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Saturday, October 1, 2011

संवाद में भी लोकतंत्र लेकर आया सोशल मीडियाः पी. शशिकला




भोपाल, 1 अक्टूबर। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में न्यू मीडिया विभाग की अध्यक्ष डा. पी. शशिकला का कहना है कि सोशल मीडिया ने हमारे संवाद का चेहरा मोहरा बदल दिया है। आज हम इसके चलते एक आनलाइन संवाद के वातावरण में जी रहे हैं। वे यहां जनसंचार विभाग द्वारा सार्थक शनिवार में आयोजित व्याख्यान को संबोधित कर रही थीं।
डा. शशिकला ने कहा कि न्यू मीडिया और सोशल मीडिया दोनों अलग चीजें हैं। सोशल मीडिया एक खास मकसद से बनाया जाता है। सोशल मीडिया एक रणनीतिक टेक्नालाजी का इस्तेमाल कर कई चीजें आरोपित भी कर रहा है। हां इसने हमें एक लोकतांत्रिक स्पेस जरूर दिया है जिसके चलते एक आम आदमी भी सूचनाओं के इस प्रवाह का लाभ ले रहा है। खासकर कनर्वेंजेंस के दौर में यह बहुत महत्व पूर्ण हो गया है। जहां एक संस्था या समाज को दूसरे से संवाद करना जरूरी है, वह चाहे व्यापार का हो या संस्कृति का या तकनीक का।
सांस्कृतिक कार्यक्रमः इस अवसर पर भक्ति पर केंद्रित प्रस्तुतियां भी विद्यार्थियों ने दीं जिनमें सुमित रंजन, सुमैया, शिल्पा अग्रवाल, मनीषा, पुनीत पाण्डेय, जागृति सोनी, मनीष दुबे, विकास गौर, सौरभ पवार, रूपाली सिंघल, ओमप्रकाश पवार, ऋचा उपाध्याय, प्रगति तिवारी, रेखा, छवि गौर, डाली जैन, आस्था पुरी, तृषा गौर आदि शामिल रहे। संचालन विकास मिश्र एवं आयुषी तिवारी ने किया।
क्विजः क्विज में जूनी कुमारी और शाहीन बानो ने छात्र- छात्राओं से रोचक सवाल पूछे। जिसमें गैंग-बी विजयी रहा।

Thursday, September 29, 2011

सार्थक शनिवार-24सितंबर,2011






सार्थक शनिवार को क्विज के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए जिनमें सबने उत्साह से भाग लिया।

सार्थक शनिवार 24सितंबर की छवियां





सार्थक शनिवार(24सितंबर2011)-डा.वैदिक का व्याख्यान





आंदोलनों को गति देता है मीडियाः वैदिक
जनांदोलन और मीडिया विषय पर डा. वैदिक का व्याख्यान

भोपाल,24 सितंबर। वरिष्ठ पत्रकार डा. वेदप्रताप वैदिक का कहना है कि हर जनांदोलन की सफलता में पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में “जनांदोलन और मीडिया” विषय पर आयोजित व्याख्यान में मुख्यवक्ता की आसंदी से बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि जब-जब आम जनता व मीडिया की आवाज को दबाने का प्रयास किया गया है, मीडिया ने पूरी ताकत से इसका विरोध किया है। मीडिया खासकर अखबारों ने राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा दिया है। यह पत्रकारों के दृढ़ निश्चय का ही परिणाम था कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को मानहानि विधेयक वापस लेना पड़ा। उन्होंने कहा कि तमाम जनांदोलनों को मीडिया तरजीह नहीं देता क्योंकि वे उसके लिए बाजार नहीं बनाते। खासकर आदिवासियों और किसानों के सवालों पर हुए आंदोलनों की मीडिया ने खासी उपेक्षा की है। उन्होंने कहा कि सबके बावजूद मीडिया बाजार की तलाश में तमाम सवालों की उपेक्षा कर जाता है। उनका कहना कि पत्रकारों को जनांदोलन के विषयों का ठीक से विश्लेषण करना चाहिए।
डा. वैदिक ने कहा कि मीडिया के सहयोग ने ही बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन को ताकत दी है। दोनों के आंदोलन ने देश को एक दिशा दी है इससे हमें पता चलता है कि मीडिया कितना महत्वपूर्ण रोल अदा कर सकता है। उनका कहना था कि लोगों के बीच भ्रष्टाचार और काले धन के सवाल पर काफी गुस्सा है, राजनीति निरंतर निराश कर रही है। ऐसे में जनांदोलनों में लोगों का जुटना स्वाभाविक है। उनका यह भी कहना था कि अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता के पीछे बाबा रामदेव के आंदोलन ने ही आधार तैयार किया था। क्योंकि जिस तरह सरकार ने बाबा के आंदोलन का दमन किया उससे लोग गुस्से से भरे बैठे थे, अन्ना ने जब दिल्ली में हुंकार लगाई तो लोग सड़कों पर उतर आए। डा. वैदिक ने कहा कि मीडिया की भूमिका इस आंदोलन में बहुत खास रही है। इसके बावजूद कोई भी आंदोलन सिर्फ मीडिया के चलते महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। मीडिया की अपनी सीमाएं हैं तथा उसकी अपनी बाजारकेंद्रित रूचियां हैं। साथ ही कई मामलों में वह चयनित दृष्टिकोण अपनाता है। जनांदोलन के नेताओं का उंचा चरित्र ही किसी आंदोलन की सफलता की गारंटी है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने की एवं संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया। कार्यक्रम के प्रारंभ में प्रो. आशीष जोशी, डा. पी. शशिकला, दीपक शर्मा, डा. आरती सारंग, राघवेंद्र सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया।

Saturday, September 17, 2011

चित्रों में सार्थक शनिवार






भोपाल,17 सितंबर। इस बार सार्थक शनिवार की ड्रेस कोड थी ब्लैक और यह सौभाग्य था कि आज हमें कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला का व्याख्यान सुनने के लिए मिला। आखिरी सत्र में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत थीं जिसने एक अलग ही समां बांध दिया।

सार्थक शनिवार में बोले कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला






भोपाल, 17 सितंबर,2011। सार्थक शनिवार के इस हफ्ते के आयोजन में कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने वैश्विक परिदृश्य और भारत जापान संबंध विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बदलती दुनिया में भारत-जापान मिलकर वैश्विक चुनौतियों का मुकाबला कर सकते है क्योंकि दोनों देशों मे कई जोड़ने वाले बिंदु मौजूद हैं। इससे विश्वशांति और सद्भाव को भी बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा जापान और भारत दोनों मिलकर एक नई दुनिया बना सकते हैं, जहां सबको साथ मिलकर काम करने और प्रगति करने के अवसर होंगें। उन्होंने कहा कि भारत और जापान का मीडिया एक सक्रिय भूमिका निभाकर रिश्तों में पुल का काम कर सकता है। इस मौके पर प्रो. कुठियाला ने छात्रों के सवालों के जबाव भी दिए।
दूसरे सत्र में विद्यार्थियों ने क्विज के माध्यम से ज्ञान और सूचनाओं के संसार का आनंद लिया तो तीसरे सत्र में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। इनमें सर्वश्री अभिषेक झा, पुनीत पाण्डेय,विकास मिश्र, मिलन भार्गव,साजिया परवीन खान, योगिता राठौर, मनीषा तोमर, सुमित रंजन, चिरंजीवी थापा, विकास गौर, सौरभ पवार, मनीष दुबे, सद्दाम हुसैन मंसूरी, अनुतोष ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। कार्यक्रम का संचालन तृषा गौर और शिल्पा अग्रवाल ने किया। कार्यक्रम में विभाग के प्राध्यापकगण डा. राखी तिवारी, गरिमा पटेल, पूर्णेंदु शुक्ल,प्रशांत पाराशर मौजूद रहे। अंत में विभागाध्यक्ष संजय द्विवेदी ने विद्यार्थियों की प्रस्तुति की सराहना की और कहा कि सार्थक शनिवार को आप सबने सार्थकता प्रदान की है।

Sunday, September 11, 2011

सार्थक शनिवार (10-09-2011) नक्सली समस्या पर विमर्श और प्रकृति से संवाद











हर शनिवार की तरह इस बार भी जनसंचार विभाग के छात्र-छात्राओं द्वारा निर्धारित हरे रंग के ड्रेसकोड में सभी ने शिरकत की। कार्यक्रम की शुरुआत विभागाध्यक्ष श्री संजय द्विवेदी ने 'भारतीय लोकतंत्र को माओवाद की चुनौती' विषय पर एक समृद्ध व्याख्यान देकर की। विलुप्त होती जा रही आदिवासियों की संस्कृति पर चिंता जताते हुए उन्होंने विभिन्न नक्सली गतिविधियों पर प्रकाश डाला।
खतरनाक है नक्सलवादः संजय द्विवेदी ने कहा कि भारतीय राज्य के द्वारा पैदा किए गए भ्रम का सबसे ज्यादा फायदा नक्सली उठा रहे हैं। उनका खूनी खेल नित नए क्षेत्रों में विस्तार कर रहा है। निरंतर अपना क्षेत्र विस्तार कर रहे नक्सल संगठन हमारे राज्य को निरंतर चुनौती देते हुए आगे बढ़ रहे हैं। उनका निशाना दिल्ली है। 2050 में भारतीय राजसत्ता पर कब्जे का उनका दुस्वप्न बहुत प्रकट हैं किंतु जाने क्यों हमारी सरकारें इस अधोषित युद्ध के समक्ष अत्यंत विनीत नजर आती हैं। एक बड़ी सोची- समझी साजिश के तहत नक्सलवाद को एक विचार के साथ जोड़ कर विचारधारा बताया जा रहा है। उन्होंने सवाल किया कि क्या आतंक का भी कोई ‘वाद’ हो सकता है? क्या रक्त बहाने की भी कोई विचारधारा हो सकती है? राक्षसी आतंक का दमन और उसका समूल नाश ही इसका उत्तर है। किंतु हमारी सरकारों में बैठे कुछ राजनेता, नौकरशाह, मीडिया कर्मी, बुद्धिजीवी और जनसंगठनों के लोग नक्सलवाद को लेकर समाज को भ्रमित करने में सफल हो रहे हैं। गोली का जवाब, गोली से देना गलत है-ऐसा कहना सरल है किंतु ऐसी स्थितियों में रहते हुए सहज जीवन जीना भी कठिन है। एक विचार ने जब आपके गणतंत्र के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है तो क्या आप उसे शांतिप्रवचन ही देते रहेंगें। आप उनसे संवाद की अपीलें करते रहेंगें और बातचीत के लिए तैयार हो जाएंगें। जबकि सामने वाला पक्ष इस भ्रम का फायदा उठाकर निरंतर नई शक्ति अर्जित कर रहा है।
दुनिया के सबसे खूबसूरत लोगों को मिटाने का षडयंत्रः श्री द्विवेदी ने कहा कि आदिवासी समाज को निकट से जानने वाले जानते हैं कि यह दुनिया का सबसे निर्दोष समाज है। ऐसे समाज की पीड़ा को देखकर भी न जाने कैसे हम चुप रह जाते हैं। पर यह तय मानिए कि इस बेहद अहिंसक, प्रकृतिपूजक समाज के खिलाफ चल रहा नक्सलवादी अभियान एक मानवताविरोधी अभियान भी है। हमें किसी भी रूप में इस सवाल पर किंतु-परंतु जैसे शब्दों के माध्यम से बाजीगरी दिखाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। भारत की भूमि के वास्तविक पुत्र आदिवासी ही हैं, कोई विदेशी विचार उन्हें मिटाने में सफल नहीं हो सकता। उनके शांत जीवन में बंदूकों का खलल, बारूदों की गंध हटाने का यही सही समय है। उन्होंने कहा कि बस्तर से आ रहे संदेश यह कह रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र यहां एक कठिन लड़ाई लड़ रहा है, जहां हमारे आदिवासी बंधु उसका सबसे बड़ा शिकार हैं। उन्हें बचाना दरअसल दुनिया के सबसे खूबसूरत लोगों को बचाना है।नक्सलवाद की दमन इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह लड़ाई हमारे जनतंत्र के खिलाफ है।
क्विज से मनोरंजन और ज्ञानवर्धन भीः
तत्पश्चात हुई प्रश्नोत्तरी ने न केवल सबका मनोरंजन बल्कि ज्ञानवर्धन भी किया। इसके पश्चात कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए संचालन की ज़िम्मेदारी एमएएमसी-३ की अनुराधा कुमारी व मीमांसा प्रतिनव ने ली।
प्रकृति से यूं हुआ संवादः
पूर्व निर्धारित थीम 'प्रकृति' को आधार बनाते हुए अनेक छात्रों ने एक से बढ़कर एक प्रस्तुति दी। किसी ने कविता तो किसी ने हिन्दी गीतों के माध्यम से प्रकृति के विभिन्न रूपों के सौन्दर्य को व्यक्त किया। इस मौके डा. आरती सारंग, डा. राखी तिवारी, सुश्री गरिमा पटेल भी मौजूद रहे।
बेहतर प्रस्तुति और सार्थक आयोजनः इस मौके पर डा. आरती सारंग ने कहा कि विद्यार्थियों ने बहुत सामयिक और गंभीर विषय पर अपनी प्रस्तुतियां दी है। प्रकृति के साथ संवाद न होने के कारण ही हमारे सामने संकट खड़े हो रहे हैं।उन्होंने कहा कि इस आयोजन से आपने इसके नाम सार्थक शनिवार को सार्थक कर दिया है।
अगले हफ्ते का विषय और ड्रेस कोडः राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न और आतंकवाद की चुनौती, ड्रेस कोडः ब्लैक
(सभी फोटोः सुमित रंजन, अभिषेक झा)