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Monday, July 4, 2011

मीडिया विमर्श का उर्दू पत्रकारिता पर केंद्रित अंक प्रकाशित


भोपाल,2 जुलाई, 2011। जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श का ताजा अंक (जून,2011) उर्दू पत्रकारिता के भविष्य पर केंद्रित है। इस अंक में देश के प्रख्यात उर्दू पत्रकारों एवं बुद्धिजीवियों के आलेख हैं। अंक के अतिथि संपादक जाने-माने उर्दू पत्रकार श्री तहसीन मुनव्वर हैं।
इस अंक में उर्दू के पांच बड़े पत्रकारों दैनिक एतमाद के सलाहकार संपादक नसीम आरफी, सियासत के संपादक जाहिद अली खान, रहनुमा-ए-दक्कन के संपादक सैय्यद विकारूद्दीन, वरिष्ठ पत्रकार अशफाक मिशहदी नदवी, यूएनआई उर्दू सर्विस के पूर्व संपादक शेख मंजूर अहमद और डेली नदीम के संपादक कमर अशफाक से विशेष साक्षात्कार प्रकाशित किए गए हैं। इसके अलावा ऐतिहासिक प्रसंगों पर डा. अख्तर आलम, डा. ए.अजीज अंकुर, इशरत सगीर और डा. जीए कादरी के लेख हैं, जिनमें उर्दू पत्रकारिता के स्वर्णिम इतिहास पर रोशनी डाली गयी है।
उर्दू पत्रकारिता के भविष्य पर विमर्श खंड में सर्वश्री फिरोज अशरफ, असद रजा, शाहिद सिद्दीकी, मासूम मुरादाबादी, संजय द्विवेदी, फिरदौस खान, उर्वशी परमार के लेख हैं। इसके अलावा नजरिया खंड में उर्दू पत्रकारिता के वर्तमान परिदृश्य पर बेहद महत्वपूर्ण सामग्री का संयोजन किया गया है जिसमें आरिफ अजीज, राजेश रैना, शारिक नूर, डा. माजिद हुसैन, आरिफ खान मंसूरी के लेख हैं।
विचारार्थ खंड में समाजवादी विचारक रघु ठाकुर, उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में प्राध्यापक एहतेशाम अहमद खान, पत्रकार ए. एन.शिबली, एजाजुर रहमान के लेख प्रस्तुत किए गए हैं। डा. निजामुद्दीन फारूखी ने उर्दू और रेडियो के रिश्ते पर एक बेबाकी से लिखा है। बिहार की उर्दू पत्रकारिता पर संजय कुमार और इलाहाबाद की उर्दू पत्रकारिता पर धनंजय चोपड़ा का लेख बहुत सारी जानकारियां समेटे हुए है। उर्दू पत्रकारिता में महिलाओं के योगदान पर डा. मरजिया आऱिफ ने बेहद शोधपरक लेख प्रस्तुत किया है। मीडिया विमर्श का यह अंक 25 रूपए में उपलब्ध है तथा पत्रिका की वार्षिक सदस्यता सौ रूपए है। पाठकगण निम्न पते पर अपना शुल्क भेजकर अपनी प्रति प्राप्त कर सकते हैं- संपादकः मीडिया विमर्श, 428- रोहित नगर, फेज-1, भोपाल-462039 (मप्र)

Wednesday, December 29, 2010

बात तो साफ हुई कि मीडिया देवता नहीं है


-संजय द्विवेदी
यह अच्छा ही हुआ कि यह बात साफ हो गयी कि मीडिया देवता नहीं है। वह तमाम अन्य व्यवसायों की तरह ही उतना ही पवित्र व अपवित्र होने और हो सकने की संभावना से भरा है। 2010 का साल इसलिए हमें कई भ्रमों से निजात दिलाता है और यह आश्वासन भी देकर जा रहा है कि कम से कम अब मीडिया के बारे में आगे की बात होगी। यह बहस मिशन और प्रोफेशन से निकलकर बहुत आगे आ चुकी है।
इस मायने में 2010 एक मानक वर्ष है जहां मीडिया बहुत सारी बनी-बनाई मान्यताओं से आगे आकर खुद को एक अलग तरह से पारिभाषित कर रहा है। वह पत्रकारिता के मूल्यों, मानकों और परंपराओं का भंजन करके एक नई छवि गढ़ रहा है, जहां उससे बहुत नैतिक अपेक्षाएं नहीं पाली जा सकती हैं। कुछ अर्थों में अगर वह कोई सामाजिक काम गाहे-बगाहे कर भी गया तो वह कारपोरेट्स के सीएसआर (कारपोरेट सोशल रिस्पांस्बिलिटी) के शौक जैसा ही माना जाना चाहिए। मीडिया एक अलग चमकीली दुनिया है। जो इसी दशक का अविष्कार और अवतार है। उसकी जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन के गर्भनाल में मत खोजिए, यह दरअसल बाजारवाद के नए अवतार का प्रवक्ता है। यह उत्तरबाजारवाद है। इसे मूल्यों, नैतिकताओं, परंपराओं की बेड़ियों में मत बांधिए। यह अश्वमेघ का धोड़ा है,जो दुनिया को जीतने के लिए निकला है। देश में इसकी जड़ें नहीं हैं। वह अब संचालित हो रहा है नई दुनिया के,नए मानकों से। इसलिए उसे पेडन्यूज के आरोपो से कोई उलझन, कोई हलचल नहीं है, वह सहज है। क्योंकि देने और लेने वालों दोनों के लक्ष्य इससे सध रहे हैं। लोकतंत्र की शुचिता की बात मत ही कीजिए। यह नया समय है,इसे समझिए। मीडिया अब अपने कथित ग्लैमर के पीछे भागना नहीं चाहता। वह लाभ देने वाला व्यवसाय बनना चाहता है। उसे प्रशस्तियां नहीं चाहिए, वह लोकतंत्र के तमाम खंभों की तरह सार्वजनिक या कारपोरेट लूट में बराबर का हिस्सेदार और पार्टनर बनने की योग्यता से युक्त है।
मीडिया का नया कुरूक्षेत्रः
मीडिया ने अपने कुरूक्षेत्र चुन लिए हैं। अब वह लोकतंत्र से, संवैधानिक संस्थाओं से, सरकार से टकराता है। उस पर सवाल उठाता है। उसे कारपोरेट से सवाल नहीं पूछने, उसे उन लोगों से सवाल नहीं पूछने जो मीडिया में बैठकर उसकी ताकत के व्यापारी बने हैं। वह सवाल खड़े कर रहा है बेचारे नेताओं पर,संसद पर जो हर पांच साल पर परीक्षा के लिए मजबूर हैं। वह मदद में खड़ा है उन लोगों के जो सार्वजनिक धन को निजी धन में बदलने की स्पर्धा में जुटे हैं। बस उसे अपना हिस्सा चाहिए। मीडिया अब इस बंदरबांट पर वाच डाग नहीं वह उसका पार्टनर है। उसने बिचौलिए की भूमिका से आगे बढ़कर नेतृत्व संभाल लिया है। उसे ड्राइविंग सीट चाहिए। अपने वैभव, पद और प्रभाव को बचाना है तो हमें भी साथ ले लो। यह चौथे खंभे की ताकत का विस्तार है। मीडिया ने तय किया है कि वह सिर्फ सरकारों का मानीटर है, उसकी संस्थाओं का वाच डाग है। आप इसे इस तरह से समझिए कि वह अपनी खबरों में भी अब कारपोरेट का संरक्षक है। उसके पास खबरें हैं पर किनकी सरकारी अस्पतालों की बदहाली की, वहां दम तोड़ते मरीजों की,क्योंकि निजी अस्पतालों में कुछ भी गड़ब़ड़ या अशुभ नहीं होता। याद करें कि बीएसएनएल और एमटीएनएल के खिलाफ खबरों को और यह भी बताएं कि क्या कभी आपने किसी निजी मोबाइल कंपनी के खिलाफ खबरें पढ़ी हैं। छपी भी तो इस अंदाज में कि एक निजी मोबाइल कंपनी ने ऐसा किया। शिक्षा के क्षेत्र में भी यही हाल है। सारे हुल्लड़-हंगामे सरकारी विश्वविद्यालयों, सरकारी कालेजों और सरकारी स्कूली में होते हैं- निजी स्कूल दूध के धुले हैं। निजी विश्वविद्यालयों में सारा कुछ बहुत न्यायसंगत है। यानि पूरा का पूरा तंत्र,मीडिया के साथ मिलकर अब हमारे जनतंत्र की नियामतों स्वास्थ्य, शिक्षा और सरकारी तंत्र को ध्वस्त करने पर आमादा है। साथ ही निजी तंत्र को मजबूत करने की सुनियोजित कोशिशें चल रही हैं। मीडिया इस तरह लोकतंत्र के प्रति, लोकतंत्र की संस्थाओं के प्रति अनास्था बढ़ाने में सहयोगी बन रहा है, क्योंकि उसके व्यावसायिक हित इसमें छिपे हैं। व्यवसाय के प्रति लालसा ने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है। मीडिया संस्थान,विचार के नकली आरोपण की कोशिशों में लगे हैं ।यह मामला सिर्फ चीजों को बेचने तक सीमित नहीं है वरन पूरे समाज के सोच को भी बदलने की सचेतन कोशिशें की जा रही हैं। शायद इसीलिए मीडिया की तरफ देखने का समाज का नजरिया इस साल में बदलता सा दिख रहा है।
यह नहीं हमारा मीडियाः
इस साल की सबसे बड़ी बात यह रही कि सूचनाओं ने, विचारों ने अपने नए मुकाम तलाश लिए हैं। अब आम जन और प्रतिरोध की ताकतें भी मानने लगी हैं मुख्यधारा का मीडिया उनकी उम्मीदों का मीडिया नहीं है। ब्लाग, इंटरनेट, ट्विटर और फेसबुक जैसी साइट्स के बहाने जनाकांक्षाओं का उबाल दिखता है। एक अनजानी सी वेबसाइट विकिलीक्स ने अमरीका जैसी राजसत्ता के समूचे इतिहास को एक नई नजर से देखने के लिए विवश कर दिया। जाहिर तौर पर सूचनाएं अब नए रास्तों की तलाश में हैं. इनके मूल में कहीं न कहीं परंपरागत संचार साधनों से उपजी निराशा भी है। शायद इसीलिए मुख्यधारा के अखबारों, चैनलों को भी सिटीजन जर्नलिज्म नाम की अवधारणा को स्वीकृति देनी पड़ी। यह समय एक ऐसा इतिहास रच रहा है जहां अब परंपरागत मूल्य, परंपरागत माध्यम, उनके तौर-तरीके हाशिए पर हैं। असांजे, नीरा राडिया, डाली बिंद्रा,, राखी सावंत, शशि थरूर, बाबा रामदेव, राजू श्रीवास्तव जैसे तमाम नायक हमें मीडिया के इसी नए पाठ ने दिए हैं। मीडिया के नए मंचों ने हमें तमाम तरह की परंपराओं से निजात दिलाई है। मिथकों को ध्वस्त कर दिया है। एक नई भाषा रची है। जिसे स्वीकृति भी मिल रही है। बिग बास, इमोशनल अत्याचार, और राखी का इंसाफ को याद कीजिए। जाहिर तौर पर यह समय मीडिया के पीछे मुड़कर देखने का समय नहीं है। यह समय विकृति को लोकस्वीकृति दिलाने का समय है। इसलिए मीडिया से बहुत अपेक्षाएं न पालिए। वह बाजार की बाधाएं हटाने में लगा है। तो आइए एक बार फिर से हम हमारे मीडिया के साथ नए साल के जश्न में शामिल हो जाएं।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

Monday, November 1, 2010

मीडिया की आचार संहिता बनाएगा पत्रकारिता विश्वविद्यालय



माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल की महापरिषद की बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसले


- डा. नंदकिशोर त्रिखा, प्रो. देवेश किशोर, रामजी त्रिपाठी और आशीष जोशी बने प्रोफेसर
भोपाल, 1 नवंबर, 2010।

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल की पिछले दिनों सम्पन्न महापरिषद की बैठक में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। महापरिषद के अध्यक्ष और प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में हुयी इस बैठक का सबसे बड़ा फैसला है मीडिया के लिए एक आचार संहिता बनाने का। इसके तहत विश्वविद्यालय मीडिया और जनसंचार क्षेत्र के विशेषज्ञों के सहयोग से तीन माह में एक आचार संहिता का निर्माण करेगा और उसे मीडिया जगत के लिए प्रस्तुत करेगा। पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.बीके कुठियाला के कार्यकाल की यह पहली बैठक है, जिसमें विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए महापरिषद ने अपनी सहमति दी और कहा है कि इसे मीडिया, आईटी और शोध के राष्ट्रीय केंद्र के रूप में विकसित किया जाए।
नए विभाग- नई नियुक्तियां- विश्वविद्यालय में शोध और अनुसंधान के कार्यों को बढ़ावा देने के लिए संचार शोध विभाग की स्थापना की गयी है। जिसके लिए प्रोफेसर देवेश किशोर की संचार शोध विभाग में दो वर्ष के लिये प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति का फैसला लिया गया है। इस विभाग में मौलिक शोध व व्यवहारिक शोध के कई प्रोजेक्ट डॉ. देवेश के मार्गदर्शन में चलेंगें। प्रोफेसर (डॉ.) नंदकिशोर त्रिखा की दो वर्ष के लिये सीनियर प्रोफेसर पद पर नियुक्ति की गयी है। अगले दो वर्ष में डॉ. त्रिखा के मार्गदर्शन में मीडिया की पाठ्यपुस्तकें हिन्दी व अंग्रेजी में लिखी जाएंगी। इस काम को अंजाम देने के लिए विश्वविद्यालय में अलग से पुस्तक लेखन विभाग की स्थापना होगी। इसी तरह विश्वविद्यालय में प्रकाशन विभाग की स्थापना की गयी है। जिसमें प्रभारी के रूप में वरिष्ठ पत्रकार एवं पीपुल्स समाचार के पूर्व स्थानीय संपादक राधवेंद्र सिंह की नियुक्ति की गयी है, विभाग में सौरभ मालवीय को प्रकाशन अधिकारी बनाया गया है। अल्पकालीन प्रशिक्षण विभाग की स्थापना की गयी है, जिसके तहत श्री रामजी त्रिपाठी, केन्द्रीय सूचना सेवा (सेवानिवृत्त), पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक, प्रसार भारती (दूरदर्शन) की दो वर्ष के लिये प्रोफेसर के पद पर अल्पकालीन प्रशिक्षण विभाग में नियुक्ति की गयी है। श्री त्रिपाठी जिला और निचले स्तर के मीडिया कर्मियों के लिये प्रशासन में कार्यरत मीडिया कर्मियों के लिये व वरिष्ठ मीडिया कर्मियों के लिये प्रशिक्षण व कार्यशालाओं का आयोजन करेंगे। इसी तरह श्री आशीष जोशी, मुख्य विशेष संवाददाता, आजतक की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग में प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति की गयी है। श्री आशीष जोशी, भोपाल परिसर में टेलीविजन प्रसारण विभाग में कार्यरत रहेंगे।
टास्क कर्मचारियों को दीपावली का तोहफा- विश्वविद्यालय में कार्यरत दैनिक वेतन पाने वाले लगभग 85 कर्मचारियों के वेतन में 25 प्रतिशत वृद्धि करने का फैसला किया गया है। इसी तरह शिक्षकों के लिए ग्रीष्मकालीन व शीतकालीन अवकाश की व्यवस्था भी एक बड़ा फैसला है। अब तक विश्वविद्यालय में जाड़े और गर्मी की छुट्टी (अन्य विश्वविद्यालयों की तरह) नहीं होती थी। आपात स्थिति के लिये 10 करोड़ रूपये का कार्पस फंड बनाया गया है , जिसमें हर वर्ष वृद्धि होगी। शिक्षक कल्याण कोष की स्थापना भी की गयी है। इसके अलावा चार प्रोफेसर, आठ रीडर व आठ लेक्चरार (कुल 20) अतिरिक्त शैक्षणिक पदों का अनुमोदन किया गया है, जिसपर विश्वविद्यालय नियमानुसार नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करेगा।
बनेगा स्मार्ट परिसरः विश्वविद्यालय के लिये भोपाल में 50 एकड़ भूमि पर ‘‘ग्रीन’’ व ‘‘स्मार्ट’’ परिसर बनाने के कार्यक्रम की शुरूआत की जाएगी। जिसके लिए भवन निर्माण शाखा की स्थापना भी की गयी है।
आगामी दो वर्षों में टेलीविजन कार्यक्रम निर्माण, नवीन मीडिया, पर्यावरण संवाद, स्पेशल इफैक्ट्स व एनीमेशन में श्रेष्ठ सुविधाओं का निर्माण के लिए यह परिसर एक बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके साथ ही आगामी पांच वर्षों में आध्यात्मिक संचार, गेमिंग, स्पेशल इफैक्ट्स, एनीमेशन व प्रकृति से संवाद के क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने की तैयारी है।इस बैठक में प्रबंध समिति के कार्यों व अधिकारों का स्पष्ट निर्धारण भी किया गया है। बैठक में महापरिषद के अध्यक्ष मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, कुलपति प्रो. बीके कुठियाला, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर के कुलपति प्रो. रामराजेश मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार राधेश्याम शर्मा (चंडीगढ़), साधना(गुजराती) के संपादक मुकेश शाह, विवेक (मराठी) के संपादक किरण शेलार, सन्मार्ग- भुवनेश्वर के संपादक गौरांग अग्रवाल, स्वदेश समाचार पत्र समूह के संपादक राजेंद्र शर्मा, काशी विद्यापीठ के प्रोफेसर राममोहन पाठक, दैनिक जागरण भोपाल के संपादक राजीवमोहन गुप्त, जनसंपर्क आयुक्त राकेश श्रीवास्तव, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के सलाहकार अशोक चतुर्वेदी, विश्वविद्यालयय के रेक्टर प्रो.चैतन्य पुरूषोत्तम अग्रवाल, नोयडा परिसर में प्रो. डा. बीर सिंह निगम शामिल थे।

Saturday, October 30, 2010

आंतरिक सुरक्षा पर मीडिया में ऊहापोह




कुन्दन पाण्डेय
MAMC III SEM
भोपाल 30 अक्टूबर,2010



आज का युग मीडिया क्रांति का युग है। आज मीडिया की प्रभावकता इतनी अधिक बढ़ गयी है कि मीडिया किसी घटना, विषय या व्यक्ति को अत्यल्प समय में अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियां बना सकता है और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां रूपी अर्श से फर्श पर भी पटक सकता है। परन्तु, ताज्जुब की बात यह है कि आंतरिक सुरक्षा जैसे गंभीर व संवेदनशील राष्ट्रीय विषय पर मीडिया अपनी सकारात्मक भूमिका की जगह लगातार ऊहापोह की स्थिति में नजर आ रहा है।
आज देश की आंतरिक सुरक्षा अत्यंत नाजुक दौर से गुजर रही है। एक ओर जेहादी आतंकवादियों का देश भर में फैलता हुआ संजाल तो दूसरी ओर नक्सली, पूर्वोत्तर के अलगाववादी संगठन, भारत माता के मष्तक कश्मीर को शाश्वत रणभूमि बना देने में संलग्न पाकिस्तानी आतंकी, अदृश्य रुप में चोरी, ड़कैती, तोड़फोड़ करने वाले लगभग 4 करोड़ बंग्लादेशी घुसपैठिए, देश के रोम रोम में अगणित वर्षों से समाये आईएसआई एजेन्टों और प्रशिक्षित दहशतगर्दों द्वारा अत्याधुनिक संचार साधनों तथा अरब देशों से प्राप्त बेहिसाब पैसे के बल पर जबरर्दस्त कहर ढाया जा रहा है।
इस संजाल को तोड़ने में सरकार, पुलिस एवं गुप्तचर एजेंसियाँ तो हमेशा साँप निकल जाने पर लाठी पीटने जैसा कार्य कर रही हैं, क्योंकि इन सभी में कुछ देशद्रोही घुसे हुए हैं, परन्तु मीडिया में तो इस तरह की कोई बात नहीं है। तो फिर मीडिया स्वयं से अपनी भूमिका सार्वजनिक कर जनता जनार्दन को यह बताये कि उसका आंतरिक सुरक्षा से कोई सरोकार है या नहीं? यदि है तो इस सरोकार के लिए मीडिया अब तक क्या-क्या कर चुका है?
कश्मीर के मामले में मीडिया सरकार के एजेंट की तरह कार्य करती हुई प्रतीत हो रही है। कश्मीर में पिछले वर्ष तक लगभग सबकुछ ठीक रहने पर केन्द्र सरकार विशेष सशस्त्र बल अधिनियम हटाने व पाक अधिकृत कश्मीर गये आतंकवादियों के घर वापसी व पुनर्वास की व्यवस्था करने की कवायद कर रही थी तो मीडिया ने सरकार से यह मुखरित होकर क्यों नहीं कहा कि कश्मीर अंदर ही अंदर शांति से सुलग रहा है। आखिरकार एक दिन यह सुलग रही आग व्यापक रुप से सबके सामने आ ही गयी।
जब कश्मीर में हालात अचानक विस्फोटक हो गये, तब सरकार की पुरजोर आलोचना, जब 26/11 को मुम्बई हमला हुआ तब सरकार की मुखर आलोचना, जब संसद पर हमला हुआ तब सरकार की चौतरफा आलोचना और 26/11 के बाद जब तक विस्फोट नहीं हुए तब तक तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की मुक्तकण्ठ से मीडिया में होने वाली सारी प्रशंसायें विस्फोट के फौरन बाद कठोर आलोचनाओं में तब्दील हो गयी।
पूर्वोत्तर के राज्यों में भारत से स्वतंत्र राज्य बनाने की माँग करने का एक प्रमुख आधार कश्मीर को मिला विशेष राज्य का दर्जा भी रहा है। पूर्वोत्तर के प्रमुख पृथकतावादी संगठनों में से प्रमुख ‘यूनाईटेड लिबरेशन फ्रन्ट ऑफ असम’ अर्थात् उल्फा, नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रन्ट ऑफ बोडोलैन्ड, नेशनल लिबरेशन फ्रन्ट ऑफ त्रिपुरा, मणिपुर में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी, मिजो नेशनल फ्रन्ट, नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नागालैन्ड-आईजक मूईवा (एन एस सी एन- आई एम) आदि प्रमुख हैं परन्तु मीडिया में इनकी गंभीरता से चर्चा कम ही हो पाती है जबकि पूर्वोत्तर के अधिकांश राज्य अशांति से ग्रस्त ही रहते हैं।
गत लोकसभा चुनावों के पेड न्यूज व मुम्बई के 26/11 हमले के कवरेज से मीडिया विश्वसनीयता के मामले में सबसे अविश्वसनीय हो गया है। विश्वसनीयता कभी खरीदी-बेची, बनाई-बिगाड़ी नहीं जा सकती, यह गणितबाजी-चालबाजी से निर्मित नहीं की जा सकती। यह कच्चे धागे की तरह अत्यंत नाजुक होती है जो काल के कपाल पर मीडिया या व्यक्ति अपने मन-वचन, कर्म और आचरण से धीरे-धीरे अर्जित ही कर सकते हैं निर्मित नहीं कर सकते।
मीडिया अगर आंतरिक सुरक्षा जैसे किसी राष्ट्रीय मसले पर ठोस कवायद कर दे तो वह अपनी अविश्वसनीयता को कुछ हद तक विश्वसनीयता में तब्दील कर पायेगा। पीपली लाईव फिल्म ने तो इलेक्ट्रानिक मीडिया की सारी कलई खोल कर रख दी है। दरअसल मीडिया का अब एक ही इष्ट देव है वह है लाभ-लाभ, बस लाभ, केवल लाभ। मीडिया लोक कल्याण के ध्येय को तिरोहित करने पर आमादा तो है लेकिन मजबूरी में, क्योंकि इष्टदेव की आराधना बंद करने पर वह कुपित भी हो सकते हैं। वैसे यदि देश गुलामी के दौर की तकनीक और सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व नैतिक स्थिति व स्तर में नहीं जा सकता तो, मीडिया क्यों और कैसे चला जाय।
आंतरिक सुरक्षा की गंभीर स्थिति देश के आर्थिक विकास के लिए विकराल चुनौती है। आंतरिक सुरक्षा को नष्ट करने वाले दुर्जनों के विरुद्ध जब भी कारगर कार्रवाई की बात की जाती है, तब छद्म मानवाधिकारवादी हत्यारों के मानवाधिकार की बात करते नहीं अघाते। मानव अधिकार किसके मरने वाले के या मारने वाले के, लेकिन मीडिया छद्म मानवाधिकारवादियों के चेहरे से नकाब को नहीं उतारती क्योंकि मीडिया द्वारा इस विषय में किए गए प्रयत्न बिकाऊ या टी आर पी बढ़ाने वाले साबित नहीं होंगे।
राष्ट्र के संप्रभुता के सर्वोच्च प्रतीक संसद पर हमले के जुर्म में उच्चतम न्यायालय द्वारा मृत्युदंडित अफजल गुरू को कई वर्षों से छद्म सेकुरलवाद के कारण सजा नहीं दी जा पा रही है। भारत की मीडिया अफजल जैसे आतंकवादियों को क्या यह संदेश देना चाहती है कि राष्ट्र ऐसे आतंकियों को सजा देने के मसले पर एक मत नहीं है। इस विषय पर कोई प्रयत्न नहीं करने से तो यही साबित होता है कि मीडिया आंतरिक सुरक्षा के मसले पर केवल हमले के बाद की सख्त रिपोर्टिंग तक सीमित रहता है। हमले के बाद आंतरिक सुरक्षा को अभेद्य बनाने हेतु मीडिया कुछ नहीं करना चाहता।
मीडिया की आलोचना इतनी सतही और स्तरहीन है कि वह सुरक्षा व्यवस्था की कठोरता, मजबूती या अभेद्यता पर आधारित ना होकर हमले या बम विस्फोट पर आधारित है। जिस सुरक्षा-व्यवस्था की प्रशंसा हमले या विस्फोट नहीं होने पर मुक्त कंठ से होती है उसी व्यवस्था की विस्फोट के बाद चौतरफा अतिशय आलोचना होती है। मीडिया इस व्यवस्था का सूक्ष्म विश्लेषण करके आलोचना इसलिए नहीं करता, क्योंकि ऐसा करके मीडिया अपनी टीआरपी या पाठक संख्या को नहीं बढ़ा पायेगा।
मीडिया का आर्थिक जीवनचक्र पूर्णतया बाजार-आधारित है, मिशन-आधारित नहीं। वर्तमान मीडिया को संतुलित और पौष्टिक आहार देकर पेट भरने का काम केवल बाजार ही कर सकता है, सामाजिक राष्ट्रीय मिशन नहीं।
आंतरिक सुरक्षा के लिए व्यवस्थापिका व कार्यपालिका अपनी-अपनी भूमिकाओं में मुस्तैद है कि नहीं, इसकी कड़ी निगरानी करके जनता-जनार्दन को अवगत कराने का काम मीडिया का ही है। अगर सत्ता अपनी सुविधा हेतु सामान्य जनजीवन के लिए अपरिहार्य सुरक्षा के विषय को हाशिए पर धकेल रहा है तो मीडिया को इस विषय को चर्चा के केन्द्र में लाकर सत्ताधीशों पर दबाव बनाये क्योंकि ऐसा काम केवल मीडिया ही कर सकता है।
यदि मीडिया आंतरिक सुरक्षा पर अपना कर्तव्य निभाने के मामले में पुलिस, गुप्तचर एजेन्सियों तथा सरकार जैसे ही असफल है तो उसे अन्य तीनों लोकतांत्रिक स्तम्भों को कठघरे में खड़ा करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। यदि मीडिया लोकतंत्र में तीनों स्तम्भों के बराबर की (लम्बाई व मजबूती का) भागीदार है तो उसकी लोकतंत्र के हर मसले पर बराबर की जिम्मेदारी भी है।
भारत जैसे सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक, सांस्कृतिक-धार्मिक-पारम्पिरक वैविध्य वाले देश में आंतरिक सुरक्षा को राष्ट्रव्यापी स्वरूप में अक्षुण्ण बनाए रखना वोट बैंक को दृष्टिगत रखकर हर फैसला करने वाली सरकार के लिए अत्यधिक दुरूह कार्य है। मीडिया आंतरिक सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए ना तो सरकार के समानांतर कार्य कर सकता है, न ही खुद सरकार बन सकता है। वह अपनी सीमा में रहकर केवल प्रचंड व बाध्यकारी जनमत का निर्माण कर सकता है। जब मीडिया सामाजिक राष्ट्रीय सरोकारों के तहत आंतरिक सुरक्षा के लिए जबरदस्त अभियान चलाएगा तो उससे उसका व्यवसायिक हित जरूर प्रभावित होगा। मसलन मीडिया को यदि सामाजिक राष्ट्रीय सरोकार व व्यवसायिक हित में से किसी एक को प्राथमिकता देनी हो, तो वह निश्चित रूप से व्यवसायिकता को पहली प्राथमिकता देगा।
आदर्श कहता है कि मीडिया जनगणमन को वह न दे, जो की वह मीडिया से चाहता है, बल्कि मीडिया जनगणमन को वह दे जो की मीडिया को उसे देना चाहिए। परन्तु वैश्वीकरण का वर्तमान वैश्विक परिदृश्य मीडिया से यह चीख-चीख कर कह रहा है कि वैश्वीकरण के विरोध से मीडिया का विकास एकांगी होगा,े जो वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में शायद ही टिक पाये।
वर्तमान बहुमत शासित वैश्विक व भारतीय परिदृश्य में मीडिया पाठक-दर्शक-श्रोता किसी गंभीर विषय को पढ़ना-देखना-सुनना नहीं चाहते हैं। बहुमत का दबाव है कि हल्की, मनोरंजक, चटपटी, गॉशिप वाली फिचरिस्टिक खबरें मीडिया में बहुतायत से रहे, तो मीडिया जनमत की अवहेलना कैसे करे। जनमत आदर्श, औसत, उत्कृष्ट या निकृष्ट कुछ भी हो सकता है, परन्तु पहले वह जनमत है, उसकी अवहेलना खबरपालिका सहित चारों स्तम्भों के लिए लगभग नामुमकिन ही है।

Tuesday, October 12, 2010

Media’s involvement in Ayodhya verdict and Commonwealth Games




Nitisha Kashyap
MAMC III SEM
Bhopal, 12oct2010

Media, as we all know, plays a very crucial role in making opinions and propagating messages. We have two cases in which media’s participation have been contradictory.
The first case is the Ayodhya verdict. After more than a decade’s wait the historic Ayodhya verdict came on September 30. Like the year 1992, this time too there was maximum probability of riots. Much havoc were created by the anti-social elements and the media forgetting its social responsibility were dogging them. Similar coverage was done with the 26/11 Mumbai terrorist attack case. It had raised a lot of questions (which all of us are well aware of). This time, as Shailja Bajpai of Indian Express opines, media did take lessons from 26/11. The panic creation was null. In fact news channels like CNN-IBN, NDTV 24×7, NDTV India started a campaign where we saw celebrities requesting and appealing for communal harmony. Apart from the news channels, we also saw newspapers appealing for peace. There were articles related to communal harmony and version of various religious leaders/preachers asking for peace. Media having greater and immediate impact on public did not go for the oversimplification and over interpretation of the verdict. In fact they said that it is a very “secular” verdict. Kudos to media.
But when we talk about media’s coverage of Commonwealth Games, we do not see an iota’s positive ness. Media has been very critical about the Commonwealth Games. Each and every thing has been criticized. Media’s exclusive stories about the games village are disappointing. I am not of the view that media should not expose the conditions but in a particular manner. Daily in the morning when you pick your newspaper or switch over to various news channels the only news for people were the stories of CWG ‘s bad progress. Those news could have been in the inner pages of the newspapers. (Well i’m a novice to comment on this). No wonder the foreign media is also criticizing. The Australian media telecasted a fake sting operation showing the “ill security” inside the CWG village. Though that news was later criticised by ABC(Australian Broadcasting Cooperation). Apart from showing the ill-functioning they could have shown the hard work that they have put. I’m not talking of the CWG’s management or the corruption (it will involve an incessant debate). There were many things to highlight apart from the ill functioning. Commonwealth Game will reflect our image in the international market.

In Ayodhya verdict case media was successful in developing a positive image and response but just the opposite happened with the coverage of Commonwealth Games.

Wednesday, September 8, 2010

जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी की नई किताबः


पुस्तक समीक्षाः भारतीय मीडिया की सच्ची पड़ताल
समीक्षकः डा. शाहिद अली
पुस्तक का नामः मीडिया नया दौर-नई चुनौतियां (लेख संग्रह),
प्रकाशकः यश पब्लिकेशन्स, 1 / 10753 सुभाष पार्क, गली नंबर-3, नवीन शाहदरा, नीयर कीर्ति मंदिर, दिल्ली-110031, मूल्यः 150 रुपये मात्र


नए दौर में मीडिया दो भागों में बंटा हुआ है, एक प्रिंट मीडिया और दूसरा इलेक्ट्रानिक मीडिया। भाषा और तेवर भी दोनों के अलग–अलग हैं। खबरों के प्रसार की दृष्टि से इलेक्ट्रानिक मीडिया तेज और तात्कालिक बहस छेड़ने में काफी आगे निकल आया है। प्रभाव की दृष्टि से प्रिंट मीडिया आज भी जनमानस पर अपनी गहरी पैठ रखता है। फिर वे कौन से कारण हैं कि आज मीडिया की कार्यशैली और उसके व्यवहार को लेकर सबसे ज्यादा आलोचना का सामना मीडिया को ही करना पड़ रहा है। चौथे खंभे पर लगातार प्रहार हो रहे हैं। समाज का आईना कहे जाने वाले मीडिया को अब अपने ही आईने में शक्ल को पहचानना कठिन हो रहा है। पत्रकारिता के सरोकार समाज से नहीं बल्कि बाजार से अधिक निकट के हो गये हैं। नये दौर का मीडिया सत्ता की राजनीति और पैसे की खनक में अपनी विरासत के वैभव और त्याग का परिष्कार कर चुका है। यानी मीडिया का नया दौर तकनीक के विकास से जितना सक्षम और संसाधन संपन्न हो चुका है उससे कहीं ज्यादा उसका मूल्यबोध और नैतिक बल प्रायः पराभव की तरफ बढ़ चला है।
संजय द्विवेदी की नई पुस्तक मीडिया का नया दौर नई चुनौतियां इन सुलगते सवालों के बीच बहस खड़ी करने का नया हौंसला है। संजय द्विवेदी अपनी लेखनी के जरिये ज्वलंत मुद्दों पर गंभीर विमर्श लगातार करते रहते हैं। लेखक और पत्रकार होने के नाते उनका चिन्तन अपने आसपास के वातावरण के प्रति काफी चौकन्ना रहता है, इसलिये जब वे कुछ लिखते हैं तो उनकी संवेदनाएं बरबस ही मुखर होकर सामने आती हैं। राजनीति उनका प्रिय विषय है लेकिन मीडिया उनका कर्मक्षेत्र है। संजय महाभारत के संजय की तरह नहीं हैं जो सिर्फ घटनाओं को दिखाने का काम करते हैं, लेखक संजय अपने देखे गये सच को उसकी जड़ में जाकर पड़ताल करते हैं और सम्यक चेतना के साथ उन विमर्शों को खड़ा करने का काम करते हैं जिसकी चिंता पूरे समाज और राष्ट्र को करना चाहिये।
यह महज वेदना नहीं है बल्कि गहरी चिंता का विषय भी है कि आजादी के पहले जिस पत्रकारिता का जन्म हुआ था इतने वर्षों बाद उसका चेहरा-मोहरा आखिर इतना क्यों बदल गया है कि मी़डिया की अस्मिता ही खतरे में नजर आने लगी है। पत्रकार संजय लंबे समय से मीडिया पर उठ रहे सवालों का जवाब तलाशने की जद्दोजहद करते हैं। कुछ सवाल खुद भी खड़े करते हैं और उस पर बहस के लिये मंच भी प्रदान करते हैं। बाजारवादी मीडिया और मीडिया के आखिरी सिपाही स्व.प्रभाष जोशी के बीच की जंग तक के सफर को संजय काफी नजदीक से देखते हैं और सीपियों की तरह इकट्ठा करके लेखमालाओं के साथ प्रस्तुत करते हैं। संजय के परिश्रमी लेखन पर प्रख्यात आलोचक श्री अष्टभुजा शुक्ल कहते हैं - संजय के लेखन में भारतीय साहित्य, संस्कृति और इसका प्रगतिशील इतिहास बार-बार झलक मारता है बल्कि इन्हीं की कच्ची मिट्टी से लेखों के ये शिल्प तैयार हुए हैं। अतः उनका लेखन तात्कालिक सतही टिप्पणियां न होकर, दीर्घजीवी और एक निर्भीक, संवेदनशील तथा जिन्दादिल पत्रकार के गवाह हैं। ऐसे ही शिल्प और हस्तक्षेप किसी भी समाज की संजीवनी है।
यह सच है कि संजय के लेखों में साहित्य, संस्कृति और प्रगतिशील इतिहास का अदभूत संयोग नजर आता है। इससे भी अधिक यह है कि वे बेलाग और त्वरित टिप्पणी करने में आगे रहते हैं। वैचारिक पृष्ठभूमि में विस्तार से प्रकाश डालना संजय की लेखनी का खास गुण हैं, जिससे ज्यादातर लोग सहमत हो सकते हैं। पं.माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर कमल दीक्षित ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि श्री द्विवेदी प्रोफेशनल और अकादमिक अध्येता – दोनों ही हैं। वे पहले समाचार-पत्रों में संपादक तक की भूमिका का निर्वाह कर चुके हैं। न्यूज चैनल में रहते हुए उन्होंने इलेक्ट्रानिक मीडिया को देखा समझा है। अब वे अध्यापक हैं। ऐसा व्यक्ति जब कोई विमर्श अपने विषय से जुड़कर करता है तो वह अपने अनुभव तथा दृष्टि से संपन्न होता है, इस मायने में संजय द्विवेदी को पढ़ना अपने समय में उतरना है। ये अपने समय को ज्यादा सच्चाई से बताते हैं। संजय के लेखन के बारे में दो विद्वानों की टिप्पणियां इतना समझने में पर्याप्त है कि उनकी पुस्तक का फलसफा क्या हो सकता है।
अतः इस पुस्तक में संजय ने मी़डिया की जिस गहराई में उतरकर मोती चुनने का साहस किया है वह प्रशंसनीय है। पुस्तक में कुल सत्ताइस लेखों को क्रमबद्ध किया गया हैं जिनमें उनका आत्मकथ्य भी शामिल है।
पहले क्रम में लेखक ने नई प्रौद्योगिकी, साहित्य और मीडिया के अंर्तसंबंधों को रेखांकित किया है। आतंकवाद, भारतीय लोकतंत्र और रिपोर्टिंग, कालिख पोत ली हमने अपने मुंह पर, मीडिया की हिन्दी, पानीदार समाज की जरुरत, खुद को तलाशता जनमाध्यम जैसे लेखों के माध्यम से लेखक ने नये सिरे से तफ्तीश करते हुए समस्याओं को अलग अन्दाज में रखने की कोशिश की है। बाजारवादी मीडिया के खतरों से आगाह करते हैं मीडिया को धंधेबाजों से बचाईये, दूसरी ओर मीडिया के बिगड़ते स्वरुप पर तीखा प्रहार करने से नहीं चूकते हैं। इन लेखों में एक्सक्लुजिव और ब्रेकिंग के बीच की खबरों के बीच कराहते मीडिया की तड़फ दिखाने का प्रयास भी संजय करते हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रिंस की पहचान कराते हैं और मीडिया के नारी संवेदनाओं को लेकर गहरी चिंता भी करते हैं। मीडिया में देहराग, किस पर हम कुर्बान, बेगानी शादी में मीडिया दीवाना जैसे लेखों में वे मीडिया की बेचारगी और बेशर्मी पर अपना आक्रोश भी जाहिर करते हैं।
श्री संजय की पुस्तक में मीडिया शिक्षा को लेकर भी कई सवाल हैं। मीडिया के शिक्षण और प्रशिक्षण को लेकर देश भर कई संस्थानों ने अपने केन्द्र खोले है। कई संस्थान तो ऐसे हैं जहां मीडिया शिक्षण के नाम पर छद्म और छलावा का खेल चल रहा है। मीडिया में आने वाली नई पीढ़ी के पास तकनीकी ज्ञान तो है लेकिन उसके उद्दैश्यों को लेकर सोच का अभाव है। अखबारों की बैचेनी के बीच उसके घटते प्रभाव को लेकर भी पुस्तक में गहरा विमर्श देखने को मिलता है। विज्ञापन की तर्ज पर जो बिकेगा, वही टिकेगा जैसा कटाक्ष भी लेखक संजय ने किया है। वहीं थोडी सी आशा भी मीडिया से रखते हैं कि जब तंत्र में भरोसा न रहे वहां हम मीडिया से ही उम्मीदें पाल सकते हैं।
श्री संजय हिंदी की पत्रकारिता पर अपना ध्यान और ध्येय केन्द्रित करते हैं। उनका मानना है कि अब समय बदल रहा है इकोनामिक टाईम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड और बिजनेस भास्कर का हिन्दी में प्रकाशन यह साबित करता है कि हिंदी क्षेत्र में आर्थिक पत्रकारिता का नया युग प्रारंभ हो रहा है। हिंदी क्षेत्र में एक स्वस्थ औद्योगिक वातावरण, व्यावसायिक विमर्श, प्रशासनिक सहकार और उपभोक्ता जागृति की संभावनाएं साफ नजर आ रही हैं। हालांकि वे हिन्दी बाजार में मीडिया वार की बात भी करते हैं। फिलवक्त उन्होंने अपनी पुस्तक में पत्रकारिता की संस्कारभूमि छत्तीसगढ़ के प्रभाव को काफी महत्वपूर्ण करार दिया है। अपने आत्मकथ्य मुसाफिर हुं यारों के माध्यम से वे उन पलों को नहीं भूल पाते हैं जहां उनकी पत्रकारिता परवान चढ़ी है। वे अपने दोस्तों, प्रेरक महापुरुषों और मार्गदर्शक पत्रकारों की सराहना करने से नहीं चूकते हैं जिनके संग-संग छत्तीसगढ़ में उन्होंने अपनी कलम और अकादमिक गुणों को निखारने का काम किया है।
संजय द्विवेदी के आत्मकथ्य को पढना काफी सुकून देता है कि आज भी ऐसे युवा हैं जिनके दमखम पर मी़डिया की नई चुनौतियां का सामना हम आसानी से कर सकते हैं। सिरफ जरुरत है ज़ज्बे और इमानदार हौंसलों की और ये हौंसला हम संजय द्विवेदी जैसे पत्रकार, अध्यापक और युवा मित्र में देख सकते हैं। संजय की यह पुस्तक विद्यार्थियों, शोधार्थियों और मीडिया से जुडे प्रत्येक वर्ग के लिये महत्वपू्ण दस्तावेज है। ज्ञान, सूचना और घटनाओं का समसामयिक अध्ययन पुस्तक में दिग्दर्शी होता है। भाषा की दृष्टि से पठनीयता के सभी गुण लिये हुये है। मुद्रण कार्य अत्यन्त सुंदर और आकर्षणयुक्त है। कवरपृष्ठ देखकर ही पुस्तक पढने की जिज्ञासा बढ़ जाती है।

(समीक्षक कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

Wednesday, March 31, 2010

संजय द्विवेदी सर के ब्लाग


भोपाल, 31 मार्च। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ,भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी के इस समय कुल दो ब्लाग सक्रिय हैं। साथ ही उनकी एक वेबसाइट भी है। उनकी वेबसाइट है http://sanjaydwivedi.com/ जिस पर आप उनसे जुड़ी व्यक्तिगत जानकारियां पा सकते हैं। इसके अलावा http://www.sanjayubach.blogspot.com/ यह उनका ब्लाग है जिसपर उनके राजनीतिक लेख हैं। मीडया के विषयों पर उनका ब्लाग है http://dwivedisanjay.blogspot.com/
द्विवेदी सर की दो किताबें भी आनलाइन उपलब्ध हैं जिनमें एक है सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और उनकी पत्रकारिता http://sampadakmahoday.blogspot.com/
दूसरी किताब है मत पूछ हुआ क्या-क्या http://sampadakmahoday11.blogspot.com/ इस पुस्तक में राजनीतिक, सामाजिक विषयों पर टिप्पणियां हैं।

Thursday, March 25, 2010

मीडिया का चरित्र और उसकी मजबूरियां


- वर्तिका नंदा
अंग्रेजी के एक अखबार के पत्रकार ने जब अपने यहां छपने वाली किसी स्टोरी विशेष की विश्वसनीयता पर आपत्ति जताई तो उसे जवाब संपादक से नहीं,बल्कि अखबार के मार्केटिंग हेड की तरफ से मिला. वैसे वह जवाब कम और सख्त हिदायत ज्यादा थी। उक्त महोदय ने जुझारू पत्रकार से कहा कि अखबार एक धंधा है. हम सब यहां पर धंधा करने बैठे हैं, अगरबत्ती जलाने नहीं. इसलिए आप वही लिखिए और वही देखिए जो बिकने लायक हो. अगर आपकी स्टोरी बिकने लायक नहीं होगी तो आप भी अखबार के लायक नहीं होंगे. दूसरी बात, हम भी कई बार आपको स्टोरी बताएंगे. वो स्टोरीज आपको करनी होंगी और याद रखिए, हम नहीं चाहेंगें कि उन स्टोरीज पर काम करते हुए आप अपने दिमाग को भी इस्तेमाल में लाएं. यह नए समय की पत्रकारिता की सच्ची तस्वीर है.
टैगलाइन चाहे जो भी कहे, अंदरूनी सच यही है कि पत्रकारिता अब पूरा सच नहीं बल्कि काफी हद तक व्यापार है. अखबार व्यापार कर रहा हो, इससे शायद किसी को बड़ी आपत्ति न हो लेकिन अफसोस इस बात पर तो हो सकता हो जब अखबार सिर्फ व्यापार ही बन कर रह जाए. हाल के महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव के तुरंत बाद द हिंदू के ग्रामीण संपादक पी साईंनाथ की खोजपरक रिपोर्ट ने जब यह साबित किया कि कैसे उस समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के पक्ष में सरकारी खर्च पर सकारात्मक स्टोरीज छापी गईं, तो राजनीतिक हलकों में इसे लेकर तनाव पैदा हुआ. कई खबरों में अशोक चव्हाण की तुलना सम्राट अशोक तक से की गई थी. यह खबरें उस समय पर छपीं थीं जब कि चुनाव की घोषणा हो चुकी थी और जाहिर तौर पर आचार संहिता लागू हो गई थी. इन खबरों को नियम के मुताबिक कहीं भी एडवरटोरियल के रूप में छापा नहीं गया (ताकि पाठक को इस बात का अहसास तक न हो कि उन्हें खबर के रूप में जो दिया जा रहा है, वह असल में एक प्रायोजित मामला है). इस तरह जनता के जो पैसे सरकारी खजाने में जमा होते रहते हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा इन दिनों राजनेता अपनी इमेज एंड लुक को चमकाने में खर्च करने लगे हैं, वो भी कुछ इस अंदाज में कि जेब जनता की ढीली हो औप मकसद वे साधें. यह ठीक है कि बाजार में टिके रहने के लिए व्यापार तो करना ही होगा लेकिन व्यापार की भी कुछ शर्तें और मर्यादाएं होती हैं. ऐसा कतई नहीं है कि कोला से कीटनाशक उड़नछू हो गए हैं. वे आज भी उन्हीं बोतलों में मौजूद हैं. इनमें कीटनाशक होने की जो छोटी-मोटी खबरें कुछ साल पहले हुईं थीं, उनका सीधा फायदा यह हुआ कि कई गांवों में किसानों ने कोला को अपने खेतों पर एक कीटनाशक के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया (और इससे खूब लाभान्वित भी हुए) लेकिन मीडिया को क्या हुआ. इन कीटनाशकों को मीडिया ने क्यों हजम किया. क्या मीडिया इस बात आश्वस्त हो गया कि कोला स्वास्थ्यवर्धक है, हानिकारक नहीं. यहां मीडिया की चुप्पी की वजह तर्क और प्रमाण पर आधारित परिणाम नहीं था, बल्कि सिक्कों की खनक और मुंह से टपकती लार थी. स्वाद और ठंडे के नाम पर कीटनाशक देने वाली ये कंपनियां चैनलों और अखबारों को बने रहने के लिए मोटी रकम देती हैं.कुछ दिनों तक हाथी के दांतों से गुस्सा दिखाने के बाद मीडिया सहमत हो गया कि कीटनाशकों के चक्कर में मोटे लालाओं और आकाओं से नाराजगी मोल लेने से जन हित सुखाय पत्रकारिता भले ही हो जाएगी लेकिन मीडिया मालिक सुखाय नहीं. वैसे भी यह दौर 1940 का नहीं है जब महात्मा गांधी सरीखे व्यक्तितत्व सोचते थे कि मीडिया और विज्ञापन एक-दूसरे से जितना दूर रहें, उतना ही भला है. तो फिर किया क्या जाए. पूरा सच कहीं भी नहीं है और पसरे हुए पूरे झूठ को ढूंढना मुश्किल नहीं. ऐसे में जरूरी हो जाती है मीडिया शिक्षा जो किसी को भी दी जा सकती है. सूचना क्रांति के इस विस्फोटक दौर में मीडिया के चरित्र और उसकी मजबूरियों को समझाने के लिए कुछ प्रयास किए ही जाने चाहिए. जब तक ऐसा हो पाता है, तब तक एक आम दर्शक और पाठक को इतना तो जान ही लेना चाहिए कि वह जो देखे-पढ़े, उस पर विश्वास करने से पहले अपनी समझ को भी इस्तेमाल में लाए. सीधा मतलब यह कि अगर वह खुद भी थोड़ा पत्रकार बन सके तो कोई हर्ज नहीं. यह किसने कहा कि हथियार की समझ तभी बढ़ानी चाहिए जब खुद के पास हथियार हो.
यह लेख दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ है.

Monday, March 22, 2010

गांव और विकास की खबरें- ढूंढते रह जाओगे


विभाग में छात्रों ने की चर्चा

भोपाल, 22 मार्च। गाँव और विकास से जुड़ी खबरों को आज के दौर में अख़बार कितना स्थान दे रहे हैं। इस विषय पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के छात्र-छत्राओं ने प्रस्तुतिकरण दिया।
इसमें देश के विभिन्न प्रमुख हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषाओं के अख़बारों को शामिल किया गया था। अख़बारों में विकास से जुड़ी ख़बरों का कम होना व विज्ञापनों के बढ़ते स्थान की चिंता व्यक्त की गयी। विकास से जुड़ी खबरों में भी किस विषय को, किस पृष्ठ पर कितनी जगह दी गयी है व इसके साथ ही भाषा सम्बन्धी त्रुटियों की भी चर्चा कार्यक्रम में की गयी। गाँवों से जुड़ी ख़बरों का कम होना व उनका सिर्फ अपराध से जुड़ा होना भी प्रस्तुतिकरण के दौरान प्रमुख तथ्य के रुप में सामने आया। दो सदस्यीय दल के रूप में गठित छात्र-छत्राओं के समूह में सबसे बेहतर प्रस्तुतिकरण देने के लिए श्रेया मोहन व कृष्ण मोहन तिवारी को प्रथम स्थान मिला।
इसके अलावा एनी अंकिता व साकेत नारायण को द्वितीय तथा नितिशा कश्यप व देवाशीष मिश्रा को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। कार्यक्रम के अंत में छात्र कुंदन पाण्डेय, कृष्णकुमार तिवारी और दीपक त्यागी ने प्रस्तुतिकरण पर अपनी टिप्पणी दी।

Wednesday, March 17, 2010

खबर की कीमत


ओम थानवी
हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्रसिंह हुड्डा ने राज्य की बागडोर फिर संभाल ली है। मगर यह प्रसंग उनके पिछले कार्यकाल का है। चंडीगढ़ में उनके निवास के पिछवाड़े की बगिया में हम धूप में बैठे थे। चौटाला के लोकदल और भारतीय जनता पार्टी के सफाये की खुशी माहौल पर तारी थी। पर इधर-उधर की बातों के बीच एक बात से वे आहत जान पड़े। अखबार वाले से मुखातिब थे, शायद इसलिए भीतर की टीस छलक आयी होगी। बोले अखबारों की तादाद (हरियाणा में) बहुत बढ़ गयी है, लेकिन पता नहीं किस दिशा में जा रहे हैं!
इसरार पर बगैर झिझक उन्होंने बताया : रोहतक में विरोधी दल की छोटी-सी सभा थी। उसकी खबर एक हिंदी दैनिक में पहले पेज पर छपी, जिसमें सभा की भीड़ की तादाद कई गुना बढ़ाकर बतायी गयी थी। मैंने अखबार के मालिक को फोन किया। उन्होंने जवाब दिया कि वह तो विज्ञापन था। जिसने पैसा दिया, उसका मजमून छप गया। यह जवाब सुनकर हुड्डा हैरान हुए और पूछा कि पैसा देकर क्या कोई कुछ भी छपवा सकता है? जवाब मिला – बिलकुल, सामग्री का जिम्मा उसी का होता है। मैं सकते में आ गया – हुड्डा बता रहे थे – और उनसे कहा, कल के अंक में पहला पूरा पृष्ठ हमारे लिए बुक कीजिए और एक पंक्ति बड़े-बड़े हर्फों में हमारे खर्च पर छापिए: ‘यह अखबार झूठा है’। छापेंगे न? अखबार के मालिक बोले, आप कैसी बात कर रहे हैं?
हुड्डा के मुताबिक उन्हें मालिक को यह सुनाते देर नहीं लगी कि पैसा देकर जब कोई भी झूठ छप सकता है, तो यह इबारत क्यों नहीं? इसे भी हमारे जिम्मे पर छापिए!
हुड्डा विनम्र स्वभाव के हैं, आसानी से खीझ जाहिर नहीं करते। मगर मुझे जरा संदेह नहीं हुआ कि चुनावी जद्दोजहद के बीच अखबारी गलतबयानी पर उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया इसी तल्खी में जाहिर की होगी।
तब यही लगा कि यह इक्के-दुक्के अखबार की कारगुजारी होगी। ज्यादातर अखबारों पर ऐसी तोहमत शायद नहीं लगायी जा सकती थी। मगर आगे बिहार-उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों और फिर लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में ऐसी शिकायतें आम हो गयीं। देखते-देखते ‘पेड न्यूज’ का सिलसिला एक ओढ़ी गयी बीमारी की तरह छोटे-मोटे अनेकानेक अखबारों को घेरता दिखाई देने लगा।सब जानते हैं, बरसों से हर चुनाव में प्रादेशिक अखबार उम्मीदवारों से कैसे प्रचार या समर्थन के इजहार वाले इश्तहार दबाव से हासिल करते थे। बदले में उनकी चुनावी रैलियों का बेहतर कवरेज मुहैया करवाया जाता था। हाल के चुनावों में बड़ा फर्क यह आया कि उम्मीदवारों से मनचाहे बयान और सभाओं के ब्योरे कीमत लेकर जस-के-तस छापे गये। इश्तहार के साथ छपे बयान का ज्यादा असर नहीं होता। यह बयानबाजी असरदार साबित हुई। जिसने ज्यादा रकम देकर प्रचार पाया, उसका झूठ विरोधियों को तिलमिला गया। वसूली चौड़े में आ गयी। लेकिन क्या उसे शह भी नेताओं ने नहीं दी?कहने का यह मतलब न निकालें कि यह पत्रकार बिरादरी की तरफदारी करते हुए नेताओं को कसूरवार ठहराने की कोशिश है। लेकिन ताली एक हाथ से नहीं बजती। आयोग के हर कायदे को धता बताते हुए हमारे उम्मीदवार चुनाव लड़ते हैं। पैसा पानी की तरह बहता है। सोचते होंगे, थोड़ा पानी अखबारों की तरफ बह जाए तो हर्ज क्या है। इससे दोनों की प्यास बुझती है। एक ही शर्त कि भरपाई इश्तहार की शक्ल में न हो। इसका उनको दोहरा लाभ है। एक तो यह चुनावी खर्च, खर्च नहीं ठहराया जाएगा। दूसरा, ज्यादा बड़ा, फायदा यह कि खबर की शक्ल में प्रचार अधपढ़ समुदाय को ज्यादा प्रभावित करेगा, बनिस्बत इश्तहारी प्रचार के।हुड्डा तो खैर उस चुनाव से पहले सत्ता में नहीं थे। जो सत्ता में रहते हैं, उनके अखबारों से राग-विराग के अपने रिश्ते बनते हैं। ऐसे रागियों की प्रतिक्रियाएं बड़ी दिलचस्प रहीं। बताते हैं, उत्तर प्रदेश के भाजपा नेता लालजी टंडन ने एक अखबार को कोसते हुए कहा कि कानपुर में उनके दल ने अखबार के दिवंगत मालिक के नाम पर पुल का नाम रखवाया, जमीनें दिलवायीं। उसी अखबार ने खबरों के लिए पैसे मांगे, ‘ऐसी निर्लज्जता?’
कोई पूछे कि भाजपा ने पुल का नामकरण पत्र के मालिक के नाम पर किस मकसद से किया होगा? किस भाव से नेता अखबारों को सस्ती जमीनें देते हैं?कुछ रोज पहले मुंबई में पी साईनाथ के साथ एक संगोष्ठी में शरीक था। उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र में बेनामी इश्तहारों की पोल कई अखबारों के पन्ने दिखाते हुए खोली। मजे की बात यह थी कि संगोष्ठी के अगले दौर में मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण खुद आने वाले थे। वे आये। पर संभवत: शिष्टाचार में किसी पत्रकार ने उनसे जिरह नहीं की। एक ने सवाल पूछ लिया : जवाब मिला – मामला चुनाव आयोग के सामने विचाराधीन है, अभी इस पर बात करना मुनासिब न होगा। कब होगा?पिछले साल आम चुनाव में बिहार में प्रभाषजी जब पूर्व विदेश राज्यमंत्री दिग्विजय सिंह के चुनाव क्षेत्र में थे, उन्हें प्रायोजित चुनावी कवरेज के लिए नामी अखबारों के रेट-कार्ड मिले। मेरे मित्र अनुराग चतुर्वेदी ने उन्हें मनचाही खबरें और तस्वीरें छपवाने के लिए तय दरों के ‘पैकेज’ और ‘रीचार्ज पैकेज’ की पुख्ता जानकारी दी। दिल्ली लौट कर उन्होंने इस भ्रष्टाचार के खिलाफ जिहाद बोला। धुआंधार लिखा, प्रेस काउंसिल गये, सरकार से भिड़े। हृदय ने असमय दगा न किया होता तो मुहिम को वे किसी तार्किक परिणति के करीब पहुंचता देखते।पर प्रभाषजी और साईनाथ आदि जुझारू पत्रकारों की कोशिशें अब रंग ला रही हैं। पैसे लेकर खबरें छापने की प्रवृत्ति के खिलाफ विवेकशील पत्रकार और संगठन एकजुट हो गये हैं। प्रेस काउंसिल, एडीटर्स गिल्ड, सूचना-प्रसारण मंत्रालय, सार्वजनिक और स्वैच्छिक संगठन अपनी दो टूक राय रख रहे हैं। हर दूसरे दिन किसी संगोष्ठी की सूचना देखने में आती है। उम्मीद बंधती है कि इसका असर होगा।लेकिन ‘पेड न्यूज’ अकेली बीमारी नहीं है। नयी और ज्यादा मुखर जरूर है। कुछ चीजें और हैं, जिन्हें लगे हाथ निराकरण प्रयासों के दायरे में ले आना चाहिए। जैसे राजनीतिक दलों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों के हाथों मीडिया के जाने-अनजाने इस्तेमाल होने का कुचक्र। मीडिया को कीमत मिलती है और समाज के सामने प्रायोजित सामग्री परोस दी जाती है। यह काम इतनी चतुराई से होता है कि उसे आसानी से नहीं पकड़ा जा सकता। हालांकि पकड़ना नामुमकिन नहीं है।एक पूरा तंत्र विकसित है, जो पेशेवराना तौर पर मीडिया को ‘मैनेज’ करता है। निजीकरण के दौर में भी नेहरू जी की रूसी प्रेतछाया सरकारी प्रचार तंत्र पर कायम है। अपने रेडियो स्टेशन, टीवी चैनल और पत्रिकाओं के बावजूद ‘मीडिया मैनेजमेंट’ के लिए जिला प्रशासन से लेकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति कार्यालय तक प्रचार अधिकारी तैनात हैं। राजनीतिक दलों और सार्वजनिक व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के पास अपने प्रचार प्रबंधक हैं। उन पर होने वाले खर्च का जोड़ लगाएंगे तो अरबों का हिसाब बैठेगा। उनका काम क्या है? डायरी-कैलेंडर से लेकर शराब, मकान, जमीन, देश-परदेस के सैर-सपाटे जैसे लालच भुगता कर मनमाफिक चीजें शाया करवाने के प्रयास करना। प्रयासों की सफलता पाठक, दर्शक या श्रोता के कितने हक में काम करती है, कितने खिलाफ – इसकी हकीकत समझने की कोशिश होनी चाहिए।चुनाव के दौरान संपादकों और संवाददाताओं के अपने आग्रह-दुराग्रह अपनी जगह होते हैं, उन्हें मिलने वाली सामग्री हमेशा क्या जरूरी खोजबीन के बाद छपती है? मसलन कुछ दल अपने पसंदीदा सर्वेकार से चुनावी सर्वे कराते हैं और उसे ठीक मतदान से पहले जारी करवाते हैं। कुछ संपादक उसे नजरअंदाज कर देते हैं, कुछ प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं। चतुरसुजान जानते हैं कि कौन अखबार किस चीज को छापेंगे, किसको नहीं।बड़ा मुद्दा समाज को झूठी या कच्ची खबरों से गुमराह न होने देना है। ‘पेड न्यूज’ उसका एक साफ दिखने वाला रूप है, जिससे टीवी भी बचा नहीं है। अखबार ‘जगह’ बेचते हैं, टीवी ‘वक्त’। यहां तक कि इंटरनेट भी इसकी गिरफ्त में आ चुका है। टीवी पर मतदान से पहले सर्वेक्षण और नमूने के नतीजे भी खूब प्रसारित होते रहे हैं। इतने बड़े देश में चुनाव एक साथ नहीं हो पाते। एक जगह के नतीजे से दूसरी जगह हवा बन या बिगड़ सकती है। मगर सिर्फ ‘वैज्ञानिक’ अंदाजे वाले नतीजे जिज्ञासा के मारे हुए दर्शकों को परोसने का क्या सबब हो सकता है? लोग हार-जीत और सरकार बनने गिरने के फैसलाकुन अनुमानों – जिन्हें भरोसेमंद लोग पेश करते हैं – को देखने-सुनने को उमड़ पड़ते हैं। उनके साथ उमड़े आते हैं बेतहाशा इश्तहार। मानो व्यवसाय जगत की सब थैलियां इसी तरफ खुल गयी हों।‘पेड न्यूज’ न सही, धन का लोभ टीवी को भी अपनी ओर कम नहीं खींचता। चुनावी सर्वे और उनके आकलन का सिलसिला पहले पत्र-पत्रिकाओं ने शुरू किया था। इससे उन्हें ज्यादा पाठक मिलते थे। टीवी को दर्शक और विज्ञापन दोनों का फायदा है। लेकिन दर्शकों को गुमराह करने की कीमत पर। उचित ही है कि चुनाव आयोग ने मतदान को प्रभावित करने वाली सभी गतिविधियों पर तो नहीं, मगर ‘एग्जिट पोल’ पर बंदिश लागू कर दी है।मीडिया का काम जानकारी देना माना जाता है। पाठक या दर्शक-श्रोता की समझ बढ़ाना भी उसका काम है। धन लेकर प्रायोजित सामग्री में भागीदार बनने से भ्रमित करने वाली जानकारी का प्रसार होता है तो इसे भी समस्या मानकर सरोकारों में शामिल करना चाहिए। ऐसे ही उठाने-गिराने वाली राजनीतिक खबरों और बाजार को हवा देने वाली व्यापारिक खबरों के निहितार्थ और प्रयोजन पकड़े जाने चाहिए।खुशी की बात है कि एडीटर्स गिल्ड ने ‘पेड न्यूज’ के मामले को बहुत गंभीरता से लिया है। ‘खबरों के भेस में राजनीतिक विज्ञापनों’ को लेकर गिल्ड का प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग से भी मिला है। मेरे खयाल में इन कोशिशों का दायरा बढ़ाना चाहिए। चुनावों के अलावा आम दिनों में भी ‘पेड न्यूज’ छपती हैं। एक उदाहरण लीजिए। पिछले महीने – 4 फरवरी को दिल्ली के एक नये हिंदी दैनिक में विश्व पुस्तक मेले पर एक पूरा पृष्ठ निकला। पुस्तक प्रेमियों ने उसे चाव से पढ़ा होगा। सामग्री क्या थी? पहले कॉलम में पहला आलेख : ‘पुस्तकों की दुनिया में बदलाव आना स्वाभाविक है। ये बदलाव अब लाएगा पेजिस बुक स्टोर। नोएडा सेक्टर 18 के रायल पैलेस में स्थित पेजिस बुक स्टोर…’। दूसरे आलेख का शीर्षक : ‘शैक्षिक पुस्तकों का उच्च प्रकाशन: वृंदा पब्लिकेशन’। तीसरा : ‘सफलता का पर्याय है उपकार प्रकाशन’। चौथा : ‘आकार बुक्स: पुस्तक प्रकाशन में नया आयाम’।शीर्षक देखकर ही समझ में आ गया कि पैसे के बदले छापी गयी सामग्री है। इसका सबूत भी पृष्ठ पर मौजूद था – उन्हीं प्रकाशकों के इश्तहार जिनकी दुकानों के बारे में आलेख या चित्र खबर की शक्ल में, बगैर किसी हवाले या स्रोत के, प्रकाशित किये गये थे।चुनावी खबर हो तो शोर भी मच सकता है, मगर क्या कोई पुस्तक-प्रेमी ऐसी सामग्री से गुमराह नहीं हुआ होगा? वह कैसे जानेगा कि किसी प्रकाशक या किताब को महान बताना महज एक सौदा है? माना जा सकता है कि शायद विज्ञापन विभाग खबरों-लेखों को इश्तहार बताना भूल गया हो। लेकिन यह भी सच है कि इश्तहार को खबर की शक्ल में छपवाने के ज्यादा दाम मिलते हैं। इसे ही कहते हैं – इस हाथ ले, उस हाथ दे!

Saturday, March 13, 2010

विकासमूलक संचार की तलाश


- जगदीश्वर चतुर्वेदी
विकासमूलक सम्प्रेषण का लक्ष्य है शोषण से मुक्ति दिलाना। व्यक्तिगत और सामुदायिक सशक्तिकरण। इस अर्थ में विकासमूलक सम्प्रेषण सिर्फ संदेश देने का काम नहीं करता बल्कि ‘मुक्तिकामी सम्प्रेषण’ है। आम लोगों में यह भाव पैदा करता है कि वे स्वयं भविष्य निर्माता बनें। इस प्रक्रिया में सभी शामिल हों। न कि सिर्फ लक्ष्यीभूत ऑडिएंस। इस परिप्रेक्ष्य की समझ यह है कि जब लोग शोषण और शक्ति को जान जाते हैं तो अपने आप समाधान खोज लेते हैं।
मुक्तिकामी विकासमूलक सम्प्रेषण की प्रकृति सब जगह एक जैसी नहीं होती। बल्कि इसमें अंतर भी हो सकता है। विकासमूलक सम्प्रेषण में मास कम्युनिकेशन और सूचना तकनीकी रूपों का कनवर्जन या समावेशन होता रहता है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि विकासमूलक सम्प्रेषण रणनीति में धार्मिक और आध्यात्मिक रणनीति मददगार साबित हो सकती है। विकासमूलक सम्प्रेषण में सभी किस्म के सवाल शामिल किए जा सकते हैं।
के.बालिस ने ”डिसपोजेविल पीपुल’ न्यू स्लेवरी इन दि ग्लोबल इकोनॉमी” में विभिन्न अनुसंधान निष्कर्षों को आधार बनाकर लिखा है कि सारी दुनिया में अभी दो करोड़ सत्तर लाख लोग गुलामी में जी रहे हैं। इनमें बच्चे और औरतें शामिल हैं जिन्हें हिंसा या हिंसा की धमकी के आधार पर गुलाम बनाया हुआ है। इनमें ऐसे लोग भी हैं जो वस्तु पाने के दले गुलामी में जी रहे हैं।
बालिस ने अपनी पुस्तक में एक अध्याय में बताया है कि थाईलैण्ड में जबरिया जिस्म की तिजारत हो रही है। पुस्तक में इसका शीर्षक ही रखा है ‘वन डॉटर इक्वल्स वन टेलीविजन। ‘यदि 21वीं शताब्दी में दुनिया का अभी भी यह हाल है तो हमें गंभीरता से भारत के संदर्भ में विकासमूलक सम्प्रेषण के मुक्तिकामी परिप्रेक्ष्य का निर्माण करना होगा। हमें यह तय करना होगा कि भारत के लिए विकासमूलक सम्प्रेषण धार्मिक मुक्ति का नजरिया प्रासंगिक है या मुक्ति का मार्क्सवादी नजरिया प्रासंगिक है।
विकासमूलक सम्प्रेषण के मुक्तिकामी धार्मिक नजरिए की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें सामाजिक इकाईयों को धार्मिक इकाईयों के रूप में देखा जाता है। वैषम्य को समाधानरहित मान लिया गया है। विकास की सफलता का श्रेय ईश्वर को दिया जाता है। विकास की सफलता के लिए ईश्वरोपासना को महत्वपूर्ण करार दिया जाता है। भारत में विकास के लिए धर्म का इस तरह का इस्तेमाल कारपोरेट घरानों से लेकर तमाम धार्मिक स्वैच्छिक संगठनों की आम रणनीति का हिस्सा है। वे इसे मनोबल बढ़ानेवाली रणनीति के रूप में व्याख्यायित करते हैं। साथ ही विकास के केन्द्र में मनुष्य की केन्द्रीय भूमिका की बजाए ईश्वर या ईश्वरोपासना को प्रतिष्ठित करते हैं।
नए कारपोरेट जगत के साथ पैदा हुए कारपोरेट धर्म की उत्पत्ति का यही रहस्य है। यह रणनीति अंतत: साम्प्रदायिक सामाजिक विभाजन और तनावों को जन्म देती है। यहां व्यक्ति का महत्व है। वह एक अनैतिहासिक कोटि के रूप में सामने आता है। इस मॉडल पर आधारित संचार संकीर्णताओं और अविवेकपूर्ण मानसिकता में इजाफा करता है। ग्राम्शी ने इटली में प्रेस में इसी तरह की प्रवृत्तियों का जिक्र करते हुए लिखा कि ‘लोकप्रिय प्रेस पाठक की संस्कृति को नियंत्रित करने के लिए भूत-प्रेत की कहानियों,अंधविश्वास आदि पर केन्द्रित कथाएं छापते रहते हैं;परिणामत: ये पत्र मौजूदा राष्ट्र का गैर-प्रान्तीकरण करते हैं। इसे रोकने के लिए विज्ञान की खबरें बेहद जरूरी हैं। ”
विकासमूलक मीडिया का नजरिया मनोरंजन के व्यवसायीकरण अथवा मनोरंजन प्राप्ति के अधिकार को लेकर उतना चिन्तित नहीं है। क्योंकि यह दोनों तत्व- व्यवसाय और मनोरंजन- पहले के समाजों में भी थे। विकासमूलक संचार मॉडल की चिन्ता है उच्च कला का वर्तमान आम जनता से अलगाव और दुराव कैसे दूर हो। लम्बे समय से पूंजीवादी समाज में उच्च कलाओं की मौजूदगी सिर्फ कलाकारों के लिए रह गई है। आज हममीडिया में जो कला रूप देख रहे हैं उनमें जनता के प्रति सम्मान का दिखावटी भाव है।
मजेदार बात यह है कि हमारे समाज में दो तरह के आलोचक हैं पहली कोटि ऐसे आलोचकों की है जो मीडिया की आदर्श भूमिका की बातें करते हैं। समाज में घटित प्रत्येक अच्छी-बुरी चीज के लिए मीडिया को कोसते रहते हैं। असल में ये ऐसे लोग हैं जो सामाजिक अलगाव के शिकार हैं। वे ऐसी भाषा और तर्क का इस्तेमाल करते हैं जो किसी के गले नहीं उतरता। इन्हें आदर्शवादी माध्यम विशेषज्ञ कह सकते हैं। दूसरी ओर ऐसे भी आलोचक हैं जो मीडिया को गरियाते हुए कलाओं के अतीत में जीते हैं। इन्हें अतीतजीवी माध्यम विशेषज्ञ कह सकते हैं। ये दोनों ही नजरिए मीडिया के वस्तुगत अध्ययन,समझ और अंतर्वस्तु के मूल्यांकन से वंचित हैं। इन दोनों ही रूझानों से बचा जाना चाहिए।
आमतौर पर मीडिया के मालिक या उत्पादक के खिलाफ यह आरोप लगाया जाता है कि वे तो वही दिखाते हैं जो जनता मांग करती है। साथ ही यह भी आरोप लगाया जाता है कि मीडिया नई तरह की चीजों के लिए नकली मांग पैदा कर रहा है। अर्थात उपभोग में वृद्धि के लिए मांग पैदा कर रहा है। प्रसिध्द कला सिद्धान्तकार गेओर्ग जीम्मल ने लिखा है ‘ऐसा नहीं है कि चीजें पहले पैदा हों फिर फैशन में आएं; चीजें पैदा ही फैशन चालू करने के लिए की जाती हैं। ‘
अर्नाल्ड हाउजर ने लिखा कि ”जिन तथ्यों पर ध्यान देना है,जिन मुद्दों पर निर्णय लेना है,जन समाधानों को स्वीकार करना है -ये सब जनता के सामने इस रूप में परोसे जाते हैं कि वह इन्हें पूरी तरह निगल ले। सामान्य तौर पर उसके समक्ष चुनाव का कोई अवसर नहीं है और वह इससे संतुष्ट भी है। ”
”भीड़ संस्कृति के उत्पाद केवल यही नहीं करते कि लोगों की रूचि बरबाद कर दें,उन्हें स्वयं के बारे में सोचने न दें,समरूपता की शिक्षा दें;वे बहुसंख्यक लोगों की आंखों के सामने पहलीबार जीवन के उन क्षेत्रों को भी खोल देते हैं जिनके सम्पर्क में वे पहले कभी नहीं आए थे। अकसर उनके पूर्वाग्रहों का अनुमोदन होता है। फिर भी आलोचना और विरोध का एक रास्ता तो खुलता ही है। जब कभी कला के उपभोक्ताओं का घेरा विस्तृत हुआ है,उसका तात्कालिक परिणाम कला उत्पादन के स्तर में गिरावट ही निकला है। ”
आम तौर पर मीडिया के बारे में जिस कॉमनसेंस का हमारा हिन्दी बुद्धिजीवीवर्ग शिकार है और मीडिया के मूल्यांकन के नाम पर गैर-मीडिया सैध्दान्तिकी के रास्ते पर चल रहा है वह विकास का सही लक्षण नहीं कहा जा सकता। मीडिया मूल्यांकन के नाम पर साहित्यिक पत्रिकाओं में जिस तरह का दृष्टिकोण परोसा जा रहा है वह मीडिया समीक्षा का घटिया नमूना है। ये लोग मीडिया को षडयंत्रकारी और शैतान के रूप में चित्रित कर रहे हैं। ऐसी आलोचना का मीडिया की सही समझ से कोई लेना-देना नहीं है।
(लेखक प्रख्यात संचार चिंतक एवं कोलकाता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर हैं)