विकास और सुरक्षा के बड़े बजट को लूट-लूटकर खाना चाहते हैं। क्योंकि अगर आप कोई लड़ाई लड़ रहे हैं तो उसका तरीका यह नहीं है। लड़ाई शुरू होती है और खत्म भी होती है किंतु हम यहां एक अंतहीन युद्ध लड़ रहे हैं। जो कब खत्म होगा नजर नहीं आता।
माओवादी 2050 में भारत की राजसत्ता पर कब्जे का स्वप्न देख रहे हैं। विदेशी विचार और विदेशी मदद से इनकी पकड़ हमारे तंत्र पर बढ़ती जा रही है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीजों का तमाशा बनाने की शक्ति इन्होंने अर्जित कर ली है। दुनिया भर के संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का सहयोग इन्हें हासिल है। किंतु यह बात बहुत साफ है उनकी जंग हमारे लोकतंत्र के खिलाफ है। वे हमारे जनतंत्र को खत्म कर माओ का राज लाने का स्वप्न देख रहे हैं। वे अपने सपनों को पूरा कभी नहीं कर पाएंगें यह तय है किंतु भारत जैसे तेजी से बढ़ते देश की प्रगति और शांति को नष्ट कर हमारे विकास को प्रभावित करने की क्षमता उनमें जरूर है। हमें इस अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र को समझना होगा। यह साधारण नहीं है कि माओवादियों के तार मुस्लिम जेहादियों से जुड़े पाए गए तो कुछ विदेशी एवं स्वयंसेवी संगठन भी यहां वातावरण बिगाड़ने के प्रयासो में लगे हैं।
समय दर्ज करेगा हमारा अपराध-
किंतु सबसे बड़ा संकट हमारा खुद का है। क्या हम और हमारा राज्य नक्सलवाद से जूझने और मुक्ति पाने की इच्छा रखता है? क्या उसमें चीजों के समाधान खोजने का आत्मविश्वास शेष है? क्या उसे निरंतर कम होते आदिवासियों की मौतों और अपने जवानों की मौत का दुख है? क्या उसे पता है कि नक्सली करोड़ों की लेवी वसूलकर किस तरह हमारे विकास को प्रभावित कर रहे हैं? लगता है हमारे राज्य से आत्मविश्वास लापता है। अगर ऐसा नहीं है तो नक्सलवाद या आतंकवाद के खिलाफ हमारे शुतुरमुर्गी रवैयै का कारण क्या है ? हमारे हाथ किसने बांध रखे हैं? किसने हमसे यह कहा कि हमें अपने लोगों की रक्षा करने का अधिकार नहीं है। हर मामले में अगर हमारे राज्य का आदर्श अमरीका है, तो अपने लोगों को सुरक्षा देने के सवाल पर हमारा आदर्श अमरीका क्यों नहीं बनता? सवाल तमाम हैं उनके उत्तर हमें तलाशने हैं। किंतु सबसे बड़ा सवाल यही है कि नक्सलवाद से कौन लड़ना चाहता है और क्या हमारे भ्रष्ट तंत्र में इस संगठित माओवाद से लड़ने की शक्ति है ?

Friday, May 20, 2011

अमंगल की खबरों से घिरे हैं हमः शुक्ल


नारद जयंती की पूर्व संध्या पर पत्रकारिता विवि में व्याख्यान
भोपाल,18 मई,2011। प्रख्यात कवि-कथाकार ध्रुव शुक्ल का कहना है हम अमंगल की खबरों से घिरे हुए हैं। यूं लगता है कि शुभ समाचार आने बंद हो गए हैं। ऐसे में हमारे समय की वाणी प्रदूषित हो गयी। हैं। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल देवर्षि नारद जयंती की पूर्वसंध्या पर आयोजित व्याख्यान कार्यक्रम में मुख्यवक्ता की आसंदी से बोल रहे थे। व्याख्यान का विषय था ‘लोकमंगल संचारकर्ता नारद’। उन्होंने कहा कि शब्द ब्रम्ह हैं इसलिए हमें लोकमंगल की पत्रकारिता का विकास करना होगा। अगर हम लगातार अध्यात्मशून्य समाज बनाते जाएंगें तो हम कभी सफल नहीं हो सकते।
श्री शुक्ल ने कहा कि देवर्षि नारद ने हमेशा लोकमंगल के लिए अनवरत यात्राएं कीं। वे एक ऐसे यात्री हैं जो ईश्वर के मन को भाँप लेते हैं और ईश्वर पर अपना अधिकार समझते हैं। उन्होंने नारद को संदेशवाहक, संवादकर्ता ओर संचारकर्ता की भूमिका में देखने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि नारद दो बातों पर ज्यादा जोर देते थे कि पहला यथार्थ को निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए, और एक अच्छा श्रोता बना जाए। यही गुण एक पत्रकार का भी होना चाहिए।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अक्षरा के प्रधान संपादक कैलाश चंद्र पंत ने कहा कि जिस तरह नारद किसी भी बात या खबर को सिर्फ बताते नहीं थे बल्कि उसके आगे भी जाते थे, ठीक यही शैली पत्रकार की भी होनी चाहिए, उसे खबर से आगे जाकर खबरों को देखना चाहिए। नारद की पत्रकार के तौर पर तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह पत्रकार लोगों की समस्याओं को अपने समाचार पत्र के माध्यम से समाज और सरकार के सामने रखता है, उसी तरह नारद भी लोगों की समस्याओं को समझकर उन्हें विध्नहर्ता देवताओं के सामने रखते थे।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि नारद के भक्ति सूत्रों को सही दृष्टिकोण से समझा जाए तो पायेंगे कि मीडिया से संबंधित सारे सिद्धांत ये अपने अंदर समेटे हुए हैं। नारद के भक्ति सूत्रों पर गहन शोध की जरूरत है। बात की तर्कसंगत व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि नारद का मानना है कि सत्य कभी पूर्ण नहीं हो सकता है और विवाद से आप किसी के मत को नहीं बदल सकते हैं यह दोनों बात आज भी व्यवहारिक हैं और नारद सूत्रों की प्रांसगिकता वक्त के साथ ज्यादा मजबूत होती जा रही है। इस अवसर दैनिक ट्रिब्यून, चंडीगढ़ के पूर्व संपादक विजय सहगल ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार स्व. अंबिकाप्रसाद वाजपेयी की पुस्तक ‘ मेरे साहित्यिक संस्मरण’ का विमोचन भी हुआ। कार्यक्रम में श्रेष्ठ विचारों के लिए पांच छात्र-छात्राओं के 501 रूपए के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जिनमें योगिता ठाकुर, योगेश कुमार साहू, ओमप्रकाश पवार, कपिलदेव सिंह, मयंक शर्मा के नाम शामिल हैं। इस अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता श्रीकांत जोशी, वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा, जीके छिब्बर, डा. श्रीकांत सिंह, प्रो. आशीष जोशी, नरेंद्र जैन, अनिल सौमित्र, पुष्पेंद्रपाल सिंह, डा. पवित्र श्रीवास्तव, डा. आरती सारंग, राखी तिवारी, डा. मोनिका वर्मा, मीता उज्जैन, सुरेंद्र पाल, दीपेंद्र सिंह बधेल, बबिता अग्रवाल, पी. शशिकला, डा. अविनाश वाजपेयी, लालबहादुर ओझा मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी और आभार प्रदर्शन राघवेंद्र सिंह ने किया।
रिपोर्टः शिशिर सिंह

Saturday, May 14, 2011

माखनलाल पत्रकारिता विवि में कई पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश प्रारंभ

भोपाल,14 मई,2011। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में शैक्षणिक सत्र 2011-12 में संचालित होने वाले विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई है। विश्वविद्यालय द्वारा मीडिया मैनेजमेंट, विज्ञापन एवं विपणन संचार, मनोरंजन संचार, कॉर्पोरेट संचार तथा विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी संचार में एम.बी.ए. पाठ्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं। 2 वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के अंतर्गत एम.जे. (पत्रकारिता स्नातकोत्तर), एम.ए.-विज्ञापन एवं जनसंपर्क, एम.ए.-जनसंचार, एम.ए.-प्रसारण पत्रकारिता, एम.एससी. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं । तीन वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रमों के अंतर्गत बी.ए.-जनसंचार, बी.एससी.- इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, बी.एससी.-ग्राफिक्स एवं एनीमेशन, बी.एससी.-मल्टीमीडिया तथा बी.सी.ए. पाठ्यक्रम संचालित हैं। एक वर्षीय पाठ्यक्रम के अंतर्गत विडियो प्रोडक्शन, वेब संचार, पर्यावरण संचार, योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एवं अध्यात्मिक संचार तथा भारतीय संचार परंपराएँ तथा पीजीडीसीए जैसे स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त एमसीए तथा बी.लिब. पाठ्यक्रम भी चल रहे हैं। मीडिया अध्ययन में एम.फिल. तथा संचार, जनसंचार, कंप्यूटर विज्ञान तथा पुस्तकालय विज्ञान में पीएच.डी. हेतु आवेदन आमंत्रित किये गए हैं। यह प्रवेश प्रक्रिया विश्वविद्यालय के भोपाल, नॉएडा एवं खंडवा स्थित परिसरों के लिए है। पाठ्यक्रमों में आवेदन करने की अंतिम तिथि 25 मई 2011 है। प्रवेश हेतु प्रवेश परीक्षा का आयोजन 12 जून 2011 को भोपाल, कोलकाता जयपुर, पटना, रांची, लखनऊ तथा दिल्ली/नोएडा केन्द्रों पर किया जायेगा। अधिक जानकारी विवरणिका और आवेदन पत्र हेतु दिनांक 16-22 अप्रैल 2011 के “रोजगार समाचार” तथा “एम्प्लोयेमेंट न्यूज़” एवं दिनांक 18-24 अप्रैल 2011 के “रोजगार और निर्माण” में प्रकाशित विज्ञापन देखें अथवा विश्वविद्यालय की वेबसाइट www.mcu.ac.in पर लोगऑन करें या किसी भी परिसर में पधारें अथवा फोन करें 0755-2553523 (भोपाल), 0120-4260640 (नोएडा), 0733-2248895 (खंडवा)।विश्वविद्यालय के सभी पाठ्यक्रम रोजगारोन्मुखी हैं एवं मीडिया के क्षेत्र में रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराते हैं।

मीडिया को नई राह बताते हैं नारद के भक्ति सूत्र


नारद जयंती (19 मई) पर विशेष\
- प्रो.बृज किशोर कुठियाला

सभी पुराणों में महर्षि नारद एक अनिवार्य भूमिका में प्रस्तुत हैं। उन्हें देवर्षि की संज्ञा दी गई, परन्तु उनका कार्य देवताओं तक ही सीमित नहीं था। वे दानवों और मनुष्यों के भी मित्र, मार्गदर्शक, सलाहकार और आचार्य के रूप में उपस्थित हैं। परमात्मा के विषय में संपूर्ण ज्ञान प्रदान करने वाले दार्शनिक को नारद कहा गया है। महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा कि नारद आदर्श व्यक्तित्व हैं। श्री कृष्ण ने उग्रसेन से कहा कि नारद की विशेषताएं अनुकरणीय हैं।

पुराणों में नारद को भागवत संवाददाता के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह भी सर्वमान्य है कि नारद की ही प्रेरणा से वाल्मीकि ने रामायण जैसे महाकाव्य और व्यास ने भागवत गीता जैसे संपूर्ण भक्ति काव्य की रचना की थी। ऐसे नारद को कुछ मूढ़ लोग कलह प्रिय के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं, परन्तु नारद जब-जब कलह कराने की भूमिका में आते हैं तो उन परिस्थितयों का गहरा अध्ययन करने से सिद्ध होता है कि नारद ने विवाद और संघर्ष को भी लोकमंगल के लिए प्रयोग किया है। नारद कई रूपों में श्रेष्ठ व्यक्तित्व प्रदर्शित करते हैं। संगीत में अपनी अपूर्णता ध्यान में आते ही उन्होंने कठोर तपस्या और अभ्यास से एक उच्च कोटि के संगीतज्ञ बनने को भी सिद्ध किया। उन्होंने संगीत गन्धर्वों से सीखा और ‘नारद संहिता’ ग्रंथ की रचना की। घोर तप करके विष्णु से संगीत का वरदान प्राप्त किया। वे तत्व ज्ञानी महर्षि थे। नारद के भक्ति सूत्रों में उनके परमात्मा व भक्त के संबंधों की व्याख्या से वे एक दार्शनिक के रूप में सामने आते हैं। परन्तु नारद अन्य ऋषियों, मुनियों से इस प्रकार से भिन्न हैं कि उनका कोई अपना आश्रम नहीं है। वे निरंतर प्रवास पर रहते हैं। परन्तु यह प्रवास व्यक्तिगत नहीं है। इस प्रवास में भी वे समकालीन महत्वपूर्ण देवताओं, मानवों व असुरों से संपर्क करते हैं और उनके प्रश्न, उनके वक्तव्य व उनके कटाक्ष सभी को दिशा देते हैं। उनके हर परामर्श में और प्रत्येक वक्तव्य में कहीं-न-कहीं लोकहित झलकता है। उन्होंने दैत्य अंधक को भगवान शिव द्वारा मिले वरदान को अपने ऊपर इस्तेमाल करने की सलाह दी। रावण को बाली की पूंछ में उलझने पर विवश किया और कंस को सुझाया की देवकी के बच्चों को मार डाले। वह कृष्ण के दूत बनकर इन्द्र के पास गए और उन्हें कृष्ण को पारिजात से वंचित रखने का अहंकार त्यागने की सलाह दी। यह और इस तरह के अनेक परामर्श नारद के विरोधाभासी व्यक्तित्व को उजागर करते दिखते हैं। परन्तु समझने की बात यह है कि कहीं भी नारद का कोई निजी स्वार्थ नहीं दिखता है। वे सदैव सामूहिक कल्याण की नेक भावना रखते हैं। उन्होंने आसुरी शक्तियों को भी अपने विवेक का लाभ पहुंचाया। जब हिरण्य तपस्या करने के लिए मंदाक पर्वत पर चले गए तो देवताओं ने दानवों की पत्नियों व महिलाओं का दमन प्रारंभ कर दिया, परन्तु दूरदर्शी नारद ने हिरण्य की पत्नी की सुरक्षा की जिससे प्रहृलाद का जन्म हो सका। परन्तु उसी प्रहृलाद को अपनी आध्यात्मिक चेतना से प्रभावित करके हिरण्य कशिपु के अंत का साधन बनाया।इन सभी गुणों के अतिरिक्त नारद की जिन विशेषताओं की ओर कम ध्यान गया है वह है उनकी ‘संचार’ योग्यता व क्षमता। नारद ने ‘वाणी’ का प्रयोग इस प्रकार किया। जिससे घटनाओं का सृजन हुआ। नारद द्वारा प्रेरित हर घटना का परिणाम लोकहित में निकला। इसलिए वर्तमान संदर्भ में यदि नारद को आज तक के विश्व का सर्वश्रेष्ठ ‘लोक संचारक’ कहा जाये तो कुछ भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। नारद के हर वाक्य, हर वार्ता और हर घटनाक्रम का विश्लेषण करने से यह बार-बार सिद्ध होता है कि वे एक अति निपुण व प्रभावी ‘संचारक’ थे। दूसरा उनका संवाद शत-प्रतिशत लोकहित में रहता था। वे अपना हित तो कभी नहीं देखते थे, उन्होंने समूहों पर जातियों आदि का भी अहित नहीं साधा। उनके संवाद में हमेशा लोक कल्याण की भावना रहती थी। तीसरे, नारद द्वारा रचित भक्ति सूत्र में 84 सूत्र हैं। प्रत्यक्ष रूप से ऐसा लगता है कि इन सूत्रों में भक्ति मार्ग का दर्शन दिया गया है और भक्त ईश्वर को कैसे प्राप्त करे ? यह साधन बताए गए हैं। परन्तु इन्हीं सूत्रों का यदि सूक्ष्म अध्ययन करें तो केवल पत्रकारिता ही नहीं पूरे मीडिया के लिए शाश्वत सिद्धांतों का प्रतिपालन दृष्टिगत होता है। नारद भक्ति सूत्र का 15वां सूत्र इस प्रकार से हैः
तल्लक्षणानि वच्यन्ते नानामतभेदात ।।
अर्थात मतों में विभिन्नता व अनेकता है, यही पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है। इसी सूत्र की व्याख्या नारद ने भक्ति सूत्र 16 से 19 तक लिखी है और बताया है कि व्यास, गर्ग, शांडिल्य आदि ऋषिमुनियों ने भक्ति के विषय में विभिन्न मत प्रकट किए हैं। अंत में नारद ने अपना मत भी प्रकट किया है, परन्तु उसी के साथ यह भी कह दिया कि किसी भी मत को मानने से पहले स्वयं उसकी अनुभूति करना आवश्यक है और तभी विवेकानुसार निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। वर्तमान में भी एक ही विषय पर अनेक दृष्टियां होती हैं, परन्तु पत्रकार या मीडिया कर्मी को सभी दृष्टियों का अध्ययन करके निष्पक्ष दृष्टि लोकहित में प्रस्तुत करनी चाहिए। यह ‘आदर्श पत्रकारिता’ का मूल सिद्धांत हो सकता है। आज की पत्रकारिता में मीडिया को सर्वशक्तिमान और सर्वगुण सम्पन्न संवाद के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सबको मालूम है कि यह भ्रम है। मीडिया पूरे सामाजिक संवाद की व्यवस्थाओं का केवल एक अंश हो सकता है और मीडिया की अपनी सीमाएं भी है। भक्ति सूत्र 20 में नारद ने कहा है कि:
अस्त्येवमेवम् ।।

अर्थात यही है, परन्तु इसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। यह पत्रकारिता की सीमा का द्योतक है। इसी प्रकार सूत्र 26 में कहा गया कि:
फलरूपत्वात् ।।
अर्थात पत्रकारिता संचार का प्रारंभ नहीं है यह तो सामाजिक संवाद का परिणाम है। यदि पत्रकारिता को इस दृष्टि से देखा जाए तो पत्रकार का दायित्व कहीं अधिक हो जाता है। सूत्र 43, पत्रकारिता के लिए मार्गदर्शक हो सकता है:
दुःसंङ्गः सर्वथैव त्याज्यः
नकारात्मक पत्रकारिता को अनेक विद्वानों और श्रेष्ठजनों ने नकारा। जबकि पश्चिम दर्शन पर आधारित आज की पत्रकारिता केवल नकारात्मकता को ही अपना आधार मानती है और ‘कुत्ते को काटने’ को समाचार मानती है। पत्रकार की भूमिका को भी प्रहरी कुत्ते (वाच डाग) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परन्तु नारद ने इस श्लोक में कहा कि हर हाल में बुराई त्याग करने योग्य है। उसका प्रतिपालन या प्रचार-प्रसार नहीं होना चाहिए। नकारात्मक पत्रकारिता की भूमिका समाज में विष की तरह है। सूत्र 46 में:
कस्तरति कस्तरति मायाम् ? यः सड्ढांस्त्यजाति यो महानुभावं सेवते, निर्ममो भवति ।।
नारद ने कहा कि बुराई लहर के रूप में आती है परन्तु शीघ्र ही वह समुद्र का रूप ले लेती है। आज समाचार वाहिनियों में अपराध समाचार की यही कहानी बनती दिखती है। सूत्र 51 में नारद अभिव्यक्ति की अपूर्णता का वर्णन करते हैं:
अनिर्ववनीयं प्रेमस्वरूपम् ।।
अर्थात वास्तविकता या संपूर्ण सत्य अवर्णनीय है इसलिए पत्रकारिता में अधूरापन तो रहेगा ही। पाठक, दर्शक व श्रोता को पत्रकारिता की इस कमी की यदि अनुभूति हो जाती है तो समाज में मीडिया की भूमिका यथार्थ को छूयेगी। इसी बात को सूत्र 52 में नारद ने अलग तरह से प्रस्तुत किया है:
मूकास्वादनवत् ।।
नारद का कहना है कि इस सृष्टि में अनेक अनुभव ऐसे हैं जिनकी अनुभूति तो है परन्तु अभिव्यक्ति नहीं है। व्याख्या करने वाले विद्वानों ने इसे ‘गूंगे का स्वाद’ लेने की स्थिति की तरह वर्णन किया है। नारद भक्ति के सूत्र 63 से मीडिया की विषय-वस्तु के बारे में मार्गदर्शन प्राप्त होता है:
स्त्रीधननास्तिकवैरिचरित्रं न श्रवणीयम् ।।

नारद ने संवाद में कुछ विषयों को निषेध किया है। वह हैं (1) स्त्रियों व पुरुषों के शरीर व मोह का वर्णन (2) धन, धनियों व धनोपार्जन का वर्णन (3) नास्तिकता का वर्णन (4) शत्रु की चर्चा । आज तो ऐसा लगता है कि मीडिया के लिए विषय-वस्तु इन चारों के अतिरिक्त है ही नहीं। सूत्र 72 एकात्मकता को पोषित करने वाला अत्यंत सुंदर वाक्य है जिसमें नारद समाज में भेद उत्पन्न करने वाले कारकों को बताकर उनको निषेध करते हैं।
नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः ।।

अर्थात जाति, विद्या, रूप, कुल, धन, कार्य आदि के कारण भेद नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता किसके लिए हो व किन के विषय में हो यह आज एक महत्वपूर्ण विषय है। जिसका समाधान इस सूत्र में मिलता है। राजनेताओं, फिल्मी कलाकारों व अपराधियों का महिमा मंडन करती हुई पत्रकारिता समाज के वास्तविक विषयों से भटकती है। यही कारण है कि जेसिकालाल की हत्या तो न केवल पत्रकारिता की लगातार ब्रेकिंग न्यूज बनती है, उसके संपादकीय लेख और यहां तक की फिल्म भी बनती है, परन्तु एक आम किसान की आत्महत्या केवल एक-दो कालम की खबर में ही सिमट जाती है। जब आत्महत्या का राजनीतिकरण होता है तो वह फिर से मुख्य पृष्ठ पर लौट आती है। आज की पत्रकारिता व मीडिया में बहसों का भी एक बड़ा दौर है। लगातार अर्थहीन व अंतहीन चर्चाएं मीडिया पर दिखती हैं। विवाद को अर्थहीन बताते हुए नारद ने सूत्र 75, 76 व 77 में परामर्श दिया है कि वाद-विवाद में समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए। क्योंकि वाद-विवाद से मत परिवर्तन नहीं होता है। उन्होंने कहा:
बाहुल्यावकाशादनियतत्वाच्च ।।

भक्तिशास्त्राणि मननीयानि, तदुदृबोधककर्माण्यपि च करणीयानि ।।

सुखदुःखेच्छालाभादित्यक्ते काले प्रतीक्ष्यमाणे क्षणार्द्धमपि व्यर्थ न नेयम्

सूत्र 78 में नारद ने कुछ गुणों का वर्णन किया है जो व्यक्तित्व में होने ही चाहिए। पत्रकारों में भी इन गुणों का समावेश अवश्य लगता है।
अहिंसासत्यशौचदयास्तिक्यादिचारिन्न्याणि परिपालनीयानि ।।
यह गुण है अहिंसा, सत्य, शुद्धता, संवेदनशीलता व विश्वास।सूत्र 71 अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीत होता है इसमें नारद बताते हैं कि यह सब कुछ हो जाये (अर्थात नारद के परामर्श को पूर्ण रूप से मान लिया जाए) तो क्या होगा? नारद के अनुसार इस स्थिति में आनन्द ही आनन्द होगा। पितर आनन्दित होते हैं, देवता उल्लास में नृत्य करते हैं और पृथ्वी मानो स्वर्ग बन जाती है। आज के मीडिया की यह दृष्टि नहीं है, यह हम सब जानते हैं। पत्रकारिता से ही सारे मीडिया में सृजन की प्रक्रिया होती है परन्तु सृजन के लिए किस प्रकार की प्रवृत्तियां होनी चाहिए? आज तो सारा सृजन साहित्य, कला, चलचित्र निर्माण, विज्ञापन या पत्रकारिता सभी अर्थ उपार्जन की प्रवृत्ति से होता है। जिसमें असत्य, छल, कपट, दिखावा व बनावटीपन मुख्य हैं। नारद के भक्ति सूत्र 60 में सृजनात्मक प्रवृत्तियों की चर्चा है, सृजनात्मकता की प्रक्रिया का उल्लेख इस तरह है:
शान्तिरूपात्परमानन्दरूपाच्च ।।
‘सत्’ अर्थात अनुभव ‘चित्’ अर्थात चेतना और ‘आनन्द’ अर्थात अनुभूति। अर्थात पत्रकारिता की प्रक्रिया भी ऐसी ही है। वह तथ्यों को समेटती है। उनका विश्लेषण करती है व उसके बाद उसकी अनुभूति करके दूसरों के लिए अभिव्यक्त होती है परन्तु इसका परिणाम दुख, दर्द, ईष्या, प्रतिद्वंद्धिता, द्वेष व असत्य को बांटना हो सकता है या फिर सुख, शांति, प्रेम, सहनशीलता व मैत्री का प्रसाद हो सकता है। कौन सा विकल्प चुनना है यह समाज को तय करना हैं। नारद के भक्ति सूत्रों का संक्षिप्त विश्लेषण पत्रकारिता की दृष्टि से यहां किया गया है। आवश्यकता है कि इन विषयों का गहन अध्ययन हो और एक वैकल्पिक पत्रकारिता के दर्शन की प्रस्तुति पूरी मानवता को दी जाए। क्योंकि वर्तमान मीडिया ऐसे समाज की रचना करने में सहायक नहीं है। पत्रकारिता की यह कल्पना बेशक श्रेष्ठ पुरुषों की रही हो परन्तु इसमें हर साधारण मानव की सुखमय और शांतिपूर्ण जीवन की आकांक्षा के दर्शन होते हैं।
( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं)

Wednesday, April 20, 2011

भारत में चुनाव सुधार नहीं चाहते राजनीतिक दल




भोपाल, 20 april 2011,
कुन्दन पाण्डेय MAMC IV SEM



तमिलनाडु में अब तक चुनाव आयोग 42 करोड़ रुपए जब्त कर चुका है, साथ ही चुनाव समाप्ति से पूर्व ही आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के 57 हजार से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं। दरअसल तमिलनाडु में वोटों के लिए महंगे गिफ्ट एवं नकदी बांटने की परम्परा से वहां का मतदाता इस बार भी कुछ पाने की आशा कर रहा है, दल इस बार भी उपहार देना चाहते हैं। लेकिन, चुनाव आयोग इस बार बहुत अधिक सख्त हो गया है। देश का चुनाव आयोग चुनाव सुधार करने के लिए सतत प्रयत्नशील है क्या? इस बार चुनाव आयोग ने सभी प्रत्याशियों को अपने समस्त चुनाव खर्च एक नये बैंक खाते खोलकर करना अनिवार्य कर दिया है।
इसके बावजूद करोड़ों रुपए का पकड़ा जाना गंभीर चिंता का विषय किसके लिए है? चिंतनीय विषय यह भी है कि देश में चुनाव जीतने के लिए 3-एम को पहली आवश्यकता माना जा रहा है वह है- माफिया, मनी और मैन पॉवर। यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे विकृत स्वरुपों में से एक है। आइवर जेनिंग्स ने लोकतंत्र को एक खर्चीली व्यवस्था कहा है, लेकिन यह तो पूर्ण भ्रष्ट व्यवस्था है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन द्वारा मतदाताओं के पहचान पत्र बनवाने की व्यवस्था से फर्जी मतदान पर काफी हद तक रोक लग चुकी है। लेकिन, राजनीतिक दलों में शुचिता के लिए चुनाव आयोग को अभी बहुत कुछ करना बाकी है। खासकर चुने हुए जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने तथा चुनावों में खड़े सभी प्रत्याशियों को नकार करके नकारात्मक वोट देने की व्यवस्था जल्द करने की आवश्यकता है।
देश की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस की एक ही व्यक्ति कुछ सालों से निर्विरोध अध्यक्ष बन रही है। जिस घर रुपी कांग्रेस पार्टी में ही लोकतंत्र कभी नहीं रहा, वह घर के बाहर के विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का लगातार गला घोंटने पर आमादा रहती है। जब तक दलों के आंतरिक चुनाव पूर्ण शुचिता से चुनाव आयोग के नियंत्रण में नहीं होंगे, तब तक सारे चुनाव सुधार निरर्थक ही सिद्ध होंगे। क्या कांग्रेस, भाजपा तथा अन्य दलों के अध्यक्षों का चुनाव, चुनाव आयोग करायेगा तो नतीजे न केवल शुद्ध होंगे बल्कि चौंकाने वाले भी हो सकते हैं। लेकिन, ऐसी व्यवस्था से गांधी परिवार की जागीरदारी कांग्रेस से समाप्त हो जाएगी और भाजपा हाईकमान के चंगुल से स्वतंत्र हो जाएगी। क्योंकि हाईकमान के लिए पार्टी विद ए डिफरेंस वाली भाजपा में संसदीय दल अध्यक्ष का नया-अनोखा पद सृजित कर दिया गया।
इसके अतिरिक्त दलों के चंदों का तिमाही या छमाही लेखा-जोखा अखबारों में व्यावसायिक कम्पनियों की तरह प्रकाशित कराने के विषय पर दलों को अपने पाक-साफ न होने का अटूट भरोसा क्यों हैं? क्योंकि गड़बड़ी की संभावना प्रबल है। संविधान की भावना के खिलाफ लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग कराने की परंपरा इंदिरा गांधी ने अपने फायदे के लिए शुरु कर दी, जो आज चुनाव आयोग के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका है। अब प्रत्येक 6 माह या प्रत्येक महीने कोई न कोई चुनाव होता रहता है।
दोनों राष्ट्रीय दल महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए जी-जान लगा देने की नौटंकी करते हैं। परन्तु दोनों ही 33 प्रतिशत महिलाओं को अपना प्रत्याशी क्यों नहीं बनाते, दोनों को रोकता कौन है? केवल एक चीज, नीयत। नीयत ठीक नहीं है, दोनों राजनीतिक दलों की ही नहीं, बल्कि पूरे तंत्र के अधिकतर जिम्मेदार लोगों की। देश की अधिकांश समस्या नेता और नीति नहीं, बल्कि नेताओं की खराब नीयत है। धनबल नहीं कम होने का एक और कारण ग्राम पंचायत स्तर पर दलों के संगठन का शून्य होना है, जबकि सबसे अधिक वोट पोल वहीं से होते हैं। अत: गांवों के वोटों की जंग को जीतने के लिए उम्मीदवार साड़ी-कपड़े, शराब और नकद पैसों का सहारा लेते हैं।
धनबल को एक और तरीके से समाप्त किया जा सकता है, वह ऐसे कि चुनावों में खड़े सभी प्रत्याशियों को चुनाव आयोग अपने खर्चे से साझे मंच की ऐसी व्यवस्था करे जिससे सभी प्रत्याशी अपना-अपना प्रचार कर सकें। चुनाव आयोग सभी प्रत्याशियों के विचारों-चुनावी घोषणाओं का एक साझा पत्रक या फोल्डर भी अपने खर्चे पर बंटवा सकता है, इससे सभी प्रत्याशियों को कार्यकर्ताओं की व्यवस्था करने की चिन्ता से भी कुछ निजात मिलेगी।
चुनाव संबंधी अपराधों के लिए भारतीय दंड संहिता में 171 (क) से 171 (झ) में सजा का प्रावधान हैं। चुनाव सुधार के लिए 1972 में संयुक्त संसदीय समिति 1975 में तारकुन्डे समिति तथा 1990 में दिनेश गोस्वामी समिति का गठन किया गया था। गोस्वामी समिति ने संस्तुति की थी कि राज्य चुनाव का खर्च वहन करे। इस विषय में 1998 में गठित इन्द्रजीत गुप्त समिति कि सिफारिशों का विशेष महत्व है। गुप्त समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि राजनीतिक दल लोकतंत्र के संचालन में विशेष भूमिका निभाते हैं, इसलिए दलों को चुनावों में खर्च करने के लिए धन तथा अन्य संबंधित सामानों की व्यवस्था राज्य द्वारा दी जाय। मेरा मानना है कि यदि पिता को यह पता है कि बेटे को व्यवसाय करने के लिए धन न दिया तो वह घर की तिजोरी से चुरा लेगा और लोक-भय से पिता रिपोर्ट भी नहीं लिखा पायेगा।
ठीक वैसे ही जब सत्ता पाते ही पार्टियां, पार्टी के लिए सरकारी धन की लूट करके रख लेती हैं, तो, इस शर्त पर चुनाव खर्च की स्टेट फंडिंग ठीक है कि धनबल का चुनावों में प्रयोग पूरी तरह बंद हो जाय, जो की किसी क्रांति से पहले संभव नहीं लगता। जयप्रकाश नारायण और मधु लिमये जैसे विचारकों का यह तक मानना था कि राजकोष से चुनाव खर्च तभी कराए जाय जब पार्टियों के आय-व्यय सरकारी या आयोग की निगरानी में हो। कांग्रेस के बुराड़ी अधिवेशन में सोनिया गांधी भी राजकोष से व्यय का सुझाव दे चुकी हैं। लेकिन, दलों के किसी बड़े नेता ने अब तक आय-व्यय के सरकारी जांच या पारदर्शिता को गारंटीशुदा करने के विषय पर कुछ नहीं कहा है। क्या चुनाव सुधार पर दलों को कुछ नहीं कहना है?