
-देवाशीष मिश्रा
दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुशबू के खिलाफ तमिलनाडु में लगभग चार वर्ष पूर्व मुकदमा दायर किया गया था। केस का आधार उनके उस बयान को बनाया गया था, जिसमें उन्होने एक पत्रिका को दिये गये इंटरव्यू के दौरान कहा था कि उन्हे सेक्स सम्बन्धो से कोई दिक्कत नही जो शादी से पूर्व सुरक्षित रुप से बनाये गये हों। इसी केस की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के साथ लिव इन रिलेशनशिप का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।
यह अटल सत्य है कि समाज हमेशा बदलाव के दौर में रहता है, हाँ कभी यह बदलाव तेजी से होता है तो कभी धीमे-धीमे। गीता में भी कहा गया है परिवर्तन संसार का नियम है। लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हो रहे परिवर्तन का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। मानवीय सम्बन्धो और व्यवहार में क्या बदलाव आयेंगे। हम सुख-दुख की बात हमेशा करते है और दुखों से भागते हुये सुख की आस लगाये बैठे रहते हैं और इस दौड़ में यह भूल जाते हैं कि हमारे सुख-दुख के पीछे सबसे बड़ी वजह हमारी जीवन शैली है। लिव इन रिलेशनशिप भी हमारी जीवन शैली का एक हिस्सा बनता जा रहा है और यह समाज में बदलाव का एक ज्वलंत उदाहरण है। समाज के बुध्दिजीवियों में लगातार इस विषय को लेकर विचार विमर्श हो रहा है। समाज का ही अंग होने के कारण यह हमारी भी जिम्मेदारी है कि हम इस पर विचार करें। इस विषय पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज को इसकी आवश्यकता कितनी है और वह कहाँ तक तैयार है। अगर पश्चिमी देशों की बात की जाए तो वहाँ यह आम बात है लेकिन भारतीय समाज में आम सहमति बनना अभी दूर का विषय है। इसका सबसे बड़ा कारण भारतीय समाज में विवाह संस्था के महत्व का आज भी प्रभावशाली होना है। विवाह नामक संस्था भारतीय जड़ों में समायी है।
भारत में लिव इन रिलेशनशिप की शुरूआत के कई कारण है जिसमें उदारीकरण प्रमुख कारणों में एक है। उदारीकरण की वजह से प्राइवेट सेक्टरों में नौकरी की बाढ़ आ गयी। जिससे देश के बड़े शहरों में रहने की जगह सीमित हो गयी। इस कमी को पूरा करने के लिए लोगों ने फ्लैट व कमरों को साझा करना शुरू किया, विशेष तौर पर शिक्षा और फिल्म से जुड़े लोगों ने अपने खर्चों को भी साझा कर आय का बड़ा भाग बचाने लगे जिसके कारण भी इस संस्कृति को ज्यादा बढ़ावा मिला। दूसरा कारण महिलाओं का तेजी से होता विकास भी है। कुछ वर्ष पूर्व यह सोचना भी मुश्किल था कि किसी छोटे शहर की लड़की अकेले किसी बड़े शहर में जाकर में जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण करे या नौकरी करे, किन्तु आज यह काफी व्यवहारिक हो गया है। इसके अलावा तीसरा कारण युवाओं ज्यादा से ज्यादा आधुनिक दिखने कि प्रवृति भी है। पश्चिमी सभ्यता को आधुनिकीकरण का ठप्पा समझने के कारण कुछ युवा भ्रमित होकर इस चलन में रहकर स्वयं को आधुनिक होने की बात करते हैं। अक्सर इस अंधी दौड़ में वे विवेकहीन लोग जुड़ जाते हैं, जो दूसरों के दिखाये रास्ते पर चलने में ज्यादा विश्वास करते हैं। स्त्री पुरुष के सम्बन्धों को संदेह की दृष्टि से देखना बिल्कुल गलत है, लेकिन समाज की मर्यादा और पवित्रता बनाये रखने के लिए तथा सामाजिक व्यवस्था को विकृत होने से बचाये रखने के लिए लिव इन रिलेशनशिप से दूर रहना होगा।