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Friday, October 25, 2013

भारतीय सिनेमाः विकृतियों का सुपर बाजार

-संजय द्विवेदी

  जब हर कोई बाजार का माल बनने पर आमादा है तो हिंदी सिनेमा से नैतिक अपेक्षाएं पालना शायद ठीक नहीं है। अपने खुलेपन के खोखलेपन से जूझता हिंदी सिनेमा दरअसल विश्व बाजार के बहुत बड़े साम्राज्यवादी दबावों से जूझ रहा है। जाहिर है कि यह वक्त नैतिक आख्यानों, संस्कृति और परंपरा की दुहाई देने का नहीं है। हिंदी सिनेमा अब आदर्शों के तनाव नहीं पालना चाहिता । वह अब सिर्फ विश्व बाजार का सांस्कृतिक एजेंट है। उसके ऊपर अब सिर्फ बाजार के नियम लागू होते हैं।मांग और आपूर्ति के इस सिद्धांत पर वह खरा उतरने को बेताब है।
कला सिनेमा को निगलने के बादः
 यह अकारण नहीं है कि कला सिनेमा की एक पूरी की पूरी धारा को यह बाजार निगल गया। कला या समानांतर सिनेमा से जुड़ा जागरुक तबका भी अब इसी बाजार की ताल से ताल मिलाकर मालबनाने में लगा है। ऐसे में सिनेमा के सामाजिक उत्तरदायित्व और उसके सरोकारों पर बातचीत बहुत जरूरी हो जाती है। ऐसे में समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले इस माध्यम का विचलन और उसके संदेशों को लेकर लंबी बहसें चलती रही हैं, लेकिन अब इसका दौर भी थम गया है। शायद इस सबने यह मान लिया है कि इस माध्यम से जन अपेक्षाएं पालना ही अनैतिक है। सिनेमा बनाने वाले भी यह कहकर हर प्रश्न का अंत कर देते हैं कि हम वहीं दिखते हैं जो समाज में घट रहा है।लेकिन यह बयान सत्य के कितना करीब है, सब जानते हैं। सच कहें तो आज का सिनेमा समाज में चल रही हलचलों का वास्तविक आईना कभी प्रस्तुत नहीं करता । वह उसे या तो अंतिरंजित करता है या चीजों को अतिसरलीकृत करके पेश करता है। 47 के पहले या 60 के दशक में दर्शक अपने नैतिक मूल्यों के लिए हीरो को लड़ते और बुरी ताकतों पर विजय प्राप्त करते हुए देखते थे। प्रेम और नैतिक आदर्श के लिए लड़ने वाला हीरो समाज में स्वीकारा जाता था। नेहरू युग के बाद लोगों की टूटती आस्था, आजादी के सपनों से छल की भावना बलवती हुई तो मुख्यधारा का सिनेमा अभिताभ बच्चन के रुप में एक में एक ऐसी व्यक्तिगत सत्ताके स्थापना का गवाह बना जो अपने बल और दुस्साहस सेल लोगों की लड़ाई लड़ता है।
कहां खो गया नायकः
    आज का सिनेमा जहां पहुंचा है, वहां नायक-खलनायक और जोकर का अंतर ही समाप्त हो गया है। इसके बीच में चले कला फिल्मों के आंदोलन को उनका सचऔर उनकीवस्तुनिष्ठ प्रस्तुतिही खा गई । यहां यह तथ्य उभरकर सामने आया कि बाजार में झूठ ही बिक सकता है, सच नहीं। इस एक सत्य की स्थापना ने हिंदी सिनेमा के मूल्य ही बदल दिए। दस्तक, अंकुर, मंथन, मोहन जोशी हाजिर हो, चक्र, अर्धसत्य, पार, आधारशिला, दामुल, अंकुश, धारावी जैसी फिल्में देने वाली धारा ही कहीं लुप्त हो गई। एक सामाजिक माध्यम के रूप में सिनेमा के इस्तेमाल की जिनमें समझ थी वे भी मुख्यधारा के साथ बहने लगे। यहां यह बात भी काबिले गौर है कि कला फिल्मों ने अपने सीमित दौर में भी अपनी सीमाओं के बावजूद व्यावसायिक सिनेमा की झूठी और मक्कार दुनिया की पोल खोल दी। यह सही बात है कि आज सिनेमा का माध्यम अपनी तकनीकगत श्रेष्ठताओं, प्रयोगों के चलते एक बेहद खर्चीला माध्यम बन गया है। ऐसे में सेक्स, हिंसा उनके अतिरिक्त हथियार बन गए हैं। पुराने जमाने में भी वी. शांताराम से लेकर गुरुदत्त, ख्वाजा अहमद अब्बास ने व्यावसायिक सिनेमा में सार्थक हस्तक्षेप किया, लेकिन आज का सिने-उद्योग सिर्फ मुनाफाखोरी तक ही सीमित नहीं है, उसके इरादे खतरनाक हैं। काले धन की माया, काले लोग इस बाजार को नियंत्रित कर रहे हैं। आज के मुख्यधारा का सिनेमा समाज के लिएनहीं बाजार के लिएहै। देशभक्ति, प्रेम, सामाजिक सरोकार सब कुछ यदि बेचने के काम आए तो ठीक वरना दरकिनार कर दिये जाते हैं। नकली इच्छाएं जगाने, मायालोक में घूमते इस सिनेमा का अपने आसपास के परिवेश से कोई लेना-देना नहीं है। इसीलिए आज उसके पास कोई नायकनहीं बचा है। पहले एकांत में नाचते नायक-नायिका इसलिए अब भीड़ में नाचते हैं । शोर का संगीत और शब्दों का अकाल इस सिनेमा की दयनीयता का बखान करते हैं । सच कहें तो भारतीय जीवन का अनिवार्य हिस्सा बने होने के बावजूद सिनेमा पर जनता का कोई बौद्धिक अंकुश नहीं रह गया है । परिणाम यह हुआ है कि हिंदी सिनेमा पागल हाथी की तरह व्यवहार कर रहा है।
मनोविकारी फिल्मों का समयः
   हिंदी सिनेमा तो वैसे ही हॉलीवुड की जूठन उठाने और खाने के लिए मशहूर है। इसीलिए प्रेम के कोमल और मोहक अंदाज की फिल्मों के साथ मनोविकारी प्रेम की फिल्में भी बालीवुड में खूब बनीं । एक दौर में शाहरूख खान ऐसी मनोविकारी प्रेम की फिल्मों के महानायक बन गए । सही अर्थों में मनोविकारों से ग्रस्त प्रेमी को पहली बार बालीवुड में शाहरूख खान ने ग्लैमराइज्डकिया । फिल्मबाजीगरसे प्रेम में हिंसा व उन्माद के जिस दौर की शुरूआत हुई, ‘डरऔरअंजाममें उसे और विस्तार मिला । फिल्म बाजीगरमें शिल्पा शेट्टी के प्रेम में दीवाना शाहरूख खान छत से धकेल कर उसकी हत्या कर देता है। डरमें जूही की दीवानगी में वह इस कदर पागल है कि वह जूही के पति सन्नी देओल की जान से पीछे पड़ जाता है। अंजाममें शाहरूख, शादीशुदा माधुरी दीक्षित की चाहत में उसके पति की हत्या कर डालता है। इस शाहरूख लहरकी सवारी नाना पाटेकर भी अग्निसाक्षीमें करते नजर आते हैं। इस फिल्म में नाना पाटेकर स्लीपिंग विद द एनमीके नायक सरीखा पति साबित होते हैं। पूरी फिल्म एक ऐसे सनकी इंसान की कथा है, जो यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उसकी पत्नी किसी और से बात भी करे । दीवानगी की इस हिंसक हद से आतंकित उसकी पत्नी कहती है वह मुझे इतना प्यार करता है कि मुझको छूकर गुजरने वाली हवा से भी नफरत करने लगा है। नाना इस फिल्म में मुहब्बत के तानाशाह के रूप में नजर आते हैं। इसके बावजूद ये फिल्में सफल रहीं। बदलते जीवन मूल्यों की बानगी पेश करती ये फिल्म एक नए विषय से साक्षात्कार कराती हैं। प्रेम की उदात्त भावनाओं के प्रति आस्था दिखाने वाला समाज एक हिंसक एवं क्रूर प्रेमी को सिर क्यों चढ़ाने लगा है, यह सवाल वस्तुतः एक बड़े समाज शास्त्रीय अध्ययन का विषय थोड़े अलग जरूर है, लेकिन वह भी प्रेम के विकृत रूप का ही परिचय कराती है।
प्रेम के चित्रण का इतिहासः
 आप हिंदी सिनेमा के 100 सालों का मूल्यांकन करें तो वह मूलतः प्रेम के चित्रण का इतिहास है। मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ दरअसल यौन सम्बन्धों की उन्मुक्ति एवं वर्जनाओं का भी रूप बदलता रहा है। सिनेमा की संपूर्ण यात्रा में प्रेम संबंधों की व्याख्या का दौर सबसे महत्वपूर्ण है। हिंदुस्तानी लोक चेतना में प्रेम के इस तत्व की जगह वैसे भी बहुत बड़ी है। दूसरे यौन संबंधों पर खुली बहस की कम गुंजाइश के कारण हम इसके अक्स एवं विकल्प परदे पर तलाशते रहे । दमित इच्छाओं एवं यौन कुंठाओं के इसी संदर्भ की समझ ने हिंदी सिनेमा व्यवसायियों को एक बेहतर मसाला दिया। गीत संगीत एवं प्रेम की इस चेतना का व्यवसाय फिल्म उद्योग की प्राथमिकता बन गई। इस सबके बावजूद हिंसा से लबरेज यह प्रेम, भारतीय दर्शकों के लिए बहुत अजनबी न था। हिंसाचार की शुरुआत और अंत अपने प्रेम को पाने या अनाचार से मुक्ति के लिए होती थी। पर प्रेम के आयातित संस्करण में अब अपनी मुहब्बत का ही गला घोंटने की तैयारियों पर जोर है। हिंसा प्रेमका यह दौर वास्तव में भारतीय सिने जगत की रेखांकित की जाने लायक परिघटना है, जो कहीं से भी प्रेम के परंपरागत चरित्र से मेंल नहीं खाती । हिंसा भारतीय सिनेमा की जानी पहचानी चीज है, पर नायक आम तौर पर खलनायक के अनाचार से मुक्ति के लिए हिंसा का सहारा लेता दिखता था। उसकी प्रमिका का ही उसके द्वारा उत्पीड़न, यह नया दौर है। जाहिर है समाज में ऐसी घटनाएं घट रही थीं और उनकी छाया रूपहले पर्दे पर भी दिखी। इस प्रकार की घटनाओं ने पर्दे पर भी हिंसक प्रेमकी थ्यौरीको जगह दी।
पलायनवादी नायकः
  शाहरूख खान की फिल्में इसी थ्यौरीका संदर्भ मानी जा सकती हैं। वह चुनौती को स्वीकारता नहीं, भागता है। मध्य वर्ग के नौजवान की चेतना एवं उसकी कुंठाओं का शाहरूख सच्चा प्रतिनिधि नजर आता है। वह प्यार करता है, किंतु स्वीकार का साहस उसमें नहीं हैं । उसे श्रम, रचनाशीलता एवं इंतजार नहीं है। सो वह पागलों सी हरकतें करता है, जिसमें प्रेमिका का उत्पीड़न भी शामिल है। इस प्रसंग पर मीडिया विशेषज्ञ सुधीश पचौरी की राय गौरतलब है। वे लिखते है- वह हमेशा लड़ता भिड़ता नजर आता है। किसी लड़की से छेड़छाड़ से लेकर मारपीट तकहिंसकऔर देहके रिश्ते बनाना ही उसका लक्ष्य है। उसके गीतों में भी सौंदर्य व कमनीयता के प्रतीक तलाशे नहीं मिलते। वह इंस्टेटिज्म’ (तुरंतवाद) का शिकार है। उसे जो भी कुछ चाहिए तुरंत चाहिए। इंस्टेट। अपने प्रेम को न पा सकने की स्थिति में उसे समाप्त कर देने की आकांक्षा उसके इसी पागलपन से उपजी है। आप इसे पूरे चित्र को पढ़ने की कोशिश करें तो यह भारतीय काव्य के धीरोदात्त नायक की विदाई का दौर है। इसमें लडके और लड़की के बीच कहीं प्यार या सामाजिक संबंध नहीं।पचौरी आगे लिखते शुद्ध रुप में फिजिकलरिश्ते पल रहे हैं। इसे हम फिल्मों के डांस सिक्वेंससे देख समझ सकते हैं नौजवान का 2 कैरेट खरा फिजिकल रूप ।यहां नायक और नायिका सिर्फ शरीरहैं। एक ऐसा शरीर, जिसमें मन, आत्मा, भावना, सुख व दुख सारे भाव तिरोहित हो चुके हैं। वह सिर्फ शरीरबनकर रह गया है। उसे खोज भी प्रेम के प्रतीक नहीं मिलते। इसीलिए गीतों में भी वह प्रेम की प्रतीक नहीं खोज पाता। एक गीत में नायक कहता है खंभे जैसी खड़ी है,/ लड़की है या छड़ी है। जाहिर है कोमल अनूभूतियों को व्यक्त करने वाले शब्दों व प्रतीकों के भी लाले हैं।
समाज में घट रही घटनाएं प्रेम के प्रति हिंसाचार इस संवेदनहीनता पर मुहर भी लगाती हैं। सिर्फ शरीरही बचा है, जिसमें से मन, आत्मा, भावना, सुखदुख, हर्ष-विषाद आदि सारे भाव तिरोहित हो चुके हैं। अपने अहंकार पर चोट आज के युवा को आहत करती है। वह घर, परिवार, समाज की बनी बनाई लीक को एक झटके में तोड़ डालने पर आमादा है। साहिर लुधियानवी की कुछ पंक्तियां इस संदर्भ को समझने में सहायक हो सकती हैं तुम अगर मुझको न चाहो तो / कोई बात नहीं,/ तुम किसी और को चाहोगी/तो मुश्किल होगी। साहिर की ये पंक्तियां इस घातक चाहत का बयान करती हैं। जहां प्रेम की प्राप्ति न होने पर उसे नष्ट कर डालने का संदेश फिल्मों में दिखता है। उपभोक्तावाद के ताजा दौर में भोगवादी संस्कृति के थपेड़ों में हमारा दार्शनिक आधार चरमरा गया है। इसी के चलते फिल्मों ने ऐसे नकारात्मक मूल्यों को सिर चढ़ाया है। पैसे की सनक और नवधनाढ्यों के उभार के बीच ये फिल्मी कथाएं वस्तुतः हमारे समाज के सच की गवाही हैं। समाचार पत्रों में आए दिन प्रेमी द्वारा प्रेमिका की हत्या, पत्नी की हत्या या पति की हत्या जैसे समाचार छपते हैं। दुर्भाग्य से सिनेमा और दूरदर्शन इस नकारात्मक प्रवृत्ति को एक आधार प्रदान करते हैं। फिल्मों की कथाएं देखकर छोटे कस्बे गांवों के नौजवान उससे गलत प्रेरणा ग्रहण करते हैं। कई बार वे पर्दे पर दिखाई घटना को जीवन में दोहराने की कोशिश करते हैं। निश्चित रूप से ताजा बाजारवादी अवधारणाओं में हमारा सिनेमा पाश्चात्य प्रभावों से तेजी से ग्रस्त हो रहा है। पश्चिमी जीवन की ज्यों की त्यों स्वीकार्यता हमारे समाज में संकट का सबब बनेगी। प्रेम के एक क्रूर चेहरे को भारतीय मन पर आरोपित करने की कोशिशें तेज हैं। दुर्भाग्य है कि यह सारा कुछ प्रेम के नाम पर हो रहा है।
सिनेमा पर गैरहाजिर विमर्शः
   किसी भी समाज में बौद्धिक और सांस्कृतिक अंकुश रखने का काम लेखक और विचारक ही करते हैं, कोई सरकार नहीं। फिल्मों पर हिंदी पत्रकारिता और टी. वी. चेनलों पर भी चल रही चर्चाएं एवं उन पर आधारित कार्यक्रम भी सतही और बचकाने होते हैं । हिंदी सिनेमा ने सही अर्थों में भारतीय समाज एवं उसके संघर्षों, उसकी चेतना को अपनी ही जमीन से बदखल कर दिया है। उसकी ताकत लगातार बढ़ी है, वह हमारा लोकाक्षर और दैन्दिन का व्यवहार तय करने लगा है। इतनी सशक्त माध्यम पर समूचे हिंदी क्षेत्र में ठोस विचार की शुरुआत के बजाए गाशिप बाजीचल रही है।

    सिनेमा पर लगभग गैरहाजिर विमर्श को चर्चा के केंद्र में लाना और उस पर बौद्धिक-सामाजिक अंकुश लगाना समय की जरूरत है। 1939 में हिंदी के यशस्वी कथाकार-उपन्यासकार प्रेमचंद ने लिखा था मगर खेद है कि इसे कोरा व्यवसाय बनाकर हमने उसे कला के उच्च आसन से खींचकर ताड़ी की दूकान तक पहुंचा दिया है यह बात प्रेमचंद के दौर की है, जब देश के लोग आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे और आज तो हिंदी सिनेमा विकृतियों का सुपर बाजारबन गया है। ऐसे ही चित्रों पर हमारी नई पीढ़ी और बचपन झूम-झूम कर जवान हो रहा है। क्या हम समाज के इतने प्रभावकारी माध्यम को, यूं ही बेलगाम छोड़ दें ?

Saturday, March 17, 2012

आज भी ज़मीन से जुड़ी है साहित्यिक पत्रकारिता





पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत हुए डॉ. हेतु भारद्वाज
भोपाल। ‘मीडिया विमर्श परिवार’ द्वारा प्रतिवर्ष दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष ‘अक्सर’ (जयपुर) के सम्पादक एवं प्रख्यात साहित्यकार डॉ. हेतु भारद्वाज को प्रदान किया गया। भोपाल के भारत भवन में आयोजित इस समारोह में देश के जाने माने साहित्यकार डॉ. विजय बहादुर सिंह ने डॉ. हेतु भारद्वाज को इस पुरस्कार से सम्मानित किया। इस सम्मान के अंतर्गत एक स्मृति चिन्ह, प्रमाणपत्र, शॉल-श्रीफल एवं 11 हजार रुपये नगद राशि दी गयी।
गौरवमयी परंपरा का सम्मानः इस अवसर पर उपस्थित डॉ. हेतु भारद्वाज ने कहा कि यह पुरस्कार उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं अपितु उस गौरवमयी परंपरा का सम्मान है जो प्रेमचंद और महावीर प्रसाद द्विवेदी से प्रारंभ होकर ज्ञानरंजन तक आती है। साहित्यिक पत्रकारिता आज भी माखनलाल चतुर्वेदी और पराड़कर की परंपरागत नीतियों का निर्वाह निर्भयता से कर रही है जबकि मुख्यधारा की पत्रकारिता व्यावसायिक होकर अपने पथ से विचलित हुई है। उन्होंने कहा कि सम्पादक किसी भी समाचार पत्र और पत्रिका की धुरी होता है, जो स्वयं ही एक संस्था है। परंतु वर्तमान समय में सम्पादक, संस्था न होकर मात्र एक व्यक्ति रह गया है, क्योंकि संपादक नामक इस संस्था ने ग्लैमर और भौतिकता की चकाचौंध में पाठक के प्रति अपने उत्तरदायित्व से मुँह मोड़ लिया है। इसी का परिणाम है कि स्वयं के अंतर्विरोधों को भी चिन्हित करने का मूल अधिकार संपादक के पास अब नहीं रहा। साहित्यिक पत्रकारिता इस मामले में अभी तक स्वच्छंद और निर्भीक है। यही कारण है कि इस धारा की पत्रकारिता की जड़ें आज भी माखनलाल चतुर्वेदी, पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी और माधवराव सप्रे के विचारों की ज़मीन से जुड़ी है।
क्षेत्रीय भाषाओं से अंतरसंवाद जरूरीः आयोजन की अध्यक्षता करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि हमारी नई पीढ़ी के समक्ष नई चुनौतियां एवं नई समस्याएं हैं। नई तकनीक ने जिस प्रकार मानवता को जोड़ने की संभावना जगाई है वह धर्म, जाति व भौगोलिक सीमाओं से परे है। इस पीढ़ी को सौभाग्य से अत्यंत विकसित तकनीक एवं संचार प्रणाली मिली है, जिसने मार्शल मैकलुहान की ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा को सार्थक कर दिया है। परंतु इस पीढ़ी को तकनीक का उपयोग नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण सदुपयोग करना होगा, अन्यथा भविष्य में विज्ञान का चमत्कार हमारे लिए विनाश का समाचार बनकर रह जाएगा। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ अपनी राष्ट्रभाषा एवं क्षेत्रीय भाषाओं में भी अंतरसंवाद बनाए रखें। प्रो. कुठियाला ने कहा कि अब समय आ गया है कि साहित्य और पत्रकारिता दोनों को अपने आपसी मतभेदों को भुलाकर साथ मिलकर वही कार्य करना चाहिए जो दोनों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान किया था। दोनों एक ही सृजनात्मकता के दो पहलू हैं, इसलिए दोनों को देश के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होना चाहिए।
अटूट रिश्ता है साहित्य व पत्रकारिता काः इस अवसर पर कार्यक्रम के विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित हुए वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने बताया कि साहित्य और पत्रकारिता तो बहुत बाद में एक-दूसरे से अलग हुए। एक समय था जब पत्रकारिता साहित्य से अलग नहीं थी और वही हिंदी साहित्य और पत्रकारिता का स्वर्णिम काल था। जहां एक तरफ हिंदी में सरस्वती, धर्मयुग और दिनमान जैसी पत्रिकाओं से नई परंपरा का प्रारंभ हुआ, वहीं पराड़कर जी जैसे पत्रकारों ने मुद्रास्फीति, राष्ट्रपति, श्री, सर्वश्री जैसे शब्द देकर हिंदी के शब्दकोष को और पुष्ट किया। श्री श्रीधर ने कहा कि ‘जर्नलिस्ट’ के लिए हम जिस ‘पत्रकार’ शब्द का प्रयोग करते हैं, वह स्वयं माखनलाल चतुर्वेदी जी द्वारा दिया गया। साथ ही साथ हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता ने अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों को भारत के कोने-कोने तक पहुंचाया। शरतचंद्र, बंकिमचंद्र और रविन्द्रनाथ टैगोर जैसे श्रेष्ठ बांग्ला लेखकों की पहुंच हिंदी-भाषी पाठकों तक बनाने में साहित्यिक पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
उपभोक्तावादी समय का संकटः कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात साहित्यकार डॉ. विजय बहादुर सिंह ने कहा कि ‘मीडिया विमर्श’ द्वारा साहित्यिक पत्रकारिता को दिया जाने वाला यह पुरस्कार उन मूल्यों की माँग और पहचान का पुरस्कार है, जिनकी समाज को महती आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि साहित्य और पत्रकारिता में दूरी इसलिए आई है क्योंकि हम रिश्तों व मूल्यों की कद्र करने वाले समय से निकलकर उपभोगवादी समय में आ गये हैं। ‘मीडिया विमर्श’ के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने इस अवसर पर कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में डॉ. हेतु भारद्वाज जी को सम्मानित किए जाने से भारतेंदु हरिश्चंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, रघुवीर सहाय एवं धर्मवीर भारती जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों की परंपरा का सम्मान हुआ है। उन्होंने कहा कि डॉ. श्याम सुंदर व्यास, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी एवं श्री हरिनारायण जी जैसे श्रेष्ठ एवं स्तरीय साहित्यिक पत्रकारों की श्रृंखला में डॉ. हेतु भारद्वाज को यह पुरस्कार देते हुए समस्त ‘मीडिया विमर्श परिवार’ तथा वह स्वयं गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। श्री द्विवेदी ने कहा कि साहित्य एवं पत्रकारिता के बीच यदि हमारा सेतु बनने का यह प्रयास सफल रहा तो वह समझेंगे कि पत्रकारिता पर साहित्य का जो ऋण था, उसे चुकाने का प्रयास किया गया है।
इस अवसर पर साहित्यकार कैलाशचंद्र पंत, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यसचिव ए.के. विजयवर्गीय, एडवोकेट एवं लेखक जी.के. छिब्बर, पत्रकार शिवअनुराग पटैरया, दीपक तिवारी, बृजेश राजपूत, राखी झंवर, दिनकर सबनीस, नरेंद्र जैन, अमरदीप मौर्य, विवेक सारंग, डा. आरती सारंग, प्रो. आशीष जोशी, डा. पवित्र श्रीवास्तव, डा. पी. शशिकला, प्रो. अमिताभ भटनागर, राघवेंद्र सिंह, साधना सिंह, डा. मोनिका वर्मा, सुरेंद्र पाल, लालबहादुर ओझा, डा. अविनाश वाजपेयी, अभिजीत वाजपेयी, सुरेंद्र बिरवा सहित मीडिया विमर्श के संपादक डॉ. श्रीकांत सिंह, प्रकाशक श्रीमती भूमिका द्विवेदी तथा नगर के मीडिया से जुड़े शिक्षक एवं विद्यार्थी भी उपस्थित थे।
भारत भवन में गूंजा भारती बंधु का कबीर रागः पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान की यह शाम कबीर के नाम रही। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कबीर गायक भारती बंधु ने कबीर राग की ऐसी तान छेड़ी कि भारत भवन के ‘अंतरंग’ का वह समां दर्शकों के मानस पटल पर आजीवन संचित रहेगा। अपने चिर-परिचित अंदाज में भारती बंधु ने कबीर के दोहों और साखियों की ऐसी तान छेड़ी कि पूरा सभागार झूम उठा। भारती बंधु की शेरो-शायरी ने दर्शकों को कभी खूब हँसाया तो कभी सोचने के लिए मजबूर कर दिया। इस अवसर पर भारती बंधु ने युवाओं से कहा कि पाश्चात्य संगीत सुनकर भले ही आप पश्चिम के क्षणिक रंग में रंग जाएं, लेकिन अगर आपको मानसिक और आत्मिक शांति चाहिए तो भारतीय संगीत के अलावा आपके पास कोई विकल्प नहीं है। इस सत्र के मुख्यअतिथि साहित्यकार कैलाशचंद्र पंत ने कार्यक्रम के प्रारंभ में भारती बंधु और साथी कलाकारों का शाल श्रीफल से सम्मान किया और कहा कि भारती बंधु की प्रस्तुति सुनना एक विरल अनुभव है यूं लगता है जैसे कबीर स्वयं हमारे बीच उतर आए हों।
प्रस्तुतिः शालिनी एवं सुमित कुमार सिंह

Thursday, December 1, 2011

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के नाम एक पत्र



भोपाल, 1 दिसंबर, 2011। युवा पत्रकार एवं लेखक संजय द्विवेदी ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के सवाल पर कांग्रेस महासचिव श्री राहुल गांधी के नाम एक पत्र भेज कर इस अन्याय को रोकने की मांग की है। संजय ने अपने पत्र के महात्मा गांधी लिखित ‘हिंद स्वराज्य’ की प्रति भी श्री गांधी को भेजी है। अपने पत्र में संजय द्विवेदी ने केंद्र की सरकार पर जनविरोधी आचरण के अनेक आरोप लगाते हुए राहुल गांधी से आग्रह किया है कि वे इस ऐतिहासिक समय में देश की कमान संभालें अन्यथा देश के हालात और बदतर ही होंगें। अपने पत्र में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की याद दिलाते हुए संजय द्विवेदी ने साफ लिखा है कि महंगाई के सवाल पर हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के पास जादू की छड़ी नहीं हैं, किंतु अमरीका के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है कि जिसके चलते हमारी सरकार के मुखिया वही कहने और बोलने लगते हैं जो अमरीका चाहता है। क्या हमारी सरकार अमरीका की चाकरी में लगी है और उसके लिए अपने लोगों का कोई मतलब नहीं है? प्रस्तुत है इस पत्र का मूलपाठ-



प्रति,
श्री राहुल गांधी
महासचिव
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी,
12, तुगलक लेन, नयी दिल्ली-110011


आदरणीय राहुल जी,
सादर नमस्कार,
आशा है आप स्वस्थ एवं सानंद होंगें। देश के खुदरा क्षेत्र में एफडीआई की मंजूरी देने के सवाल पर देश भर में जैसी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उससे आप अवगत ही होंगे। आपकी सरकार के प्रधानमंत्री आदरणीय मनमोहन सिंह जी अपने पूरे सात साल के कार्यकाल में दूसरी बार इतनी वीरोचित मुद्रा में दिख रहे हैं। आप याद करें परमाणु करार के वक्त उनकी देहभाषा और भंगिमाओं को, कि वे सरकार गिराने की हद तक आमादा थे। उनकी यही मुद्रा इस समय दिख रही है। निश्चय ही अमरीका की भक्ति का वे कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहते। किंतु सवाल यह है कि इन सात सालों में देश में कितने संकट आए, जनता की जान जाती रही, वह चाहे आतंकवाद की शक्ल में हो या नक्सलवाद की शक्ल में, बाढ़-सूखे में हो, किसानों की आत्महत्याएं या इंसीफ्लाइटिस जैसी बीमारियों से मरते लोगों पर, हमारे प्रधानमंत्री की इतनी मुखर संवेदना कभी व्यक्त नहीं होती।
अमरीकी जादू की छड़ीः
महंगाई के सवाल पर हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के पास जादू की छड़ी नहीं हैं, किंतु अमरीका के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है कि जिसके चलते हमारी सरकार के मुखिया वही कहने और बोलने लगते हैं जो अमरीका चाहता है। क्या हमारी सरकार अमरीका की चाकरी में लगी है और उसके लिए अपने लोगों का कोई मतलब नहीं है? आखिर क्या कारण है कि जिस सवाल पर लगभग पूरा देश, देश के प्रमुख विपक्षी दल, आम लोग और कांग्रेस के सहयोगी दल भी सरकार के खिलाफ हैं, हम उस एफडीआई को स्वीकृति दिलाने के लिए कुछ भी करने पर आमादा हैं। एक दिसंबर, 2011 को भारत बंद रहा, संसद पिछले कई दिनों से ठप पड़ी है। क्या जनता के बीच पल रहे गुस्से का भी हमें अंदाजा नहीं है? क्या हम एक लोकतंत्र में रह रहे हैं ? आखिर हमारी क्या मजबूरी है कि हम अपने देशी धंधों और व्यापार को तबाह करने के लिए वालमार्ट को न्यौता दें?
वालमार्ट के कर्मचारी हैं या देश के नेताः
अगर इस विषय पर राष्ट्रीय सहमति नहीं बन पा रही है, तो पूरे देश की आकांक्षाओं को दरकिनार करते हुए हमारे प्रधानमंत्री और मंत्री गण वालमार्ट के कर्मचारियों की तरह बयान देते क्यों नजर आ रहे हैं? आप इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि आप इन दिनों गांवों में जा रहे हैं और गरीबों के हालात को जानने का प्रयास कर रहे हैं। आपको जमीनी सच्चाईयां पता हैं कि किस तरह के हालात में लोग जी रहे हैं। अर्जुनसेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट से लेकर सरकार की तमाम रिपोर्ट्स हमें बताती हैं कि असली हिंदुस्तान किस हालात में जी रहा है। 20 रूपए की रोजी पर दिन गुजार रहा 70 प्रतिशत हिंदुस्तान कैसे और किस आधार पर देश में वालमार्ट सरीखी दानवाकार कंपनियों को हिंदुस्तान की जमीन पर पैर पसारने के लिए सहमत हो सकता है?
भूले क्यों गांधी कोः
आप उस पार्टी के नेता हैं जिसकी जड़ों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के संस्कार, पं. जवाहरलाल नेहरू की प्रेरणा, आदरणीया इंदिरा गांधी जी का अप्रतिम शौर्य और आदरणीय राजीव गांधी जी संवेदनशीलता और निष्छलता है। क्या यह पार्टी जो हिंदुस्तान के लोगों को अंग्रेजी राज की गुलामी से मुक्त करवाती है,वह पुनः इस देश को एक नई गुलामी की ओर झोंकना चाहती है ? मेरा निवेदन है कि एक बार देशाटन के साथ-साथ आपको बापू (महात्मा गांधी) को थोड़ा ध्यान से पढ़ना चाहिए। बापू की किताब ‘हिंद स्वराज्य’ की प्रति मैं आपके लिए भेज रहा हूं। इस किताब में किस तरह पश्चिम की शैतानी सभ्यता से लड़ने के बीज मंत्र दिए हुए हैं, उस पर आपका ध्यान जरूर जाएगा। मैं बापू के ही शब्दों को आपको याद दिलाना चाहता हूं, वे कहते हैं-“ कारखाने की खूबी यह है कि उसे इस बात से कोई सरोकार नहीं रहता कि लोग हिंदुस्तान में या दुनिया में कहीं भूखे मर रहे हैं। उसका तो बस एक ही मकसद होता है, वह यह कि दाम उंचे बने रहें। इंसानियत का जरा भी ख्याल नहीं किया जाता।” जिस देश में किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं और नौजवान बड़ी संख्या में बेरोजगार हों, वहां इस तरह की नीतियां अपनाकर हम आखिर कैसा देश बनाना चाहते हैं?क्या इसके चलते देश में हिंसाचार और अपराध की घटनाएं नहीं बढ़ेगीं, यह एक बड़ा सवाल है।
धोखे का लोकतंत्रः
महात्मा गांधी इसीलिए हमें याद दिलाते हैं कि – “अनाज और खेती की दूसरी चीजों का भाव किसान नहीं तय किया करता। इसके अलावा कुछ चीजें ऐसी हैं, जिन पर उसका कोई बस नहीं चलता है और फिर मानसून के सहारे रहने की वजह से साल में कई महीने वह खाली भी रहता है। लेकिन इस अर्से में पेट को तो रोटी चाहिए ही।” राहुल जी क्या हमारी व्यवस्था किसानों के प्रति संवेदनशील है? हमारे कृषि मंत्री के बयानों को याद कीजिए और बताइए कि क्या हमने जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने का एक अभियान सरीखा नहीं चला रखा है। एक लोकतंत्र में होने के हमारे मायने क्या हैं? इसीलिए राष्ट्रपिता हमें याद दिलाते हैं कि “बड़े कारखानों में लोकराज्य नामुमकिन है। जो लोग चोटी पर होते हैं,वे गरीब मजदूरों पर उनके रहन-सहन के तरीकों पर –जिनकी तादाद प्रति कारखाना चार-पांच हजार तो होती ही है –एक दबाव डालते हैं और मनमानी करते हैं। ......राष्ट्रजीवन में ऐसे धंधों की एक बहुत बड़ी जगह होनी चाहिए, जिससे लोग लोकशाही की तरफ झुकें। बड़े कारखानों से राजनीतिक तानाशाही ही बढ़ेगी। नाम के लोक –राज्यवाले देश तक जैसे अमरीका, रूस वगैरह लड़ाई के दबाव में सचमुच तानाशाह बन जाते हैं। जो कोई देश भी अपनी जरूरत का सामान केंद्रीय कारखानों से तैयार करेगा, वह आखिर में जरूर तानाशाह बन जाएगा। लोकराज्य वहां केवल दिखावे का रहेगा जिससे लोग धोखे में पड़े रहें। ”

क्या हमने स्वतंत्रता की लड़ाई लोकतंत्र के लिए लड़ी थीः
सवाल यह भी है क्या हमारी आजादी की लड़ाई देश में लोकतंत्र स्थापित करने के लिए थी? जाहिर तौर पर नहीं, हमारी लड़ाई तो सुराज, स्वराज्य और आजादी के लिए थी। आजादी वह भी मुकम्मल आजादी। क्या हम ऐसा बना पाए हैं? यहां आजादी चंद खास तबकों को मिली है। जो मनचाहे तरीके से कानूनों को बनाते और तोड़ते हैं। यही कारण है कि हमें लोकतंत्र तो हासिल हो गया किंतु सुराज नहीं मिल सका। इस सुराज के इंतजार में हमारी आजादी ने छः दशकों की यात्रा पूरी कर ली किंतु सुराज के सपने निरंतर हमसे दूर जा रहे हैं।
चमकीली दुनिया के पीछे छिपा अंधेराः
सवाल यह है कि गांधी-नेहरू-सरदार पटेल-मौलाना आजाद- इंदिरा जी जैसा देश बनाना चाहते थे,क्या हम उसे बना पा रहे है ? इस नई अर्थनीति ने हमारे सामने एक चमकीली दुनिया खड़ी की है,किंतु उसके पीछे छिपा अंधेरा हम नहीं देख पा रहे हैं। आपकी चिंता के केंद्र में अगर हिंदुस्तान की तमाम ‘कलावतियां’ हैं तो आपकी पार्टी की सरकार का नेतृत्व मनमोहन सिंह जी जैसे लोग कैसे कर सकते हैं? जिनके सपनों में अमरीका बसता है। हिंदुस्तान को न जानने और जानकर भी अनजान बनने वाले नेताओं से देश घिरा हुआ है। यह चमकीली प्रगति कितने तरह के हिंदुस्तान बना रही है,आप देख रहे हैं।
संभालिए नेतृत्व राहुल जीः
आपकी संवेदना और कही जा रही बातों में अगर जरा भी सच्चाई भी है तो इस वक्त देश की कमान आपको तुरंत संभाल लेनी चाहिए। क्योंकि आप एक ऐतिहासिक दायित्व से भाग रहे हैं। मनमोहन सिंह न तो देश का, न ही कांग्रेस का स्वाभाविक नेतृत्व हैं। उनकी नियुक्ति के समय जो भी संकट रहे हों किंतु समय ने साबित किया कि यह कांग्रेस का एक आत्मघाती फैसला था। जनता के मन में चल रहे झंझावातों और हलचलों को आपको समझने की जरूरत है। देश के लोग व्यथित हैं और बड़ी आशा से आपकी तरफ देख रहे हैं। किंतु हम सब आश्चर्यचकित हैं कि क्या सरकार और पार्टी अलग-अलग दिशाओं में जा सकती है? कांग्रेस संगठन का मूल विचार अगर आम आदमी के साथ है तो मनमोहन सिंह की सरकार खास आदमियों की मिजाजपुर्सी में क्यों लगी है? महंगाई और भ्रष्टाचार के सवालों पर सरकार बगलें क्यों झांक रही है ? क्या कारण है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे अहिंसक प्रतिरोधों को भी कुचला जा रहा है ? क्या कारण है आपकी तमाम इच्छाओं के बावजूद भूमि अधिग्रहण का बिल इस सत्र में नहीं लाया जा सका ? क्या आपको नहीं लगता कि यह सारा कुछ कांग्रेस नाम के संगठन को जनता की नजरों में गिरा रहा है। कांग्रेस पार्टी को अपने अतीत से सबक लेते हुए गांधी के मंत्र को समझना होगा। बापू ने कहा था कि जब भी आप कोई काम करें,यह जरूर देखें कि इसका आखिरी आदमी पर क्या असर होगा।
सादर आपका

( संजय द्विवेदी)
40, शुभालय विहार, ई-8 एक्सटेंशन, बावड़ियाकलां, भोपाल-402039 (मध्यप्रदेश)