Tuesday, September 6, 2011

गुरू-शिष्य संबंधः नए रास्तों की तलाश


शिक्षक दिवस ( 5 सितंबर) पर विशेषः
अध्यापकों का विवेक और रचनाशीलता भी है कसौटी पर
-संजय द्विवेदी


शिक्षक मनुष्य का निर्माता है। एक शिक्षक की भूमिका बच्चों को साक्षर करने से ही खत्म नहीं हो जाती बल्कि वह अपने छात्रों में आत्मबल, आदर्श, नैतिक बल, सच्चाई, ईमानदारी, लगन और मेहनत की वह मशाल भी जलाता है जो उसे पूर्ण मनुष्य बनाते हैं। - सर जान एडम्स


जब हर रिश्ते को बाजार की नजर लग गयी है, तब गुरू-शिष्य के रिश्तों पर इसका असर न हो ऐसा कैसे हो सकता है ? नए जमाने के, नए मूल्यों ने हर रिश्ते पर बनावट, नकलीपन और स्वार्थों की एक ऐसी चादर डाल दी है, जिसमें असली सूरत नजर ही नहीं आती। अब शिक्षा बाजार का हिस्सा है, जबकि भारतीय परंपरा में वह गुरू के अधीन थी, समाज के अधीन थी।
बाजार में उतरे शातिर खिलाड़ीः
पूंजी के शातिर खिलाड़ियों ने जब से शिक्षा के बाजार में अपनी बोलियां लगानी शुरू की हैं तबसे हालात बदलने शुरू हो गए थे। शिक्षा के हर स्तर के बाजार भारत में सजने लगे थे। इसमें कम से कम चार तरह का भारत तैयार हो रहा था। आम छात्र के लिए बेहद साधारण सरकारी स्कूल थे जिनमें पढ़कर वह चौथे दर्जे के काम की योग्यताएं गढ़ सकता था। फिर उससे ऊपर के कुछ निजी स्कूल थे जिनमें वह बाबू बनने की क्षमताएं पा सकता था। फिर अंग्रेजी माध्यमों के मिशनों, शिशु मंदिरों और मझोले व्यापारियों की शिक्षा थी जो आपको उच्च मध्य वर्ग के करीब ले जा सकती थी। और सबसे ऊपर एक ऐसी शिक्षा थी जिनमें पढ़ने वालों को शासक वर्ग में होने का गुमान, पढ़ते समय ही हो जाता है। इस कुलीन तंत्र की तूती ही आज समाज के सभी क्षेत्रों में बोल रही है। इस पूरे चक्र में कुछ गुदड़ी के लाल भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, इसमें दो राय नहीं किंतु हमारी व्यवस्था ने वर्ण व्यवस्था के हिसाब से ही शिक्षा को भी चार खानों में बांट दिया है और चार तरह के भारत बनाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। जाहिर तौर पर यह हमारी एकता- अखंडता और सामाजिक समरसता के लिए बहुत घातक है।
उच्चशिक्षा के क्षेत्र में बदहालीः
हालात यह हैं कि कुल 54 करोड़ का हमारा युवा वर्ग उच्च शिक्षा के लिए तड़प रहा है। उसकी जरूरतों को हम पूरा नहीं कर पा रहे हैं। सरकारी क्षेत्रों की उदासीनता के चलते आज हमारे सरकारी विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय लगभग स्लम में बदल रहे हैं। एक लोककल्याणकारी सरकार जब सारा कुछ बाजार को सौंपने को आतुर हो तो किया भी क्या जा सकता है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्चशिक्षा का बाजार अब उन व्यापारियों के हवाले है, जिनको इससे मोटी कमाई की आस है। जाहिर तौर पर शिक्षा अब सबके लिए सुलभ नहीं रह जाएगी। कम वेतन और सुविधाओं में काम करने वाले शिक्षक आज भी गांवों और सूदूर क्षेत्रों में शिक्षा की अलख जगाए हुए हैं। किंतु यह संख्या निरंतर कम हो रही है। सरकारी प्रोत्साहन के अभाव और भ्रष्टाचार ने हालात बदतर कर दिए हैं। इससे लगता है कि शिक्षा अब हमारी सरकारों की प्राथमिकता का हिस्सा नहीं रही।
बढ़ गयी है जिम्मेदारीः
ऐसे कठिन समय में शिक्षक समुदाय की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। क्योंकि वह ही अपने विद्यार्थियों में मूल्य व संस्कृति प्रवाहित करता है। आज नई पीढ़ी में जो भ्रमित जानकारी या कच्चापन दिखता है, उसका कारण शिक्षक ही हैं। क्योंकि अपने सीमित ज्ञान, कमजोर समझ और पक्षपातपूर्ण विचारों के कारण वे बच्चों में सही समझ विकसित नहीं कर पाते। इसके कारण गुरू के प्रति सम्मान भी घट रहा है। रिश्तों में भी बाजार की छाया इतनी गहरी है कि वह अब डराने लगी हैं। आज आम आदमी जिस तरह शिक्षा के प्रति जागरूक हो रहा है और अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने के आगे आ रहा है, वे आकांक्षांए विराट हैं। उनको नजरंदाज करके हम देश का भविष्य नहीं गढ़ सकते। सबसे बड़ा संकट आज यह है कि गुरू-शिष्य के संबंध आज बाजार के मानकों पर तौले जा रहे हैं। युवाओं का भविष्य जिन हाथों में है, उनका बाजार तंत्र किस तरह शोषण कर रहा है इसे समझना जरूरी है। सरकारें उन्हें प्राथमिक शिक्षा में नए-नए नामों से किस तरह कम वेतन पर रखकर उनका शोषण कर रही हैं, यह एक गंभीर चिंता का विषय है। इसके चलते योग्य लोग शिक्षा क्षेत्र से पलायन कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि जीवन को ठीक से जीने के लिए यह व्यवसाय उचित नहीं है।
नई पीढ़ी की व्यापक आकांक्षांएः
शहरों में पढ़ रही नई पीढ़ी की समझ और सूचना का संसार बहुत व्यापक है। उसके पास ज्ञान और सूचना के अनेक साधन हैं जिसने परंपरागत शिक्षकों और उनके शिक्षण के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। नई पीढ़ी बहुत जल्दी और ज्यादा पाने की होड़ में है। उसके सामने एक अध्यापक की भूमिका बहुत सीमित हो गयी है। नए जमाने ने श्रद्धाभाव भी कम किया है। उसके अनेक नकारात्मक प्रसंग हमें दिखाई और सुनाई देते हैं। गुरू-शिष्य रिश्तों में मर्यादाएं टूट रही हैं, वर्जनाएं टूट रही हैं, अनुशासन भी भंग होता दिखता है। नए जमाने के शिक्षक भी विद्यार्थियों में अपनी लोकप्रियता के लिए कुछ ऐसे काम कर बैठते हैं जो उन्हें लांछित ही करते हैं। सीखने की प्रक्रिया का मर्यादित होना भी जरूरी है। परिसरों में संवाद, बहसें और विषयों पर विमर्श की धारा लगभग सूख रही है। परीक्षा को पास करना और एक नौकरी पाना इस दौर की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गयी है। ऐसे में शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस पीढ़ी की आकांक्षाओं की पूर्ति करने की है। साथ ही उनमें विषयों की गंभीर समझ पैदा करना भी जरूरी है। शिक्षा के साथ कौशल और मूल्यबोध का समावेश न हो तो वह व्यर्थ हो जाती है। इसलिए स्किल के साथ मूल्यों की शिक्षा बहुत जरूरी है। कारपोरेट के लिए पुरजे और रोबोट तैयार करने के बजाए अगर हम उन्हें मनुष्यता,ईमानदारी और प्रामणिकता की शिक्षा दे पाएं और स्वयं भी खुद को एक रोलमाडल के प्रस्तुत कर पाएं तो यह बड़ी बात होगी। शिक्षक अपने विद्यार्थियों के लिए एक दोस्त, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में सामने आते है। वह उसका रोल माडल भी हो सकते हैं।
सही तस्वीर गढ़ने की जरूरतः
गुरू-शिष्य परंपरा को समारोहों में याद की जाने वाली वस्तु के बजाए अगर हम उसकी सही तस्वीरें गढ़ सकें तो यह बड़ी बात होगी। किंतु देखा यह जा रहा है गुरू तो गुरूघंटाल बन रहे हैं और छात्र तोममोल करने वाले माहिर चालबाज। काम निकालने के लिए रिश्तों का इस्तेमाल करने से लेकर रिश्तों को कलंकित करने की कथाएं भी हमारे सामने हैं, जो शर्मसार भी करती हैं और चेतावनी भी देती है। नए समय में गुरू का मान- स्थान बचाए और बनाए रखा जा सकता है, बशर्ते हम विद्यार्थियों के प्रति एक ईमानदार सोच रखें, मानवीय व संवेदनशील व्यवहार रखें, उन्हें पढ़ने के बजाए समझने की दिशा में प्रेरित करें, उनके मानवीय गुणों को ज्यादा प्रोत्साहित करें। भारत निश्चय ही एक नई करवट ले रहा है, जहां हमारे नौजवान बहुत आशावादी होकर अपने शिक्षकों की तरफ निहार रहे हैं, उन्हें सही दिशा मिले तो आसमान में रंग भर सकते हैं। हमारे युवा भारत में इस समय दरअसल शिक्षकों का विवेक, रचनाशीलता और कल्पनाशीलता भी कसौटी पर है। क्योंकि देश को बनाने की इस परीक्षा में हमारे छात्र अगर फेल हो रहे हैं तो शिक्षक पास कैसे हो सकते हैं ?
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

Saturday, September 3, 2011

भोपाल को है आज भी न्याय का इंतजार


भोपाल गैस त्रासदी के सच पर बोले विजयमनोहर तिवारी

भोपाल, 3 सितंबर,2011। वरिष्ठ पत्रकार विजयमनोहर तिवारी का कहना है कि है विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी पर न तो भोपाल को न्याय मिल पाया है न ही रचनाकारों एवं पत्रकारों ने इस दर्द को अपनी लेखनी से व्यक्त किया। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग द्वारा “ भोपाल गैस त्रासदी की रिर्पोटिंग” विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यह दुखद है कि इतनी बड़ी त्रासदी पर प्रामाणिक पुस्तकें हमारे पास उपलब्ध नहीं हैं।
श्री तिवारी का कहना था कि कुछ हजार लोग आज भी यूनियन कारबाइड फैक्ट्री के आसपास के इलाकों में रह रहे हैं, जहां का जीवन वास्तव में नारकीय है और हम अपने शहर के लोगों के दुखों के प्रति इतने उदासीन कैसे हो सकते हैं? उन्होंने कहा भोपाल गैस त्रासदी एक ऐसी कथा है जिसने सत्तातंत्र, प्रशासन, समाज और न्यायपालिका सबके सामने कई सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि आज भोपाल में सारा कुछ सामान्य हो गया लगता है पर इन पचीस सालों में भी न्याय कहां मिला है? उन्होंने कहा कि युवा पत्रकारों और लेखकों को चाहिए कि वे भोपाल के इस दर्द का बयान करें। भोपाल का दर्द एक सामूहिक पीड़ा बनना चाहिए। ताकि ऐसी संवेदनहीनता के अवसर दुबारा उपस्थित न हों।
इस मौके पर श्री तिवारी ने अपनी किताब “ भोपाल गैस त्रासदीः आधी रात का सच” को लिखने की पृष्ठभूमि पर भी प्रकाश डाला और अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि खबरों को लिखने के क्रम में बहुत कुछ छूट जाता है उसे पुस्तक के रूप में देकर वे यह महसूस करते हैं कि अब वे अपनी जिम्मेदारी का पूरा निवर्हन कर पाए हैं। इसके पूर्व विभागाध्यक्ष संजय द्विवेदी ने उनका स्वागत किया। कार्यक्रम में डा. संजीव गुप्ता एवं डा. राखी तिवारी मौजूद रहे। कार्यक्रम में जनसंचार विभाग के विद्यार्थी बड़ी संख्या में मौजूद थे।

Saturday, August 20, 2011

अन्ना ने इस देश की आत्मा को छू लिया है


भ्रष्टाचार विरोधी जनांदोलन ने देश को एक सूत्र में बांधा

-संजय द्विवेदी


अन्ना हजारे ने सही मायने में इस देश की आत्मा को छू लिया है। सच मानिए उनकी गांधी टोपी, बालसुलभ उत्साह, उनकी भारतीय वेशभूषा और बातों की सहजता कुल मिलाकर एक भरोसा जगाती हैं। अन्ना आज जहां हैं उसके पीछे कहीं न कहीं वह छवि जिम्मेदार है जो उन्हें महात्मा गांधी से जोड़ती है। इसलिए जब कांग्रेस के अहंकारी प्रवक्ता उनके बारे में कुछ कहते हैं, तो दर्द देश को होता है। अन्ना हजारे सही मायने में एक भारतीय आत्मा के रूप में उभरे हैं। उन्होंने देश की नब्ज पर हाथ रख दिया है।

कांग्रेस के दिशाहीन और जनता से कटे नेतृत्व की छोड़िए उन्होंने विपक्ष के भी नाकारेपन का लाभ उठाते हुए यह साबित कर दिया है कि लोकशाही की असल ताकत क्या है। जनता के मन में इस कदर उनका बस जाना और नौजवानों का उनके पक्ष में सड़कों पर उतरना, इसे साधारण मत समझिए। यह वास्तव में एक साधारण आदमी के असाधारण हो जाने की परिघटना है। हमारी खुफिया एजेंसियां कह रही थीं- ‘अन्ना को रामदेव समझने की भूल न कीजिए।’ किंतु सरकारें कहां सुनती हैं। पूरी फौज उतर पड़ी अन्ना को निपटाने के लिए। क्या कांग्रेस के प्रवक्ता, क्या मंत्री सब उनकी ईमानदारी और निजी जीवन पर ही कीचड़ उछालने लगे। लेकिन क्या हुआ कि तीन दिनों के भीतर देश के गृहमंत्री को लोकसभा में उन्हें ‘सच्चा गाँधीवादी’ बताते हुए ‘सेल्यूट’ करना पड़ा। समय बदलता है, तो यूं ही बदलता है।

राजनीतिक दलों के लिए चुनौतीः

अन्ना आज राजनीतिक दलों के लिए एक चुनौती और देश के सबसे बड़े यूथ आईकान हैं। वे लोकप्रियता के उस शिखर पर हैं जहां पहुंचने के लिए राजनेता, अभिनेता और लोकप्रिय कलाकार तरसते हैं। महाराष्ट्र के एक गांव राणेगण सिद्धि के इस आम इंसान के इस नए रूपांतरण के लिए आप क्या कहेंगें? क्या यह यूं हो गया ? सच है समय अपने नायक और खलनायक दोनों तलाश लेता है। याद कीजिए यूपीए-1 की ताजपोशी का समय जब मनमोहन सिंह, एक ऐसे ईमानदार आईकान के तौर पर प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हैं जो भारत का भविष्य बदल सकता है, क्योंकि वह एक अर्थशास्त्री के तौर पर दुनिया भर में सम्मानित हैं। आज देखिए उनकी ईमानदारी और अर्थशास्त्र दोनों औंधे मुंह पड़े हैं। अमरीका से हुए परमाणु करार को पास कराने के लिए अपनी जान लड़ा देने वाले अमरीका प्रिय प्रधानमंत्री के सहायकों की बेबसी देखिए वे यह कहने को मजबूर हैं कि अन्ना के आंदोलन के पीछे अमरीका का हाथ है। अमरीका की चाकरी में लगी केंद्र सरकार के सहयोगियों के इस बयान पर क्या आप हंसे बिना रह सकते हैं? लेकिन उलटबासियां जारी हैं। सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री के राज में भ्रष्टाचार के रिकार्ड टूट रहे हैं, और विद्वान अर्थशास्त्री को प्रधानमंत्री बनाने की सजा यह कि महंगाई से जनता त्राहि-त्राहि कर रही है।

विपक्ष भी करता रहा निराशः

इस समय में तो विपक्ष भी आशा से अधिक निराश कर रहा है। प्रामणिकता के सवाल पर विपक्ष की भी विश्वसनीयता भी दांव पर है। यह साधारण नहीं है कि जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं वहां भी भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। केरल में वामपंथियों को ले डूबने वाले विजयन हों, कर्नाटक के भाजपाई मुख्यमंत्री रहे वीएस येदिरेप्पा या उप्र की मुख्यमंत्री मायावती। सब का ट्रैक बहुत बेहतर नहीं है। शिबू सोरेन, लालूप्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव की याद तो मत ही दिलाइए। राज्यों की विपक्षी सरकारें लूट-पाट का उदाहरण बनने से खुद को रोक नहीं पायीं। ऐसे में राजनीतिक विश्वसनीयता के मोर्चे पर वे कांग्रेस से बहुत बेहतर स्थिति में नहीं हैं। कम से कम भ्रष्टाचार के मामले पर मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का राष्ट्रीय चरित्र एक सरीखा है। सो इस राजनीतिक शून्यता और विपक्ष के नाकारेपन के बीच अन्ना आशा की एक किरण बनकर उभरते हैं। विपक्ष वास्तव में सक्रिय और विश्वसनीय होता तो अन्ना कहां होते? इसलिए देखिए कि सारे दल अपनी घबराहटों के बावजूद लोकपाल को लेकर किंतु-परंतु से आगे नहीं बढ़ रहे हैं। अन्ना हजारे के नैतिक बल और व्यापक जनसमर्थन ने उन्हें सहमा जरूर दिया है किंतु वे आज भी आगे आकर सक्षम लोकपाल बनाने के उत्सुक नहीं दिखते। राजनीतिक दलों का यही द्वंद देश की सबसे बड़ी पीड़ा है। जनता इसे देख रही है और समझ भी रही है।

टूटा राज्य का दंभः

सवाल यह भी नहीं है कि अन्ना सफल होते हैं या विफल किंतु अन्ना ने जनशक्ति का भान, मदांध राजनीति को करा दिया है। राज्य( स्टेट) को यह जतला दिया है उसका दंभ, जनशक्ति चाहे तो चूर-चूर हो सकता है। बड़बोले, फाइवस्टारी और गगनविहारी नेताओं को अन्ना ने अपनी साधारणता से ही लाजवाब कर दिया है। अगर उन्हें दूसरा गांधी कहा जा रहा है तो यह अतिरंजना भले हो, किंतु सच लगती है। क्योंकि आज की राजनीति के बौनों की तुलना में वे सच में आदमकद नजर आते हैं। यह सही बात है अन्ना के पास गांधी, जयप्रकाश नारायण और वीपी सिंह जैसा कोई समृद्ध अतीत नहीं है। उनके पास सिर्फ उनका एक गांव है, जहां उन्होंने अपने प्रयोग किए, उनका अपना राज्य है, जहां वे भ्रष्टों से लड़े और उसकी कीमत भी चुकायी। किंतु उनके पास वह आत्मबल, नैतिक बल और सादगी है जो आज की राजनीति में दुर्लभ है। उनके पास निश्चय ही न गांधी सरीखा व्यक्तित्व है, ना ही जयप्रकाश नारायण सरीखा क्रांतिकारी और प्रभावकारी व्यक्तित्व। वीपी सिंह की तरह न वे राजपुत्र हैं न ही उनका कोई राजनीतिक अतीत है। किंतु कुछ बात है कि जो लोगों से उनको जोड़ती है। उनकी निश्छलता, सहजता, कुछ कर गुजरने की इच्छा, उनकी ईमानदारी और अराजनैतिक चरित्र उनकी ताकत बन गए हैं।

हाथ में तिरंगा और वंदेमातरम् का नादः

आजादी के साढ़े छः दशक के बाद जब वंदेमातरम, इंकलाब जिंदाबाद, भारत माता की जय की नारे लगाते नौजवान तिरंगे के साथ दिल्ली ही नहीं देश के हर शहर में दिखने लगे हैं तो आप तय मानिए कि इस देश का जज्बा अभी मरा नहीं है। इन्हें फेसबुकिया, ट्विटरिया गिरोह मत कहिए- यह चीजों का सरलीकरण है। संवाद के माध्यम बदल सकते हैं पर विश्वसनीय नेतृत्व के बिना लोगों को सड़कों पर उतारना आसान नहीं होता। गौहाटी से लेकर कोलकाता और लखनऊ से लेकर हैदराबाद तक बड़े और छोटे समूहों में अगर लोग निकले हैं तो इसका मजाक न बनाइए। कुछ करते हुए देश का स्वागत कीजिए। युवा अगर देश जाति, धर्म,राज्य और पंथ की सीमाएं तोड़कर ‘भारत मां की जय’ बोल रहा है तो कान बंद मत कीजिए। सबको पता है कि अन्ना गांधी नहीं हैं, किंतु वे गांधी के रास्ते पर चल रहे हैं। वे विवेकानंद भी नहीं हैं पर विवेकानंद के अध्ययन ने उनके जीवन को बदला है। इतना तय मानिए कि वे हिंदुस्तान के आम और खास हर आदमी की आवाज बन गए हैं। अन्ना को नहीं उस भारतीय मनीषा को सलाम कीजिए जो अपने गांव की माटी और इस देश के आम आदमी में परमात्मा के दर्शन करता है। अन्ना के इस आध्यात्मिक बल को सलाम कीजिए। इस देश पर पड़ी गांधी की लंबी छाया को सलाम कीजिए कि जिनकी आभा में पूरा देश अन्ना बनने को आतुर है। अन्ना अगर गांधी को नहीं समझते, विवेकानंद को नहीं समझते तो तय मानिए वे देश को भी अपनी बात नहीं समझा पाते। उनका नैतिक बल इन्हीं विभूतियों से बल पाता है। उनको मीडिया, ट्यूटर और फेसबुक की जरूरत नहीं है, वे उनके मददगार हो सकते हैं किंतु वे अन्ना को बनाने वाले नहीं हैं। अन्ना के आंदोलन को बनाने वाले नहीं हैं। अन्ना का आंदोलनकारी व्यक्तित्व भारत की माटी में गहरे बसे लोकतांत्रिक चैतन्य का परिणाम है। जहां एक आम आदमी भी अपनी आध्यात्मिक चेतना और नैतिक बल से महामानव हो सकता है। गांधी ने यही किया और अब अन्ना यह कर रहे हैं। सफलताएं और असफलताएं मायने नहीं रखतीं। गांधी भी देश का बंटवारा रोक नहीं पाए, अन्ना भी शायद भ्रष्टाचार को खत्म होता न देख पाएं, किंतु उन्होंने देश को मुस्कराने का एक मौका दिया है। उन्होंने नई पीढ़ी को राष्ट्रवाद की एक नई परिभाषा दी है। खाए-अधाए मध्यवर्ग को भी फिर से राजनीतिक चेतना से लैस कर दिया है। एक लोकतंत्र के वास्तविक अर्थ लोगों को समझाने की कोशिशें शुरू की हैं। एक पूरी युवा पीढ़ी जिसने गांधी, भगत सिहं, डा.लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय या जयप्रकाश नारायण को देखा नहीं है। उसे उस परंपरा से जोड़ने की कोशिश की है। अन्ना ने जनांदोलन और उसके मायने समझाए हैं।

सवाल पूछने लगे हैं नौजवानः

कांग्रेस के एक जिम्मेदार नेता कहते हैं कि यह फैशन है। अगर यह फैशनपरस्ती भी तो भी वह अमरीका की तरफ मुंह बाए खड़ी, एनआरआई बनने, अपना घर भरने और सिर्फ खुद की चिंता की करने वाली पीढ़ी का एक सही दिशा में प्रस्थान है। यह फैशन भी है तो स्वागत योग्य है क्योंकि अरसे बाद शिक्षा परिसरों में फेयरवेल पार्टियों, डांस पार्टिंयों और फैशन शो से आगे अन्ना के बहाने देश पर बात हो रही है,भ्रष्टाचार पर बात हो रही है, प्रदर्शन हो रहे हैं। नौजवान सवाल खड़े कर रहे हैं और पूछ रहे हैं। अन्ना ने अगर देश के नौजवानों को सवाल करना भर सिखा दिया तो यह भी इस दौर की एक बड़ी उपलब्धि होगी। अन्ना हजारे की जंग से बहुत उम्मीदें रखना बेमानी है किंतु यह एक बड़ी लड़ाई की शुरूआत तो बन ही सकती है। अन्ना की इस जंग को तोड़ने और भोथरा बनाने के खेल अभी और होंगें। सत्ता अपने खलचरित्र का परिचय जरूर देगी। किंतु भारतीय जन अगर अपनी स्मृतियों को थोड़ा स्थाई रख पाए तो राजनीतिक तंत्र को भी इसके सबक जरूर मिलेगें। क्योंकि अब तक हमारा राजनीतिक तंत्र भारतीय जनता के स्मृतिदोष का ही लाभ उठाता आया है। अब उसे लग रहा है कि हम ‘पांच साल के ठेकेदारों’ से पांच साल से पहले ही सवाल क्यों पूछे जा रहे हैं। इसलिए वे ललकार रहे हैं कि आप चुनकर आइए और फिर सवाल पूछिए। पर यह सवाल भी मौंजू कि एक अरब लोगों के देश में आखिर कितने लोग लोकसभा और राज्यसभा में भेजे जा सकते हैं? यानि सवाल करने का हक क्या संसद में बैठे लोगों का ही होगा, किंतु अन्ना ने बता दिया है कि नहीं हर भारतीय को सवाल करने का हक है। “हम भारत के लोग” संविधान में लिखी इन पंक्तियों के मायने समझ सकें तो अन्ना का आंदोलन सार्थक होगा और अपने लक्ष्य के कुछ सोपान जरूर तय करेगा।

Monday, August 8, 2011

लोकतांत्रिक चेतना का देश है भारतः विजयबहादुर सिंह


स्थानीय विविधताएं ही करेंगी पश्चिमी संस्कृति के हमलों का मुकाबला
भोपाल, 8 जुलाई 2011। हिंदी साहित्य के प्रख्यात आलोचक एवं विचारक डा.विजयबहादुर सिंह का कहना है कि भारत एक लोकतांत्रिक चेतना का देश है। इसकी स्थानीय विविधताएं ही बहुराष्ट्रीय निगमों और पश्चिमी संस्कृति के साझा हमलों का मुकाबला कर सकती हैं। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग द्वारा ‘भारत का सांस्कृतिक का अवचेतन ’ विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि ज्ञान और संस्कृति अगर अलग-अलग चलेंगें तो यह मनुष्य के खिलाफ होगा। प्रख्यात विचारक धर्मपाल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनके द्वारा उठाया गया यह सवाल कि “ हम किसके संसार में रहने लगे हैं”, आज बहुत प्रासंगिक हो उठा है। हिंदुस्तान के लोग आज दोहरे दिमाग से काम कर रहे हैं, यह एक बड़ी चिंता है। सभ्यता में हम पश्चिम की नकल कर रहे हैं और धर्म के पालन में हम अपने समाज में लौट आते हैं। डा. सिंह ने कहा कि 1947 के पहले स्वदेशी, सत्याग्रह और अहिंसा हमारे मूल्य थे किंतु आजादी के बाद हमने परदेशीपन, मिथ्याग्रह और हिंसा को अपना लिया है। यह दासता का दिमाग लेकर हम अपनी पंचवर्षीय योजनाएं बनाते रहे, संविधान रचते रहे और नौकरशाही भी उसी दिशा में काम करती रही। ऐसे में सोच वा आदर्श में फासले बहुत बढ़ गए हैं। हमारा पूरा तंत्र आम आदमी के नहीं ,सरकार के पक्ष में खड़ा दिखता है। हमारा सामाजिक जीवन और लोकजीवन दोनों अलग-अलग दिशा में चल रहे हैं। जबकि हिंदुस्तान समाजों का देश नहीं ‘लोक’ है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ का उल्लेख करते हुए विजय बहादुर सिंह ने कहा कि पश्चिम कभी भी हमारा आदर्श नहीं हो सकता, क्योंकि यह सभ्यता अपने को स्वामी और बाकी को दास समझती है। उनका कहना था कि कोई भी क्रांति तभी सार्थक है, जब उससे होने वाले परिवर्तन मनुष्यता के पक्ष में हों। आजादी के बाद जो भी बदलाव किए जा रहे हैं वे वास्तव में हमारी परंपरा और संस्कृति से मेल नहीं खाते। भारत की सांस्कृतिक चेतना त्याग में विश्वास करती है, क्योंकि वह एक आदमी को इंसान में रूपांतरित करती है। शायद इसीलिए गालिब ने लिखा कि “आदमी को मयस्सर नहीं इंशा होना”। भारत की संस्कृति इंसान बनाने वाली संस्कृति है पर हम अपना रास्ता भूलकर उस पश्चिम का अंधानुकरण कर रहे हैं, जिसे गांधी ने कभी शैतानी सभ्यता कहकर संबोधित किया था। इस अवसर पर डा. श्रीकांत सिंह, पुष्पेंद्रपाल सिंह, डा. संजीव गुप्ता, पूर्णेंदु शुक्ल, शलभ श्रीवास्तव, प्रशांत पाराशर और जनसंचार विभाग के विद्यार्थी मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन विभागाध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।

लोकमंगल हो मीडिया का ध्येयः स्वामी शाश्वतानंद


भोपाल, 6 अगस्त,2011। महामंडलेश्वर डा.स्वामी शाश्वतानंद गिरि का कहना है कि लोकमंगल अगर पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं है तो वह व्यर्थ है। हमें हमारे सामाजिक संवाद और पत्रकारिता में लोकमंगल के तत्व को शामिल करना पड़ेगा। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा ‘संवाद और पत्रकारिता का अध्यात्म’ विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अध्यात्म के बिना प्रेरणा संभव नहीं है। अध्यात्म ही किसी भी क्षेत्र में हमें लोकमंगल की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि अरविंद घोष, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी भी पत्रकार थे किंतु उनकी पत्रकारिता, उनकी आत्मा का स्पंदन थी, आज जबकि पूंजी का स्पंदन ही पत्रकारिता की प्रेरणा बन रहा है। उन्होंने युवा पत्रकारों से आग्रह किया कि वे अपनी पत्रकारिता में सकारात्मकता को शामिल करें तभी हम भारत के मीडिया का मान बढ़ा सकेंगें। शरीर के तल पर मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं, मूल्य ही हमें अलग करते हैं। हमारे लिए मनुष्यता बहुत महत्वपूर्ण है।
डा. गिरि ने कहा कि मन से लिखा और मन से बोला गया शब्द ही पढ़ा और सुना जाएगा। बुद्धि से लिखे और बोले हुए का कोई महत्व नहीं है, वह बुद्धि से ही पढ़ा और सुना जाएगा। हमारे लेखन में अगर हमारी आत्मा न होगी तो वह प्राणहीन हो जाएगा। प्रेमचंद और निराला जी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ये इसलिए दिल से पढ़े गए, क्योंकि उन्होंने दिल से लिखा। कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों ने डा. गिरि से प्रश्न भी पूछे।
कार्यक्रम के प्रारंभ में कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, रजिस्ट्रार डा. चंदर सोनाने, प्रो. आशीष जोशी, दीपक शर्मा, पवित्र श्रीवास्तव, पुष्पेंद्र पाल सिंह, डा. श्रीकांत सिंह, डा. पी. शशिकला, डा. आरती सारंग, वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा,पूर्व कुलसचिव पी. एन. साकल्ले आदि ने पुष्पहार से महामंडलेश्वर डा. गिरि का स्वागत किया। संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।

Saturday, July 30, 2011

चीनी ड्रैगन के कसते शिकंजे की अनदेखी खतरनाक



BHOPAL,
30 JULY 2011,
KUNDAN PANDEY

चीनी ड्रैगन की ताकत को शब्दों में बताने का एक कुत्सित प्रयास ही कहा जायेगा कि चीन विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जो प्रतिदिन 1 अरब डॉलर अधोसंरचना निर्माण में खर्च करता है। चीन का विनिर्माण उत्पादन 1,995 अरब डॉलर हो गया है। यह अमेरिका एवं अमेरिका के बाद के शीर्ष 6 देशों के योग से भी अधिक है। यह विश्व में वस्तुओं का सबसे बड़ा निर्यातक बन चुका है। चीन का विदेशी मुद्रा भण्डार गत वर्षान्त तक तकरीबन 2500 अरब डॉलर था। चीन ने फॉरेन रिजर्व, निर्यात व विनिर्माण के आधार पर युआन को विशेष आहरण अधिकार (एसडीआर) वाली मुद्रा का दर्जा देने की मांग की है जिसका विश्व बैंक अध्यक्ष रॉबर्ट जोएलिक ने भी समर्थन किया है।
चीन आधुनिक हथियारों के निर्माण में न केवल आत्मनिर्भर है बल्कि इन हथियारों के पाक जैसे देशों को निर्यात से विदेशी मुद्रा भी अर्जित करता है। उसके पास स्वविकसित व राडार की पकड़ में नहीं आने वाले पांचवी पीढ़ी के स्टील्थ समुद्री जहाज व स्टील्थ फाईटर प्लेन हैं। जिनका वह सफल परीक्षण कर चुका है। उसकी सेना के तीनों अंग हमारी सेना से मौटे तौर पर लगभग दोगुनी क्षमता रखते हैं। युगांतकारी सेनानायक नेपोलियन ने चीन के बारे में सत्य ही कहा था कि “चीन को सोने दो, क्योंकि वह अगर जाग गया तो दुनिया हिल जायेगी”। विश्व को तो नहीं लेकिन भारत को हर मोर्चे पर हिलाकर गर्त में ढ़केलने की रणनीति पर चीन मुस्तैदी से तन्मय-तत्पर होकर कार्य कर रहा है।
माओत्से तुंग ने चीन के विस्तारवादी महत्वाकांक्षा का एक पत्रावली में जिक्र करते हुए लिखा है कि, “तिब्बत; लद्दाख, सिक्किम, नेपाल, भूटान और अरुणाचल रूपी 5 उंग्लियों की हथेली है”। तुंग ने हथेली को उसकी पांचों उंग्लियों से जोड़ने का जो आह्वान किया था, अपनी आर्थिक और सामरिक स्वावलम्बल को मजबूत करते हुए चीन इन वर्षों में इन उंग्लियों को पाने के लिए जोर-शोर से ठोस रणनीतिक कवायद कर रहा है। इसके लिए वह विश्व के समस्त नियमों को तोड़ने से भी नहीं हिचक रहा है।
चीन ने एशियाई विकास बैंक से अरूणाचल प्रदेश को मिलने वाले ऋण को, इस प्रदेश को विवादास्पद कह कर रूकवा दिया। चुनाव प्रचार के लिए तवांग गए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का चीन ने खुलकर विरोध किया था। 1962 के युद्ध में चीन ने हमसे लद्दाख, सिक्किम और अरूणाचल प्रदेश में पड़ने वाली तकरीबन 40 हजार वर्ग मील जमीन हड़प ली। युद्ध में भारत की पराजय के बाद पाक ने पीओके का लगभग 5 हजार किमी हिस्सा को 1963 में चीन को यह समझ कर दे दिया कि मुझसे तो भारत लड़कर सारा कश्मीर कभी भी ले सकता है, परन्तु चीन से भारत शायद ही कभी युद्ध में जीत सके।
चीन निश्चित रूप से भारत से बड़ी आर्थिक शक्ति है, परन्तु यह आर्थिक ताकत विकसित देशों; अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस की तरह सीधे-सीधे साम्राज्यवादी लूट से तो नहीं, लेकिन आर्थिक बेईमानी से जरूर हासिल की गई है। चीन ने निर्यात में झंडा गाड़ने के लिए 1978 से ही अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करना शूरू कर दिया, जिसको 682 युआन प्रति डॉलर पर लाकर चीन ने स्थिर कर दिया है। भारत में यह डॉलर-रूपया विनिमय दर 45-50 के दरम्यान ही रहता है। भारत भी डॉलर के मुकाबले रूपये की विनिमय दर 600 के आस-पास करके अपनी आर्थिक प्रगति को तेज कर सकता है।
चीनी कम्पनी यदि 1 डॉलर का सामान विदेशों में निर्यात करती हैं तो बदले में उसको अपने देश की 682 युआन मिलेंगे। भारत में यह केवल 45 रूपए होगा। यह तो निहायती बेईमानी है। विश्वविख्यात अर्थशास्त्री क्रुगमैन ने चीन के बारे में ठीक कहा है कि, “चीन यदि युआन को लेकर ईमानदारी बरतता तो विश्व की विकास दर गत 5-6 सालों में औसतन डेढ़ प्रतिशत से अधिक होती, चीन ने अपनी मुद्रा युआन के 600 प्रतिशत से अधिक अवमूल्यन से अन्य व्यापारिक साझीदार देशों की विकास दर को हड़प लिया”।
चीन का श्रम विश्व में सबसे सस्ता है। बेईमानी की पूंजी भी भारत से अधिक है ही। मानव संसाधन, विश्व में सबसे अधिक उसके पास है। 2008 के लगभग पाश्चात्य मल्टीनेशनल कम्पनियों के लगभग 70 प्रतिशत तक के शेयर, चीनी सरकार ने बाजार मूल्य देकर शेयर मार्केट से केवल इसलिए खरीद लिया कि इनके सारे लाभ, पूंजी और नीतियों को वह नियंत्रित कर सके। भारत सरकार ऐसा शायद सोचे ही नहीं क्योंकि देश के भीतर और बाहर के कालाधन को लाने में सरकार की नीयत साफ नहीं लग रही, जब तक सोचेगी तब तक स्याह धन का अधिकांश सफेद धन में तब्दील हो चुका होगा।
चीन की अधिकतर क्षेत्रों में बढ़ती ताकत का सबसे बड़ा कारण, वहां लोकतंत्र का न होना है। इसके कारण वहां देश हित के फैसले, दिनों में; बिना वाद-विवाद, धरना-प्रदर्शन और आन्दोलन के हो जाते हैं। विशेष आर्थिक जोन (सेज) की अवधारणा भारत में चीन से आयी है। चीन में तो इस पर कोई बवाल नहीं हुआ परन्तु भारत में तो लोकतंत्र के कारण विरोध होंगे ही। चीन में राष्ट्रीय हित में फैसले एक दिन में भी लोकतंत्र न होने से लिए जा सकते हैं, लेकिन भारत में लोकतंत्र के कारण लोकपाल जैसे फैसलों में वर्षों लगते जाते हैं।
न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार पाक ने पीओके के गिलगित और बाल्टिस्तान जैसे उत्तरी इलाकों को चीन को सौंप दिया है, क्योंकि ये सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ, यहां के स्थानीय निवासियों को पाक अपना प्रबल विरोधी मानता है। इससे यह अर्थ निकाला जा सकता है कि यहां विद्रोह की संभावना प्रबल है। रिपोर्ट के मुताबिक पीओके के गिलगित व बाल्टिस्तान में चीन के लगभग 11 हजार सैनिक तैनात हैं, जो निश्चित रूप से शांति सैनिक तो नहीं है। चीन खुलकर भारत की सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का विरोध करता रहता है। वियना में हुए भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के तीव्र विरोध के बाद चीन ने न्यूक्लियर सप्लॉयर ग्रुप से भारत को बिना शर्त छूट मिलने का भी विरोध किया था।
नई दिल्ली स्थित ‘थिंक टैंक इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेन्स स्टडीज एंड एनालिसिस’ की रिपोर्ट में ऐसी आशंका व्यक्त की गयी है कि चीन 2020 तक पीओके पर अपना कब्जा कर लेगा। रिपोर्ट में कराकोरम हाईवे से गुपचुप तरीके से परमाणु सामग्री को चीन से पाक भेजने की संभावना व्यक्त की गई है। ऐसा होने पर भारत को कश्मीर को बचाये रखने के लिए पाक के साथ ही साथ, चारों तरफ से चीन से भी जूझना पड़ सकता है। जो भारत 60 से अधिक वर्षों में तीन बार पाक द्वारा थोपी गई लड़ाई को जीतकर पूरा कश्मीर नहीं ले पाया, वो चीन से शायद ही युद्ध जीतकर कश्मीर ले पाये।
सीमा पर तैनात उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल के. टी. पटनायक के एक सेमिनार में कहे गये तथ्यार्थों से संकेत मिलता है कि चीन पीओके में पन बिजली, पुल, कई सड़कें, कराकोरम नेशनल हाईवे व शिनजियांग प्रांत के शहर ‘खासघर’ से ग्वादर बंदरगाह तक रेलवे लाईन बिछाकर, भारत पर चारो तरफ से भीषण हमला करने की चौतरफा तैयारी कर रहा है। ग्वादर को चीन अपनी नौसेना का बेस बना रहा है। रेलवे से वहां पर उसकी सेना काफी कम समय में पहुंच जायेगी, जबकि भारतीय सेना सरकार से 26 वर्षों से तोपों के आधुनिकीकरण करने की गुहार ही लगा रही है।
वाशिंगटन स्थित सामरिक संस्थान ‘सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी’ के विशेषज्ञ रॉबर्ट कपलान के कथनार्थों के अनुसार “चीन कुछ नये बंदरगाहों का निर्माण करके हिंद महासागर में भी भारत को चुनौती देना चाहता है”। चीन बंग्लादेश के चितागोंग व हमबांतोला, पाकिस्तान में ग्वादर के साथ ही साथ बर्मा और श्रीलंका में भी बंदरगाह बना रहा है जिससे हिंद महासागर में भारत को चारो दिशाओं से घेर सके।
इसके अतिरिक्त चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाकर पं. बंगाल व असम की जनता को या तो प्यास व सूखे से मार सकता है या तो फसल को असिंचित करके नष्ट कर सकता है तथा अधिक वर्षा होने पर बांध को खोलकर इन दोनों प्रदेशों को भारी बाढ़ में झोंक देगा। पूर्वोत्तर के उग्रवादियों तथा नक्सलियों को चीन द्वारा हथियार और धन देने के आरोप लगते रहे हैं। बंग्लादेश, श्रीलंका व पाक के साथ भारत विरोधी गठजोड़ बनता साफ-साफ प्रतीत हो रहा है।
चीन, भारत की उत्तर तथा पश्चिम सीमा तक कम समय में पहुंचने के लिए सड़क, रेलवे लाइन्स, हवाई अड्डों तथा अन्य संसाधनों का खुलकर विकास कर रहा है। मेड इन चाइना के सस्ते मालों से भारत को पाटकर भारत की अर्थव्यवस्था को खोखला करता है। भारत सरकार से 1962 की तरह ही चीन को रणनीतिक रूप से समझने-निपटने में कहीं ‘देर ना हो जाय’। जे एम लिंगदोह के शब्दों में ‘राजनेता कैंसर हैं जिनका इलाज अब संभव नहीं’। ऐसे राजनेताओं का तो इस देर से कुछ नहीं बिगड़ेगा, परन्तु देश की कुछ और हजार वर्ग किमी जमीन को चीन हमेशा-हमेशा के लिए अवश्य ही हड़प लेगा।
(लेखक युवा पत्रकार हैं।)

Monday, July 4, 2011

मीडिया विमर्श का उर्दू पत्रकारिता पर केंद्रित अंक प्रकाशित


भोपाल,2 जुलाई, 2011। जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श का ताजा अंक (जून,2011) उर्दू पत्रकारिता के भविष्य पर केंद्रित है। इस अंक में देश के प्रख्यात उर्दू पत्रकारों एवं बुद्धिजीवियों के आलेख हैं। अंक के अतिथि संपादक जाने-माने उर्दू पत्रकार श्री तहसीन मुनव्वर हैं।
इस अंक में उर्दू के पांच बड़े पत्रकारों दैनिक एतमाद के सलाहकार संपादक नसीम आरफी, सियासत के संपादक जाहिद अली खान, रहनुमा-ए-दक्कन के संपादक सैय्यद विकारूद्दीन, वरिष्ठ पत्रकार अशफाक मिशहदी नदवी, यूएनआई उर्दू सर्विस के पूर्व संपादक शेख मंजूर अहमद और डेली नदीम के संपादक कमर अशफाक से विशेष साक्षात्कार प्रकाशित किए गए हैं। इसके अलावा ऐतिहासिक प्रसंगों पर डा. अख्तर आलम, डा. ए.अजीज अंकुर, इशरत सगीर और डा. जीए कादरी के लेख हैं, जिनमें उर्दू पत्रकारिता के स्वर्णिम इतिहास पर रोशनी डाली गयी है।
उर्दू पत्रकारिता के भविष्य पर विमर्श खंड में सर्वश्री फिरोज अशरफ, असद रजा, शाहिद सिद्दीकी, मासूम मुरादाबादी, संजय द्विवेदी, फिरदौस खान, उर्वशी परमार के लेख हैं। इसके अलावा नजरिया खंड में उर्दू पत्रकारिता के वर्तमान परिदृश्य पर बेहद महत्वपूर्ण सामग्री का संयोजन किया गया है जिसमें आरिफ अजीज, राजेश रैना, शारिक नूर, डा. माजिद हुसैन, आरिफ खान मंसूरी के लेख हैं।
विचारार्थ खंड में समाजवादी विचारक रघु ठाकुर, उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में प्राध्यापक एहतेशाम अहमद खान, पत्रकार ए. एन.शिबली, एजाजुर रहमान के लेख प्रस्तुत किए गए हैं। डा. निजामुद्दीन फारूखी ने उर्दू और रेडियो के रिश्ते पर एक बेबाकी से लिखा है। बिहार की उर्दू पत्रकारिता पर संजय कुमार और इलाहाबाद की उर्दू पत्रकारिता पर धनंजय चोपड़ा का लेख बहुत सारी जानकारियां समेटे हुए है। उर्दू पत्रकारिता में महिलाओं के योगदान पर डा. मरजिया आऱिफ ने बेहद शोधपरक लेख प्रस्तुत किया है। मीडिया विमर्श का यह अंक 25 रूपए में उपलब्ध है तथा पत्रिका की वार्षिक सदस्यता सौ रूपए है। पाठकगण निम्न पते पर अपना शुल्क भेजकर अपनी प्रति प्राप्त कर सकते हैं- संपादकः मीडिया विमर्श, 428- रोहित नगर, फेज-1, भोपाल-462039 (मप्र)