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Saturday, June 23, 2012

जनजाति समाज का मूल्यबोध कायमः जुएल उरांव


जनजातीय समाज के विविध मुद्दों तीन दिवसीय विमर्श का समापन भोपाल, 20 जून। आदिवासी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जुएल उरांव का कहना है कि जनजाति समाज में आज भी पारंपरिक भारतीय मूल्यबोध कायम है, जबकि विकसित कहे जाने वाले वर्गों में यह तेजी से कम हो रहा है। आज जरूरत इस बात की है कि जनजाति समाज को समर्थ बनाने के लिए ईमानदार प्रयास किए जाएं, इसके बाद हम अपने सवालों के हल खुद तलाश लेंगें। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, वन्या,आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान और वन साहित्य अकादमी की ओर से “जनजाति समाज एवं जनसंचार माध्यमः प्रतिमा और वास्तविकता” विषय पर रवींद्र भवन में आयोजित तीन दिवसीय संगोष्ठी के समापन सत्र में मुख्यवक्ता की आसंदी से बोल रहे थे। इस आयोजन में 22 प्रांतों से आए जनजातीय समाज के लगभग 140 लोग सहभागी हैं। जिनमें लगभग 45 जनजातियों के प्रतिनिधि शामिल हैं। देश के पहले अनुसूचित जनजाति मंत्री रहे उरांव ने कहा कि आखिर ये आधुनिक विकास और मुख्यधारा से जोड़ने की बातें हमें कहां ले जाएंगीं। आज का सबसे बड़ा सवाल हमारी पहचान और मूल्यों को बचाने का है। जिस तरह जनजातीय समाज को भारतीयता से काटने के प्रयास चल रहे हैं वह खतरनाक हैं। उनका कहना था कि नक्सली आतंकवाद में जनजातियों के लोग दोनों तरफ से पिस रहे हैं। बावजूद इसके हमें अपनी एकता और संगठन शक्ति पर भरोसा कर एक होना होगा। तेजी से सकारात्मक परिवर्तन होते दिख रहे हैं। एक नई सामाजिक पुर्नरचना खड़ी होती दिखने लगी है। अनूसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष दिलीप सिंह भूरिया ने कहा कि इस विमर्श ने जनजातियों के सवालों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। विस्थापन, जीवन, सांस्कृतिक मूल्यबोध, पहचान और नक्सलवाद के प्रश्नों से जनजाति समाज घिरा है हमें इनके हल ढूंढने होंगें। उन्होंने सवाल किया कि आखिर अंग्रेजों से हमारी लड़ाई क्या थी यही कि वे हमारी पहचान को नष्ट करने के लिए एक अलग संस्कृति-पंथ, हमारी भाषाओं की जगह दूसरी भाषा ला रहे थे और शोषण कर रहे थे। यही हालात आज फिर से पैदा हो गए हैं। इसीलिए जंगल फिर से अशांत हो उठे हैं। उन्होंने कहा कि वनवासियों ने मातृशक्ति का आदर करते हुए बेटियों को बचाया है ,इसलिए शेष समाज से यहां बेटियां ज्यादा हैं और सुरक्षित हैं। कार्यक्रम के मुख्यअतिथि प्रदेश के उच्चशिक्षा एवं जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने कहा कि विश्वविद्यालयों के द्वारा ऐसे विमर्शों के आयोजन से एक नई चेतना और समझ का विकास हो रहा है। जनजातीय समाज के समग्र विकास के लिए सामूहिक एवं ईमानदार प्रयासों की जरूरत है। उनका कहना था कि जनजातीय समाज के नेतृत्व और समाज के जागरूक लोगों को यह प्रयास करना होगा कि योजनाओं का वास्तविक लाभ कैसे आम लोगों तक पहुंचे। विकास की चाबी जिनके पास है उनकी ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि राज्य शासन जनजातीय समाज की पहचान को संरक्षित करने के लिए भोपाल में एक जनजातीय संग्रहालय की स्थापना कर रहा है जिसमें देश भर की वनवासी संस्कृति के अक्स देखने को मिलेगें। कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन करते हुए कुलपति प्रो.बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि एक बेहद समृद्ध मानव संस्कृति के विषय में शिक्षा परिसरों में तथा पाठ्यपुस्तकों में जो भ्रम फैलाया जा रहा है यह उसे तोड़ने का समय है। उन्होंने कहा कि जनजाति समाज में होने वाली त्रासदी से ही खबरें बनती हैं। जबकि जनजातियों के सही प्रश्न मीडिया में जगह नहीं पाते। उनका कहना था कि मीडिया ने अनेक अवसरों पर सार्थक अभियान हाथ में लिए है, यह समय है कि उसे जनजातियों के सवालों को जोरदार तरीके से अभिव्यक्ति देनी चाहिए। क्योंकि देश की इतनी बड़ी आबादी की उपेक्षा कर हम भारत को विश्वशक्ति नहीं बना सकते। मीडिया का दायित्व है कि वह जनजातियों की वास्तविक आकांक्षाओं के प्रगटीकरण का माध्यम बने। सत्र की अध्यक्षता करे हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल न्यायमूर्ति विष्णु सदाशिव कोकजे ने कहा कि समाज के बीच संवाद से सारी समस्याएं हल हो जाएंगी, क्योंकि ये सारे संकट संवादहीनता के चलते ही पैदा हुए हैं। उनका कहना था कि जनसंचार माध्यम इस दिशा में एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। जनजातियों की वर्तमान स्थिति और आवश्यकता का चिंतन जरूरी है और उसके अनुरूप योजनाएं बनाने की आवश्यक्ता है। कार्यक्रम में राज्य अनूसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष रामलाल रौतेल, वन्या के संचालक श्रीराम तिवारी, वन साहित्य अकादमी के समन्वयक हर्ष चौहान ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संचालन वरिष्ठ पत्रकार जगदीश उपासने ने किया। इसके पूर्व आर्यद्रविड़ संघर्ष और जीनोटोमी, जनजाति वैश्विक परिदृश्यःमूल निवासी एवं भारत, संविधान-न्यायिक निर्णय एवं जनगणना के सत्रों में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता भूपेंद्र यादव, डा. जितेंद्र बजाज,श्याम परांडे, जलेश्वर ब्रम्ह, विराग पाचपोर, कल्याण भट्टाचार्य, अशोक घाटगे, लक्ष्मीनारायण पयोधि आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। सत्रों का संचालन दीपक शर्मा, डा. आरती सारंग एवं डा. पी. शशिकला ने किया।

वेदों की संस्कृति को जीता है जनजाति समाजः नंदकुमार साय


राष्ट्रीय सेमीनार में जनजातीय समाज के विविध मुद्दों पर चर्चा जारी, पढ़े जा रहे शोधपत्र भोपाल, 19 जून। आदिवासी नेता और सांसद नंदकुमार साय का कहना है कि जनजाति समाज के लोग ही भारत की मूल संस्कृति, परंपराओं और धर्म के वाहक हैं। जनजाति समाज आज भी वेदों में वर्णित संस्कृति को ही जी रहा है। इसलिए यह कहना गलत है कि वे भारतीय परंपराओं से किसी भी प्रकार अलग हैं। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, वन्या,आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान और वन साहित्य अकादमी की ओर से “जनजाति समाज एवं जनसंचार माध्यमः प्रतिमा और वास्तविकता” विषय पर रवींद्र भवन में आयोजित तीन दिवसीय संगोष्ठी के खुला सत्र में अध्यक्ष की आसंदी से बोल रहे थे। इस आयोजन में 22 प्रांतों से आए जनजातीय समाज के लगभग 140 लोग सहभागी हैं तथा विविध विषयों पर संगोष्ठी में लगभग 105 शोध पत्र पढ़े जाएंगें। उन्होंने कहा कि राम के साथ वनवासी समाज ही था, जिसने रावण के आतंक से दण्डकारण्य को मुक्त कराया। देश के सभी स्वातंत्र्य समर में वनवासी बंधु ही आगे रहे। वनवासी सही मायने में सरल, भोले और वीर हैं। वे इस माटी के वरद पुत्र हैं और अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए सदा प्राणों की आहुति देते आए हैं। उनका कहना था हमें अपने समाज से शराबखोरी जैसी की कमियों को दूर कर एकजुट होना होगा। क्योंकि इस देश की संस्कृति, सभ्यता और धर्म को बचाने की जिम्मेदारी हमारी ही है। श्री साय ने कहा कि देश के तमाम वनवासी क्षेत्र नक्सलवाद की चुनौती से जूझ रहे हैं, अगर वनवासी समाज के साथ मिलकर योजना बनाई जाए तो कुछ महीनों में ही इस संकट से निजात पाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद एक संगठित आतंकवाद है इससे जंग जीतकर ही हम भारत को महान राष्ट्र बना सकते हैं। इस सत्र में प्रमुख रूप से शंभूनाथ कश्यप, संगीत वर्मा, इदै कौतुम, मधुकर मंडावी, कविराज मलिक ने अपने विचार व्यक्त किए। सत्र का संचालन विष्णुकांत ने किया। इसके पूर्व “जनजातियां, जीवन दर्शन, आस्थाएं, देवी देवता, जन्म से मृत्यु के संस्कार और सृष्टि की उत्पत्ति” के सत्र में डा. कृष्णगोपाल (गुवाहाटी) ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तर पूर्व राज्यों में करीब 220 जनजातियां हैं। कभी किसी ने एक दूसरे की आस्था व परंपराओं का अतिक्रमण नहीं किया। जनजातियों की प्रकृति पूजा, सनातन धर्म का ही रूप है। अंग्रेजी लेखकों व इतिहासकारों ने इनको भारतीयता से काटने के लिए सारे भ्रम फैलाए। भारतीय जनजातियां सनातन धर्म की प्राचीन वाहक हैं, उनमें सबको स्वीकारने का भाव है। उनके इस पारंपरिक जुड़ाव को तोड़ने के लिए सचेतन प्रयास किए जा रहे हैं जिसे रोकना होगा। इस सत्र में डा. राजकिशोर हंसदा, सेर्लीन तरोन्पी, थुन्बुई जेलियाड, डपछिरिंड् लेपचा, डा.श्रीराम परिहार, आशुतोष मंडावी, डा. आजाद भगत, डा. नारायण लाल निनामा ने भी अपने पर्चे पढ़े। सत्र की अध्यक्षता डा. मनरुप मीणा ने की। जनजाति समाज और मीडिया पर केंद्रित सत्र में मीडिया और वनवासी समाज के रिश्तों पर चर्चा हुयी। इस सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने की। अपने संबोधन में श्री कुठियाला ने कहा कि मीडिया हर जगह राजनीति की तलाश करता है। जीवनदर्शन, विस्थापन, समस्याएं आज इसके विषय नहीं बन रहे हैं। मीडिया के काम में समाज का सक्रिय हस्तक्षेप होना चाहिए क्योंकि इस हस्तक्षेप से ही उसमें जवाबदेही का विकास होगा। एक सक्रिय पाठक और दर्शक ही जिम्मेदार मीडिया का निर्माण कर सकते हैं। वरिष्ठ पत्रकार और नवदुनिया के संपादक गिरीश उपाध्याय ने कहा कि मीडिया नगरकेंद्रित होता जा रहा है और वह उपभोक्ताओं की तलाश में है। बावजूद इसके उसमें काफी कुछ बेहतर करने की संभावनाएं और शक्ति छिपी हुयी है। दिल्ली से आए वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार भारद्वाज ने कहा कि किसानों और वनवासी खबरों में तब आते हैं जब वे आत्महत्या करें या भूख से मर जाएं। जनजातियों की रिपोर्टिंग को लेकर ज्यादा सजगता और अध्ययन की जरूरत है। डा. पवित्र श्रीवास्तव ने कहा कि जनजातियों के बारे में जो भी जैसी धारणा बनी है वह मीडिया के चलते ही बनी है। मीडिया ही इस भ्रम को दूर कर सकता है। सत्र का संचालन प्रो. आशीष जोशी ने किया।

Wednesday, October 26, 2011

एमसीयू में यूं मना दीवाली का उत्सव






भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विकास भवन परिसर में दीवाली मिलन समारोह का आयोजन किया गया,जिसमें कुलपति प्रो.बृजकिशोर कुठियाला सहित विश्वविद्यालय परिवार के कर्मचारी, अधिकारी एवं प्राध्यापक शामिल रहे। कार्यक्रम का संचालन सुश्री मीता उज्जैन ने किया।
कार्यक्रम में मां लक्ष्मी की पूजा अर्चना के बाद दीप जलाकर पटाखे चलाए गए। जिसमें सबने उत्साह से हिस्सा लिया। इस मौके पर कुलपति श्री कुठियाला ने अपने सारगर्भित भाषण में कहा कि दीपावली का त्यौहार सही मायने में प्रकाश को और ज्यादा बढ़ाने का त्यौहार है। हमें अपने आसपास, परिवेश में और वंचित जनों के जीवन में भी प्रकाश फैलाने का प्रयास करना चाहिए। यह चीज हमें हमारी परंपरा से मिली है जिसमें मनुष्य मात्र के सुख की कामना की गयी है और पूरे विश्व को एक परिवार माना गया है। यह त्यौहार हमें कई तरह की शिक्षा देता है जिसमें स्वच्छता से लेकर रामराज की कल्पनाएं भी शामिल हैं।

Friday, October 21, 2011

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं-संजय द्विवेदी


आप सब घर जा रहे हैं, दीपों का त्यौहार दिवाली मनाने। विभाग आज से ही कितना सूना हो जाएगा। आपकी मौजूदगी से वास्तव में यहां कितनी उर्जा और रौशनी रहती है। अब यही उर्जा और रौशनी आपके घर और मोहल्ले में होगी। आप सबको आज से लगातार बहुत मिस करूंगा। आपके न होने पर आप सब और याद आते हैं। मेरी ओर से दीपावली और छठ पूजा की बहुत-बहुत बधाई। इन त्यौहारों के ठीक बाद 7 नवंबर को ईद-उल-जुहा का भी त्योहार है- उसकी भी बहुत बधाई। उम्मीद है कि आप इन सब त्यौहारों को बहुत अच्छे तरीके इंज्वाय करेंगें। मेरी बहुत शुभकामनाएं। समूचे परिवार और दोस्तों को भी मेरी तरफ से त्यौहारों की मुबारकबाद कहें। बहुत सारे विद्यार्थी जो अखबारों और अन्य मीडिया संस्थानों में काम कर रहे हैं उनकी दीवाली अलग होती है, क्योंकि मीडिया में इतनी लंबी छुट्टियां नहीं मिलती। उन सबको भी मुबारकबाद कि वे काम के साथ ही त्यौहारों का आनंद उठाएं। मुझे याद आता है कि तीन साल पहले जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ न्यूज चैनल में दशहरे के दिन और दिवाली के दिन भी मैने प्राइम टाइम के बुलेटिन पढ़े थे और उसके बाद घर जाकर दिए जलाए। किंतु इस नए काम में एक सप्ताह की तो छुट्टी है ही और आपके न आने तक सिर्फ आप सबका इंतजार ही है। एक बार फिर से शुभकामनाएं कि आपकी जिंदगी में इतना उजाला हो कि उसकी रौशनी से हम सब के मन भर जाएं। ढेर सा प्यार....
-संजय द्विवेदी

Thursday, September 15, 2011

विकास ही बन रहा है विनाश : राजकुमार भारद्वाज





किसानों को न तो सरकार समझती है न मीडिया

भोपाल, 15 सितंबर। वरिष्ठ पत्रकार एवं कृषि मामलों के जानकार राजकुमार भारद्वाज का कहना है कि किसानों की समस्याओं को न तो सरकार समझती है न मीडिया। इसके चलते कृषि को विकास से जितना फायदा होना चाहिए था, भारतीय परिवेश में वह उतना सफल नहीं हुआ है, नहीं तो ऐसा क्यों है कि जो क्षेत्र उत्पादन में अग्रणी थे, वहीं के किसान आत्महत्या में अब सबसे आगे हैं। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग में आयोजित कार्यक्रम में‘किसानों के मुद्दे और मीडिया ‘विषय पर बोल रहे थे। श्री राजकुमार लंबे समय से कृषि मुद्दों पर काम कर रहे हैं और संप्रति दिल्ली से प्रकाशित नई दुनिया अखबार से जुड़े हैं।

श्री राजकुमार ने बताया कि भारत में जोतों का आकार काफी छोटा है, जिसके चलते कृषि कार्यों को सुगम बनाने के लिए जो तकनीक विकसित की गई है वह भारतीय खेती को बहुत फायदा नहीं पहुंचा पा रही हैं। उदाहरण के लिए हमारे यहाँ अधिकतर किसानों के पास उपलब्ध जोत पांच एकड़ से कम है, जबकि ट्रैक्टर इतनी छोटी जोत के लिए उपयुक्त नहीं रहता है। अन्य जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि भले ही ‘कांट्रेक्ट खेती’ ने किसानों को तेजी से आर्थिक लाभ पहुंचाया हो, पर लंबे समय में इसके नुकसान ज्यादा हैं। कांट्रैक्ट खेती करने वाली कंपनियाँ अपने बीज, अपनी खाद आदि इस्तेमाल करवाती हैं, जो जमीन की उर्वरा शक्ति दो-तीन फसलों के बाद कम कर देते हैं। फिर किसान खुद को ठगा महसूस करता है।

जमीन अधिग्रहण पर किसानों का पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि, भारत का किसान समझदार निवेशक नहीं है, पहले हुए जमीन अधिग्रहणों से मिले पैसों का वह उचित निवेश नहीं कर पाया, फलस्वरूप पहले तो खूब शानो-शौकत की इकट्ठी की, पर अब उसकी आर्थिक हालत काफी खराब है। किसानों का ये हश्र देखकर अब नए किसान अपनी जमीन देने में ज्यादा संकोच कर रहे हैं। किसानों के प्रति बैंकों के तौर-तरीकों पर भी उन्होंने नाराजगी प्रकट की, उन्होंने कहा कि जो किसान पहले साहूकार के चंगुल से छूटकर बैंकों की तरफ मुड़ा था, वह अब वापस साहूकारों की तरफ लौट रहा है। कारण बैंक रकम वापस न होने पर जिस तरह से वसूली करते हैं उससे किसान की सामाजिक प्रतिष्ठा खराब होती है। एक अन्य संकट की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय किसान अभी अपनी फसलों के पेटेंट के प्रति सजग नहीं है। उनकी इस कमी का फायदा विदेशी कंपनियाँ उठाना चाहती हैं वह लंबे समय से देश में उत्पादित अच्छी फसलों की किस्मों का पेटेंट कराने की फिराक में है। बासमाती चावल उनमें से एक है। बीटी बीजों के बारे में तल्ख टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि मल्टीनेशनल कंपनियां बीटी बीजों के सहारे भारतीय कृषि को गुलाम बनाना चाह रही हैं। बीटी बीज से पैदा होनी फसलें जमीन की उर्वरा शक्ति को तो कम करती ही है, साथ ही हर बार नए बीज के लिए कंपनियों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

किसान और मीडिया के बारे में उन्होंने कहा कि मीडिया में कृषि आन्दोलनों के लिए जगह ही नहीं है, अगर किसी मुद्दे को स्थान मिलता भी है तो वह कृषि आन्दोलन के कारण नहीं, बल्कि अन्य कारणों से मिलता है, इस संदर्भ में उन्होंने भट्टा पारसौल का जिक्र किया। समस्याओं को कम करने के सुझाव में उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि किसान शिक्षित और जागरूक बने। कृषि से जुड़ी संस्थाओं को चाहिए कि वह शोध पर ज्यादा ध्यान दें। साथ ही साथ वह किसान को कृषि से जुड़े आर्थिक, सामाजिक सहित सभी मुद्दों पर जागरूक भी करें , ताकि किसान को उचित निर्णय लेने में आसानी हो। उन्होंने कोआपरेटिव संस्थाएं, संघ, अनाज बैंक आदि को बढ़ाने पर जोर दिया।

इस व्याख्यान के दौरान डा. राखी तिवारी, डा. संजीव गुप्ता एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।

Monday, August 8, 2011

लोकतांत्रिक चेतना का देश है भारतः विजयबहादुर सिंह


स्थानीय विविधताएं ही करेंगी पश्चिमी संस्कृति के हमलों का मुकाबला
भोपाल, 8 जुलाई 2011। हिंदी साहित्य के प्रख्यात आलोचक एवं विचारक डा.विजयबहादुर सिंह का कहना है कि भारत एक लोकतांत्रिक चेतना का देश है। इसकी स्थानीय विविधताएं ही बहुराष्ट्रीय निगमों और पश्चिमी संस्कृति के साझा हमलों का मुकाबला कर सकती हैं। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग द्वारा ‘भारत का सांस्कृतिक का अवचेतन ’ विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि ज्ञान और संस्कृति अगर अलग-अलग चलेंगें तो यह मनुष्य के खिलाफ होगा। प्रख्यात विचारक धर्मपाल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनके द्वारा उठाया गया यह सवाल कि “ हम किसके संसार में रहने लगे हैं”, आज बहुत प्रासंगिक हो उठा है। हिंदुस्तान के लोग आज दोहरे दिमाग से काम कर रहे हैं, यह एक बड़ी चिंता है। सभ्यता में हम पश्चिम की नकल कर रहे हैं और धर्म के पालन में हम अपने समाज में लौट आते हैं। डा. सिंह ने कहा कि 1947 के पहले स्वदेशी, सत्याग्रह और अहिंसा हमारे मूल्य थे किंतु आजादी के बाद हमने परदेशीपन, मिथ्याग्रह और हिंसा को अपना लिया है। यह दासता का दिमाग लेकर हम अपनी पंचवर्षीय योजनाएं बनाते रहे, संविधान रचते रहे और नौकरशाही भी उसी दिशा में काम करती रही। ऐसे में सोच वा आदर्श में फासले बहुत बढ़ गए हैं। हमारा पूरा तंत्र आम आदमी के नहीं ,सरकार के पक्ष में खड़ा दिखता है। हमारा सामाजिक जीवन और लोकजीवन दोनों अलग-अलग दिशा में चल रहे हैं। जबकि हिंदुस्तान समाजों का देश नहीं ‘लोक’ है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ का उल्लेख करते हुए विजय बहादुर सिंह ने कहा कि पश्चिम कभी भी हमारा आदर्श नहीं हो सकता, क्योंकि यह सभ्यता अपने को स्वामी और बाकी को दास समझती है। उनका कहना था कि कोई भी क्रांति तभी सार्थक है, जब उससे होने वाले परिवर्तन मनुष्यता के पक्ष में हों। आजादी के बाद जो भी बदलाव किए जा रहे हैं वे वास्तव में हमारी परंपरा और संस्कृति से मेल नहीं खाते। भारत की सांस्कृतिक चेतना त्याग में विश्वास करती है, क्योंकि वह एक आदमी को इंसान में रूपांतरित करती है। शायद इसीलिए गालिब ने लिखा कि “आदमी को मयस्सर नहीं इंशा होना”। भारत की संस्कृति इंसान बनाने वाली संस्कृति है पर हम अपना रास्ता भूलकर उस पश्चिम का अंधानुकरण कर रहे हैं, जिसे गांधी ने कभी शैतानी सभ्यता कहकर संबोधित किया था। इस अवसर पर डा. श्रीकांत सिंह, पुष्पेंद्रपाल सिंह, डा. संजीव गुप्ता, पूर्णेंदु शुक्ल, शलभ श्रीवास्तव, प्रशांत पाराशर और जनसंचार विभाग के विद्यार्थी मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन विभागाध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।

लोकमंगल हो मीडिया का ध्येयः स्वामी शाश्वतानंद


भोपाल, 6 अगस्त,2011। महामंडलेश्वर डा.स्वामी शाश्वतानंद गिरि का कहना है कि लोकमंगल अगर पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं है तो वह व्यर्थ है। हमें हमारे सामाजिक संवाद और पत्रकारिता में लोकमंगल के तत्व को शामिल करना पड़ेगा। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा ‘संवाद और पत्रकारिता का अध्यात्म’ विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अध्यात्म के बिना प्रेरणा संभव नहीं है। अध्यात्म ही किसी भी क्षेत्र में हमें लोकमंगल की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि अरविंद घोष, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी भी पत्रकार थे किंतु उनकी पत्रकारिता, उनकी आत्मा का स्पंदन थी, आज जबकि पूंजी का स्पंदन ही पत्रकारिता की प्रेरणा बन रहा है। उन्होंने युवा पत्रकारों से आग्रह किया कि वे अपनी पत्रकारिता में सकारात्मकता को शामिल करें तभी हम भारत के मीडिया का मान बढ़ा सकेंगें। शरीर के तल पर मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं, मूल्य ही हमें अलग करते हैं। हमारे लिए मनुष्यता बहुत महत्वपूर्ण है।
डा. गिरि ने कहा कि मन से लिखा और मन से बोला गया शब्द ही पढ़ा और सुना जाएगा। बुद्धि से लिखे और बोले हुए का कोई महत्व नहीं है, वह बुद्धि से ही पढ़ा और सुना जाएगा। हमारे लेखन में अगर हमारी आत्मा न होगी तो वह प्राणहीन हो जाएगा। प्रेमचंद और निराला जी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ये इसलिए दिल से पढ़े गए, क्योंकि उन्होंने दिल से लिखा। कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों ने डा. गिरि से प्रश्न भी पूछे।
कार्यक्रम के प्रारंभ में कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, रजिस्ट्रार डा. चंदर सोनाने, प्रो. आशीष जोशी, दीपक शर्मा, पवित्र श्रीवास्तव, पुष्पेंद्र पाल सिंह, डा. श्रीकांत सिंह, डा. पी. शशिकला, डा. आरती सारंग, वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा,पूर्व कुलसचिव पी. एन. साकल्ले आदि ने पुष्पहार से महामंडलेश्वर डा. गिरि का स्वागत किया। संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।

Saturday, May 14, 2011

माखनलाल पत्रकारिता विवि में कई पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश प्रारंभ

भोपाल,14 मई,2011। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में शैक्षणिक सत्र 2011-12 में संचालित होने वाले विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई है। विश्वविद्यालय द्वारा मीडिया मैनेजमेंट, विज्ञापन एवं विपणन संचार, मनोरंजन संचार, कॉर्पोरेट संचार तथा विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी संचार में एम.बी.ए. पाठ्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं। 2 वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के अंतर्गत एम.जे. (पत्रकारिता स्नातकोत्तर), एम.ए.-विज्ञापन एवं जनसंपर्क, एम.ए.-जनसंचार, एम.ए.-प्रसारण पत्रकारिता, एम.एससी. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं । तीन वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रमों के अंतर्गत बी.ए.-जनसंचार, बी.एससी.- इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, बी.एससी.-ग्राफिक्स एवं एनीमेशन, बी.एससी.-मल्टीमीडिया तथा बी.सी.ए. पाठ्यक्रम संचालित हैं। एक वर्षीय पाठ्यक्रम के अंतर्गत विडियो प्रोडक्शन, वेब संचार, पर्यावरण संचार, योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एवं अध्यात्मिक संचार तथा भारतीय संचार परंपराएँ तथा पीजीडीसीए जैसे स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त एमसीए तथा बी.लिब. पाठ्यक्रम भी चल रहे हैं। मीडिया अध्ययन में एम.फिल. तथा संचार, जनसंचार, कंप्यूटर विज्ञान तथा पुस्तकालय विज्ञान में पीएच.डी. हेतु आवेदन आमंत्रित किये गए हैं। यह प्रवेश प्रक्रिया विश्वविद्यालय के भोपाल, नॉएडा एवं खंडवा स्थित परिसरों के लिए है। पाठ्यक्रमों में आवेदन करने की अंतिम तिथि 25 मई 2011 है। प्रवेश हेतु प्रवेश परीक्षा का आयोजन 12 जून 2011 को भोपाल, कोलकाता जयपुर, पटना, रांची, लखनऊ तथा दिल्ली/नोएडा केन्द्रों पर किया जायेगा। अधिक जानकारी विवरणिका और आवेदन पत्र हेतु दिनांक 16-22 अप्रैल 2011 के “रोजगार समाचार” तथा “एम्प्लोयेमेंट न्यूज़” एवं दिनांक 18-24 अप्रैल 2011 के “रोजगार और निर्माण” में प्रकाशित विज्ञापन देखें अथवा विश्वविद्यालय की वेबसाइट www.mcu.ac.in पर लोगऑन करें या किसी भी परिसर में पधारें अथवा फोन करें 0755-2553523 (भोपाल), 0120-4260640 (नोएडा), 0733-2248895 (खंडवा)।विश्वविद्यालय के सभी पाठ्यक्रम रोजगारोन्मुखी हैं एवं मीडिया के क्षेत्र में रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराते हैं।

Saturday, October 30, 2010

विद्या से आएगी समृद्धि: प्रो. कुठियाला



विद्यार्थियों ने मनाया दीपावली मिलन समारोह
भोपाल, 30 अक्तूबर 2010

लक्ष्मी और सरस्वती आपस में बहनें ही हैं। यदि विद्या है तो धन और समृद्धि अपने आप ही प्राप्त हो जाएंगी। पत्रकारिता में सरस्वती की अराधना से ही लक्ष्मी भी प्रसन्न होंगी। दीपावली का पर्व मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आगमन को याद करने के साथ उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प लेने का अवसर है। उक्त बातें माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने विवि के जनसंचार विभाग द्वारा आयोजित दीपावली मिलन सामारोह में कही।
प्रो. कुठियाला ने विश्वविद्यालय प्रशासन तथा स्वयं की ओर से विद्यार्थियों को दीपावली की शुभकामनाएँ देते हुए अपील की कि विद्यार्थी कोर्स समाप्त होने के बाद जब पत्रकारिता करें तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों को ध्यान में रखकर करें ताकि दीपावली की प्रासंगिकता युगों-युगों तक कायम रहे। वर्तमान में मीडिया जगत में पाँव पसार रहे सुपारी पत्रकारिता व पेड-न्यूज संस्कृति से पत्रकारिता को मुक्त करने की आवश्यकता है। उन्होंने हनुमान जी को विश्व का पहला खोजी पत्रकार बताया। जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने विद्यार्थियों को दीपावली की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि पूरा विश्व आज भारत की ओर आशा भरी नजरों से देख रहा है। हमें उनकी आशाओं पर खरा उतरने के लिए रामराज्य को धरती पर उतारने की आवश्यता है। इसके लिए भारत में सुख, समृद्धि, एकता और अखंडता का वातावरण बनाना होगा। तभी, दीपावली का पर्व भी सार्थक होगा। शिक्षिका मोनिका वर्मा ने विद्यार्थियों को घर जाकर आनंद से दीपावली मनाने की शुभकामनाएँ दी और कहा कि जब वापस आएँ तो पूरी लगन से पढ़ाई करें ताकि सारा जीवन दीपावली की खुशियाँ मनाएँ।
समारोह में दीपावली की पौराणिक कथाओं के बारे में बताते हुए छात्र देवाशीष मिश्रा ने बताया कि यह बुराइयों पर अच्छाइयों की जीत की खुशी मनाने का पर्व है। छात्रा श्रेया मोहन ने दीपावली के बाद बिहार-झारखण्ड में विशेष रूप सें मनाए जाने वाल छठ-पर्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने गीत-गायन व कविता पाठ भी किया। शाहीन बानो ने एक हास्य कविता का पाठ कर सबका मन मोह लिया वहीं संजय ने राजस्थानी लोकगीत पधारो म्हारो देश गाकर सबको राजस्थान आने का निमंत्रण दिया। छात्रा मीमांसा ने एक सुंदर कृष्ण-भजन का गायन किया। कार्यक्रम का संचालन अंशुतोष शर्मा व शिल्पा मेश्राम ने किया। इस अवसर पर विभाग के शिक्षक संदीप भट्ट, शलभ श्रीवास्तव, कर्मचारीगण तथा समस्त छात्र-छात्राएँ उपस्थित थे।

Thursday, October 14, 2010

बेहतर शासन के लिए जरूरी है सकारात्मक संचार : प्रो. कुठियाला


एमआईटी स्कूल आफ गर्वमेंट के छात्रों ने किया पत्रकारिता विश्वविद्यालय का भ्रमण

भोपाल 14 अक्टूबर। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला का कहना है कि समाज को अगर सकारात्मक दिशा देनी है तो जरुरी है कि शासन और संचार दोनों की प्रकृति भी सकारात्मक हो। मीडिया और शासन समाज के दिशावाहकों में से एक हैं। इसलिए इनको अपने व्यवहार और कार्यप्रणाली में सकारत्मकता रखना बेहद जरुरी है।
वे यहां विश्वविद्यालय परिसर में शैक्षणिक भ्रमण के अन्तर्गत भोपाल आए पुणे स्थित एमआईटी स्कूल ऑफ गर्वमेंट के विद्यार्थियों को सम्बोधित कर रहे थे। प्रो. कुठियाला ने छात्रों को मीडिया की मूलभूत जानकारी देते हुए कहा कि दोनों संस्थानों का मूल उद्देश्य समान है, जहाँ एमआईटी का उद्देश्य बेहतर शासन प्रणाली के लिए अच्छे राजनेता पैदा करना है, वहीं पत्रकारिता विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल पत्रकार बनाना नहीं बल्कि विद्यार्थियों को अच्छा संचारक बनाना भी है। ताकि वे समाज के मेलजोल और सदभाव के लिए काम करें। प्रो. कुठियाला ने विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली, उद्देश्य एवं लक्ष्यों के बारे में भी विद्यार्थियों को अवगत कराया। एक प्रश्न के जबाब में उन्होंने कहा व्यवसायीकरण और व्यापारीकरण में अन्तर पहचानना बेहद जरूरी है। किसी भी वस्तु या सेवा के व्यवसायीकरण में बुराई नहीं है, समस्या तब शुरू होती है जब उसका व्यापारीकरण होने लगता है। वर्तमान मीडिया, इसी स्थिति का शिकार है। संवाद पर आधारित इस क्षेत्र का इतना व्यापारीकरण कर दिया गया है कि सूचना अब भ्रमित करने लगी है, उकसाने लगी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मीडिया की जिम्मेदारी केवल मीडिया के लोगों पर छोड़ना ज्यादती होगी, इसलिए जरूरी है कि समाज के अन्य वर्ग भी मीडिया से जुड़ी अपनी जिम्मेदारी समझे एवं निभाएं। कार्यक्रम के प्रारंभ में एमआईटी, पुणे के छात्रों ने अंगवस्त्रम और प्रतीक चिन्ह देकर प्रो. कुठियाला का स्वागत किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी , जनसंपर्क विभाग के अध्यक्ष डॉ. पवित्र श्रीवास्तव, डा. जया सुरजानी, गरिमा पटेल एवं कई शिक्षक उपस्थित रहे। संचालन एमआईटी संस्थान की शिक्षिका सीमा गुंजाल एवं आभार प्रदर्शन एमआईटी के ओएसडी संकल्प सिंघई ने व्यक्त किया।
(डा. पवित्र श्रीवास्तव)

Monday, March 15, 2010

हर्षोल्लास से मना भारतीय नववर्ष


भोपाल,15 मार्च। सोमवार को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय,भोपाल के जनसंचार विभाग में भारतीय नववर्ष की पूर्व संध्या पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में जनसंचार विभाग के विद्यार्थियों ने भारतीय नववर्ष से जुड़े ऐतिहासिक, पौराणिक व वैज्ञानिक तथ्यों के बारे में चर्चा की।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति बृजकिशोर कुठियाला ने विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के गौरवमय इतिहास को बताया और कहा कि हमें गर्व होना चाहिए कि हम भारतीय हैं। उन्होंने इसकी व्यवहारिकता एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी छात्रों को अवगत कराया। योग व आयुर्वेद के वैश्विक प्रसार का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हमें अपनी श्रेष्ठ चीजें को विश्व को देने का कोशिश करनी चाहिए। श्री कुठियाला ने कहा कि हमें अपनी सांस्कृतिक वैभव से जुड़ी जानकारियों का वैश्वीकरण करना होगा तथा विदेशी ज्ञान-विज्ञान का भारतीयकरण करना होगा।
जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने कहा कि ये काफी दुःखद है कि नयी पीढ़ी भारतीय नववर्ष के बारे में कम जानती है। उन्होंने कहा कि हमें अपनी तरफ से इसको प्रोत्साहित करने की कोशिश करनी चाहिए फिर तो बाजार इसका अपने आप ही वैश्वीकरण कर देगा। इस मौके पर छात्र-छात्राओं ने नववर्ष पर स्वनिर्मित शुभकामना पत्र कुलपति श्री कुठियाला को भेंटकर उन्हें नए साल की शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम में पवित्रा भंडारी और एन्नी अंकिता ने कविताएं प्रस्तुत कीं तो बिकास कुमार शर्मा एवं पंकज साव ने गीत प्रस्तुत कर माहौल को सरस बना दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जनसंपर्क विभाग के अध्यक्ष डॉ पवित्र श्रीवास्तव ने की। इस अवसर पर सर्वश्री संदीप भट्ट, पूर्णेदु शुकल, शलभ श्रीवास्तव, देवेशनारायण राय, साकेत नारायण, कुंदन पाण्डेय सहित विभाग के छात्र मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन शिशिर सिंह व आभार प्रदर्शन सोनम झा ने किया।