Thursday, September 8, 2011

मीडिया छवि का शिकार हो रहे हैं अन्ना


-शिशिर सिंह

बाबूराव किशन हजारे उर्फ अन्ना हजारे लोकप्रियता की ऊँचाई पर हैं। क्षेत्रीय सामाजिक कार्यकर्ता से उनकी छवि अब देश के सामाजिक कार्यकार्ता के रूप में होने लगी है। महाराष्ट्र से शुरू हुआ उनका सफर अब देशाटन में बदल चुका है। महाराष्ट्र में तो वह पहले ही काफी जाना-पहचाना नाम थे, जनलोकपाल आन्दोलन की सफलता के चलते पूरा देश उन्हें पहचानने लगा है। ब्रांडिग की भाषा में अगर अन्ना हजारे की छवि की बात की जाए तो अन्ना की छवि मीडिया में सकारात्मक ही हैं। अन्ना सामाजिक कार्यकर्ता तो हैं ही, जनलोकपाल पर मिले अपार समर्थन ने मीडिया ने उन्हें दूसरा गाँधी, क्राँतिकारी, मसीहा और अन्य कई अलंकरणों से नवाजा है।
लेकिन अन्ना की यह छवि अन्ना का शिकार कर रही है। खुद की छवि या पहचान के बारे में मनोविज्ञान का सिद्धांत कहता है कि लोगों के बीच हमारी छवि से हमारा व्यवहार तय होता है। अब बात यह उठती है कि अन्ना किस तरह अपनी छवि का शिकार हो रहे हैं? अन्ना खुद को महात्मा गाँधी सहित अन्य क्रांतिकारियों के समतुल्य मानने लगे हैं। हालिया बयान उनकी यह सोच प्रदर्शित करता है गौर कीजिए सरकार को सुरक्षा के सम्बन्ध में दिया गया उनका बयान “अन्ना के मुताबिक भगत सिंह और राजगुरू ने कभी सुरक्षा नहीं ली थी, लिहाजा वो भी ऐसा नहीं करेंगे।” क्या यह बयान उनका बड़बोलापन प्रदर्शित नहीं करता है? सुरक्षा लेना या न लेना उनका निजी मसला है, पर खुद को भगत सिंह के समतुल्य मानना, भगत सिंह का अपमान तो है ही, साथ ही एक बेतुकी सोच भी। अभी तक जिस अन्दाज में मीडिया में उनकी बयानबाजी रही है, वो कहीं से ये साबित नहीं करते कि वह महात्मा गाँधी के अनुयायी हैं। अन्ना अगर ये समझते हैं कि केवल अनशन करने, हथियार न उठाना ही महात्मा गाँधी की अहिंसा है, तो उन्हें गाँधी को पढ़ने और जानने की जरूरत है। ‘केजरीवाल पर कार्रवाई की, जो अन्जाम अच्छा नहीं होगा’, और ऐसे अन्य बयान उनकी वाणी की हिंसा को दिखाते हैं। इस तरह की भाषा में बात करना कितना उचित है कितना नहीं यह बहस के लिए एक अलग विषय है। पर गाँधी का बनावटी लबादा ओढ़कर, धमकी भरे अंदाज में बात करना, खुद को देश के बडे क्रांतिकारियों के समकक्ष बताना कम से कम अन्ना के बड़बोलेपन को प्रदर्शित करता है।

एक बात : एकता शब्द को सकारात्मक दृष्टि से उपयोग में लाया जाता है, पर अगर अराजक तत्व, गुंडे और अपराधियों के समर्थन में लोग एकत्रित हों तो क्या उसे भी एकता कहेंगे? वैसे यह जाना-माना तथ्य है कि आमतौर पर गुंडे जल्दी एकजुट होते हैं। बेल्लारी के बारे में क्या कहेंगे? रेड्डी बंधुओं पर कार्रवाई के बाद बेल्लारी में जनता ने प्रदर्शन किया और बेल्लारी को बन्द रखा। उनके समर्थन में अच्छी संख्या में लोग आए। वैसे भी रेड्डी बंधु बेल्लारी के बेताज बादशाह है, उस क्षेत्र को रेड्डी बंधुओं के ‘रिपब्लिक ऑफ बेल्लारी’ के रूप में जाना जाने लगा है। रेड्डी बंधुओं की कारास्तानी किसी से छिपी भी नहीं है। ऐसे भ्रष्ट नेता के बचाव में लोगों का आना क्या दर्शाता है? क्या केवल जनता के सेवक को इलाज की जरूरत है, ‘जनता’ को नहीं।
(लेखक जनसंचार विभाग के पूर्व छात्र हैं)

Wednesday, September 7, 2011

सोशल नेटवर्किंगः नए समय का संवाद


-संजय द्विवेदी

तेजी से बदलती दुनिया, तेज होते शहरीकरण और जड़ों से उखडते लोगों व टूटते सामाजिक ताने बाने ने इंटरनेट को तेजी से लोकप्रिय किया है। कभी किताबें,अखबार और पत्रिकाएं दोस्त थीं आज का दोस्त इंटरनेट है क्योंकि यह दुतरफा संवाद का भी माध्यम है। सो पढ़े या लिखे हुए की तत्काल प्रतिक्रिया ने इसे लोकप्रिय बनाया है। आज का पाठक सब कुछ तुरंत चाहता है-इंस्टेंट। टीवी और इंटरनेट उसकी इस भूख को पूरा करते हैं। यह गजब है कि आरकुट, फेसबुक, ट्यूटर जैसी सोशल साइट्स का प्रभाव हमारे समाज में भी महसूस किया जाने लगा है। यह इंटरनेट पर गुजारा गया वक्त अपने पढ़ने के वक्त से लिया गया है। जाहिर तौर पर यह सामाजिकता के खिलाफ है और निजता को स्थापित करने वाला है।

निजता का माध्यमः सूचना और संचार के अभी तक प्रकट सभी माध्यम कहीं न कहीं सामूहिकता को साधते हैं। किंतु इंटरनेट व्यक्ति की निजता को स्थापित करता है। इसका समाज पर गहरा असर देखा जा रहा है। सूचनाएं अब मुक्त हैं। वे उड़ रही हैं इंटरनेट के पंखों। कई बार वे असंपादित भी हैं, पाठकों को आजादी है कि वे सूचनाएं लेकर उसका संपादित पाठ स्वयं पढ़ें। सूचना की यह ताकत अब महसूस होने लगी है। यह बात हमने आज स्वीकारी है, पर कनाडा के मीडिया विशेषज्ञ मार्शल मैकुलहान को इसका अहसास साठ के दशक में ही हो गया था। तभी शायद उन्होंने कहा था कि ‘मीडियम इज द मैसेज’ यानी ‘माध्यम ही संदेश है।’ मार्शल का यह कथन सूचना तंत्र की महत्ता का बयान करता है। आज का दौर इस तंत्र के निरंतर बलशाली होते जाने का समय है। संचार क्रांति ने इसे संभव बनाया है। नई सदी की चुनौतियां इस परिप्रेक्ष्य में बेहद विलक्षण हैं। इस सदी में यह सूचना तंत्र या सूचना प्रौद्योगिकी ही हर युद्ध की नियामक है, जाहिर है नई सदी में लड़ाई हथियारों से नहीं सूचना की ताकत से होगी। मंदीग्रस्त अर्थव्यवस्था से ग्रस्त पश्चिमी देशों को बाजार की तलाश तथा तीसरी दुनिया को देशों में खड़ा हो रहा, क्रयशक्ति से लबरेज उपभोक्ता वर्ग वह कारण हैं जो इस दृश्य को बहुत साफ-साफ समझने में मदद करते हैं । पश्चिमी देशों की यही व्यावसायिक मजबूरी संचार क्रांति का उत्प्रेरक तत्व बनी है। हम देखें तो अमरीका ने लैटिन देशों को आर्थिक, सांस्कृतिक रूप से कब्जा कर उन्हें अपने ऊपर निर्भर बना लिया। अब पूरी दुनिया पर इसी प्रयोग को दोहराने का प्रयास जारी है। निर्भरता के इस तंत्र में अंतर्राट्रीय संवाद एजेंसियां, विज्ञापन एजेसियां, जनमत संस्थाएं, व्यावसायिक संस्थाए मुद्रित एवं दृश्य-श्रवण सामग्री, अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार कंपनियां, अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियां सहायक बनी रही हैं। लेकिन ध्यान दें कि सूचनाएं अब पश्चिम के ताकतवर देशों की बंधक नहीं रह सकती। उन्होंने अपना निजी गणतंत्र रच लिया है। विजय कुमार लिखते हैं- “ हम एक ऐसे समय में रह जी रहे हैं जब एक ओर आदमी के भीतर का अकेलापन लगातार बढ़ रहा है तब दूसरी ओर उसके भीतर नए-नए संबंधों को खोजने और पाने की ललक भी है। एक अधिक व्यापक सूचना से भरी हुयी अधिक उष्मा और अधिक मानवीय संबंधों वाली दुनिया की तलाश मनुष्य के भीतर सदा रही से रही है। ”1

एक वर्चुअल दुनियाः इसी संचार क्रांति का एक प्रभावी हिस्सा है- सोशल नेटवर्किंग साइट्स, जिन्होंने सही मायने में निजता के एकांत को एक सामूहिक संवाद में बदल दिया है। अब यह निजता, निजता न होकर एक सामूहिक संवाद है, वार्तालाप है, जहां सपने बिक रहे हैं, आंसू पोछे जा रहे हैं, प्यार पल रहा है, साथ ही झूठ व तिलिस्म का भी बोलबाला है। यह वर्चुअल दुनिया है जो हमने रची है, अपने हाथों से। इस अपने रचे स्वर्ग में हम विहार कर रहे है और देख रहे हैं फेसबुक,ट्विटर और आरकुट की नजर से एक नई दुनिया। इन तमाम सोशल साइट्स ने हमें नई आँखें दी हैं, नए दोस्त और नई समझ भी। यहां सवाल हैं, उन सवालों के हल हैं और कोलाहल भी है। युवा ही नहीं अब तो हर आयु के लोग यहां विचरते हैं कि ज्ञान और सूचना ना ही सही, रिश्तों के कुछ मोती चुनने के लिए। यह एक एक नया समाज है, यह नया संचार है, नया संवाद है, जिसे आप सूचना या ज्ञान की दुनिया भी नहीं कह सकते। यह एक वर्चुअल परिवार सरीखा है। जहां आपके सपने, आकांक्षाएं और स्फुट विचारों, सबका स्वागत है। दोस्त हैं जो वाह-वाह करने, आहें भरने और काट खाने के लिए तैयार बैठे हैं। यह सारा कुछ भी है तुरंत, इंस्टेंट। तुरंतवाद ने इस उत्साह को जोश में बदल दिया है। यानि आपकी लिखी एक पंक्ति पर तत्काल हल्लाबोल हो सकता है। शशि थरूर को याद कीजिए। केंद्रीय मंत्री का पद अपने इसी ट्विटर प्रेम के नाते छोड़ना पड़ा। एक वाक्य का विचार यहां क्रांति बन रहा है। विचार की ताकत तो देखिए। यह ट्वीट करना अब एक फैशन है। विचार किस तरह एक कीमती समाज बना रहा है, इसे देखिए। वहां लिखे एक वाक्य की कीमत तमाम पोथियों से बड़ी है। ट्विटर कम्युनिटी में होना एक बड़ी बात है। आप ट्विटर पर नहीं, फेसबुक पर नहीं, आरकुट पर भी नहीं- क्या आदमी हो यार। ये सोशल साइट्स हमें नई सामाजिकता का बोध दे रही हैं। ये बता रही हैं इनके बिना आप कुछ भी नहीं। यह सारा कुछ इतना लुभावना है कि काम के घंटों से वक्त चुराकर भी, आप वहां जाते हैं। ताजा खबर है कि हमारे केंद्रीय मंत्रियों की घोषणाएं भी अब ट्विटर पर होंगी। जेपीसी पर मचे धमाल पर डा. मुरली मनोहर जोशी की भूमिका पर सफाई भाजपा की ओर से नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने ट्विटर पर ही दी। सारे सितारों, खिलाड़ियों और सेलिब्रटीज की ट्वीट के लिए अब अखबारों में कालम शुरू हो चुके हैं। जाहिर तौर पर यह सोशल साइट्स को यह मीडिया और अधिकारिक क्षेत्रों की स्वीकृति सरीखा ही है। उसे मिलती मान्यता का प्रतीक है।

शादियों में बदलते रिश्तेः फेसबुक अब रिश्ते ही नहीं बना रहा है, वे रिश्ते शादियों में तब्दील हो रहे हैं। व्यक्ति की निजता के साथ ये साइट्स नए रिश्ते बना रही हैं। फेसबुक एक नया राज्य है जिसका नागरिक होना एक गर्व का विषय है। उसने सबको आवाज दी है। वाणी दी है। तमाम भाषाओं के हजारों-हजार शब्द लगातार वहां अपनी जगह बना रहे हैं। चित्रों, चलचित्रों को उसने जगह दी है। देश में दस करोड़ से ज्यादा कम्प्यूटर वाले हैं, इंटरनेट वाले हैं। अगर नहीं हैं तो बाकी तमाम मोबाइल वाले हैं। अब मोबाइल से भी यह खेल आसान हो चला है। मोबाइल के यंत्र खुद को अपडेट कर रहे हैं। वे भी फेसबुक के साथ होना चाहते हैं। यानी वह वर्चुअल दुनिया जो आपने रची है वह आपके साथ-साथ है। शायद अपने परिवेश के प्रति आपमें वह आग और जागरूकता न हो, किंतु आप साइबर के खिलाड़ी हैं, एक वर्चुअल दुनिया के सक्रिय नागरिक हैं। वरिष्ठ पत्रकार मधुसूदन आनंद इस राय से इत्तेफाक नहीं रखते। वे मानते हैं कि “ जो लोग सैंकड़ों हजारों दोस्त होने का दावा करते हैं, वे सच्ची दोस्ती और जतन-संपर्क के बीच या तो भेद नहीं करना चाहते या जानबूझकर उसे नजरंदाज करते हैं। ये कामकाजी दोस्तियां होती हैं जिनका प्रदर्शन अपने विशाल प्रभामंडल के लिए किया जाता है। ये दोस्तियां आदमी की ताकत बताती हैं कि इस आदमी की पहुंच कहां-कहां है। इस तरह की दोस्तियां विरोधियों को डराने के काम भी आती हैं और समर्थकों का काम कराने में भी। इन दोस्तियों से आदमी का अहम तुष्ट होता है और उसमें सुरक्षा भाव बढ़ता है।”2

हालांकि दुनिया के तमाम देशों में चल रहे जनांदोलनों में फेसबुक और सोशल नेटवर्किंग साइट्स का खासा असर देखा जा रहा है। भारत में भी अन्ना हजारे के आंदोलन में फेसबुक और टिवटर का खासा इस्तेमाल देखा गया। इसके चलते इस आंदोलन पर ये आरोप भी लगे कि यह देश के खाए-अधाए मध्यवर्ग का आंदोलन है। किंतु सही यह है कि यह आज नई पीढ़ी के बीच संवाद का माध्यम बन गया है। सोशल मीडिया पर राजनेता भी अपनी टिप्पणियां करते हैं और उसके महत्व को रेखांकित करते हुए पीयूष पांडेय लिखते हैं-“अमेरिकी सोशल मीडिया की दुनिया में ताजा बहस यह है कि सोशल मीडिया पर लिखे जा रहे शब्दों को किस तरह लिया जाए? यह बहस अब आवश्यकता है। उमर के ट्वीट के संदर्भ में एक बात गौर करने लायक है कि यदि उन्होंने अपना बयान किसी अखबार या टेलीविजन चैनल को दिया होता तो शायद वे तोड़-मरोड़कर छापने या प्रसारित करने की बात भी कह सकते थे, लेकिन ट्विटर पर आपका खाता सिर्फ और सिर्फ आपका है। इसे संचालित करने की जिम्मेदारी आपकी है। अगर आपका ट्विटर या फेसबुक खाता हैक न हुआ हो तो आप इस पर लिखे शब्द से मुकर नहीं सकते।”3

बहुत कुछ घट रहा है इस दुनिया में- अब विचार के अलावा भी बहुत कुछ इस दुनिया में घट रहा है। वह मनोरोगियों और मनोविकारियों के हाथ में भी ताकत दे रहा है तो तमाम को विकारी भी बना रहा है। इसके सामाजिक प्रभावों का अध्ययन होना प्रारंभ हुआ है। तमाम प्रकार के दिखते हुए लाभों के अलावा सामाजिक संकट भी खड़े होने लगे हैं। उसने तमाम युवक-युवतियों को वह वर्चुअल दुनिया दी है जो उन्हें अपने परिवेश से काटकर एक ऐसी जमीन पर ले जा रही है जहां अवसाद और मनोरोग साथ-साथ जकड़ते हैं। नकली प्रोफाइल बनाकर किए जाने वाले छल और भावनाओं के व्यापार यहां भी हैं। छली जा रही तमाम कहानियां सुनाई देने लगी हैं। यह सुनना दुखद है किंतु सारा कुछ घट रहा है।

जनांदोलनों में खास भूमिकाः नया मीडिया किस तरह से उपयोगी बना है और सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने अपनी उपयोगिता साबित की है वह एक अध्ययन का विषय है। खासकर जनांदोलनों में उसने एक कारगर भूमिका का निर्वहन किया है। अनेक खतरों के साथ उसके सामाजिक लाभों का मूल्यांकन होना अभी शेष है। कथादेश के मीडिया वार्षिकी में इसी ताकत को स्वीकार करते हुए इस अंक के संपादकीय में संपादक द्वय दिलीप मंडल और अविनाश लिखते हैं-“ 21वीं सदी के मौजूदा दौर में परंपरागत मीडिया जब उम्मीद की कोई रोशनी नहीं दिखा रहा है, तब वैकल्पिक मीडिया के कुछ नए रूप सामने आए हैं। इनमें इंटरनेट पर खासतौर नजर रखने की जरूरत है। मिश्र और दूसरे अरब देशों में विद्गोह के कई कारण हैं, लेकिन इंटरनेट ने विद्रोहियों को संगठित होने में मदद की। दुनिया ने देखा कि फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट ने खासकर मिस्र में किस तरह संगठनकर्ता की भूमिका निभाई।”4

पीछे हुआ पारंपरिक मीडियाः किंतु पारंपरिक मीडिया अब चाहकर भी इसका मुकाबला नहीं कर सकता क्यों कि इसकी तेजी सब पर भारी है। सबसे बड़ी बात है इसकी गति और त्वरा। सिरिल गुप्ता की मानें तो-“ पारंपरिक मीडिया कितना भी तेज से अधिक तेज होने का दावा करता हो और चाहे खबर किसी भी कीमत पर लाता हो, नए मीडिया के सामने पानी मांगता है। लीबिया में पारंपरिक मीडिया पैठ न बना सका, लेकिन नए मीडिया साधनों जैसै ब्लाग,. ट्विटर, फेसबुक , यू-ट्यूब के जरिए पल-पल की खबर दुनिया देखती रही। नौबत यह आ गयी कि गद्दाफी सरकार ने पूरे देश में इंटरनेट की सुविधा बंद कर दी। फिर भी सैटलाइट कनेक्शन के जरिए लोगों को खबर मिलती रही। ” 5

पर सेहत तो बचा लीजिएः इसके सामाजिक प्रभावों के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी अब असर दिखाने लगीं हैं। तमाम प्रकार की बीमारियों के साथ अब कंप्यूटर सिड्रोम का खतरा आसन्न है। जिसने नई पीढ़ी ही नहीं, हर कंप्यूटर प्रेमी को जकड़ लिया है। अब यहां सिर्फ काम की बातें नहीं, बहुत से ऐसे काम हैं जो नहीं होने चाहिए, हो रहे हैं। एकांत अब आवश्यक्ता में बदल रहा है। समय मित्रों, परिजनों के साथ नहीं अब यहां बीत रहा है। ऐसे में परिवारों में भी संकट खड़े हो रहे हैं। यह खतरा टेलीविजन से बड़ा दिख रहा है, क्योंकि लाख के बावजूद टीवी ने परिवार की सामूहिकता पर हमला नहीं किया था। साइबर की दुनिया अकेले का संवाद रचती है, यह सामूहिक नहीं है इसलिए यह स्वप्नलोक सरीखी भी है। यहां सामने वाले की पहचान क्या है यह भी नहीं पता, उस नाम का कोई है या नहीं यह भी नहीं पता, किंतु कहानियां चल रही हैं, संवाद हो रहा है, प्यार घट रहा है, क्षोभ बढ़ रहा है। एक वाक्य के विचार किस तरह कमेंट्स में और पल की दोस्ती किस तरह प्यार में बदलती है- इसे घटित होता हम यहां देख सकते हैं। यानी खतरे आसमानी भी हैं और रूहानी भी।

संदर्भः

1. कुमार विजयः कहां पहुंचा रहे हैं अतंरंगता के नए पुल, नवनीत हिंदी डायजेस्ट (मुंबई), फरवरी, 2011 पेज-18
2. आनंद मधुसूदनः कितनी लंबी हो सकती है एक क्लिक की दूरी, नवनीत हिंदी डायजेस्ट (मुंबई) फरवरी, 2011, पेज-22
3. पांडेय पीयूषः ट्विटर पर उमर वाणी, दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण, नई दिल्ली, 4 सितंबर, 2011
4. मंडल दिलीप एवं अविनाश, संपादकीय, कथादेश,दिल्ली, अप्रैल-2011
5. गुप्त सिरिलःपुराने मीडिया की विदाई के दिन, कथादेश, दिल्ली, अप्रैल-2011

Tuesday, September 6, 2011

गुरू-शिष्य संबंधः नए रास्तों की तलाश


शिक्षक दिवस ( 5 सितंबर) पर विशेषः
अध्यापकों का विवेक और रचनाशीलता भी है कसौटी पर
-संजय द्विवेदी


शिक्षक मनुष्य का निर्माता है। एक शिक्षक की भूमिका बच्चों को साक्षर करने से ही खत्म नहीं हो जाती बल्कि वह अपने छात्रों में आत्मबल, आदर्श, नैतिक बल, सच्चाई, ईमानदारी, लगन और मेहनत की वह मशाल भी जलाता है जो उसे पूर्ण मनुष्य बनाते हैं। - सर जान एडम्स


जब हर रिश्ते को बाजार की नजर लग गयी है, तब गुरू-शिष्य के रिश्तों पर इसका असर न हो ऐसा कैसे हो सकता है ? नए जमाने के, नए मूल्यों ने हर रिश्ते पर बनावट, नकलीपन और स्वार्थों की एक ऐसी चादर डाल दी है, जिसमें असली सूरत नजर ही नहीं आती। अब शिक्षा बाजार का हिस्सा है, जबकि भारतीय परंपरा में वह गुरू के अधीन थी, समाज के अधीन थी।
बाजार में उतरे शातिर खिलाड़ीः
पूंजी के शातिर खिलाड़ियों ने जब से शिक्षा के बाजार में अपनी बोलियां लगानी शुरू की हैं तबसे हालात बदलने शुरू हो गए थे। शिक्षा के हर स्तर के बाजार भारत में सजने लगे थे। इसमें कम से कम चार तरह का भारत तैयार हो रहा था। आम छात्र के लिए बेहद साधारण सरकारी स्कूल थे जिनमें पढ़कर वह चौथे दर्जे के काम की योग्यताएं गढ़ सकता था। फिर उससे ऊपर के कुछ निजी स्कूल थे जिनमें वह बाबू बनने की क्षमताएं पा सकता था। फिर अंग्रेजी माध्यमों के मिशनों, शिशु मंदिरों और मझोले व्यापारियों की शिक्षा थी जो आपको उच्च मध्य वर्ग के करीब ले जा सकती थी। और सबसे ऊपर एक ऐसी शिक्षा थी जिनमें पढ़ने वालों को शासक वर्ग में होने का गुमान, पढ़ते समय ही हो जाता है। इस कुलीन तंत्र की तूती ही आज समाज के सभी क्षेत्रों में बोल रही है। इस पूरे चक्र में कुछ गुदड़ी के लाल भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, इसमें दो राय नहीं किंतु हमारी व्यवस्था ने वर्ण व्यवस्था के हिसाब से ही शिक्षा को भी चार खानों में बांट दिया है और चार तरह के भारत बनाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। जाहिर तौर पर यह हमारी एकता- अखंडता और सामाजिक समरसता के लिए बहुत घातक है।
उच्चशिक्षा के क्षेत्र में बदहालीः
हालात यह हैं कि कुल 54 करोड़ का हमारा युवा वर्ग उच्च शिक्षा के लिए तड़प रहा है। उसकी जरूरतों को हम पूरा नहीं कर पा रहे हैं। सरकारी क्षेत्रों की उदासीनता के चलते आज हमारे सरकारी विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय लगभग स्लम में बदल रहे हैं। एक लोककल्याणकारी सरकार जब सारा कुछ बाजार को सौंपने को आतुर हो तो किया भी क्या जा सकता है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्चशिक्षा का बाजार अब उन व्यापारियों के हवाले है, जिनको इससे मोटी कमाई की आस है। जाहिर तौर पर शिक्षा अब सबके लिए सुलभ नहीं रह जाएगी। कम वेतन और सुविधाओं में काम करने वाले शिक्षक आज भी गांवों और सूदूर क्षेत्रों में शिक्षा की अलख जगाए हुए हैं। किंतु यह संख्या निरंतर कम हो रही है। सरकारी प्रोत्साहन के अभाव और भ्रष्टाचार ने हालात बदतर कर दिए हैं। इससे लगता है कि शिक्षा अब हमारी सरकारों की प्राथमिकता का हिस्सा नहीं रही।
बढ़ गयी है जिम्मेदारीः
ऐसे कठिन समय में शिक्षक समुदाय की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। क्योंकि वह ही अपने विद्यार्थियों में मूल्य व संस्कृति प्रवाहित करता है। आज नई पीढ़ी में जो भ्रमित जानकारी या कच्चापन दिखता है, उसका कारण शिक्षक ही हैं। क्योंकि अपने सीमित ज्ञान, कमजोर समझ और पक्षपातपूर्ण विचारों के कारण वे बच्चों में सही समझ विकसित नहीं कर पाते। इसके कारण गुरू के प्रति सम्मान भी घट रहा है। रिश्तों में भी बाजार की छाया इतनी गहरी है कि वह अब डराने लगी हैं। आज आम आदमी जिस तरह शिक्षा के प्रति जागरूक हो रहा है और अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने के आगे आ रहा है, वे आकांक्षांए विराट हैं। उनको नजरंदाज करके हम देश का भविष्य नहीं गढ़ सकते। सबसे बड़ा संकट आज यह है कि गुरू-शिष्य के संबंध आज बाजार के मानकों पर तौले जा रहे हैं। युवाओं का भविष्य जिन हाथों में है, उनका बाजार तंत्र किस तरह शोषण कर रहा है इसे समझना जरूरी है। सरकारें उन्हें प्राथमिक शिक्षा में नए-नए नामों से किस तरह कम वेतन पर रखकर उनका शोषण कर रही हैं, यह एक गंभीर चिंता का विषय है। इसके चलते योग्य लोग शिक्षा क्षेत्र से पलायन कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि जीवन को ठीक से जीने के लिए यह व्यवसाय उचित नहीं है।
नई पीढ़ी की व्यापक आकांक्षांएः
शहरों में पढ़ रही नई पीढ़ी की समझ और सूचना का संसार बहुत व्यापक है। उसके पास ज्ञान और सूचना के अनेक साधन हैं जिसने परंपरागत शिक्षकों और उनके शिक्षण के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। नई पीढ़ी बहुत जल्दी और ज्यादा पाने की होड़ में है। उसके सामने एक अध्यापक की भूमिका बहुत सीमित हो गयी है। नए जमाने ने श्रद्धाभाव भी कम किया है। उसके अनेक नकारात्मक प्रसंग हमें दिखाई और सुनाई देते हैं। गुरू-शिष्य रिश्तों में मर्यादाएं टूट रही हैं, वर्जनाएं टूट रही हैं, अनुशासन भी भंग होता दिखता है। नए जमाने के शिक्षक भी विद्यार्थियों में अपनी लोकप्रियता के लिए कुछ ऐसे काम कर बैठते हैं जो उन्हें लांछित ही करते हैं। सीखने की प्रक्रिया का मर्यादित होना भी जरूरी है। परिसरों में संवाद, बहसें और विषयों पर विमर्श की धारा लगभग सूख रही है। परीक्षा को पास करना और एक नौकरी पाना इस दौर की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गयी है। ऐसे में शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस पीढ़ी की आकांक्षाओं की पूर्ति करने की है। साथ ही उनमें विषयों की गंभीर समझ पैदा करना भी जरूरी है। शिक्षा के साथ कौशल और मूल्यबोध का समावेश न हो तो वह व्यर्थ हो जाती है। इसलिए स्किल के साथ मूल्यों की शिक्षा बहुत जरूरी है। कारपोरेट के लिए पुरजे और रोबोट तैयार करने के बजाए अगर हम उन्हें मनुष्यता,ईमानदारी और प्रामणिकता की शिक्षा दे पाएं और स्वयं भी खुद को एक रोलमाडल के प्रस्तुत कर पाएं तो यह बड़ी बात होगी। शिक्षक अपने विद्यार्थियों के लिए एक दोस्त, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में सामने आते है। वह उसका रोल माडल भी हो सकते हैं।
सही तस्वीर गढ़ने की जरूरतः
गुरू-शिष्य परंपरा को समारोहों में याद की जाने वाली वस्तु के बजाए अगर हम उसकी सही तस्वीरें गढ़ सकें तो यह बड़ी बात होगी। किंतु देखा यह जा रहा है गुरू तो गुरूघंटाल बन रहे हैं और छात्र तोममोल करने वाले माहिर चालबाज। काम निकालने के लिए रिश्तों का इस्तेमाल करने से लेकर रिश्तों को कलंकित करने की कथाएं भी हमारे सामने हैं, जो शर्मसार भी करती हैं और चेतावनी भी देती है। नए समय में गुरू का मान- स्थान बचाए और बनाए रखा जा सकता है, बशर्ते हम विद्यार्थियों के प्रति एक ईमानदार सोच रखें, मानवीय व संवेदनशील व्यवहार रखें, उन्हें पढ़ने के बजाए समझने की दिशा में प्रेरित करें, उनके मानवीय गुणों को ज्यादा प्रोत्साहित करें। भारत निश्चय ही एक नई करवट ले रहा है, जहां हमारे नौजवान बहुत आशावादी होकर अपने शिक्षकों की तरफ निहार रहे हैं, उन्हें सही दिशा मिले तो आसमान में रंग भर सकते हैं। हमारे युवा भारत में इस समय दरअसल शिक्षकों का विवेक, रचनाशीलता और कल्पनाशीलता भी कसौटी पर है। क्योंकि देश को बनाने की इस परीक्षा में हमारे छात्र अगर फेल हो रहे हैं तो शिक्षक पास कैसे हो सकते हैं ?
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

Saturday, September 3, 2011

भोपाल को है आज भी न्याय का इंतजार


भोपाल गैस त्रासदी के सच पर बोले विजयमनोहर तिवारी

भोपाल, 3 सितंबर,2011। वरिष्ठ पत्रकार विजयमनोहर तिवारी का कहना है कि है विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी पर न तो भोपाल को न्याय मिल पाया है न ही रचनाकारों एवं पत्रकारों ने इस दर्द को अपनी लेखनी से व्यक्त किया। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग द्वारा “ भोपाल गैस त्रासदी की रिर्पोटिंग” विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यह दुखद है कि इतनी बड़ी त्रासदी पर प्रामाणिक पुस्तकें हमारे पास उपलब्ध नहीं हैं।
श्री तिवारी का कहना था कि कुछ हजार लोग आज भी यूनियन कारबाइड फैक्ट्री के आसपास के इलाकों में रह रहे हैं, जहां का जीवन वास्तव में नारकीय है और हम अपने शहर के लोगों के दुखों के प्रति इतने उदासीन कैसे हो सकते हैं? उन्होंने कहा भोपाल गैस त्रासदी एक ऐसी कथा है जिसने सत्तातंत्र, प्रशासन, समाज और न्यायपालिका सबके सामने कई सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि आज भोपाल में सारा कुछ सामान्य हो गया लगता है पर इन पचीस सालों में भी न्याय कहां मिला है? उन्होंने कहा कि युवा पत्रकारों और लेखकों को चाहिए कि वे भोपाल के इस दर्द का बयान करें। भोपाल का दर्द एक सामूहिक पीड़ा बनना चाहिए। ताकि ऐसी संवेदनहीनता के अवसर दुबारा उपस्थित न हों।
इस मौके पर श्री तिवारी ने अपनी किताब “ भोपाल गैस त्रासदीः आधी रात का सच” को लिखने की पृष्ठभूमि पर भी प्रकाश डाला और अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि खबरों को लिखने के क्रम में बहुत कुछ छूट जाता है उसे पुस्तक के रूप में देकर वे यह महसूस करते हैं कि अब वे अपनी जिम्मेदारी का पूरा निवर्हन कर पाए हैं। इसके पूर्व विभागाध्यक्ष संजय द्विवेदी ने उनका स्वागत किया। कार्यक्रम में डा. संजीव गुप्ता एवं डा. राखी तिवारी मौजूद रहे। कार्यक्रम में जनसंचार विभाग के विद्यार्थी बड़ी संख्या में मौजूद थे।

Saturday, August 20, 2011

अन्ना ने इस देश की आत्मा को छू लिया है


भ्रष्टाचार विरोधी जनांदोलन ने देश को एक सूत्र में बांधा

-संजय द्विवेदी


अन्ना हजारे ने सही मायने में इस देश की आत्मा को छू लिया है। सच मानिए उनकी गांधी टोपी, बालसुलभ उत्साह, उनकी भारतीय वेशभूषा और बातों की सहजता कुल मिलाकर एक भरोसा जगाती हैं। अन्ना आज जहां हैं उसके पीछे कहीं न कहीं वह छवि जिम्मेदार है जो उन्हें महात्मा गांधी से जोड़ती है। इसलिए जब कांग्रेस के अहंकारी प्रवक्ता उनके बारे में कुछ कहते हैं, तो दर्द देश को होता है। अन्ना हजारे सही मायने में एक भारतीय आत्मा के रूप में उभरे हैं। उन्होंने देश की नब्ज पर हाथ रख दिया है।

कांग्रेस के दिशाहीन और जनता से कटे नेतृत्व की छोड़िए उन्होंने विपक्ष के भी नाकारेपन का लाभ उठाते हुए यह साबित कर दिया है कि लोकशाही की असल ताकत क्या है। जनता के मन में इस कदर उनका बस जाना और नौजवानों का उनके पक्ष में सड़कों पर उतरना, इसे साधारण मत समझिए। यह वास्तव में एक साधारण आदमी के असाधारण हो जाने की परिघटना है। हमारी खुफिया एजेंसियां कह रही थीं- ‘अन्ना को रामदेव समझने की भूल न कीजिए।’ किंतु सरकारें कहां सुनती हैं। पूरी फौज उतर पड़ी अन्ना को निपटाने के लिए। क्या कांग्रेस के प्रवक्ता, क्या मंत्री सब उनकी ईमानदारी और निजी जीवन पर ही कीचड़ उछालने लगे। लेकिन क्या हुआ कि तीन दिनों के भीतर देश के गृहमंत्री को लोकसभा में उन्हें ‘सच्चा गाँधीवादी’ बताते हुए ‘सेल्यूट’ करना पड़ा। समय बदलता है, तो यूं ही बदलता है।

राजनीतिक दलों के लिए चुनौतीः

अन्ना आज राजनीतिक दलों के लिए एक चुनौती और देश के सबसे बड़े यूथ आईकान हैं। वे लोकप्रियता के उस शिखर पर हैं जहां पहुंचने के लिए राजनेता, अभिनेता और लोकप्रिय कलाकार तरसते हैं। महाराष्ट्र के एक गांव राणेगण सिद्धि के इस आम इंसान के इस नए रूपांतरण के लिए आप क्या कहेंगें? क्या यह यूं हो गया ? सच है समय अपने नायक और खलनायक दोनों तलाश लेता है। याद कीजिए यूपीए-1 की ताजपोशी का समय जब मनमोहन सिंह, एक ऐसे ईमानदार आईकान के तौर पर प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हैं जो भारत का भविष्य बदल सकता है, क्योंकि वह एक अर्थशास्त्री के तौर पर दुनिया भर में सम्मानित हैं। आज देखिए उनकी ईमानदारी और अर्थशास्त्र दोनों औंधे मुंह पड़े हैं। अमरीका से हुए परमाणु करार को पास कराने के लिए अपनी जान लड़ा देने वाले अमरीका प्रिय प्रधानमंत्री के सहायकों की बेबसी देखिए वे यह कहने को मजबूर हैं कि अन्ना के आंदोलन के पीछे अमरीका का हाथ है। अमरीका की चाकरी में लगी केंद्र सरकार के सहयोगियों के इस बयान पर क्या आप हंसे बिना रह सकते हैं? लेकिन उलटबासियां जारी हैं। सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री के राज में भ्रष्टाचार के रिकार्ड टूट रहे हैं, और विद्वान अर्थशास्त्री को प्रधानमंत्री बनाने की सजा यह कि महंगाई से जनता त्राहि-त्राहि कर रही है।

विपक्ष भी करता रहा निराशः

इस समय में तो विपक्ष भी आशा से अधिक निराश कर रहा है। प्रामणिकता के सवाल पर विपक्ष की भी विश्वसनीयता भी दांव पर है। यह साधारण नहीं है कि जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं वहां भी भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। केरल में वामपंथियों को ले डूबने वाले विजयन हों, कर्नाटक के भाजपाई मुख्यमंत्री रहे वीएस येदिरेप्पा या उप्र की मुख्यमंत्री मायावती। सब का ट्रैक बहुत बेहतर नहीं है। शिबू सोरेन, लालूप्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव की याद तो मत ही दिलाइए। राज्यों की विपक्षी सरकारें लूट-पाट का उदाहरण बनने से खुद को रोक नहीं पायीं। ऐसे में राजनीतिक विश्वसनीयता के मोर्चे पर वे कांग्रेस से बहुत बेहतर स्थिति में नहीं हैं। कम से कम भ्रष्टाचार के मामले पर मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का राष्ट्रीय चरित्र एक सरीखा है। सो इस राजनीतिक शून्यता और विपक्ष के नाकारेपन के बीच अन्ना आशा की एक किरण बनकर उभरते हैं। विपक्ष वास्तव में सक्रिय और विश्वसनीय होता तो अन्ना कहां होते? इसलिए देखिए कि सारे दल अपनी घबराहटों के बावजूद लोकपाल को लेकर किंतु-परंतु से आगे नहीं बढ़ रहे हैं। अन्ना हजारे के नैतिक बल और व्यापक जनसमर्थन ने उन्हें सहमा जरूर दिया है किंतु वे आज भी आगे आकर सक्षम लोकपाल बनाने के उत्सुक नहीं दिखते। राजनीतिक दलों का यही द्वंद देश की सबसे बड़ी पीड़ा है। जनता इसे देख रही है और समझ भी रही है।

टूटा राज्य का दंभः

सवाल यह भी नहीं है कि अन्ना सफल होते हैं या विफल किंतु अन्ना ने जनशक्ति का भान, मदांध राजनीति को करा दिया है। राज्य( स्टेट) को यह जतला दिया है उसका दंभ, जनशक्ति चाहे तो चूर-चूर हो सकता है। बड़बोले, फाइवस्टारी और गगनविहारी नेताओं को अन्ना ने अपनी साधारणता से ही लाजवाब कर दिया है। अगर उन्हें दूसरा गांधी कहा जा रहा है तो यह अतिरंजना भले हो, किंतु सच लगती है। क्योंकि आज की राजनीति के बौनों की तुलना में वे सच में आदमकद नजर आते हैं। यह सही बात है अन्ना के पास गांधी, जयप्रकाश नारायण और वीपी सिंह जैसा कोई समृद्ध अतीत नहीं है। उनके पास सिर्फ उनका एक गांव है, जहां उन्होंने अपने प्रयोग किए, उनका अपना राज्य है, जहां वे भ्रष्टों से लड़े और उसकी कीमत भी चुकायी। किंतु उनके पास वह आत्मबल, नैतिक बल और सादगी है जो आज की राजनीति में दुर्लभ है। उनके पास निश्चय ही न गांधी सरीखा व्यक्तित्व है, ना ही जयप्रकाश नारायण सरीखा क्रांतिकारी और प्रभावकारी व्यक्तित्व। वीपी सिंह की तरह न वे राजपुत्र हैं न ही उनका कोई राजनीतिक अतीत है। किंतु कुछ बात है कि जो लोगों से उनको जोड़ती है। उनकी निश्छलता, सहजता, कुछ कर गुजरने की इच्छा, उनकी ईमानदारी और अराजनैतिक चरित्र उनकी ताकत बन गए हैं।

हाथ में तिरंगा और वंदेमातरम् का नादः

आजादी के साढ़े छः दशक के बाद जब वंदेमातरम, इंकलाब जिंदाबाद, भारत माता की जय की नारे लगाते नौजवान तिरंगे के साथ दिल्ली ही नहीं देश के हर शहर में दिखने लगे हैं तो आप तय मानिए कि इस देश का जज्बा अभी मरा नहीं है। इन्हें फेसबुकिया, ट्विटरिया गिरोह मत कहिए- यह चीजों का सरलीकरण है। संवाद के माध्यम बदल सकते हैं पर विश्वसनीय नेतृत्व के बिना लोगों को सड़कों पर उतारना आसान नहीं होता। गौहाटी से लेकर कोलकाता और लखनऊ से लेकर हैदराबाद तक बड़े और छोटे समूहों में अगर लोग निकले हैं तो इसका मजाक न बनाइए। कुछ करते हुए देश का स्वागत कीजिए। युवा अगर देश जाति, धर्म,राज्य और पंथ की सीमाएं तोड़कर ‘भारत मां की जय’ बोल रहा है तो कान बंद मत कीजिए। सबको पता है कि अन्ना गांधी नहीं हैं, किंतु वे गांधी के रास्ते पर चल रहे हैं। वे विवेकानंद भी नहीं हैं पर विवेकानंद के अध्ययन ने उनके जीवन को बदला है। इतना तय मानिए कि वे हिंदुस्तान के आम और खास हर आदमी की आवाज बन गए हैं। अन्ना को नहीं उस भारतीय मनीषा को सलाम कीजिए जो अपने गांव की माटी और इस देश के आम आदमी में परमात्मा के दर्शन करता है। अन्ना के इस आध्यात्मिक बल को सलाम कीजिए। इस देश पर पड़ी गांधी की लंबी छाया को सलाम कीजिए कि जिनकी आभा में पूरा देश अन्ना बनने को आतुर है। अन्ना अगर गांधी को नहीं समझते, विवेकानंद को नहीं समझते तो तय मानिए वे देश को भी अपनी बात नहीं समझा पाते। उनका नैतिक बल इन्हीं विभूतियों से बल पाता है। उनको मीडिया, ट्यूटर और फेसबुक की जरूरत नहीं है, वे उनके मददगार हो सकते हैं किंतु वे अन्ना को बनाने वाले नहीं हैं। अन्ना के आंदोलन को बनाने वाले नहीं हैं। अन्ना का आंदोलनकारी व्यक्तित्व भारत की माटी में गहरे बसे लोकतांत्रिक चैतन्य का परिणाम है। जहां एक आम आदमी भी अपनी आध्यात्मिक चेतना और नैतिक बल से महामानव हो सकता है। गांधी ने यही किया और अब अन्ना यह कर रहे हैं। सफलताएं और असफलताएं मायने नहीं रखतीं। गांधी भी देश का बंटवारा रोक नहीं पाए, अन्ना भी शायद भ्रष्टाचार को खत्म होता न देख पाएं, किंतु उन्होंने देश को मुस्कराने का एक मौका दिया है। उन्होंने नई पीढ़ी को राष्ट्रवाद की एक नई परिभाषा दी है। खाए-अधाए मध्यवर्ग को भी फिर से राजनीतिक चेतना से लैस कर दिया है। एक लोकतंत्र के वास्तविक अर्थ लोगों को समझाने की कोशिशें शुरू की हैं। एक पूरी युवा पीढ़ी जिसने गांधी, भगत सिहं, डा.लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय या जयप्रकाश नारायण को देखा नहीं है। उसे उस परंपरा से जोड़ने की कोशिश की है। अन्ना ने जनांदोलन और उसके मायने समझाए हैं।

सवाल पूछने लगे हैं नौजवानः

कांग्रेस के एक जिम्मेदार नेता कहते हैं कि यह फैशन है। अगर यह फैशनपरस्ती भी तो भी वह अमरीका की तरफ मुंह बाए खड़ी, एनआरआई बनने, अपना घर भरने और सिर्फ खुद की चिंता की करने वाली पीढ़ी का एक सही दिशा में प्रस्थान है। यह फैशन भी है तो स्वागत योग्य है क्योंकि अरसे बाद शिक्षा परिसरों में फेयरवेल पार्टियों, डांस पार्टिंयों और फैशन शो से आगे अन्ना के बहाने देश पर बात हो रही है,भ्रष्टाचार पर बात हो रही है, प्रदर्शन हो रहे हैं। नौजवान सवाल खड़े कर रहे हैं और पूछ रहे हैं। अन्ना ने अगर देश के नौजवानों को सवाल करना भर सिखा दिया तो यह भी इस दौर की एक बड़ी उपलब्धि होगी। अन्ना हजारे की जंग से बहुत उम्मीदें रखना बेमानी है किंतु यह एक बड़ी लड़ाई की शुरूआत तो बन ही सकती है। अन्ना की इस जंग को तोड़ने और भोथरा बनाने के खेल अभी और होंगें। सत्ता अपने खलचरित्र का परिचय जरूर देगी। किंतु भारतीय जन अगर अपनी स्मृतियों को थोड़ा स्थाई रख पाए तो राजनीतिक तंत्र को भी इसके सबक जरूर मिलेगें। क्योंकि अब तक हमारा राजनीतिक तंत्र भारतीय जनता के स्मृतिदोष का ही लाभ उठाता आया है। अब उसे लग रहा है कि हम ‘पांच साल के ठेकेदारों’ से पांच साल से पहले ही सवाल क्यों पूछे जा रहे हैं। इसलिए वे ललकार रहे हैं कि आप चुनकर आइए और फिर सवाल पूछिए। पर यह सवाल भी मौंजू कि एक अरब लोगों के देश में आखिर कितने लोग लोकसभा और राज्यसभा में भेजे जा सकते हैं? यानि सवाल करने का हक क्या संसद में बैठे लोगों का ही होगा, किंतु अन्ना ने बता दिया है कि नहीं हर भारतीय को सवाल करने का हक है। “हम भारत के लोग” संविधान में लिखी इन पंक्तियों के मायने समझ सकें तो अन्ना का आंदोलन सार्थक होगा और अपने लक्ष्य के कुछ सोपान जरूर तय करेगा।

Monday, August 8, 2011

लोकतांत्रिक चेतना का देश है भारतः विजयबहादुर सिंह


स्थानीय विविधताएं ही करेंगी पश्चिमी संस्कृति के हमलों का मुकाबला
भोपाल, 8 जुलाई 2011। हिंदी साहित्य के प्रख्यात आलोचक एवं विचारक डा.विजयबहादुर सिंह का कहना है कि भारत एक लोकतांत्रिक चेतना का देश है। इसकी स्थानीय विविधताएं ही बहुराष्ट्रीय निगमों और पश्चिमी संस्कृति के साझा हमलों का मुकाबला कर सकती हैं। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग द्वारा ‘भारत का सांस्कृतिक का अवचेतन ’ विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि ज्ञान और संस्कृति अगर अलग-अलग चलेंगें तो यह मनुष्य के खिलाफ होगा। प्रख्यात विचारक धर्मपाल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनके द्वारा उठाया गया यह सवाल कि “ हम किसके संसार में रहने लगे हैं”, आज बहुत प्रासंगिक हो उठा है। हिंदुस्तान के लोग आज दोहरे दिमाग से काम कर रहे हैं, यह एक बड़ी चिंता है। सभ्यता में हम पश्चिम की नकल कर रहे हैं और धर्म के पालन में हम अपने समाज में लौट आते हैं। डा. सिंह ने कहा कि 1947 के पहले स्वदेशी, सत्याग्रह और अहिंसा हमारे मूल्य थे किंतु आजादी के बाद हमने परदेशीपन, मिथ्याग्रह और हिंसा को अपना लिया है। यह दासता का दिमाग लेकर हम अपनी पंचवर्षीय योजनाएं बनाते रहे, संविधान रचते रहे और नौकरशाही भी उसी दिशा में काम करती रही। ऐसे में सोच वा आदर्श में फासले बहुत बढ़ गए हैं। हमारा पूरा तंत्र आम आदमी के नहीं ,सरकार के पक्ष में खड़ा दिखता है। हमारा सामाजिक जीवन और लोकजीवन दोनों अलग-अलग दिशा में चल रहे हैं। जबकि हिंदुस्तान समाजों का देश नहीं ‘लोक’ है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ का उल्लेख करते हुए विजय बहादुर सिंह ने कहा कि पश्चिम कभी भी हमारा आदर्श नहीं हो सकता, क्योंकि यह सभ्यता अपने को स्वामी और बाकी को दास समझती है। उनका कहना था कि कोई भी क्रांति तभी सार्थक है, जब उससे होने वाले परिवर्तन मनुष्यता के पक्ष में हों। आजादी के बाद जो भी बदलाव किए जा रहे हैं वे वास्तव में हमारी परंपरा और संस्कृति से मेल नहीं खाते। भारत की सांस्कृतिक चेतना त्याग में विश्वास करती है, क्योंकि वह एक आदमी को इंसान में रूपांतरित करती है। शायद इसीलिए गालिब ने लिखा कि “आदमी को मयस्सर नहीं इंशा होना”। भारत की संस्कृति इंसान बनाने वाली संस्कृति है पर हम अपना रास्ता भूलकर उस पश्चिम का अंधानुकरण कर रहे हैं, जिसे गांधी ने कभी शैतानी सभ्यता कहकर संबोधित किया था। इस अवसर पर डा. श्रीकांत सिंह, पुष्पेंद्रपाल सिंह, डा. संजीव गुप्ता, पूर्णेंदु शुक्ल, शलभ श्रीवास्तव, प्रशांत पाराशर और जनसंचार विभाग के विद्यार्थी मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन विभागाध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।

लोकमंगल हो मीडिया का ध्येयः स्वामी शाश्वतानंद


भोपाल, 6 अगस्त,2011। महामंडलेश्वर डा.स्वामी शाश्वतानंद गिरि का कहना है कि लोकमंगल अगर पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं है तो वह व्यर्थ है। हमें हमारे सामाजिक संवाद और पत्रकारिता में लोकमंगल के तत्व को शामिल करना पड़ेगा। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा ‘संवाद और पत्रकारिता का अध्यात्म’ विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अध्यात्म के बिना प्रेरणा संभव नहीं है। अध्यात्म ही किसी भी क्षेत्र में हमें लोकमंगल की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि अरविंद घोष, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी भी पत्रकार थे किंतु उनकी पत्रकारिता, उनकी आत्मा का स्पंदन थी, आज जबकि पूंजी का स्पंदन ही पत्रकारिता की प्रेरणा बन रहा है। उन्होंने युवा पत्रकारों से आग्रह किया कि वे अपनी पत्रकारिता में सकारात्मकता को शामिल करें तभी हम भारत के मीडिया का मान बढ़ा सकेंगें। शरीर के तल पर मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं, मूल्य ही हमें अलग करते हैं। हमारे लिए मनुष्यता बहुत महत्वपूर्ण है।
डा. गिरि ने कहा कि मन से लिखा और मन से बोला गया शब्द ही पढ़ा और सुना जाएगा। बुद्धि से लिखे और बोले हुए का कोई महत्व नहीं है, वह बुद्धि से ही पढ़ा और सुना जाएगा। हमारे लेखन में अगर हमारी आत्मा न होगी तो वह प्राणहीन हो जाएगा। प्रेमचंद और निराला जी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ये इसलिए दिल से पढ़े गए, क्योंकि उन्होंने दिल से लिखा। कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों ने डा. गिरि से प्रश्न भी पूछे।
कार्यक्रम के प्रारंभ में कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, रजिस्ट्रार डा. चंदर सोनाने, प्रो. आशीष जोशी, दीपक शर्मा, पवित्र श्रीवास्तव, पुष्पेंद्र पाल सिंह, डा. श्रीकांत सिंह, डा. पी. शशिकला, डा. आरती सारंग, वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा,पूर्व कुलसचिव पी. एन. साकल्ले आदि ने पुष्पहार से महामंडलेश्वर डा. गिरि का स्वागत किया। संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।