Monday, November 23, 2009

अराजक राजनीति से जूझने का समय




- संजय द्विवेदी

लोकतंत्र को बचाना है तो शिवसेना और मनसे जैसे दलों पर पाबंदी जरूरी


मुंबई में एक टीवी चैनल के कार्यालय पर शिवसेना का हमला एक ऐसी घटना है जिसकी निंदा से आगे बढ़कर इस सिलसिले को रोकने के लिए पहल करने की जरूरत है। शिवसेना ने कुछ नया नहीं किया। वही किया जो वे अरसे से करते आ रहे हैं। टीवी चैनलों ने सारा कुछ इतना तुरंत और जीवंत बना दिया है कि ये चीजें अब दर्ज होने लगी हैं। शिवसेना के रास्ते पर ही चलकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उसके मदांध नेता राज ठाकरे अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। यानी कि बाजार में अब दो गुंडे हैं।

शिवसेना हो या महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना दोनों का डीएनए एक है। दोनों लोकतंत्र और संविधान को न मानने वाले दल हैं। हमारे लोकतंत्र की खामियों का फायदा उठाकर वे विधानसभा और संसद तक भले पहुंच जाएं पर वे कार्य और व्यवहार दोनो से अलोकतांत्रिक हैं। बाल ठाकरे के लोग सालों से पत्रकारों और अपने विरोधी विचारों से इसी तरह निपटते आए हैं। क्योंकि लोकतंत्र में भरोसा होता तो ये पार्टी या राजनीतिक दल बनाते, सेना नहीं। सही मायने में ये लोकतंत्र में बाहुबल और शक्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए आए हैं। इन्हें तर्क, संवाद और बातचीत में आस्था नहीं है। ये तो शक्ति के आराधक हैं जो शिवाजी महाराज का नाम भी लेते हैं और महिलाओं पर भी हाथ उठाने से इन्हें गुरेज नहीं है। मराठा संस्कृति को आज ये जैसी पहचान दे रहे हैं उससे वह कलंकित ही हो रही है। सही मायने में यह हमारे राजनीतिक तंत्र की विफलता है कि हम ऐसे तत्वों पर लगाम लगाने में खुद को विफल पा रहे हैं। शिवसेना सही मायने में एक ऐसा दल है जिसके पास कोई वैचारिक और राजनीतिक दर्शन नहीं है। वह शिवाजी महाराज का नाम लेकर एक भावुक अपील पैदा करने की कोशिश तो करता है पर शिवाजी के आर्दशों से उसका कोई लेना देना नहीं है। आम मजदूर और मेहनतकश आदमी के खिलाफ अपनी ताकत दिखाने वाली शिवसेना और मनसे जैसे दल पूंजीपतियों से हफ्ता वसूली करके अपनी राजनीति को आधार देते रहे हैं। पैसा वसूली और भयादोहन के आधार पर अपनी राजनीति को चलाने वाले ये लोग बेहद डरे और धबराए हुए लोग हैं इसीलिए संवाद के बजाए ये हमेशा जोर आजमाइश पर उतर आते हैं।

कांग्रेस और भाजपा जैसे दलों की विफलता यही है कि वे ऐसी अराजक क्षेत्रीय ताकत के साथ खड़े नजर आते हैं। भाजपा जहां शिवसेना की साझीदार है वहीं कांग्रेस के ऊपर शिवसेना और अब मनसे को फलने- फूलने के अवसर देने के आरोप हैं। कभी कांग्रेस की राजनीति में कद्दावर रहे तमाम नेताओं के साथ शिवसेना प्रमुख के रिश्तों के चलते ही उसे महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़त मिली। आज आरोप यह है कि कांग्रेस की सरकार के ढीलेपन के चलते ही महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना अपनी गुंडागर्दी जारी रखे हुए है। उनकी हिम्मत यह है कि वे विधानसभा में भी हाथापाई कर रहे हैं और विधायकों को पत्र लिखकर धमका भी रहे हैं। अब मनसे स्टेट बैंक आफ इंडिया के अफसरों और उसके परीक्षार्थियों को धमकाने का काम कर रहा है। राज्य की यह कमजोरी ही गांवों से लेकर शहर और जंगलों तक एक अशांति का वातावरण बनाने में मदद कर रही है। क्या हमारे शासक इतने कमजोर हैं कि कोई व्यक्ति कानून और संविधान को चुनौती देता हुआ कभी विधानसभा, कभी मीडिया के दफ्तरों और कभी सड़कों पर आतंक मचाता फिरे और हम अपनी वाचिक कुशलता से ही काम चला लें। क्या ये मामले सिर्फ निंदा या कड़ी भत्सर्ना से ही बंद हो सकते हैं। इन्हें भड़काने वाले लोंगों की जगह क्या जेल में नहीं है। बाल ठाकरे और राज ठाकरे जैसे लोग सही मायनों में इस देश के लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा हैं। उनसे कड़ाई से निपटना हमारे राष्ट्र-राज्य की जिम्मेदारी है। पर हमारी सरकारें निरूपाय दिखती हैं। बलवा करने वाले और करवाने वाले दोनों को दंडित करने का साहस हम क्यों नहीं पाल पा रहे हैं। मुंबई जैसा शहर यदि ऐसी अराजकता का केंद्र बना रहा तो हम क्या मुंह लेकर दुनिया के सामने जाएंगें। मुंबई में 26.11.2008 जैसी घटनाएं हो जाती हैं तो हम यह कहते हैं कि पड़ोसी देश ने साजिश की, यह जो सड़कों पर नंगा नाच हमारे अपने लोग ही भारतीय नागरिकों के खिलाफ कर रहे हैं उसका क्या। आस्ट्रेलिया में भारतवंशी छात्रों के उत्पीड़न पर हम रोज चिंता जता रहे हैं, आस्ट्रेलिया की सरकार को लांछित कर रहे हैं। यहां अपने ही देश में प्रतियोगी परिक्षाएं दे रहे छात्रों को लोग मारते हैं तो हम क्या कर पा रहे हैं। सही मायने में भारतीय राज्य अपने नागरिकों की रक्षा और उनके शांतिपूर्ण जीवन-यापन की स्थितियां भी पैदा नहीं कर पा रहा है। कुछ मुट्टी भर लोग कभी शिवसैनिक बनकर, कभी आतंकवादी बनकर, कभी नक्सलवादी बनकर, कभी मनसे कार्यकर्ता बनकर भारतीय जनता पर अत्याचार करते रहेगें और हम इसे देखते रहने को मजबूर हैं।

मीडिया को भी इन स्थितियों के खिलाफ सामने आना होगा। ये सारी चुनौतियां दरअसल हमारे लोकतंत्र के खिलाफ हैं। सो हमें लोकतंत्र और देश को बचाना है तो सारे विवाद भूलकर ऐसी ताकतों के खिलाफ एकजुट होना होगा जो संवाद के बजाए बाहुबल या बंदूकों से फैसला करना चाहती हैं। अभी जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के परिणाम आए थे तो यही मीडिया विधानसभा की तेरह सीटें जीतने वाले राज को हीरो बना रहा था। उन पर विशेष कार्यक्रम दिखाए जा रहे थे। आखिर ऐसी अराजक प्रवृत्तियों का महिमामंडन करने से हम कब बाज आएंगें। कारण यही है इनके बेलगाम हाथ अब मीडिया के गिरेबान तक जा पहुंचे हैं। आज हमें बहुत दर्द हो रहा है। लोकतंत्र का चौथा खंभा अब हिलने लगा है। गुंडों और अराजक राजनीति को महत्वपूर्ण बनाने का जो काम मीडिया और खासकर टीवी मीडिया जिस अंदाज में कर रहा है उसपर भी सोचने की जरूरत है। मीडिया को भी ऐसे अराजक तत्वों के महिमामंडन से बाज आना होगा क्योंकि इससे इनकी धृणा की राजनीति को ही विस्तार व समर्थन मिलता है। सही मायनों में हमें अपने लोकतंत्र को बचाना है तो शिवसेना और मनसे जैसे दलों पर तुरंत पाबंदी लगाई जानी चाहिए और इसके नेताओं को तुरंत राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में डाल देना चाहिए। इससे इस घातक प्रवृत्ति का विस्तार रोका जा सकेगा वरना भारतीय राज्य और लोकतंत्र दोनों को चुनौती देने वाली ऐसी ताकतें कई राज्यों में सिर उठा सकती हैं। क्योंकि क्षेत्रीयता और भाषा की गंदी राजनीति से देश वैसे भी काफी नुकसान उठा चुका है। हम आज भी नहीं चेते तो कल बहुत देर हो जाएगी।

( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)


संपर्कः अध्यक्ष , जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्ववि

इस ‘राज’ नीति से देश को बचाइए

- कृष्णकुमार तिवारी

राजनीतिक लाभ के लिए क्या देश के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ किया जा सकता है? यदि उत्तर नहीं है तो फिर राज ठाकरे या उनकी पार्टी किस व्यवहार का परिचय दे रही है? राष्ट्रभाषा कही जाने वाली भाषा हिन्दी के साथ इतना घृणापूर्ण व्यवहार आखिर क्यों? भाषा एवं क्षेत्रीयता पर आधारित राजनीति कुएं में टर्राते मेंढक के समान है जो कुएं में रहकर खूब- उछलकूद करता है लेकिन वह केवल और केवल उसी कुएं भर में रह जाता है। इस बात की शिक्षा राज ठाकरे को अपने चाचा बाला साहेब ठाकरे से लेनी चाहिए।
हिंदी से इतनी घृणा कि फिल्म में मुबंई के स्थान पर बंबई बोलने पर कभी करण जौहर को राज से माफी मांगनी पड़ती है तो कभी उद्धव के कहने पर मराठी मानुष से माफी मांगनी पड़ती है। वैसे यह घटना पहली नहीं है इससे पहले मणिरत्नम की फिल्म बांबे के लिए उन्हें बाला साहेब ठाकरे के घर मातोश्री जाकर मांफी मांगनी पड़ी थी। उत्तर भारतीयों खिलाफ, फिर हिंदी के खिलाफ अभियान यह सारी ओछी राजनीति या कहें विभाजनकारी राजनीति है। क्योंकि आज जो महाराष्ट्र में हो रहा है यदि वह सारे देश में चालू हो जाए तो राज ठाकरे खुद कहां जायेंगें? क्योंकि दूसरे प्रदेशों में उत्तर भारतीयों की तरह अन्य भाषाभाषियों के खिलाफ भी प्रतिक्रिया हो सकती है। राज ठाकरे यह भूल रहे हैं यही हिंदी थी और यही उत्तर भारत था जिसके द्वारा कभी न डूबने वाले राज का सूरज डूबा दिया था। यहीं सारे बड़े-बड़े आंदोलन खड़े हुए जिनकी बदौलत आज देश आजाद है। लेकिन आजादी के 62 वर्ष के बाद भी देश को पुनः टुकड़ो में बांटने की कोशिश की जा रही है।
पिछले दो जनगणनाओं के अनुसार आबादी की वृद्धि दर महाराष्ट्र में 2.62, सूरत में 6.16, पटना में वृद्धि दर 4.40 तथा सबसे तेज बढ़ती दिल्ली जिसकी वृद्धि 4.18 है। ऐसे में देखा जाए तो पायेंगे कि महाराष्ट्र के दुगने की दर से पटना की जनसंख्या बढ़ रही है। मुंबई पर अपना हक जताने वाले शायद मुंबई के इतिहास से परिचित नहीं है। मुंबई का पुराना नाम बोम् बइया था जो कि पुर्तगालियों द्वारा रखा गया था। जिसका अर्थ था अच्छी घाटी। बंबई का विकास सात द्वीपों की दलदली भूमि से हुआ जिस पर 1654-1661 तक पुर्तगालियों का शासन था। यह बंबई इंग्लैंड़ के बादशाह चार्ल्स द्वितीय को दहेज के रुप में मिला था। बादशाह ने दस पौंड़ के वार्षिक कर पर ईस्ट इंडिया कंपनी को सन् 1669 में दे दिया। 1818 में पेशवा शासन के अंत के बाद अंग्रेजों ने सारे दक्षिणी पठार पर अधिकार कर बंबई का विकास किया बंबई के विकास में जिनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान था उनमें जमशेद जी भाई, प्रेमचंद्र रायचंद्र, भाऊदाजी लाड़, दादा भाई नौरौजी इत्यादि थे। इनमें से केवल एक महाराष्ट्रियन जांभेकर को छोड़कर सभी अन्य भाषाभाषी थे। नाना शंकर जिनका विकास में विशेष योगदान था वह गुजराती थे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नाना शंकर सेठ 12 साल तक अध्यक्ष रहे। इन्हीं के द्वारा 1845 में स्थापित एल.फिस्टन.कॉलेज और 1857 में बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। शिवाजी और पेशवा मराठा साम्राज्य का उत्तराधिकारी होने का दावा करने वाली शिवसेना या मनसे यह भूल गयी हैं कि वे खुद उत्तर भारत के हैं। बाला साहेब ठाकरे के पिता जो बड़े लेखक और खोजी इतिहासकार थे यह बता गए कि ठाकरे यानि चंद्रसेन कायस्थ प्रभु बिहार से आए थे। चंद्रगुप्त मौर्य के पूर्वज पाटिलिपुत्र सम्राट महापदमनंद (शूद्र) के कुकृति से संतृप्त होकर वहां से भागे और महाराष्ट्र में आकर बसे। इस प्रकार से तो ये मूलतः बिहारी हैं । चर्चिल ने शायद इन्हीं परिस्थितयों को सोचकर कहा होगा कि भारतीय शासन करना नहीं जानते और इनकी आजादी होने में इनकी ही बरबादी है और इसी का उदाहरण है अबू आजमी को मनसे के विधायकों के द्वारा हिंदी में शपथ लेते समय चांटा मारा जाना। हकीकत तो यह कि बंटवारे की राजनीति आपको ही आपको ही अकेला छोड़ देगी और राज ठाकरे का भी वही हाल होगा जो बाला साहेब ठाकरे का हुआ है या हो रहा है। एक समय बाद जनता खुद जानेगी और इसका खुद प्रतीकात्मक उत्तर देगी।



( लेखक एमए – जनसंचार के पहले सेमेस्टर के छात्र हैं।)

Wednesday, October 28, 2009

अंगरेज़ी की श्रेष्ठ कविताएं हिन्दी में


समीक्षक- गिरीश पंकज



अंगरेज़ी साहित्य और उसकी प्रभावोत्पादकता से किसे इंकार हो सकता है। भारतीय समाज के ऊपर अगरेज़ी साहित्य एक दबाव की तरह भी विद्यमान रहा है। साहित्य न भी रहा हो, पर एक भाषा तो रही है। मजबूरी में ही सही, अंगरेज़ी जीवन का हिस्सा बनती चली गयी। भाषा या भाषा को हथियार बनाकर हमें गुलाम बनाने वाली प्रकृतियों की बात न भी करें तो अंगरेज़ी साहित्य का अपना मूल्य है। इस भाषा के साहित्य में कुछ बात तो है कि इसकी हस्ती अब तक नहीं मिट पायी है। हालत यह है कि धीरे-धीरे भारत में भी अंगरेज़ी साहित्य रचने वालों की तादाद बढ़ी है। हिंदी लेखकों में भी लिखने, छपने और अनूदित होने की ललक बढ़ी है। यह शायद वैश्विक होने के अहसास का ही एक हिस्सा है। अंगरेज़ी की श्रेष्ठ कविताएँ बरबस अपनी ओर खींचती है। यही कारण है कि हिंदी का अंगरेज़ी पढ़ा-लिखा लेखक समाज उससे बहुत जल्दी प्रभावित भी होता रहा है। अनेक हिंदी साहित्कारों की कविताएँ अंगरेज़ी के कवियों की छापाओं से ग्रस्त दीखती हैं। यह हिंदी कवियों की कमजोरी हो सकती है, लेकिन निर्विवाद रूप से अंगरेज़ी की श्रेष्ठता का प्रमाण तो है ही। ऐसी श्रेष्ठ कविताओं का एक संकलन प्रकाशित होकर हिंदी के पाठकों तक पहुँचा है। अनुवादक कुलदीप सलिल के संपादन में “अंगरेज़ी की श्रेष्ठ कवि और उनकी श्रेष्ठ कविताएँ” नामक इस पुस्तक में अगरेज़ी के महत्वपूर्ण कवियों की रचनाओं के अनुवाद प्रस्तुत किए गए हैं।



कुलदीप सलिल की अनेक अनूदित कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही है। वे दक्ष अनुवादक हैं। उनके अनुवाद अनुवाद जैसे नहीं लगते। समझ में आते हैं। (जबकि समकालीन हिंदी कविताएँ अनुवाद-सरीखी लगती हैं और समझ में भी नहीं आतीं) कुलदीप जी ने भूमिका में एक महत्वपूर्ण बात कही है कि “अनुवादक का कवि होना भी जरूरी है” सचमुच कवि ही मूल कविता की ध्वन्यात्मकता को, लयता को, उसकी समस्त प्रभविष्णुता को गहराई से समझ सकता है। कविता की ध्वनि, कविता का प्रवाह और कविता की आत्मा को एक कवि ही बेहतर समझ सकता है। अंगरेज़ी का जानकार कविता का मशीनी अनुवाद करेगा, मगर कवि उसी कविता का आत्मिक अनुवाद करेगा। अनुवाद अनुवाद न लगे, वह अनुरचना (यानी ट्रांस्क्रिएशन) लगे तभी उसकी सार्थकता है। तभी उसकी पठनीयता है। और उपादेयता भी। अनुवाद एक तरह से पुनर्सर्जना भी है। इसलिए कहा जा सकता है कि ये अनुवाद नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे। भाव की गहराई है और डूब के जाना है। कुलदीप सलिल ने डूबकर अनुवाद किया है।



समीक्षा पुस्तक में जिन अठारह कवियों का चयन किया गया है उनमें विलियम शेक्सपियर, बेन जान्सन, जॉन मिल्टन, विलियम वर्डसवर्थ, पीबी शेली, जॉन कीट्स, राबर्ट ब्राउनिंग, विलियम बटलर गेट्स, राबर्ट फ्रॉस्ट, टी.एस.एलविट जैसे वैश्विक रूप से बेहद लोकप्रिय कवि शामिल हैं। जॉन डन, एलेक्जैंडर पोप, विलियम ब्लैक एस.टी.कॉलरिज, एल्फ्रेड टेनीसन, मैथ्यू अर्नाल्ड, एमिली डिकिन्सन और डब्ल्यू. एच. ऑडेन भी कम नहीं हैं। अनुवादक ने इन कवियों का सारगर्भित परिचय दिया है। कवियों की मूल रचनाएँ भी दी हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए साफ समझ में आता है कि उस दौर की अंगरेज़ी भाषा और वर्तमान दौर की अंगरेज़ी में कितने परिवर्तन हुए हैं। भाषा को हमारे यहाँ बहता नीर कहा गया है। नीर अपने साथ अनेक उपयोगी चीजें बहाकर लाता है। अनुवादक ने ठीक किया है कि उस वक्त जो भाषा थी, शब्द की जो स्पेलिंग प्रचलित थी, उसे जस का तस रख दिया है। इससे अंगरेज़ी साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों एवं विद्यार्थियों को भाषा के क्रमिक विकास एवं परिवर्तन होने की सहज प्रवृत्ति का पता चलेगा। मेरे जैसे पाठकों को भी अच्छा लगेगा जिन्होंने बहुत ज्यादा अंगरेज़ी कविताएँ नहीं पढ़ी हैं।



शेक्सपियर की मशहूर पंक्ति “दुनिया एक मंच है और हम सब कठपुतली” से हिंदी समाज भी परिचित है। बहुतों को पता भी नहीं कि यह कथन शेक्सपियर का है। अनुवादक ने शेक्सपियर के “आल द वर्ल्ड’स ए स्टेज” का हिंदी अनुवाद “सारी दुनिया एक मंच है” करते हुए कुछ इस तरह अनुवाद किया है कि “सारी दुनिया एक मंच है, नर नारी अभिनेता/ सात अवस्थाएँ जीवन की/ सात अंकों के नाटक में/ अपना-अपना खेल दिखा हर इनसान चला जाता है” इस भावभूमि पर एक फिल्मी गीत भी कभी लिखा गया था। अनुवाद से बेहतर था यह कि “रंगमंच है दुनिया सारी/ हर इंसां अभिनेता है/ अपना-अपना अभिनय करके/ हर कोई चल देता है”। कुलदीप सलिल ने भी अनुवाद में मेहनत की है, अगर वह इन्हें और करीने से छंदबद्ध कर सकते तो अनुवाद का लालित्य द्विगुणित हो जाता। फिर भी तमाम अनुवाद बाँधने की ताकत रखते हैं।



पंद्रहवीं शताब्दी के कवि हों या उन्नीसवीं शताब्दी के, मानवीय संवेदनाएँ विरासत के रूप में ही स्थानांतरित होती दिखती है। भाषा भले ही परिवर्तित होती गयी, भावनाएँ वहीं हैं। परिदृश्य बदला है, लेकिन प्रवृत्तियाँ जस की तस हैं। संग्रह की रचनाओं को पढ़ते हुए हम अंगरेज़ी कविता के क्रमिक विकास, उसके चिंतन से भी परिचित होते चलते हैं। कविताओं में प्रयुक्त मुहावरे बदलते हैं और दृश्य बंध भी। विषयवस्तु भी परिवर्तित होती चलती है। जॉन डन या जॉन मिल्टन अपने दौर में (यानी पाँच सौ साल पहले) अगर मौत या आँखों की ज्योति चले जाने पर ईश्वर से प्रश्न करते हैं तो बीसवीं शताब्दी के आते-आते डब्ल्यू.एच. ऑडेन का मनुष्य रेडियो, टेलीफोन, फ्रिज, कार के साथ आधुनिक आदमी बन जाता है। लेकिन वह प्रेम गीत जरूर गाता है।



संग्रह की कविताएँ पढ़कर हिंदी का पाठक सहज भाव से तुलनात्मक अध्ययन पर भी विवश हो जाता है। इस कृति के बहाने अंगरेज़ी और हिंदी कविता का तुलनात्मक अध्ययन का मौका भी मिलता है। समझ में आ जाता है कि अंगरेज़ी कविता किस भाव-भूमि पर खड़ी है और हिंदी का काव्यकौशल कहाँ है। हिंदी का पाठक महसूस करता है कि हिंदी की उस दौर की कविता अंगरेज़ी कविताओं से काफी आगे रही है। आज स्थिति उलट है। जो भी हो, कुलदीप सलिल के चयन की तारीफ करनी पड़ती है। चालीस-पैंतालीस साल से अनुवाद कर्म में रत कुलदीप जी ने हिंदी के पाठकों को अनमोल तोहफा दिया है। इस कृति के बहाने अंगरेज़ी साहित्य का सत्व सामने आ जाता है। और पता चलता है कि सोच का मानवीय चेहरा कितना भावुक है। उसके चिंतन के औजार क्या हैं। यह संग्रह अंगरेज़ी और श्रेष्ठ कविताओं की तलाश के लिए व्याकुल करता है।



कृति - अंगरेज़ी के श्रेष्ठ कवि

अनुवादक - कुलदीप सलिल

प्रकाशक - राजपाल एंड सन्स,

कश्मीरी गेट, दिल्ली मूल्य - 190/-

साभार सृजनगाथा

बाजार की चुनौतियों से बेजार हिन्दी पत्रकारिता



- संजय द्विवेदी
आज भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी पत्रकारिता की चुनौतियां न सिर्फ बढ़ गई हैं वरन उनके संदर्भ भी बदल गए हैं। पत्रकारिता के सामाजिक उत्तरदायित्व जैसी बातों पर सवालिया निशान हैं तो उसकी नैसर्गिक सैद्धांतिकता भी कठघरे में है। वैश्वीकरण और नई प्रौद्योगिकी के घालमेल से एक ऐसा वातावरण बना है जिससे कई सवाल पैदा हुए हैं। इनके वाजिब व ठोस उत्तरों की तलाश कई स्तरों पर जारी है। वैश्वीकरण व बाजारवाद की इन चुनौतियों ने हिन्दी पत्रकारिता को कैसे और कितना प्रभावित किया है इसका अध्ययन किया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समूची भारतीय पत्रकारिता के संदर्भ में बात करने के पहले इसे तीन हिस्सों में समझने की जरूरत है। पहली अंग्रेजी पत्रकारिता, दूसरी हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के बड़े अखबारों की पत्रकारिता और तीसरी नितांत क्षेत्रीय अखबारों की पत्रकारिता। पहली, अंग्रेजी की पत्रकारिता तो बाजारवाद की हवा को आंधी में बदलने में सहायक ही बनी है, और कमोवेश इसने सारे नैतिक मूल्यों व सामाजिक सरोकारों को शीर्षासन करा दिया है। दूसरी श्रेणी में आने वाले हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के बहुसंस्करणीय अखबार हैं। वे भी बाजारवादी हो हल्ले में अंग्रेजी पत्रकारिता के ही अनुगामी बने हुए हैं। उनकी स्वयं की कोई पहचान नहीं है और वे इस संघर्ष में कहीं ‘लोक’ से जुड़े नहीं दिखते। तीसरी श्रेणी में आने वाले क्षेत्रीय अखबार हैं, जो अपनी दयनीयता के नाते न तो खास अपील रखते हैं न ही उनमें कोई आंदोलनकारी-परिवर्तनकारी भूमिका निभाने की इच्छा शेष है। यानि मुख्यधारा की पत्रकारिता ने चाहे-अनचाहे बाजार की ताकतों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है।
व्यावसायिक दृष्टि से देखें तो यह घाटे का सौदा नहीं है। अखबारों की छाप-छपाई, तकनीक-प्रौद्योगिकी के स्तर पर क्रांति दिखती है। वे ज्यादा कमाऊ उद्यम में तब्दील हो गए हैं। अपने कर्मचारियों को पहले से ज्यादा बेहतर वेतन, सुविधाएं दे पा रहे हैं। बात सिर्फ इतनी है कि उन सरोकारों का क्या होगा, उन सामाजिक जिम्मेदारियों का क्या होगा-जिन्हें निभाने और लोकमंगल की भावना से अनुप्राणित होकर काम करने के लिए हमने यह पथ चुना था? क्या अखबार को ‘प्रोडक्ट’ बनने और संपादक को ‘ब्रांड मैनेजर’ या ‘सीईओ’ बन जाने की अनुमति दे दी जाए? बाजार के आगे लाल कालीन बिछाने में लगी पत्रकारिता को ही सिर माथे बिठा लिया जाए? क्या यह पत्रकारिता भारत या इस जैसे विकासशील देशों की जरूरतों, आकांक्षाओं को तुष्ट कर पाएगी? यदि देश की सामाजिक आर्थिक जरूरतों, जनांदोलनों को स्वर देने के बजाए वह बाजार की भाषा बोलने लगे तो क्या किया जाए? यह चिंताएं आज हमें मथ रही हैं?

आप लाख कहें लेकिन ‘विश्वग्राम’ के पीछे जिस आर्थिक चिंतन और नई प्रौद्योगिकी पर जोर है क्या उसका मुकाबला हमारी पत्रकारिता कर सकती है? बाजारवाद के खिलाफ गूंजें तो अवश्य हैं, लेकिन वे बहुत बिखरी-बिखरी, बंटी-बंटी ही हैं। वह किसी आंदोलन की शक्ल लेती नहीं दिखतीं। बिना वेग, त्वरा और नैतिक बल के आज की हिन्दी या भाषाई पत्रकारिता कैसे उदारीकारण के अर्थचिंतन से दो-दो हाथ कर सकती है?
बढ़ती उपभोक्तावादी संस्कृति, चैनलों पर अपसंस्कृति परोसने की होड़, बढ़ती सौन्दर्य प्रतियोगिताएं, जीवन में हासिल करने के बजाए हथियाने का बढ़ता चिंतन, भाषा के रूप में अंग्रेजी का वर्चस्ववाद, असंतुलित विकास और असमान शिक्षा का ढांचा कुछ ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे हम रोजाना टकरा रहे हैं और समाज में गैर बराबरी की खाई बढ़ती जा रही है। इसके साथ ही मूल्यहीनता के संकट अलग हैं। भारत की दुनिया के सात बड़े बाजारों में एक होना एक संकट को और बढ़ाता है। दुनिया की सारी कम्पनियां इस बाजार पर कब्जा जमाने कुछ भी करने पर आमादा हैं।
असंतुलित विकास भी इसी व्यवस्था की नई देन है। शायद इसलिए अर्थशास्त्री प्रो. ब्रम्हानंद मानते है कि आने वाले वर्षों में ‘स्टेट बनाम मार्केट’ (राज्य बनाम बाजार) का गंभीर टकराव होगा। सो विकसित राज्यों व बाजारवादी व्यवस्था से लाभान्वित हुए राज्यों औसे आंध्र, कनोटक, गुजरात, महाराष्ट्र के खिलाफ अविकसित राज्यों का एक स्वाभाविक संघर्ष शुरू हो गया है। प्रो. ब्रम्हानंद के मुताबिक ‘‘उदारीकरण के बाद स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क, सार्वजनिक यातायात, शिक्षा हर जगह दोहरी व्यवस्था कायम हो गई है। एक व्यवस्था निजीकरण से जुड़ी है, जहां उपभोक्ताओं के पास समृद्धि है और ‘निजीकरण’ से लाभ लेने की क्षमता भी। दूसरी ओर व्यवस्था, सार्वजनिक क्षेत्र की सुविधाओं से जुड़ी हैं, जहां निवेश के लिए सरकार के पास जैसा नहीं है पर करोड़ों लोग इससे जुड़े हैं। केन्द्र की नीतियों से भी भेदभाव प्रायोजित हो रहा है। बीमारू राज्य और बीमारू होते जा रहे हैं।’’ ये संकट देश के भी हैं और पत्रकारिता के भी।
दुर्भाग्य है बीमारू राज्यों के अधिकांश क्षेत्रों में बोले जानी वाली भाषा हिन्दी है। अंग्रेजी के मुकाबले उसकी दयनीयता तो जाहिर है ही परन्तु सूचना की भाषा बनने की दिषा में भी हिन्दी बहुत पीछे है। साहित्य-संस्कृति, कविता-कहानी के क्षेत्रों में शिखर को छूने के बावजूद ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों पर हिन्दी में बहुत कम काम हुआ है। विज्ञान, प्रबंधन, प्रौद्योगिकी, उच्च वाणिज्य, उद्योग आदि क्षेत्रों में हिन्दी बेचारी साबित हुई है, जबकि यह युग सत्य है कि आज के दौर में जब तक भाषा बहुआयामी अभिव्यक्ति व विशेष सूचना की भाषा न बने उसे सीमा से अधिक महत्व नहीं मिल सकता। वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश की मानें तो - ‘‘हिन्दी को आज देश, काल, परिस्थितियों के अनुरूप सूचना की सम्पन्न भाषा बनाना जरूरी है। आज की हिन्दी पत्रकारिता के लिए यही सीमा ही सबसे बड़ी चुनौती है। बाजारवाद की चुनौतियों के खिलाफ हिन्दी पत्रकारिता का यह सृजनात्मक उत्तर होगा। आधुनिक राजसत्ता, तंत्र, बाजारवाद, विश्वग्राम की सही अंदरूनी तस्वीर लोगों तक पहुंचे, यह सायास कोशिश हो। इसके अंतर्विरोध-कुरूपता को हिन्दी या भाषाई पाठक जानें, यह प्रयास हो। यह काम अंग्रेजी प्रेस नहीं कर सकता। अंग्रेजी की नकल कर रहे भाषाई अखबार भी नहीं कर सकते, क्योंकि ये सभी माडर्न सिस्टम की उपज हैं। यही बाजारवाद इनका शक्तिस्रोत हैं।’’
अंग्रेजी के वर्चस्ववाद के खिलाफ हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं की शक्ति को जगाए व पहचाने बिना अंधेरा और बढ़ता जाएगा। अंग्रेजी अखबार इस लूटतंत्र के हिस्सेदार बने हैं तो मुख्यधारा की हिन्दी-भाषाई पत्रकारिता उनकी छोड़ी जूठी पत्तलें चाट रही हैं। हिन्दी की ताकत सिर्फ सिनेमा में दिखती है, जबकि यह भी बाजार का हिस्सा है। सच कहें तो हिन्दी सिर्फ मनोरंजन और वोट मांगने की भाषा बनकर रह गयी है।
बाजारवाद में मुक्त बेचने वाले हाते हैं - खरीदने वाले नहीं। हमारा पाठक यहीं ठगा जा रहा है। उसे जो कुछ यह कहकर पढ़ाया जा रहा है कि यह तुम्हारी पंसद है - दरअसल वह उसकी पसंद नहीं होती। जिस तरह एक ओर बाजार इच्छा सृजन कर रहा है, आपकी जरूरतें बढ़ी हैं और नाजायज चीजें हमारी जिन्दगी में जगह बना रही हैं। अखबार भी बाजार के इस षडयंत्र का हिस्सा बन गया है। सो पाठक केन्द्र में नहीं है, विज्ञापनदाता को मदद करने वाला ‘संदेश’ केन्द्र में है। हमने कहा - ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ पूरा विश्व एक परिवार है। ‘विश्वग्राम’ कहता है - ‘पूरा विश्व एक बाजार है।’ जाहिर है चुनौती कठिन है। विज्ञापन दाता ‘कंटेंट’ को नियंत्रित करने की भूमिका में आ गया है - यह दुर्भाग्य का क्षण है। आज हालात यह है कि पाठक ही यह तय नहीं करते कि उन्हें कौन सा अखबार पढ़ना है, अखबार ही यह भी तय कर रहे हैं कि हमें किस पाठक के साथ रहना है। कई अंग्रेजी अखबार इसी भूमिका का काम कर रहे हैं।
हिन्दी व भारतीय भाषाओं के अखबारों के सामने यह चुनौती है कि वे अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करें। वे यह सोचें कि क्या वे सूचना देने, शिक्षित करने और मनोरंजन करने के अपने बुनियादी धर्म का निर्वाह करते हुए कुछ ‘विशिष्ठ’ कर सकते हैं? क्या हमने अपने प्रस्थान बिन्दु से नाता तोड़ लिया है, क्या हम जनोन्मुखी और सरोकारी पत्रकारिता से हाथ जोड़ लेंगे। देह और भोग (बाडी एंड प्लेजर) की पत्रकारिता के पिछलग्गू बन जाएंगे? अपने समाज जीवन को प्रभावित करने वाले सवालों से मुंह चुराएंगे? उदारीकरण के नकारात्मक प्रभावों पर चर्चा तक नहीं करेंगे। अपने पाठकों तक सांस्कृतिक पतन की सूचनाएं नहीं देंगे? क्या हम यह नहीं बताएंगे कि मैक्सिकों का यह हाल क्यों हुआ? थाईलैंड की वेश्यावृत्ति का बाजावाद से क्या नाता है? पत्रकारिता सार्थक भूमिका के निर्वहन में हमारे आड़े कौन आ रहा है?
हमारे एकता-अखंडता क्या पश्चिमी सांचों की बुनावट पर कायम रह सकेगी? सुविधाओं एवं सुखों के नाम पर क्या हम आत्म-समर्पण कर देंगे? ऐसे तमाम सवाल पत्रकारिता के सामने खड़े हैं। उनके उत्तर भी हमें पता है लेकिन ‘बाजावाद’ की चकाचैंध में हमें कुछ सूझता नहीं। इसके बावजूद रास्ता यही है कि हम अपने कठघरों से बाहर आकर बुनियादी सवालों से जूझें। हवा के खिलाफ खड़े होने का साहस पालें। हिन्दी पत्रकारिता की ऐतिहासिक भावभूमि हमें यही प्रेरणा देती है। यही प्रस्थान बिन्दु हमें जड़ों से जोड़ेगा और ‘वैकल्पिक पत्रकारिता’ की राह भी बनाएगा।
( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)
- संपर्कः अध्यक्ष , जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र)

Tuesday, October 27, 2009

Tolstoy's words..







Leo Tolstoy (1828-1910)
Russian novelist, philosopher






Hypocrisy in anything whatever may deceive the cleverest and most penetrating man, but the least wide-awake of children recognizes it, and is revolted by it, however ingeniously it may be disguised.

हिन्दी की आर्थिक पत्रकारिता: पहचान बनाने की जद्दोजहद




- संजय द्विवेदी



वैश्वीकरण के इस दौर में ‘माया’ अब ‘महागठिनी’ नहीं रही। ऐसे में पूंजी, बाजार, व्यवसाय, शेयर मार्केट से लेकर कारपोरेट की विस्तार पाती दुनिया अब मीडिया में बड़ी जगह घेर रही है। हिन्दी के अखबार और न्यूज चैनल भी इन चीजों की अहमियत समझ रहे हैं। दुनिया के एक बड़े बाजार को जीतने की जंग में आर्थिक पत्रकारिता एक साधन बनी है। इससे जहां बाजार में उत्साह है वहीं उसके उपभोक्ता वर्ग में भी चेतना की संचार हुआ है। आम भारतीय में आर्थिक गतिविधियों के प्रति उदासीनता के भाव बहुत गहरे रहे हैं। देश के गुजराती समाज को इस दृष्टि से अलग करके देखा जा सकता है क्योंकि वे आर्थिक संदर्भों में गहरी रूचि लेते हैं। बाकी समुदाय अपनी व्यावसायिक गतिविधियों के बावजूद परंपरागत व्यवसायों में ही रहे हैं। ये चीजें अब बदलती दिख रही हैं। शायद यही कारण है कि आर्थिक संदर्भों पर सामग्री के लिए हम आज भी आर्थिक मुद्दों तथा बाजार की सूचनाओं को बहुत महत्व देते हैं। हिन्दी क्षेत्र में अभी यह क्रांति अब शुरू हो गयी है।



‘अमर उजाला’ समूह के ‘कारोबार’ तथा ‘नई दुनिया’ समूह के ‘भाव-ताव’ जैसे समाचार पत्रों की अकाल मृत्यु ने हिन्दी में आर्थिक पत्रों के भविष्य पर ग्रहण लगा दिए थे किंतु अब समय बदल रहा है इकोनामिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड और बिजनेस भास्कर का हिंदी में प्रकाशन यह साबित करता हैं कि हिंदी क्षेत्र में आर्थिक पत्रकारिता का एक नया युग प्रारंभ हो रहा है। जाहिर है हमारी निर्भरता अंग्रेजी के इकानामिक टाइम्स, बिजनेस लाइन, बिजनेस स्टैंडर्ड, फाइनेंसियल एक्सप्रेस जैसे अखबारों तथा बड़े पत्र समूहों द्वारा निकाली जा रही बिजनेस टुडे और मनी जैसे पत्रिकाओं पर उतनी नहीं रहेगी। देखें तो हिन्दी समाज आरंभ से ही अपने आर्थिक संदर्भों की पाठकीयता के मामले में अंग्रेजी पत्रों पर ही निर्भर रहा है, पर नया समय अच्छी खबरें लेकर आ रहा।



भारत में आर्थिक पत्रकारिता का आरंभ ब्रिटिश मैनेजिंग एजेंसियों की प्रेरणा से ही हुआ है। देश में पहली आर्थिक संदर्भों की पत्रिका ‘कैपिटल’ नाम से 1886 में कोलकाता से निकली। इसके बाद लगभग 50 वर्षों के अंतराल में मुंबई तेजी से आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र बना। इस दौर में मुंबई से निकले ‘कामर्स’ साप्ताहिक ने अपनी खास पहचान बनाई। इस पत्रिका का 1910 में प्रकाशन कोलकाता से भी प्रारंभ हुआ। 1928 में कोलकाता से ‘इंडियन फाइनेंस’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। दिल्ली से 1943 में इस्टर्न इकानामिक्स और फाइनेंसियल एक्सप्रेस का प्रकाशन हुआ। आजादी के बाद भी गुजराती भाषा को छोड़कर हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में आर्थिक पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई बहुत महत्वपूर्ण प्रयास नहीं हुए। गुजराती में ‘व्यापार’ का प्रकाशन 1949 में मासिक पत्रिका के रूप में प्रारंभ हुआ। आज यह पत्र प्रादेशिक भाषा में छपने के बावजूद देश के आर्थिक जगत की समग्र गतिविधियों का आइना बना हुआ है। फिलहाल इसका संस्करण हिन्दी में भी साप्ताहिक के रूप में प्रकाशित हो रहा है। इसके साथ ही सभी प्रमुख चैनलों में अनिवार्यतः बिजनेस की खबरें तथा कार्यक्रम प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं लगभग दर्जन भर बिजनेस चैनलों की शुरूआत को भी एक नई नजर से देखा जाना चाहिए। जी बिजनेस, सीएनबीसी आवाज, एनडीटीवी प्राफिट आदि।



वैश्वीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन से पैदा हुई स्पर्धा ने इस क्षेत्र में क्रांति-सी ला दी है। बड़े महानगरों में बिजनेस रिपोर्टर को बहुत सम्मान के साथ देखा जाता है। इसकी तरह हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में वेबसाइट पर काफी सामग्री उपलब्ध है। अंग्रेजी में तमाम समृद्ध वेबसाइट्स हैं, जिनमें सिर्फ आर्थिक विषयों की इफरात सामग्री उपलब्ध हैं। हिन्दी क्षेत्र में आर्थिक पत्रकारिता की दयनीय स्थिति को देखकर ही वरिष्ट पत्रकार वासुदेव झा ने कभी कहा था कि हिन्दी पत्रों के आर्थिक पृष्ठ ‘हरिजन वर्गीय पृष्ट’ हैं। उनके शब्दों में - ‘भारतीय पत्रों के इस हरिजन वर्गीय पृष्ठ को अभी लंबा सफर तय करना है। हमारे बड़े-बड़े पत्र वाणिज्य समाचारों के बारे में एक प्रकार की हीन भावना से ग्रस्त दिखते हैं, अंग्रेजी पत्रों में पिछलग्गू होने के कारण हिन्दी पत्रों की मानसिकता दयनीय है। श्री झा की पीड़ा को समझा जा सकता है, लेकिन हालात अब बदल रहे हैं। बिजनेस रिपोर्टर तथा बिजनेस एडीटर की मान्यता और सम्मान हर पत्र में बढ़ा है। उन्हें बेहद सम्मान के साथ देखा जा रहा है। पत्र की व्यावसायिक गतिविधियों में भी उन्हें सहयोगी के रूप में स्वीकारा जा रहा है। समाचार पत्रों में जिस तरह पूंजी की आवश्यकता बढ़ी है, आर्थिक पत्रकारिता का प्रभाव भी बढ़ रहा है। व्यापारी वर्ग में ही नहीं समाज जीवन में आर्थिक मुद्दों पर जागरूकता बढ़ी है। खासकर शेयर मार्केट तथा निवेश संबंधी जानकारियों को लेकर लोगों में एक खास उत्सुकता रहती है।



ऐसे में हिन्दी क्षेत्र में आर्थिक पत्रकारिता की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है, उसे न सिर्फ व्यापारिक नजरिए को पेश करना है, बल्कि विशाल उपभोक्ता वर्ग में भी चेतना जगानी है। उनके सामने बाजार के संदर्भों की सूचनाएं सही रूप में प्रस्तुत करने की चुनौती है। ताकि उपभोक्ता और व्यापारी वर्ग तमाम प्रलोभनों और आकर्षणों के बीच सही चुनाव कर सके। आर्थिक पत्रकारिता का एक सिरा सत्ता, प्रशासन और उत्पादक से जुड़ा है तो दूसरा विक्रेता और ग्राहक से। ऐसे में आर्थिक पत्रकारिता की जिम्मेदारी तथा दायरा बहुत बढ़ गया है। हिन्दी क्षेत्र में एक स्वस्थ औद्योगिक वातावरण, व्यावसायिक विमर्श, प्रकाशनिक सहकार और उपभोक्ता जागृति का माहौल बने तभी उसकी सार्थकता है। हिन्दी ज्ञान विज्ञान के हर अनुशासन के साथ व्यापार, वाणिज्य और कारर्पोरेट की भी भाषा बने। यह चुनौती आर्थिक क्षेत्र के पत्रकारों और चिंतकों को स्वीकारनी होगी। इससे भी भाषायी आर्थिक पत्रकारिता को मान-सम्मान और व्यापक पाठकीय समर्थन मिलेगा।

( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

- संपर्कः अध्यक्ष , जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र)

मोबाइलः 098935-98888 e-mail- 123dwivedi@gmail.com

Web-site- www.sanjaydwivedi.com

Monday, October 26, 2009

यूटोपिया



नीलेश रघुवंशी

जन्म
04 अगस्त, 1969, गंज बासौद(म.प्र.)





यूटोपिया

उसने अपनी जेब में
इतने अहंकार से हाथ डाला कि
उस पल मुझे लगा
काश! किसी के पास जेब न होती
तो कितना अछ्छा होता
आख़िर क्यों हो किसी के पास जेब?
मैं एक यूटोपिया में प्रवेश करने जा रही हू`ं
बंजारा खानबदोश जिप्सी नो मेंस लैण्ड
कुछ भी कह लो मुझे
अपने इस यूटोपिया में
बिना जेब के हूँ मैं
खालीपन मुझे अच्छा लगता है
तिस पर
जेब के खालीपन के तो कहने ही क्या...
क्यों बढ़ा रही हूँ बात को इतना
कहना चाहिए कभी-कभी
कलेजे को चीरती
सीधी-सच्ची दो टूक बात
आख़िर क्यों हो किसी के पास जेब?