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Friday, June 17, 2011

क्या रंग लाएगा शिष्टाचार का भ्रष्टाचार से संघर्ष


-प्रो. बृजकिशोर कुठियाला

भ्रष्टाचार के विरोध में उठी जनमानस की आवाज को जिस प्रकार से वर्तमान राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था ने कुचला है वह अप्रत्यक्षित था। अन्ना हजारे देश के विशिष्ठ और नगरीय जनता की आवाज को लेकर उठे। उनके साथ कुछ और भी प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सहयोग किया। कुटिलता से सरकार ने अन्ना हजारे की टीम को लुभाया और आन्दोलन टाय-टाय फिस हो गया। वार्ता के चक्रों में फंसाकर कुछ राजनेताओं ने तो स्थापित प्रतिष्ठा वाले अन्ना हजारे की छवि को भी धूमिल करने का प्रयास किया।
बाबा रामदेव की आवाज में निम्न मध्यवर्ग और ग्रामीण जनता की पीड़ा और विरोध शामिल था। भ्रष्टाचार की व्यापकता और उसकी विराटता से आम आदमी न केवल क्षुब्ध है बल्कि कुछ कर गुजरने की इच्छा भी रखता है। श्रीमती गांधी ने भी जयप्रकाश के नेतृत्व में युवा आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया था। जिसके कारण से भारत के प्रजातन्त्र के स्वर्णिम इतिहास में 19 महीने का एक काला अध्याय जुड़ा।
कुटिल परन्तु सफल प्रयास यह भी हुआ कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आन्दोलन एक- दूसरे के सहयोगी नहीं बन पाये। दोनों ही व्यक्ति राजनीति के गठजोड़ के दांवपेच के खिलाड़ी नहीं है। परन्तु दूसरे पाले में ऐसे ही लोग सक्रिय और मुखर हैं जिनका राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन झूठ, धोखे और ईर्ष्या का उदाहरण है। भ्रष्टाचार को रोकने, अपनी सम्पत्ति को देश में वापस लाने और सड़ी हुई व्यवस्था को बदलने के लिये आन्दोलन तो उठेंगे ही परन्तु इनका सूत्रपात राजनीति नहीं करेगी, क्योंकि जो व्यक्ति उस शाखा को काटता है जिस पर वह स्वयं बैठा है उसे शेखचिल्ली कहा गया है। हमारे राजनीतिक कार्यकर्ता सब कुछ हो सकते है, परन्तु वह मूर्ख नहीं है। इसलिये व्यवस्था परिवर्तन का कार्य तो नागरिक समाज को ही करना होगा।
नागरिक समाज के समक्ष भी प्रश्न रणनीति का उठना चाहिए। भ्रष्ट व्यवस्था को समाप्त करने का आन्दोलन तर्क संगत है परन्तु क्या नागरिक समाज विकल्प प्रस्तुत करने की स्थिति में है ? भ्रष्टाचार का सबसे परिचय है परन्तु इसके स्थान पर जिस शिष्टाचार को लाना चाहते है उसकी रचना और कल्पना हमारे पास नहीं है। आम आदमी को यह समझ में नहीं आता कि भ्रष्ट व्यवस्था द्वारा स्थापित लोकपाल की संस्था भ्रष्टाचार को कैसे समाप्त कर सकती है। केन्द्र में और राज्य सरकारों में विजिलेन्स आयोग और आर्थिक अपराधों से निपटने के लिये अनेक संस्थाएं है, वे कितनी कारगर हैं यह प्रश्न हर आन्दोलनकारी के मन में है। बाबा रामदेव भी व्यवस्था में परिवर्तन की बात तो करते हैं परन्तु नई व्यवस्था की आसानी से समझ में आने वाली परिकल्पना या मॉडल उनके पास नहीं है।
आज भारतीय समाज तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है पहला भाग संख्या में छोटा परन्तु बहुत अधिक प्रभावी है जो न केवल भ्रष्ट है परन्तु बेईमानी और अपराध से ही विकास करने की प्रक्रिया पर उसे पूरा विश्वास है। दुर्भाग्य से समाज का अत्यन्त सूक्ष्म यह भाग ही देश को चलाता है।
एक बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो भ्रष्ट तो नहीं है परन्तु शिष्टाचारी भी नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर वे भ्रष्ट व्यवस्था के साथ भी हो लेते हैं और मन ही मन उसका विरोध भी करते हैं। लाइसेन्स जल्दी बने इसके लिये रिश्वत दे देते है, टैफिक का चालान हो तो चालान की जगह रिश्वत दे कर बचने में उन्हे कोई बुराई नहीं लगती। परीक्षा में अध्यापक को सिफारिश करना उन्हें उचित लगता है और बिजली की चोरी करना वह अपना अधिकार मानते है। कहा जाये तो यह वर्ग भ्रष्ट नहीं है परन्तु शिष्टाचारी भी नहीं है। इस समूह को हम छद्म शिष्टाचारी की संज्ञा दे सकते है।
आशा की किरण इस भयानक काली रात में यह दिखाती है कि भारतीय जनता का एक वर्ग न केवल भ्रष्टाचार के विरोध में मुखर है परन्तु अपने व्यवहार से वह शिष्टाचारी भी है। सूचना प्रौद्योगिकी की बड़ी संस्था के प्रमुख की यह छवि है कि उन्होंने अपने संस्था को आज अन्तरराष्ट्रीय स्तर का बनाया है और उन्होंने कभी भी कानून को नहीं तोड़ा है रिश्वत नहीं दी है और ‘गुड प्रेक्टिसेस’ अर्थात् आदर्श व्यवहार का पालन किया है। आज का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग अधिकतर शिष्टाचारी है उसे अपने सामने ऐसे अवसर दिखते है जिनमें वह आदर्श सामाजिक व्यवस्था में रहते हुए भी वह आगे बढ़ सकता है। आगे बढ़ने के लिये वह पीछे के द्वार, ’लाइन जम्पिंग’ और विशिष्ट देखभाल के शाटर्कट्स वह नहीं लेता। यह वर्ग देश और समाज के भविष्य के लिये चिंतित दिखता है और भ्रष्टाचार को निपटाने के लिये न केवल प्रयास परन्तु त्याग करने के लिये भी तत्पर है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के हाल ही में हुए आयोजनों से यह बात स्पष्ट होती है कि जब देश का शिष्टाचारी वर्ग आन्दोलित होगा तो छद्म शिष्टाचारियों का बड़ा हिस्सा उनके साथ आयेगा क्योंकि इन छद्म शिष्टाचारियों के मन में भी भ्रष्टाचार और अनाचार के प्रति विपरीत भाव है वे समाज की आदर्श व्यवस्थाओं और नैतिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं परन्तु उनका पालन करने का साहस नहीं कर पाते। मौका मिलने पर और विश्वसनीय नेतृत्व द्वारा प्रोत्साहित करने पर वे शिष्टाचार के संरक्षक बनकर ऊभर सकते है।
देश में अनेक अन्ना हजारे और बाबा रामदेव हैं। अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन ऐसे है जो केवल मात्र शिष्टाचार का ही संस्कार देते हैं। ऐसे संगठनों का प्रभाव भारतीय जीवन के हर पहलू पर पड़ रहा है। एक बड़ा कारण यह भी है कि भारत के नागरिक को सत्य, अहिंसा और नैतिकता का पाठ हजारों वर्षों से विरासत में मिला है। इसलिये भारत में ईमानदारी को श्रेष्ठ नीति नहीं माना गया है (ओनेस्टी इज द बेस्ट पॉलिसी) परन्तु एक अनपढ़ ग्रामीण भारतीय को भी बचपन से ही बताया जाता है कि धर्म का पालन अनिवार्य है और धर्म के पालन के लिए सत्य का आचरण अनिवार्य है। जैसा कि 1974-75 में हुआ था एक बार फिर देश में छोटे-छोटे आन्दोलन उठेंगे और मिलकर एक विराट आन्दोलन बनेगा जो अभारतीय और अव्यवहारिक व्यवस्था को परिवर्तित करेगा। आवश्यकता वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था के रखवालों से बेहतर रणनीति बनाने की है। इसके लिये अनेक हजारे और अनेक रामदेव मिलकर प्रयास करेंगे। शिष्टाचारी समाज के हर सज्जन व्यक्ति को अन्ना और बाबा बनना पड़ेगा।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं)

Tuesday, November 16, 2010

शब्द-बाणों का राजनैतिक संग्राम




प्रो. बृज किशोर कुठियाला
कुलपति
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता,
एवं संचार विश्वविद्यालय,

भोपाल,16 नवंबर,2010


शब्द तो ब्रह्म ही है, परन्तु कुछ लोग शब्दों को भ्रम बना लेते हैं। हमारे देश के एक प्रतिष्ठित राजनेता ने पिछले दिनों एक अन्य उभरते हुए राजनेता को गंगा में फेंक देने की घोषणा की। वैसे तो भारतीय संस्कृति में गंगा मोक्ष का द्वार है और गंगा की शरण में जो भेजे उसे शुभचिंतक ही मानना चाहिए। परन्तु जिस संदर्भ में यह वाक्य कहा गया उसके आगे व पीछे नकारात्मकता ही थी, इसलिए गंगा में फेंक देने का अर्थ यह लगाया गया कि श्री राहुल गांधी को राजनीति से विदाई दे देनी चाहिए। सार्वजनिक संवाद में इस तरह की घोषणाएं उचित हैं या अनुचित यह तो श्रोता, पाठक व दर्शक स्वयं तय करेंगे। परन्तु विरोधियों के बीच में संवाद की मर्यादाएं तो राजनीतिज्ञ ही तय करेंगे।
कश्मीर के विषय पर एक सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता का बयान आजकल आम चर्चा का विषय है। लगभग पूरा का पूरा सामाजिक संवाद बयान के विरोध में है। परन्तु उसी सभा में लेखिका ने अपने देश की जो व्याख्या की वह भी भ्रमित मस्तिष्क की द्योतक है। लेखिका ने अपने देश को ‘भूखे नंगों का देश’ कहा। एक अर्द्ध सदी से पूर्व भारत की ऐसी व्याख्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित थी। उस दौर में फ़िल्मकार पैसा फेंकते और जब ग़रीब उस पैसे को उठाने के लिये छीना झपटी करते थे तो उसकी फ़िल्म बनाकर देश विदेश में भारत की छवि का निर्माण करते थे, पर आज ऐसा नहीं है। भारतीय अर्थशास्त्रियों और कूटनीतिज्ञों से अधिक विदेशी विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में जो पिछले 60 वर्षों में विकास किया है, वह अद्वितीय है, क्योंकि यह विकास प्रजातंत्र के वातावरण में हुआ है।
आज भारत के करोड़ों युवक-युवतियाँ पूरे विश्व में अनेक तरह के तकनीकी व सृजनात्मक कार्यों में लगे हैं। आम समृद्धि बढ़ी है, देश में नवसृजन का वातावरण चारों ओर है। कुछ भूख और नंगापन भी है, परन्तु हमारी दृष्टि कहाँ है ? क्या विकास की सकारात्मकता को प्रसारित करके सुख और प्रेरणा का वातावरण बनाना है या निर्धनता को असफलताओं के भ्रम के रूप में प्रस्तुत करना है। लेखिका में कहीं न कहीं दृष्टि-दोष है। पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों पर फौजी अत्याचार और मानवाधिकारों का उल्लंघन उन्हें नहीं दिखता है और शहीद सैनिकों के शव उन्हें कुछ ही जातियों के दिखते हैं। वे चश्मा भी पहनती है, परन्तु खोजी पत्रकारिता का विषय यह होना चाहिए कि उनका चश्मा कहाँ बना है ? और उसके लैंस किस रंग के हैं ? उनका बचपन कैसा था ? और किस प्रकार से उन्हें ‘बुकर सम्मान’ मिला। यह भी सामान्य जन को पता लगाना चाहिए।
शब्दों का ब्रह्म होना या भ्रम होना, बोलने व सुनने वालों पर तो निर्भर है ही परन्तु संदर्भ भी महत्वपूर्ण होता है। भारत के एकमात्र फ़ील्ड मार्शल ज. मानेक शा ने पाकिस्तानी सेना के लिए अँगरेज़ी के शब्द ‘बैन्डीक्यूट्स’ का प्रयोग किया था। उनसे पाकिस्तान सेना की बढ़ती हुई संख्या के बारे में पूछा गया था। यह शब्द अधिक प्रचलित नहीं है और अधिकतर लोगों ने इसे शब्द कोष में देखा। ‘बैन्डीक्यूट्स’ वो जंगली चूहे हैं जो खेतों में पाये जाते हैं। शब्द ने ब्रह्म होने को सिद्ध किया और भ्रम की कोई गुंज़ाइश नहीं है। इसी तरह से लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ की घोषणा करके सारे देश को एक माला में पिरो दिया था। श्रीमती इंदिरा गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा देकर राष्ट्र के सम्मुख एक केन्द्रित उद्देश्य रखा था और कई वर्षों तक योजना बनाकर इस लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास हुआ। परन्तु राजनीति के ही कुछ खिलाड़ियों ने ग़रीबी शब्द से आखरी ‘ई’ की मात्रा हटाकर शब्दों का भ्रम पैदा कर दिया।
हिटलर ने शब्द जाल बिछाकर ही उस समय की जर्मन जनता को इतना भ्रमित कर दिया था कि उन्हें हिटलर ही ब्रह्म है का भ्रम हो गया। उनके जनसम्पर्क मंत्री गोयबल्स तो शब्दों के भ्रम के विशेषज्ञ थे। बार-बार असत्य बोलने से भ्रम भी सत्य के रूप में स्थापित हो जाता है के सिद्धांत का उन्होंने बख़ूबी प्रयोग किया। आज भी इस सिद्धांत के प्रयोग के कई उदाहरण सामने आते हैं। गांधी की हत्या में एक विशेष संस्था का हाथ नहीं है, यह कई बार न्यायालयों में सिद्ध हो चुका है, परन्तु राजनीति के खेल में इस असत्य को भी कई बार दायित्ववान राजनीतिज्ञ प्रयोग करते रहे हैं। हमारी दृष्टि का रंग कोई भी हो परन्तु भगवा रंग को आंतकवाद से जोड़ना भी एक भ्रम जाल बुनने का ही प्रयास लगता है।
ऐसा नहीं है कि शब्दों का दुरूपयोग हर बार जानबूझकर ही होता हो, हाल ही में एक भारतीय उदघोषक ने अल्पज्ञानी होने के कारण अफ्रीका के एक देश के विषय में अपमानजनक टिप्पणी कर दी। परन्तु समय रहते उसने अपनी ग़लती को माना और देश के प्रतिष्ठित व्यक्ति को क्षमा मांगनी पड़ी। आस्ट्रेलिया के एक टेलीविजन उद्घोषक ने भारतीय खिलाड़ी के बारे में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया और उसे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। एक भूतपूर्व मंत्री ने तो राष्ट्रमण्डल खेलों के असफल होने की कामना सार्वजनिक रूप से कर डाली। वह महानुभाव आज अपने ही शब्दों के घाव सहला रहे हैं।
आधुनिक मानव समाज में तो शब्दों का अंतरताना हर समय अधिक से अधिक गहन हो रहा है। पूरा का पूरा मीडिया शब्दों का ही खेल है। चित्र होने के बावजूद भी शब्दों के बिना संचार व संवाद की स्थिति नहीं बनती। छोटे समूहों में सार्वजनिक वार्ता भी मीडिया के द्वारा विश्वव्यापी हो जाती है और एक शब्द का बाण अनेकों घाव करता है। शब्द मरहम का भी काम करते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शब्दों ने बालक नरेन्द्र के उद्वेलित मन को शान्त किया और विवेकानन्द का जन्म हुआ। डॉक्टर व वैद्य के आशावादी शब्द ‘दवाई’ से अधिक प्रभावकारी हो जाते हैं। बुद्धिशील व्यक्ति शब्दों के द्वारा समाज में सुख, सहयोग और समरसता सजाता है और यदि बुद्धि कम हुई या भ्रमित हुई तो अपने ही साथी को गंगा में फेंकने का विचार आता है और अपना ही देश भूखा नंगा नजर आता है।
किसी भी समाज में शब्दों को तीखे चुभते और विध्वंशकारी बाणों के रूप में प्रयोग करने वाले लोग तो रहेंगे ही, परन्तु क्या इन शब्द बाणों को प्रचालित व प्रसारित कर उनकी घाव बनाने की क्षमता को कई गुणा वृद्धि करने का प्रयास मीडिया को करना चाहिए ? कहीं न कहीं मीडिया को समाज का ध्यान तो रखना ही पडेगा कि वह अधिक भ्रमित व्यक्तियों द्वारा प्रसारित जहरीले शब्दों को सम्पादित करे या उनका वितरण करे?

Saturday, June 12, 2010

आप वहां क्या कर रही हैं अरूंधती ?


-संजय द्विवेदी
मुझे पता था वे अपनी बात से मुकर जाएंगी। बीते 2 जून, 2010 को मुंबई में महान लेखिका अरूंधती राय ने जो कुछ कहा उससे वे मुकर गयी हैं। एक प्रमुख अखबार के 12 जून, 2010 के अंक में छपे अपने लेख में अरूधंती ने अपने कहे की नई व्याख्या दी है और ठीकरा मीडिया पर फोड़ दिया है। मीडिया के इस काम को उन्होंने खबरों का ग्रीनहंट नाम दिया है। जाहिर तौर पर अरूंधती को जो करना था वे कर चुकी हैं। वे एक हिंसक अभियान से जुड़े लोगों को संदेश दे चुकी हैं। 2 जून के वक्तव्य की 12 जून को सफाई देना यानि चीजें अपना काम कर चुकी हैं। अरूधंती भी अपने लक्ष्य पा चुकी हैं। पहला लक्ष्य था वह प्रचार जो गुनहगारों के पक्ष में वातावरण बनाता है, दूसरा लक्ष्य खुद को चर्चा में लाना और तीसरा लक्ष्य एक भ्रम का निर्माण।
यह सही मायने में मीडिया का ऐसा इस्तेमाल है जिसे राजनेता और प्रोपेगेंडा की राजनीति करने वाले अक्सर इस्तेमाल करते हैं। आप जो कहें उसे उसी रूप में छापना और दिखाना मीडिया की जिम्मेदारी है किंतु कुछ दिन बाद जब आप अपने कहे की अनोखी व्याख्याएं करते हैं तो मीडिया क्या कर सकता है। अरूंधती राय एक महान लेखिका हैं उनके पास शब्दजाल हैं। हर कहे गए वाक्य की नितांत उलझी हुयी व्याख्याएं हैं। जैसे 76 सीआरपीएफ जवानों की मौत पर वे “दंतेवाड़ा के लोगों को सलाम” भेजती हैं। आखिर यह सलाम किसके लिए है मारने वालों के लिए या मरनेवालों के लिए। अब अरूधंती ने अपने ताजा लेख में लिखा हैः “मैंने साफ कर दिया था कि सीआरपीएफ के जवानों की मौत को मैं एक त्रासदी के रूप में देखती हूं और मैं मानती हूं कि वे गरीबों के खिलाफ अमीरों की लड़ाई में सिर्फ मोहरा हैं। मैंने मुंबई की बैठक में कहा था कि जैसे-जैसे यह संघर्ष आगे बढ़ रहा है, दोनों ओर से की जाने वाली हिंसा से कोई भी नैतिक संदेश निकालना असंभव सा हो गया है। मैंने साफ कर दिया था कि मैं वहां न तो सरकार और न ही माओवादियों द्वारा निर्दोष लोगों की हत्या का बचाव करने के लिए आई हूं।”
नक्सली हिंसा, हिंसा न भवतिः
ऐसी बौद्धिक चालाकियां किसी हिंसक अभियान के लिए कैसी मददगार होती हैं। इसे वे बेहतर समझते हैं जो शब्दों से खेलते हैं। आज पूरे देश में इन्हीं तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ऐसा भ्रम पैदा किया है कि जैसे नक्सली कोई महान काम कर रहे हों। ये तो वैसे ही है जैसे नक्सली हिंसा हिंसा न भवति। कभी हमारे देश में कहा जाता था वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। सरकार ने एसपीओ बनाए, उन्हें हथियार दिए इसके खिलाफ गले फाड़े गए, लेख लिखे गए। कहा गया सरकार सीधे-साधे आदिवासियों का सैन्यीकरण कर रही। यही काम नक्सली कर रहे हैं, वे बच्चों के हाथ में हथियार दे रहे तो यही तर्क कहां चला जाता है। अरूंधती राय के आउटलुक में छपे लेख को पढ़िए और बताइए कि वे किसके साथ हैं। वे किसे गुमराह कर रही हैं।

अभिव्यक्ति के खतरे तो उठाइएः
अब वे अपने बयान से उठ सकने वाले संकटों से आशंकित हैं। उन्हें अज्ञात भय ने सता रखा वे लिखती है-“क्या यह ऑपरेशन ग्रीनहंट का शहरी अवतार है, जिसमें भारत की प्रमुख समाचार एजेंसी उन लोगों के खिलाफ मामले बनाने में सरकार की मदद करती है जिनके खिलाफ कोई सबूत नहीं होते? क्या वह हमारे जैसे कुछ लोगों को वहशी भीड़ के सुपुर्द कर देना चाहती है, ताकि हमें मारने या गिरफ्तार करने का कलंक सरकार के सिर पर न आए। या फिर यह समाज में ध्रुवीकरण पैदा करने की साजिश है कि यदि आप ‘हमारे’ साथ नहीं हैं, तो माओवादी हैं। ” आखिर अरूंधती यह करूणा भरे बयान क्यों जारी कर रही हैं। उन्हें किससे खतरा है। मुक्तिबोध ने भी लिखा है अभिव्यक्ति के खतरे तो उठाने ही होंगें। महान लेखिका अगर सच लिख और कह रही हैं तो उन्हें भयभीत होने की जरूरत नहीं हैं। नक्सलवाद के खिलाफ लिख रहे लोगों को भी यह खतरा हो सकता है। सो खतरे तो दोनों ओर से हैं। नक्सलवाद के खिलाफ लड़ रहे लोग अपनी जान गवां रहे हैं, खतरा उन्हें ज्यादा है। भारतीय सरकार जिनके हाथ अफजल गुरू और कसाब को भी फांसी देते हुए कांप रहे हैं वो अरूंधती राय या उनके समविचारी लोगों का क्या दमन करेंगी। हाल यह है कि नक्सलवाद के दमन के नाम पर आम आदिवासी तो जेल भेज दिया जाता है पर असली नक्सली को दबोचने की हिम्मत हममें कहां है। इसलिए अगर आप दिल से माओवादी हैं तो निश्चिंत रहिए आप पर कोई हाथ डालने की हिम्मत कहां करेगा। हमारी अब तक की अर्जित व्यवस्था में निर्दोष ही शिकार होते रहे हैं।
अरूंधती इसी लेख में लिख रही हैं- “26 जून को आपातकाल की 35वीं सालगिरह है। भारत के लोगों को शायद अब यह घोषणा कर ही देनी चाहिए कि देश आपातकाल की स्थिति में है (क्योंकि सरकार तो ऐसा करने से रही)। इस बार सेंसरशिप ही इकलौती दिक्कत नहीं है। खबरों का लिखा जाना उससे कहीं ज्यादा गंभीर समस्या है।” क्या भारत मे वास्तव में आपातकाल है, यदि आपातकाल के हालात हैं तो क्या अरूंधती राय आउटलुक जैसी महत्वपूर्ण पत्रिका में अपने इतने महान विचार लिखने के बाद मुंबई में हिंसा का समर्थन और गांधीवाद को खारिज कर पातीं। मीडिया को निशाना बनाना एक आसान शौक है क्योंकि मीडिया भी इस खेल में शामिल है। यह जाने बिना कि किस विचार को प्रकाशित करना, किसे नहीं, मीडिया उसे स्थान दे रहा है। यह लोकतंत्र का ही सौंदर्य है कि आप लोकतंत्र विरोधी अभियान भी इस व्यवस्था में चला सकते हैं। नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखते हुए नक्सली आंदोलन के महान जनयुद्ध पर पन्ने काले कर सकते हैं। मीडिया का विवेकहीनता और प्रचारप्रियता का इस्तेमाल करके ही अरूंधती राय जैसे लोग नायक बने हैं अब वही मीडिया उन्हें बुरा लग रहा है। अपने कहे पर संयम न हो तो मीडिया का इस्तेमाल करना सीखना चाहिए।
कारपोरेट की लेवी पर पलता नक्सलवादः
अरूंधती कह रही हैं कि “ मैंने कहा था कि जमीन की कॉरपोरेट लूट के खिलाफ लोगों का संघर्ष कई विचारधाराओं से संचालित आंदोलनों से बना है, जिनमें माओवादी सबसे ज्यादा मिलिटेंट हैं। मैंने कहा था कि सरकार हर किस्म के प्रतिरोध आंदोलन को, हर आंदोलनकारी को ‘माओवादी’ करार दे रही है ताकि उनसे दमनकारी तरीकों से निपटने को वैधता मिल सके।” अरूंधती के मुताबिक माओवादी कारपोरेट लूट के खिलाफ काम कर रहे हैं। अरूंधती जी पता कीजिए नक्सली कारपोरेट लाबी की लेवी पर ही गुजर-बसर कर रहे हैं। नक्सल इलाकों में आप अक्सर जाती हैं पर माओवादियों से ही मिलती हैं कभी वहां काम करने वाले तेंदुपत्ता ठेकेदारों, व्यापारियों, सड़क निर्माण से जुड़े ठेकेदारों, नेताओं और अधिकारियों से मिलिए- वे सब नक्सलियों को लेवी देते हुए चाहे जितना भी खाओ स्वाद से पचाओ के मंत्र पर काम कर रहे हैं। आदिवासियों के नाम पर लड़ी जा रही इस जंग में वे केवल मोहरा हैं। आप जैसे महान लेखकों की संवेदनाएं जाने कहां गुम हो जाती हैं जब ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पर लाल आतंक के चलते सैकड़ों परिवार तबाह हो जाते हैं। राज्य की हिंसा का मंत्रजाप छोड़कर अपने मिलिंटेंट साथियो को समझाइए कि वे कुछ ऐसे काम भी करें जिससे जनता को राहत मिले। स्कूल में टीचर को पढ़ाने के लिए विवश करें न कि उसे दो हजार की लेवी लेकर मौज के लिए छोड़ दें। राशन दुकान की मानिटरिंग करें कि छत्तीसगढ में पहले पचीस पैसे किलो में अब फ्री में मिलने वाला नमक आदिवासियों को मिल रहा है या नहीं। वे इस बात की मानिटरिंग करें कि एक रूपए में मिलने वाला उनका चावल उन्हें मिल रहा है या उसे व्यापारी ब्लैक में बेच खा रहे हैं। किंतु वे ऐसा क्यों करेंगें। आदिवासियों के वास्तविक शोषक, लेवी देकर आज नक्सलियों की गोद में बैठ गए हैं। इसलिए तेंदुपत्ता का व्यापारी, नेता, अफसर, ठेकेदार सब नक्सलियों के वर्गशत्रु कहां रहे। जंगल में मंगल हो गया है। ये इलाके लूट के इलाके हैं। आप इस बात का भी अध्ययन करें नक्सलियों के आने के बाद आदिवासी कितना खुशहाल या बदहाल हुआ है। आप नक्सलियों के शिविरों पर मुग्ध हैं, कभी सलवा जुडूम के शिविरों में भी जाइए। आपकी बात सुनी,बताई और छापी जाएगी। क्योंकि आप एक सेलिब्रिटी हैं। मीडिया आपके पीछे भागता है। पर इन इलाकों में जाते समय किसी खास रंग का चश्मा पहन कर न जाएं। खुले दिल से, मुक्त मन से, उसी आदिवासी की तरह निर्दोष बनकर जाइएगा जो इस जंग में हर तरफ से पिट रहा है। सरकारें परम पवित्र नहीं होतीं। किंतु लोकतंत्र के खिलाफ अगर कोई जंग चल रही है तो आप उसके साथ कैसे हो सकते हैं। जो हमारे संविधान, लोकतंत्र को खारिज तक 2050 तक माओ का राज लाना चाहते हैं आप उनके साथ क्यों और कैसे खड़ी हैं अरूंधती। एक संवेदनशील लेखिका होने के नाते इतना तो आपको पता होगा साम्यवादी या माओवादी शासन में पहला शिकार कलम ही होती है। फिर आप वहां क्या रही हैं अरूंधती?

Thursday, April 1, 2010

इस पौरूषपूर्ण समय में


साधारण नहीं है स्त्री को समान अधिकार देने का संघर्ष
-संजय द्विवेदी
नारे हों या प्रतीक, राजनीति उन्हें इस्तेमाल कर निस्तेज होते ही कूड़ेदान में फेंक देती है। ‘राजनीति’ में ‘स्त्री’ का नारा भगवान करे वैसे ही गति को प्राप्त न हो। नारे उजास जगाते हैं, रोशनी की किरण बन जाते हैं लेकिन इस पौरुषपूर्ण समय में वे बलशाली, आक्रामक और हठी लोगों के बंधक बनकर रह जाते हैं।यह देखना कितना विचित्र है कि एक व्यक्ति जो एक घोटाले के आरोप में जेल जाते समय अपनी पत्नी को ‘मुख्यमंत्री’ की कुर्सी पर बिठा जाता है, लेकिन लोकसभा में वह महिला आरक्षण विधेयक के खिलाफ सबसे ज्यादा गला फाड़ता है।
जब स्व. फूलनदेवी को ‘अन्याय का प्रतिकार करने वाली स्त्री’ बताकर राजनीति में लाने वाले मुलायम सिंह यादव भी आरक्षण विधेयक पर अपनी शैली में लाठियां भांजते नजर आते हैं तो बात सिर्फ प्रतीकों से आगे जाती नहीं दिखती-संकट का असल कारण यही है। अधिकार और दुलार उतना ही, जितना पुरुष तय करे या पुरुषवादी तय करें। शायद इसीलिए बहुत पहले श्रीमती इंदिरा गांधी को सिरमाथे बिठाने के बावजूद हम स्त्री के लिए राजनीति को सुरक्षित और अनुकूल क्षेत्र नहीं बना पाए। इंदिरा गांधी हमारे लिए दरअसल एक स्त्री की सफलता का, उसकी जद्दोजहद का प्रतीक नहीं बन पाई । हमने उन्हें विशिष्ट परिवार से आने के कारण, खास दैवी शक्तियों से युक्त मान लिया। जबकि ऐसा मूल्यांकन स्वयं इंदिराजी और देश की महान स्त्रियों का अपमान है।
इस देश की स्त्री के लिए तंग होता दरवाजा इसे और अराजक बनाता गया। आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी ने जिस स्त्री में देशभक्ति,समाज सुधार का जुनून फूंका था, जिसके चलते वह आगे बढ़कर आजादी के आंदोलन का हिस्सा बनी रही, आजादी मिलते ही वापस अपनी काराओं और कठघरों में कैद हो गई। सरोजनी नायडू, सुचेता कृपलानी, विजयलक्ष्मी पंडित, प्रकाशवती पाल, उषा मेंहता, निर्मला देशपांडे, तारकेश्वरी सिन्हा, कैप्टन लक्ष्मी सहगल आदि अनेक नाम थे, जिन्होंने अपना सार्थक योगदान देकर स्त्री की सामर्थ्य को साबित किया। लंबे समय तक पसरे शून्य के बाद पंचायती राय की कल्पना के क्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के मन में स्त्री को उचित प्रतिनिधित्व देने का का विचार आया । यह ताजा महिला आरक्षण विधेयक उसी कल्पना के महल पर खड़ा है। देखते ही देखते स्थानीय सरकारों (नगरपालिका, पंचायतों) का चेहरा बदल गया। बड़ी संख्या में औरतों ने घर से निकलकर लोक प्रशासन की कमान संभाली। इस प्रक्रिया में ‘प्रधान पति’ और ‘सभासद पति’ जैसे अघोषित पद जरूर अस्तित्व में आ गए। परिवारवाद के पसरने की बातें शुरू हुई। लेकिन यह सब बदलाव के एक ही चित्र को देखना है। जब इन पदों पर पुरुष बैठते थे तो भी लाचारियां सामने थीं। यदि पुरुष अहंकार से उपजे मानस की टिप्पणी यह है कि ‘अगर महिलाओं का दखल बढ़ा तो सब कुछ गड़बड़ हो जाएगा’ तो यह भी देखना होगा कि 50-52 सालों में भारत के लोकतंत्र को पुरुषों ने कितना उपयोगी, जनधर्मी और भ्रष्टाचार मुक्त बनाया है ? आज राजनीति का जो ‘काजल की कोठरी’ वाला स्वरूप है, क्या उसकी जिम्मेदारी पुरुष लेना चाहेंगे ? क्या सरकारी प्रशासन में घटती संवेदनहीनता, भ्रष्टाचार और नकारेपन के साथ लगभग ध्वस्त हो चुके मूलभूत ढांचे का श्रेय वे लेना चाहेंगे ? जाहिर है कि ऐसे आरोप मामले को अतिसरलीकृत करके देखने का प्रयास ही कहे जाएंगे । इनसे हटकर शिक्षा, आर्थिक समृद्धि और सत्ता में भागीदारी जैसे तीन मंत्रों से ही स्त्री मजबूत और अपने अधिकारों के प्रति सजग होगी। आज असली सवाल स्त्री को पुरुष बनाने का नहीं, बल्कि उसे पुरुषों के समान अधिकार देने का है। आरक्षण भी इस दिशा में सिर्फ एक कदम है, समस्या का संपूर्ण निदान नहीं है। सही मानस बनाकर स्त्री के शक्तिकरण के प्रयास न हुए तो यह भी चंद स्त्रियों के विकास और सत्ता के गलियारों में उनकी हिस्सेदारी का उपक्रम बनकर रह जाएगा। समग्र समाज को साथ लेकर प्रतीकात्मक कार्यवाइयों को आंदोलन व बदलाव की बुनियाद तक ले जाने का जज्बा न होगा तो ऐसी कार्रवाइयां कोई मतलब नहीं रखतीं, क्योंकि इस्तेमाल होने से बचने के लिए न्यूजतम शक्तियां ही स्त्री के पास हैं। आरक्षण मिलने पर भी मेधा पाटकर, महाश्वेता देवी या जमीनी संघर्ष कर रही ऐसी महिलाओं को भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र संसद में लाएगा, इसकी उम्मीद न पालिए। टिकटों के बंटवारे की कुंजी तब भी आमतौर पर पुरुषों के हाथ में ही होगी। 33 प्रतिशत आरक्षण की मजबूरी में वे ‘भाभी-बहुओं’ और ‘मित्रों’ को टिकट जरूर देंगे, ताकि ‘इनके’ जरिए ‘उनका’ शासन चलता रहे। आप ध्यान दें कई बार लोकसभा चुनावों में दागी राजनेताओं का पत्ता कटने पर जिस तरह उनकी बीबियों को मैदान में उतारा गया और ‘दाग’ मिटते ही वे बीबियों को इस्तीफा दिलाकर वापस संसद में लौटने को जिस तरह बेताब हो गए वह इसी मानसिकता का एक उदाहरण है। बिहार में राबड़ी देवी इसका सबसे जीवंत प्रतीक हैं। ऐसे समय में बदलती दुनिया और अवसरों के परिप्रेक्ष्य में औरत के लिए अपनी जगह बनाना बहुत आसान नहीं है।
समाज जीवन के तमाम क्षेत्रों में वे बेहतर काम कर रही हैं, किंतु राजनीति का मंच इतना साधारण नहीं है। इस मंच पर जगह पाने की भूख स्त्री में जिस परिमाण में बढ़ी है, समाज और पुरुष में उस रफ्तार से बदलाव नहीं आया है।
नई बाजारवादी व्यवस्था ने औरत की बोली लगानी शुरू की है, उसके भाव बढ़े हैं। सौंदर्य के बाजार कदम-कदम पर सज गए हैं, लेकिन बाजार का यह आमंत्रण, सत्ता के आमंत्रण जैसा नहीं है। दोनों जगहों पर उसकी चुनौतियां अलग हैं। सौंदर्य के बाजार में स्त्री विरोधी परंपराएं और नाजुकता रूप बदलकर बिक रही है, लेकिन सत्ता के मंच पर स्त्री का आमंत्रण उनके दायित्वबोध, नेतृत्वक्षमता और दक्षता का आमंत्रण है। जिस भी नीयत से हो, यह आमंत्रण सार्थक बदलाव की उम्मीद जगाता है। राजनीतिज्ञों के प्रपंचों के बावजूद यदि भारतीय स्त्री ने इस आमंत्रण को स्वीकारा और वे सिर्फ सत्ता के खेल का हाथियार न बनीं तो महिला आरक्षण भारतीय राजनीति का चेहरा-मोहरा बदलकर रख देगा और तब महामानव गौतम बुद्ध द्वारा ढाई हजार साल पहले कही गई यह उक्ति के ‘स्त्री होना ही दुःख है’ शायद अप्रासंगिक हो जाए और फिर शायद किसी पामेंला बोर्डिस को यह कहने की जरूरत न पड़े कि ‘यह समाज अब भी मिट्टी-गारे की बनी झुग्गी में रहता है।’

Monday, March 29, 2010

जाति प्रथा- एक अभिशाप


प्रस्तुतिःशिशिर सिंह
जनसंचार सेमेस्टर-II

आधुनिक भारत के इतिहास के आरंभ से ही समाजसुधारक, राजनेता और चिन्तक यहां तक की अब भारत का सर्वोच्च न्यायालय इस तथ्य को रेखांकित करता रहा है कि भारत के चौतरफा विकास के लिए जाति प्रथा का अंत होना जरूरी है। सर्वोच्च न्यायलय की इस मान्यता के पीछे यह कड़वी सच्चाई काम कर रही है कि, जाति प्रथा और जातिवादी चेतना ने भारतीयों के जीवन के हर क्षेत्र में विध्वंसकारी भूमिका अदा की है। आजादी के साठ वर्ष के बाद भी तथा देश के संविधान और कानून में उसके निराकरण के लिए किए गए प्रावाधानों के बावजूद यह व्यवस्था कमजोर पड़ने के बजाए और ढृढ ही होती दिखाई दे रही है। आज देश में एक भी जाति ऐसी नहीं है जो जातिवादी चेतना से ग्रस्ति न हो। एक आम रुझान यह देखने को मिलता है कि जातिवाद के सभी अभिव्यक्तियों को एक समान मानकर उनकी एक ढंग से निन्दा व आलोचना की जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि जातिवादी चेतना के विभिन्न रंग रुपों में अंतर स्पष्ट किया जाए और उनके मूर्त सार तत्व को पकड़ा जाए।
जाति एक विभाजक शक्ति
जाति प्रथा और जातिवाद देश के अंदर एक विभाजनकारी शक्ति के रुप में काम कर रही हैं। इसमें इस व्यवस्था ने देश के अंदर की एकता को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आजादी के बाद से ही बिहार में गुजरात में, हाल ही में राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश आदि स्थानों पर आरक्षण के सवाल पर एक जाति के लोग दूसरी जाति के विरुद्ध खड़े हो गए हैं। आज बाह्मण हो या क्षत्रिय, वैश्य हो या दलित या पिछड़ी जातियां हों, कोई भी ऐसी जाति नहीं है जिसका अपना एक या एक से अधिक जाति संगठन मौजूद न हो। ब्राह्मण सभा, क्षत्रिय सभा, पाल समाज, खटीक समाज, आदि सभी समाजों के अपने संगठन है और सभी अपनी जाति के तंग दायरे में रहकर ही सोचते हैं।
जाति की विभाजनकारी भूमिका से प्रशासनिक सेवायें भी अछूती नहीं रही है। जाति के आधार पर गोलबंदी पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों तथा कर्मचारियों के अंदर भी देखने को मिल जाती है। जातिवादी उभार ने जाति पंचायतों को विशेषकर उत्तर प्रदेश व हरियाणा में सक्रिय तथा मजबूत किया है। ये जाति पंचायतें देश के संविधान, कानून तथा मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हुए व्यक्ति की स्वतंत्रता व जीवन के अधिकार पर हमला कर बर्बर युग की याद दिला देती है। वह युवक-युवतियों को अंतर्जातीय विवाह करने पर मौत की सजा सुना देती है। गोत्र नियमों के उल्लंघन के नाम पर वह पति-पत्नी को अपना रिश्ता तोड़कर भाई-बहन के रुप में रहने का तुगलकी फरमान जारी कर देती हैं। ऐसा करते समय वह देश के कानून और संविधान को मुंह चिढ़ा रही होती है। जाति पंचायतें जाति की विभाजनकारी भूमिका को और गहरा करने का काम करती है।
सवर्णों के अंदर पाई जाने वाली जाति चेतना
सवर्णों के अंदर पायी जानी वाली जातिवादी चेतना का एक रुप वह है जो उनकी सामंती-शोषक मनोवृत्ति का परिचायक है। एक समय था जब दबंग जातियों के रुप में सवर्ण जमीन के मालिक थे, सरकारी नौकरियों पर एक तरह से उनका एकाधिकार था। उद्योग व्यापार उनके हाथ में थे। सरकार पर उनका वर्चस्व था तथा सामाजिक क्षेत्र में वह विशेष अधिकार संपन्न समुदाय के रुप में थे। आजादी के बाद सीमित रुप में ही सही पर उनकी इस स्थिति में प्रतिकूल बदलाव आया। उनके वर्चस्व और विशेष अधिकरों को चुनौती मिलने लगी। इस परिस्थिति में सामंती-शोषक मनोवृत्ति से ग्रस्त सवर्णों का यह तबका हर कीमत पर अपने राजनीतिक आर्थिक एवं सामाजिक विशेष अधिकरों को बनाये रखने के लिए कृत संकल्प हो आक्रमक रुख अपना लेता है। बराबरी तथा न्याय के लिए दलितों की आवाज को वह बल प्रयोग द्वारा कुचल देना चाहता है। दलितों की ह्त्यायें, उनकी बस्तियों में लूट और आगजनी, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार आदि जघन्य अपराध इसी जातिवादी सोच से निकलते हैं।
दूसरा पहलू है सरकार की गलत नीतियां : आर्थिक तबाही के चलते आजकल अधिकांश सवर्ण नौजवानों के सामने शिक्षा एवं रोजगार की गंभीर समस्या पैदा हो गई है। शिक्षा पाने के अवसरों से वंचित होना और बेरोजगारी का शिकार होना यह वर्तमान सरकार और विकास के सत्यानाशी नीतियों का परिणाम है।
लेकिन जातिवादी नेताओं ने उसे यह कहकर गुमराह कर दिया कि उसे शिक्षा और रोजगार के अवसर से इसलिए वंचित होना पड़ा रहा है क्योंकि आरक्षण के व्यवस्था के चलते यह अवसर दलितों और पिछड़ो को आरक्षित कर दिये गये हैं। जातिवादी ताकतों के बहकावे में आकर यह नौजवान आरक्षण की नीति को अपनी बर्बादी का कारण मान लेता है और अपनी जाति के स्वार्थी नेताओं के द्वारा बहकाया जाकर जातीय दंगो व संघर्षों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगता है।
पिछड़ो के अंदर जातिगत चेतना
जहां तक पिछड़ो और दलितों का संबंध है यह याद रखना होगा कि वह जातियां तो है ही, लेकिन इसके साथ ही आजादी के साठ वर्ष के अंदर होने वाले सामाजिक, आर्थिक परिवर्तनों ने उनके अंदर भी वर्ग विभाजन को पैदा कर दिया है। आजादी के बाद के भू-सुधारों ने चाहे वह कितने ही अधूरे और सतही क्यों न रहे हो। ग्रामीण क्षेत्र में पिछड़ी जातियों की आर्थिक स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। आजादी से पूर्व इन पिछड़ी जातियों के पास कृषि भूमि का मात्र आठ प्रतिशत था। लेकिन आजादी के बाद के सुधारों के फलस्वरुप वह वर्तमान में लगभग चालीस फीसदी कृषि भूमि के मालिक हैं। ग्राम सभा, जंगल और नजूल की जमीन पर जो अवैध कब्जा किया हुआ है वह अलग। इसके फलस्वरुप हिन्दी भाषी क्षेत्र में जाट, यादव, कुर्मी आदि भू-स्वामी अर्थात् गांव में वर्चस्ववादी जाति के रुप में उभर कर सामने आये हैं। इन जातियों के इस भू-स्वामी तबके में वही शोषक सामंती जातिवादी सोच पैदा हो गयी है जो ग्रामीण सवर्णों में पाई जाती है।
जातिवाद और राजनीति
जातिप्रथा ने देश की संसदीय जनतांत्रिक पद्धति को प्रदूषित करने का ही काम किया है। उसने एकीकरण की चेतना को कमजोर बना करके उसके स्थान पर जाति आधारित राजनीतिक चेतना को स्थापित किया है। यह राजनीतिक जातिवादी चेतना कई रूपों में काम कर रही है। एक स्वस्थ राजनीति में राजनीतिक दलों की पहचान उनके राजनीतिक कार्यक्रम तथा राजनीतिक विचारधारा से होती है। लेकिन जातिवादी की मेहरबानी के कारण भारत में विशेषकर हिन्दी भाषी क्षेत्र में अधिकांश राजनीतिक दलों को उनके जातीय जनाधार के आधार पर चिन्हित करने और उसी रुप में उनके प्रति रुख अपनाने का रुझान बढ़ा है। इस तरह बहुजन समाज पार्टी मूलतः दलितों की पार्टी हो जाती है जो अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए दूसरी जातियों के साथ समीकरण बैठाने का काम करती है। समाजवादी पार्टी का मूल जातीय जानाधार पिछड़ों में यादव जाति है। उत्तर प्रदेश में अपना दल कुर्मियों की राजनीतिक पार्टी है। राजनीति में इस क्षेत्र में जाति का आधार कोई नयी बात नहीं है। न केवल हिन्दी भाषी क्षेत्र में बल्कि देश के पैमाने पर सत्ता में अपनी इजारेदारी को कांग्रेस ने जो एक राष्ट्रीय दल कहा जाता है, ब्राह्मण, दलित जातियों के गठजोड़ के साथ अल्पसंख्यकों को लेकर स्थापित किया था। चौधरी चरण सिंह जब कांग्रेस से अलग हुए तो उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में वर्चस्व रखने वाली जातियों अहीर, जाट, गुर्जर तथा राजपूतों को साथ लेकर अपने राजनीतिक दल का गठन किया था। हिन्दुत्व के एजेंडे को लेकर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी और उसका आदि रुप जनसंघ पार्टी स्वाभाविक तौर पर सवर्ण जातियों की पार्टी के रुप में पहचान रखती है। जाति आधारित राजनीतिक दल केवल हिन्दी भाषी क्षेत्र की ही विशिष्टता नहीं है। सुदूर दक्षिण में तमिलनाड़ु में पीएमके तथा एनडीएमके पार्टियां भी जातिवादी पार्टिय़ां होने के अलावा और कुछ भी नहीं है। आंध्र प्रदेश हो या कर्नाटक, गुजरात हो या महाराष्ट्र इन सभी स्थानों पर अधिकांश राजनीतिक दल (केवल वामदलों को अपवाद के रुप में छोड़कर) जातिवादी के चश्मे से देखने, संगठित होने और काम करने की बीमारी के शिकार है।
जब राजनीतिक दल ही जाति के विषाणु से ग्रस्त है तो फिर राजनीतिक चुनाव पद्धति कैसे उससे बच सकती है। चुनाव के दौरान, वह चुनाव चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का हो अथवा स्थानीय संस्थाओं का हो, जाति की अहम भूमिका हो जाती है। राजनीतिक दलों के लिए जातियां वोट बैंक में तब्दील हो जाती है। जिनको अपने कब्जे में लेने के लिए वह किसी भी तरह के अवसरवादी कदम उठाने से नहीं हिचकिचाते हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान में विधानसभा चुनाव जीतने के लिए एक आम चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने जाटों को आरक्षण का लाभ देने के लिए उन्हें ‘पिछड़ा’ घोषित कर दिया, इसका लाभ उन्हें चुनाव में मिला। अगले अर्थात आगामी चुनाव में इसी कार्यनीति पर अमल करते हुए गुर्जरों को ‘अनुसूचित जाति’ घोषित करने का वायदा किया गया। इस वायदे के पूरा न होने से राजस्थान में सरकार और गुर्जरों के बीच में तो टकराव हुआ ही इसने गुर्जर और मीणा जाति को भी जातियुद्ध में आमने सामने खड़ा कर दिया। समानता पर विश्वास रखने वाले ‘समाजवाद’ में आस्था रखने वाली समाजवादी पार्टी जाति प्रथा को नष्ट करने के लिए संघर्ष न चलाकर, वोट बैंक के खातिर विभिन्न जातियों के ‘समाजवादी’ संगठन बना रही है। इस तरह समाजवादी क्षत्रिय सभा आदि जातिवादी संगठन अस्तित्व में आकर सक्रिय हो जाते हैं। विभिन्न पार्टियां चुनाव के लिए अपने प्रत्याशियों का चयन करते समय उनकी योग्यता से पहले जाति को देखती हैं। यह देखा जाता है कि उस क्षेत्र के मतदाताओं से वह कितने जाति वोट पा सकता है। चुनाव प्रचार के समय चुनाव घोषणा पत्र हाथी के दिखाने के दांत की तरह होते हैं। असली प्रचार स्थानीय स्तर के जाति नेताओं को मोलतोल कर अपने पक्ष में करने का होता है ताकि उनके माध्यम से एकमुश्त जाति वोट प्राप्त हो सके। इसलिए एक चुनाव विश्लेषक ने टिप्पणी की थी भारत में लोग वोट नहीं करते हैं अपितु अपनी जाति के लिए वोट करते हैं (Do Not Caste vote but vote their caste).
जाति आधारित उत्पीड़न और अपराध
जाति प्रथा के बढ़ते कुप्रभाव ने समाजिक न्याय के प्रश्न को एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना दिया है। संविधान के प्रावधानों तथा देश के कानूनों को मुंह चिढ़ाते हुए दलितों के प्रति अत्याचार, अपराध और भेदभाव कम होने के स्थान पर बढ़ ही रहे हैं। गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकडे इस कड़वी सच्चाई को सामने लाते हैं। 2006 के लिए गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकडे दलितों पर अपराधों की एक भयावह तस्वीर पेश करते हैं। इस वर्ष उत्तर प्रदेश में अनसूचित जातियों के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या 4960 थी, जो देश में सबसे अधिक थी। दूसरे स्थान पर मध्यप्रदेश था जहां 4214 अपराध दर्ज किए गए। पूरे देश में दर्ज किए गए अपराधों में से आधे से अधिक हिन्दी भाषी क्षेत्र में ही थे। दक्षिण और पश्चिम भारत भी कोई अपवाद नहीं रहे। दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा अपराध आंध्र प्रदेश में हुए जहां इनकी संख्या 3891 थी। चिन्ता की बात यह है कि अपराधों की यह संख्या साल-दर-साल कम होने के बजाए बढ़ती ही जा रही है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में 2004 में यह संख्या 3785 थी, 2005 में बढ़कर 4397 हो गयी और जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है 2006 में 4960 पहुंच गयी है।
उ.प्र. में इटावा के एक गांव में पूरे दलित परिवार की हत्या करने की, फतेहपुर में ग्राम प्रधान दलित महिला की हत्या की घटना चर्चा में रही तो आगरा में दलित बस्ती में आग लगाये जाने का काम हुआ। उत्तर प्रदेश के बाहर महाराष्ट्र के खेरालांजी में दलित हत्याकांड़ ने पूरे देश को ही एक तरह से हिलाकर रख दिया था।
इन अपराधों का सबसे क्रूर पहलू दलित महिलाओं के प्रति अपनायी गयी विकृत मानसिक सोच है। भारतीय समाज में महिला को जाति और परिवार की प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। अतः दलितों पर हमले करते समय उनकी मान प्रतिष्ठा को धूल-धूसारित करने के लिए महिलाओं को खासतौर पर निशाना बनाया जाता है। दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनायें हिन्दी भाषी क्षेत्र में आए दिन की बात है। पश्चिम उत्तर प्रदेश और उससे सटे हुए इलाके में दलित महिलाओं के प्रति प्रचलित वाक्य ‘बकरी को कभी भी दुहा जा सकता है और दलित महिला के साथ कहीं भी और कभी भी सोया जा सकता है’ इस इलाके की दलित और महिला विरोधी विकृत रुग्ण मानसिकता को उजागर करने के लिए पर्याप्त है। दलितों को सिर्फ अत्याचार, उत्पीड़न और अनाचार का ही सामना नहीं करना पड़ रहा है। छूआछूत निवारक कानून के बावजूद वह आज भी समाजिक भेदभाव और असमानता के शिकार है। यह भेदभाव कई रुपों में देखने को मिलता है। आज भी उन्हें कई स्थानों पर मंदिरों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। यदि कानून की शक्ति के बल पर एक कद्दावर राष्ट्रीय नेता जगजीवन राम बनारस में विश्वनाथ के मंदिर में प्रवेश कर भी जाते हैं तो उस मंदिर को धार्मिक अनुष्ठानों के द्वारा पुनः पवित्र किया जाता है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश में सार्वजनिक ढाबों और चाय की दुकानों में दो ग्लास की परंपरा(दलितों के लिए अलग ग्लास, उच्च जातियों के लिए अलग ग्लास) का आज भी पालन होता है। राजस्थान के अंदरुनी ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में दलित बच्चों को आज भी घड़े से सीधे पानी निकालकर पीने की अनुमति नहीं है। हिन्दी भाषी क्षेत्र के लगभग सभी प्रदेशों में यह देखने को मिला है कि जहां भी स्कूलों में ‘मिड़ डे मील’ योजना के अंतर्गत दलित महिला के द्वारा भोजन पकाया गया तो उसे ऊंची जाति के छात्रों ने खाने से इंकार कर दिया। उड़ीसा में एक दलित छात्रा को साइकिल पर सवार होकर स्कूल जाने की अनुमति उच्च जाति के लोगों ने नहीं दी। पुलिस के संरक्षण में ही लड़की साइकिल से यात्रा कर सकी। दलितों के साथ भेदभाव यहीं तक सीमित नहीं है। नौकरियों के मामले में भी उनके साथ भेदभाव हो रहा है। अकसर यह तर्क दिया जाता है कि नौकरियां योग्यता के आधार पर होती है और भेदभाव योग्यता उन्नमुख होता है जाति उन्नमुख नहीं। इस ढकोसले का पर्दाफाश हाल ही में किए गए एक शोध से हो जाता है। इस शोध में एक ही योग्यता को दर्शाने वाले आवेदन पत्र दलित, अल्पसंख्यक और सवर्ण आवेदनकर्ता के रुप में भेजे गए। साक्षात्कार के लिए अधिकांश जगह से केवल सवर्णों को बुलाया गया । उसी योग्यता के होने के बावजूद दलित को साक्षात्कर के लिए भी नहीं बुलाया गया। यह समाज में मौजूद भेदभाव पर आधारित दलित विरोधी चेतना का परिचायक है। यही चेतना है जसके चलते आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद आज भी सरकारी और सार्वजनिक संस्थाओं में दलितों को जितनी नौकरियां प्राप्त होना चाहिए थी उसकी आधी भी प्राप्त नहीं हुई है।
जातिवादी उभार का लाभ उठाकर दलितों एवं पिछड़ो के अंदर के बुर्जुआ सामंती शोषक तत्व अपनी जनता के अधिकांश को अपने पीछे लामबंद करने में सफल हो जाते हैं, इस शोषित जनता के वास्तविक हितों और संघर्षों की उपेक्षा करते हुए सामाजिक न्याय के नारे से भ्रमित कर अपने पीछे गोल बंद कर लेते हैं। देश में सामाजिक न्याय तथा समानता पर आधारित समाज की स्थापना की कल्पना भी जाति प्रथा के रहते नहीं की जा सकती ह। जातिप्रथा अपने जन्म से ही शोषण का हथियार रही है। जातिप्रथा का इतिहास इसका गवाह है ।
जातिवाद से लड़ने का रास्ता
जातिप्रथा और जातिवाद के विरुद्ध प्राचीनकाल से ही आवाज उठती रही है। प्राचीन भारत में गौतम बुद्ध और महावीर मध्यकाल में कबीर और नानक जैसे संत तथा आधुनिक भारत में 19वीं सदी के समाजसुधारक एवं 20वीं सदी में अम्बेडकर जैसे योद्धा जातिप्रथा के विरुद्ध संघर्ष करते आये हैं। किन्तु इन सभी संघर्षों के बावजूद जातिप्रथा आज भी बनी हुई है। यह बताता है इन सुधारकों के प्रयास निष्फल रहे। इन प्रयासों की निष्फलता का कारण यह था कि वह जाति प्रथा की वास्तविकता की पूर्णरुप से ग्रहण नहीं कर सके। उन्होंने इसे केवल विकृत चेतना के रुप में देखा और यह माना कि उसके विरुद्ध मात्र वैचारिक संघर्ष चलाकर उसे समाप्त किया जा सकता है। यह मानते समय वह यह भूल गए कि जातिप्रथा की जड़े शोषणमूलक समाज में मौजूद संपत्ति के संबंधों पर आधारित है तथा संपत्ति के इन संबंधों को समाप्त किए बगैर जाति प्रथा को समाप्त नहीं किया जा सकता। वैचारिक संघर्ष जाति प्रथा को कुछ सीमा तक उदार और कमजोर भर बना सकता है उसे समाप्त नहीं कर सकता।
यह भी मानना कि जाति प्रथा को समाप्त करने के लिए संपत्ति के संबंधों पर चोट करना ही पर्याप्त है यह एक संकीर्णतावादी रुख होगा। जाति प्रथा सामाजिक आर्थिक संरचना का हिस्सा होने के साथ-साथ उससे पैदा होने वाली ऐसी वैचारिक चेतना है जो हजारों वर्षों से लोगों को मिलती रही है और इस तरह वह अपने आप में एक मजबूत शक्ति के रुप में स्थापित हो गयी है। अतःएक स्वस्थ शिक्षा ही इस बुराई को खत्म करने में सहायक हो सकती है।
Biblography:-
Loksambaad fortnightly Newspaper
Caste: A social evil, Author: S.R.TOPPO; Rajat publication

Friday, March 12, 2010

चिदंबरम जी ये क्या हो रहा है ?


नक्सलियों के सामने भारतीय राज्य की लाचारी के मायने क्या हैं
- संजय द्विवेदी

माओवादी नक्सलियों ने 15 फरवरी,2010 को लालगढ़ के जंगलों में बंगाल पुलिस की एलीट फोर्स ईस्टर्न फ्रंटीयर राइफल्स के एक कैम्प को तहस-नहस कर 24 जवानों को मार डाला। हमारे केंद्रीय गृहमंत्री कह रहे हैं कि गलती हो गयी, चूक हुयी है। किंतु देश माननीय गृहमंत्री से यह जानना चाहता है कि इसकी गारंटी क्या है कि अब गलती नहीं होगी। जाहिर तौर पर हमारी विवश राजनीति,कायर रणनीति और अक्षम प्रशासन पर यह सवाल सबसे भारी है। नक्सली हों या देश की सीमापार बैठे आतंकवादी वे जब चाहें, जहां चाहें कोई भी कारनामा अंजाम दे सकते हैं और हमारी सरकारें लकीर पीटने के अलावा कर क्या सकती हैं। राजनीति की ऐसी बेचारगी और बेबसी लोकतंत्र के उन विरोधियों के सामने क्यों है। क्या कारण है कि हिंसा में भरोसा रखनेवाले, हमारे लोकतंत्र को न माननेवाले, संविधान को न माननेवाले भी इस देश में कुछ बुद्धिवादियों की सहानुभूति पा जाते हैं। सरकारें भी इनके दबाव में आ जाती हैं। नक्सली चाहते क्या हैं। नक्सलियों की मांग क्या है। वे किससे यह यह मांग कर रहे हैं। वे बातचीत के माध्यम से समस्या का हल क्यों नहीं चाहते। सही तो यह है कि वे इस देश में लोकतंत्र का खात्मा चाहते हैं। वे जनयुद्ध लड़ रहे हैं और जनता का खून बहा रहे हैं।
हमारी सरकारें भ्रमित हैं। लोग नक्सल समस्या को सामाजिक-आर्थिक समस्या बताकर प्रमुदित हो रहे हैं। राज्य का आतंक चर्चा का केंद्रीय विषय है जैसे नक्सली तो आतंक नहीं फैला रहे बल्कि जंगलों में वे प्रेम बांट रहे हैं। उनका आतंक, आतंक नहीं है। राज्य की हिंसा का प्रतिकार है। किसने उन्हें यह ठेका दिया कि वे शांतिपूर्वक जी रही आदिवासी जनता के जीवन में जहर धोलें। उनके हाथ में बंदूकें पकड़ा दें, जो हमारे राज्य की ओर ही तनी हुयी हों। लोगों की जिंदगी बदलने के लिए आए ये अपराधी क्यों इन इलाकों में स्कूल नहीं बनने देना चाहते, क्यों वे चाहते हैं कि सरकार यहां सड़क न बनाए, क्यों वे चाहते हैं कि सरकार नाम की चीज के इन इलाकों में दर्शन न हों। पुल, पुलिया, सड़क, स्कूल, अस्पताल सबसे उन्हें परेशानी है। जनता को दुखी बनाए रखना और अंधेरे बांटना ही उनकी नीयत है। क्या हम सब इस तथ्य से अपरिचित हैं। सच्चाई यह है कि हम सब इसे जानते हैं और नक्सलवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई फिर भी भोथरी साबित हो रही है। हमें कहीं न कहीं यह भ्रम है कि नक्सल कोई वाद भी है। आतंक का कोई वाद हो सकता है यह मानना भी गलत है। अगर आपका रास्ता गलत है तो आपके उद्देश्य कितने भी पवित्र बताए जाएं उनका कोई मतलब नहीं है। हमारे लोकतंत्र ने जैसा भी भारत बनाया है वह आम जनता के सपनों का भारत है। माओ का कथित राज बुराइयों से मुक्त होगा कैसे माना जा सकता है। आज लोकतंत्र का ही यह सौंदर्य है कि नक्सलियों का समर्थन करते हुए भी इस देश में आप धरना-प्रदर्शन करते और गीत- कविताएं सुनाते हुए घूम सकते हैं। अखबारों में लेख लिख सकते हैं। क्या आपके माओ राज में अभिव्यक्ति की यह आजादी बचेगी। निश्चय ही नहीं। एक अधिनायकवादी शासन में कैसे विचारों, भावनाओं और अभिव्यक्तियों का गला घुटता है इसे कहने की जरूरत नहीं है। ऐसे माओवादी हमारे लोकतंत्र को चुनौती देते घूम रहे हैं और हम उन्हें सहते रहने को मजबूर हैं।
नक्सलवादियों के प्रति हमें क्या तरीका अपनाना चाहिए ये सभी को पता है फिर इस पर विमर्श के मायने क्या हैं। खून बहानेवालों से शांति की अर्चना सिर्फ बेवकूफी ही कही जाएगी। हम क्या इतने नकारा हो गए हैं कि इन अतिवादियों से अभ्यर्थना करते रहें। वे हमारे लोकतंत्र को बेमानी बताएं और हम उन्हें सिर-माथे बिठाएं, यह कैसी संगति है। आपरेशन ग्रीन हंट को पूरी गंभीरता से चलाना और नक्सलवाद का खात्मा हमारी सरकार का प्राथमिक ध्येय होना चाहिए। जब युद्ध होता है तो कुछ निरअपराध लोग भी मारे जाते हैं। यह एक ऐसी जंग है जो हमें अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए जीतनी ही पड़ेगी। बीस राज्यों तक फैले नक्सली आतंकवादियों से समझ की उम्मीदें बेमानी हैं। वे हमारे लोकतंत्र की विफलता का फल हैं। राज्य की विफलता ने उन्हें पालपोस का बड़ा किया है। सबसे ऊपर है हमारा संविधान और लोकतंत्र जो भी ताकत इनपर भरोसा नहीं रखती उसका एक ही इलाज है उन प्रवृत्तियों का शमन। हमारा देश एक नई ताकत के साथ महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। ये हिंसक आंदोलन उस तेज से बढ़ते देश के मार्ग में बाधक हैं। हमें तैयार होकर इनका सामना करना है और इसे जल्दी करना है- यह संकल्प हमारी सरकार को लेना होगा। भारत की महान जनता अपने संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखते हुए देश के विकास में जुटी है। हिंसक और आतंकी प्रसंग उसकी गति को धीमा कर रहे हैं। हमें लोगों को सुख चैन से जीने से आजादी और वातावरण देना होगा। अपने जवानों की मौत पर सिर्फ स्यापा करने के बजाए हमें कड़े फैसले लेने होंगें और यह संदेश देना होगा कि भारतीय राज्य अपने नागरिकों की जान-माल की रक्षा करने में समर्थ है। इस मोर्चे पर तो भारतीय राज्य की लाचारी ही दिखती है, आगे के दिनों की कौन जाने।