-राजेश बादल
अगर आप समय की स्लेट पर लिखी इबारत को भूल जाएं तो उसके गभीर परिणाम भी देखने को मिलते हैं। बलूचिस्तान के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ है। मैं इस समय याद करता हूँ 1971 को, जब सारा देस श्रीमती इंदिरा गाँधी, थलसेनाध्यक्ष मानेक शॉ और जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा की जय-जयकार कर रहा था तो बलूचिस्तान में भी यही जयकार गूंज रही थी। वहां भी इंदिरा गाँधी और जनरल अरोड़ा ज़िंदाबाद के नारे महीनों तक सुनाई देते रहे थे। अख़बारों में भी ये ख़बरें सुर्खिंयों में थीं। पाकिस्तान के लोग हैरान थे कि देश के दो टुकड़े होने के बाद उनके देशे में शत्रु-देश की ज़िदाबाद क्यों हो रही है। इसका उत्तर बहुत सीधा-सपाट नहीं है। अतीत के कुछ पन्नों को पलटना होगा। कभी बौद्ध धर्म की शिक्षाएं बलूचिस्तान में अपना व्यापक असर दिखाती थीं,मौर्य साम्राज्य का प्रभुत्व चरम पर था और कनिष्क की कथाएं आज भी बलूचिस्तान के गाँवों में सुनाई जाती हैं।
भारत को जब अँग्रेज़ों ने बांटा और चौदह अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनाया,तब उन्होंने बलूचिस्तान पाकिस्तान को नहीं सौंपा था। उसके तीन दिन पहले 11 अगस्त को उन्होंने बलूचिस्तान को आज़ाद कर दिया था। बँटवारे से पहले ही बलूच-संसद अँगरेज़ों से हुई संधि रद्द कर चुकी थी और बलूचिस्तान स्वतंत्र देश ही था। पाकिस्तान ने अस्तित्व में आते ही फौजी कार्रवाई की और बलूचिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया था। बेचारे बलूच स्वायत्तता-अखंडता का राग अलापते रह गए। उनकी संसद को मोतै जेलों में डाल दिए गए या मार दिए गए।स्वाभिमानी बलूचियों न इसे कभी मंज़ूर नहीं किया। भारत चाहता तो यही काम वह नेपाल या भूटान के साथ कर सकता था और वहाँ तब शायद वैसा विरोध भी न होता,जैसा बलूचिस्तान में लगातार होता आया है। पाकिस्तानी फौजों ने वहाँ वर्षों तक अभियान चलाए हैं। जनरल टिक्का ख़ाना को तो बलूचिस्तान का कसाई कहा जाता है। उन्होंने गाजर-मूली की तरह बलूचियों को काटा और हवाई हमलों से उनकी नींद हराम कर दी। यह सिलसिला आज भी जारी है। तब न वहाँ अलक़यादा था, न आतंकवाद, न ओसाम और न अमेरिका। भारत ने तो कभी काश्मीर में ऐसा नहीं किया।बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तान से कब्ज़ा छोड़ने की माँग वैसे ही कर रहे हैं, जैसे हिंदुस्तान अँगरेज़ों से भारत छोड़ने की माँग कर रहा था।
अगर हम पाकिस्तान की तरफ से एक बार यह सोचें भी कि बलूचिस्तान उनका अटूट हिस्सा है तो सवाल यह है कि अपने नागरिकों पर हवाई हमलों और लगातार फौजी कार्रवाई के लिए पाकिस्तानी हुक्मरानों को किसने मजबूर किया था?क्या कोई देश अपने ही नागरिकों पर इस तरह की कार्रवाई करता है? और याद कीजिए 1970 को-पाकिस्तान ने ही अपने देश के एक टुकड़े पूर्वी पाकिस्तान(अब बांग्लादेश) में सिर्फ छह महीनों के दौरान सीधी फौजी कार्रवाई करते हुए तीन लाख से ज़्यादा लोगों को मार डाला था। यह आँकड़ा खुद पाकिस्तान के अपने जाँच अधिकारी हमीद उर रहमान की रिपोर्ट में दिया गया है। तब भी दुनिया भर के चौधरी चुप्पी साधे-सिवाय भारत के। आज मनमोहन सिंह के रवैये पर काँग्रेस पार्टी में छाती पीट-पीटकर विलाप किया जा रहा है। हाय! मनमोहन!तुमने ये क्या कर दिया?बलूचिस्तान का उल्लेख क्यों होने दिया?
हैरत की बात है कि कश्मीर में आतंकवाद को पाकिस्तान खुले-आम कश्मीरियों की आज़ादी की जंग बताता है और नैतिक समर्थन देता है। वह कश्मीर जो कल्हम की राजतरंगिणी की भूमि है, वह कश्मीर जो 1947 तक हिंदू राजा की रियासत था, वह कश्मीर जो 1947 से ही हमारे साथ विलय कर चुका था, अगर वह हिंदुस्तान का नहीं है तो बलूचिस्तान पाकिस्तान का कैसे है?एक स्वतंत्र देश पर फौज के दम पर कब्ज़ा कितना जायज़ है?उसका विलय तो कभी पाकिस्तान में हुआ ही नहीं। पाकिस्तान का कब्ज़े का यह देश क्षेत्रफल में पाकिस्तान के सभी राज्यों से बड़ा है, सबसे अमीर भी है। वहाँ के लोग बासठ साल से अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमें बलूचिस्तान की आज़ादी के आंदोलन को खुला समर्थन क्यों नहीं देना चाहिए?कश्मीर के मसले पर पाक को इससे अच्छा उत्तर नहीं दिया जा सकता। भले ही मनमोहन सिंह या हमारे अफसरों से अनजाने में ही बलूचिस्तान का उल्लेख हुआ हो,लेकिन वास्तव में हमारे हाथ अब एक ऐसा हथियार है, जिसे हमें पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए इस्तेमाल करना ही होगा। पाकिस्तान की अखंडता अगर पाकिस्तान को प्यारी हो सकती है तो भारत को क्यों नहीं?अगर हिंदुस्तान के लोग एक बार पाकिस्तान की अखंडता अगर पाकिस्तान को प्यारी हो सकती है तो भारत को क्यों नहीं? अगर हिंदुस्तान के लोग एक बार पाकिस्तान की अखंडता को स्वीकार कर भी लें, तो यह देखना होगा कि उससे पहले हमें हमारी अखंडता प्रिय है। हमारी अखंडता की क़ीमत पर यदि पाकिस्तान बिखरता है तो किसी को इस पर ऐतराज़ क्यों होना चाहिए।
एक और उदाहरण सीमांत गाँधी ख़ान अब्दुल गफ्फार ख़ान और उनके खुदाई खिदमतगार भारत से अलग होना ही नहीं चाहते थे। उन्हें आत्म निर्णय का अधिकार ही नहीं दिया गया। अलग होने की सूरत में वे अपना देश चाहते थे। वे पाकिस्तान में विलय नहीं चाहते थे. जाने माने पत्रकार स्व.राजेंद्र माथुर ने करीब पचास साल पहले यह सवाल उठाया था कि पख्तून सूबे का ज़बरन विलय पाकिस्तान में अंतिम क्यों है और कश्मीर का भारत में विलय अंतिम क्यों नहीं है?
लब्वो-लुआब यह है कि भारत को मौजूदा हालात में अपनी विदेश नीति और पाकिस्तान नीति में बदलाव करना ही होगा। बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए खुलकर सामने आना ही होगा। कमज़ोरी छोड़नी होगी और विलाप को विजय में बदलने का प्रयास करना होगा। दुनिया में कमज़ोर कभी नहीं जीतते। अब तक की नीति का अनुभव यही है कि भारत ने खोया ही खोया ही खोया है। पाया कुछ नहीं। 1947-48 में एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान ने छीन लिया। हम वापस नहीं ले पाए। 1962 में चीन हज़ारों किलोमीटर ज़मीन छीन ली। हम वापस नहीं ले पाए। 1965 में कच्छ की ज़मीन पाकिस्तान ने हड़प ली। और तो और 65और 71 में हमने चीती हुई ज़मीन भी वापस कर दी। चीन ने 1959 में तिब्बत हड़पा। दुनिया जानती है कि आध्यात्मिक सांस्कृतिक और सामाजिक नज़रिए से तिब्बत पर हमारी दावेदारी बनती थी। हम वह भी नहीं कर पाए। पाकिस्तान ने हमारे कश्मीर का एक हिस्सा चीन को तोहफे के तौर पर दे दिया। हम देखते रहे। तो अब बलूचिस्तान प्रसंग पर हम रक्षात्मक क्यों हैं? दुनिया के नक्शे पर भारत की आवाज़ अब सुनी जाती है। बलूचिस्तान की आज़ादी हमारी पाक-नीति का अस्त्र होना चाहिए। जान-बूझकर साहस हम शायद न दिखाते, लेकिन अनजाने में कुदरत ने बलूचिस्तान का ब्रम्हास्त्र भारत को दे दिया है।
( प्रख्यात पत्रकार राजेश बादल का यह लेख देशकाल डाट काम ने प्रकाशित किया है.)
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ,भोपाल के जनसंचार विभाग के छात्रों द्वारा संचालित ब्लॉग ..ब्लाग पर व्यक्त विचार लेखकों के हैं। ब्लाग संचालकों की सहमति जरूरी नहीं। हम विचार स्वातंत्र्य का सम्मान करते हैं।
Wednesday, July 29, 2009
मीडिया, राजनीति, नौकरशाही का काकटेल

-पुण्यप्रसून वाजपेयी
मीडिया को अपने होने पर संदेह है। उसकी मौजूदगी डराती है। उसका कहा-लिखा किसी भी कहे लिखे से आगे जाता नहीं। कोई भी मीडिया से उसी तरह डर जाता है जैसे नेता....गुंडे या बलवा करने वाले से कोई डरता हो। लेकिन राजनीति और मीडिया आमने-सामने हो तो मुश्किल हो जाता है कि किसे मान्यता दें या किसे खारिज करें। रोना-हंसना, दुत्काराना-पुचकारना, सहलाना-चिकोटी काटना ही मीडिया-राजनीति का नया सच है। मीडिया के भीतर राजनीति के चश्मे से या राजनीति के भीतर मीडिया के चश्मे से झांक कर देखने पर कोई अलग राग दोनों में नजर नहीं आयेगा। लेकिन दोनों प्रोडेक्ट का मिजाज अलग है, इसलिये बाजार में दोनों एक दूसरे की जरुरत बनाये रखने के लिये एक दूसरे को बेहतरीन प्रोडक्ट बताने से भी नहीं चूकते। यह यारी लोकतंत्र की धज्जिया उड़ाकर लोकतंत्र के कसीदे भी गढ़ती है और भष्ट्राचार में गोते लगाकर भष्ट्राचार को संस्थान में बदलने से भी नही हिचकती।
मौजूद राजनेताओं की फेरहिस्त में मीडिया से निकले लोगो की मौजूदगी कमोवेश हर राजनीतिक दलों में है। अस्सी के दशक तक नेता अपनी इमेज साफ करने के लिये एक बार पत्रकार होने की चादर को ओढ़ ही लेता था, जिससे नैतिक तौर पर उसे भी समाज का पहरुआ मान लिया जाये। जागरुक नेता के तौर पर ...बुद्धिजीवी होने का तमगा पाने के तौर पर, पढ़े-लिखों के बीच मान्यता मिलने के तौर पर नेता का पत्रकार होना उसके कैरियर का स्वर्णिम हथियार होता, जिसे बतौर नेता मीडिया के घेरे में फंसने पर बिना हिचक वह उसे भांजता हुआ निकल जाता। नेहरु से लेकर वाजपेयी तक के दौर में कई प्रधानमंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं ने खुलकर कहा कि वह पत्रकार भी रह चुके हैं। आईके गुजराल और वीपी सिंह भी कई मौकों पर कहते थे कि एक वक्त पत्रकार तो वह भी रहे हैं। लेकिन नया सवाल एकदम उलट है। एक पत्रकार की पुण्यतिथि पर कबिना मंत्री मंच से खुलकर कहता है कि उन्हें मीडिया की फ्रिक्र नहीं है कि वह क्या लिखते हैं क्योकि पत्रकार और पत्रकारिता अब मुनाफा बनाने के लिये किसी भी स्तर तक जा पहुंची है। अखबार के एक ही पन्ने पर एक ही व्यक्ति से जुड़ी दो खबरें छपती हैं, जो एक दूसरे को काटती हैं। राजनेता की यह सोच ख्याली कह कर टाली नहीं जा सकती है। हकीकत है कि इस तरह की पत्रकारिता हो रही है।
लेकिन यहां सवाल उस राजनीति का है, जो खुद कटघरे में है। सत्ता तक पहुंचने के जिसके रास्ते में कई स्तर की पत्रकारिता की बलि भी वह खुद चढ़ाता है और जो खुद मुनाफे की अर्थव्यवस्था को ही लोकहित का बतलाती है। लेकिन लोकहित किस तरह राज्य ने हाशिये पर ढकेला है यह कोई दूर की गोटी नहीं है लेकिन यहां सवाल मीडिया का है। यानी उस पत्रकारिता का सवाल है, जिस पत्रकारिता को पहरुआ होना है, पर वह पहरुआ होने का कमीशन मांगने लगी है और जिस राजनीति को कल्य़ाणकारी होना है, वह मुनाफा कमा कर सत्ता पर बरकरार रहने की जोड़तोड़ को राष्ट्रीय नीति बनाने और बतलाने से नही चूक रही है। तो पत्रकार को याद करने के लिये मंच पर नेता चाहिये, यह सोच भी पत्रकारो की ही है और नेता अगर पत्रकारो के मंच से ही पत्रकारिता को जमीन दिखा दे तो यह भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। लेकिन पत्रकारिता के घालमेल का असल खेल यहीं से शुरू होता है। मीडिया को लेकर पिछले एक दशक में जितनी बहस मीडिया में ही हुई, उतनी आजादी के बाद से नहीं हुई है। पहली बार मीडिया को देखने, समझने या उसे परोसने को लेकर सही रास्ता बताने की होड़ मीडियाकर्मियों में ही जिस तेजी से बढ़ी है, उसका एक मतलब तो साफ है कि पत्रकारों में वर्तमान स्थिति को लेकर बैचैनी है। लेकिन बैचैनी किस तरह हर रास्ते को एक नये चौराहे पर ले जाकर ना सिर्फ छोड़ती है, बल्कि मीडिया का मूल कर्म ही बहस से गायब हो चला है, इसका एहसास उसी सभा में हुआ, जिसमें संपादक स्तर के पत्रकार जुटे थे।
उदयन शर्मा की पुण्यतिथि के मौके पर जो सवाल उस सभा में मंच या मंच के नीचे से उठे, वह गौर करने वाले इसलिये हैं, क्योंकि इससे हटकर व्यवसायिक मीडिया में कुछ होता नहीं और राजनीति भी कमोवेश अपने आत्ममंथन में इसी तरह के सवाल अपने घेरे में उठाती है और सत्ता मिलने के बाद उसी तरह खामोश हो जाती है, जैसे कोई पत्रकार संपादक का पद मिलने के बाद खुद को कॉरपोरेट का हिस्सा मान लेता है। मीडिया अगर प्रोडक्ट है तो पाठक उपभोक्ता हैं। और उपभोक्ता के भी कुछ अधिकार होते हैं। अगर वह माल खरीद रहा है तो उसे जो माल दिया जा रहा है उसकी क्वालिटी और माप में गड़बड़ी होने पर उपभोक्ता शिकायत कर भरपायी कर सकता है। लेकिन मीडिया अगर खबरों की जगहो पर मनोरंजन या सनसनाहट पैदा करने वाले तंत्र-मंत्र को दिखाये या छापे तो उपभोक्ता कहां शिकायत करें। यह मामला चारसौबीसी का बनता है। इस तरह के मापदंड मीडिया को पटरी पर लाने के लिये अपनाये जाने चाहिये। प्रिंट के पत्रकार की यह टिप्पणी खासी क्रांतिकारी लगती है।
लेकिन मीडिया को लेकर पत्रकारों के बीच की बहस बार-बार इसका एहसास कराने से नहीं चूकती कि पत्रकारिता और प्रोडक्ट में अंतर कुछ भी नही है। असल में खबरों को किसी प्रोडक्ट की तरह परखें तो इसमें न्यूज चैनल के पत्रकार की टिप्पणी भी जोड़ी जा सकती है, जिनके मुताबिक देश की नब्ज न पकड़ पाने की वजह कमरे में बैठकर रिपोर्टिग करना है। और आर्थिक मंदी ने न्यूज चैनलों के पत्रकारो को कमरे में बंद कर दिया है, ऐसे में स्पॉट पर जाकर नब्ज पकडने के बदले जब रिपोर्टर दिल्ली में बैठकर समूचे देश के चुनावी तापमान को मांपना चाहेगा तो गलती तो होगी ही। जाहिर है यह दो अलग अलग तथ्य मीडिया के उस सरोकार की तरफ अंगुली उठाते हैं जो प्रोडक्ट से हटकर पत्रकारिता को पैरों पर खड़ा करने की जद्दोजहद से निकली है । इसमें दो मत नहीं कि समाज की नब्ज पकड़ने के लिये समाज के बीच पत्रकार को रहना होगा लेकिन मीडिया में यह अपने तरह की अलग बहस है कि पत्रकारिता समाज से भी सरोकार तभी रखेगी, जब कोई घटना होगी या चुनाव होंगे या नब्ज पकडने की वास्तव में कोई जरुरत होगी। यानी मीडिया कोई प्रोडक्ट न होकर उसमें काम करने वाले पत्रकार प्रोडक्ट हो चुके हैं, जो किसी घटना को लेकर रिपोर्टिंग तभी कर पायेंगे जब मीडिया हाउस उसे भेजेगा।
अब सवाल पहले पत्रकार का जो उपभोक्ताओं को खबरें न परोस कर चारसौबीसी कर रहा है। तो पत्रकार के सामने तर्क है कि वह बताये कि आखिर शहर में दंगे के दिन वह किसी फिल्म का प्रीमियर देख रहा था तो खबर तो फिल्म की ही कवर करेगा। या फिर फिल्म करोड़ों लोगों तक पहुंचेगी और दंगे तो सिर्फ एक लाख लोगो को ही प्रभावित कर रहे हैं, तो वह अपना प्रोडक्ट ज्यादा बड़े बाजार के लिये बनायेगा। यानी देश में सांप्रदायिक दंगो को राजनीति हवा दे रही है और उसी दौर में फिल्म अवॉर्ड समारोह या कोई मनोरंजक बालीवुड का प्रोग्राम हो रहा है और कोई चैनल उसे ही दिखाये। य़ा फिर अवार्ड समारोह की ही खबर किसी अखबार के पन्ने पर चटकारे लेकर छपी रहे तो कोई उपभोक्ता क्या कर सकता है। जैसे ही पत्रकारिता प्रोडक्ट में तब्दील की जायेगी, उसे समाज की नहीं बाजार की जरूरत पड़ेगी। पत्रकारिता का संकट यह नहीं है कि वह खबरों से इतर चमकदमक को खबर बना कर परोसने लगी है।
मुश्किल है पत्रकारिता के बदलते परिवेश में मीडिया ने अपना पहला बाजार राजनीति को ही माना। संपादक से आगे क्या। यह सवाल पदों के आसरे पहचान बनाने वाले पत्रकारों से लेकर खांटी जमीन की पत्रकारिता करने वालो को भी राजनीति के उसी दायरे में ले गया, जिस पर पत्रकारिता को ही निगरानी रखते हुये जमीनी मुद्दों को उठाये रखना है। संयोग से उदयन की इस सभा में एनसीपी के नेता डीपी त्रिपाठी ने कहा कि राजनीति का यह सबसे मुश्किल भरा वक्त इसलिये है क्योकि वाम राजनीति इस लोकसभा चुनाव में चूक गयी। वाम राजनीति रहती तो सत्ता मनमानी नहीं कर सकती थी। वहीं कपिल सिब्बल ने कहा कि उदयन सरीखे पत्रकार होते तो पत्रकारिता चूकती नही, जो लगातार चूक रही है । लेकिन मंच के नीचे से यह सवाल भी उठा कि उदयन को भी आखिर राजनीति क्यों रास आयी । क्यो पत्रकारिता में इतना स्पेस नहीं है कि पत्रकार की जिजिविशा को जिलाये रख सके। उदयन जिस दौर में कांग्रेस में गये या कहें कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़े, उस दौर में देश में सांप्रदायिकता तेजी से सर उठा रही थी । और उदयन की पहचान सांप्रदायिकता के खिलाफ पत्रकारिता को धार देने वाली रिपोर्ट करने में ही थी। सवाल सिर्फ उदयन का ही नहीं है। अरुण शौरी जिस संस्थान से निकले, उसे चलाने वाले गोयनका राजनीति में अरुण शौरी से मीलो आगे रहे। लेकिन गोयनका ने कभी किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़कर या पिछले दरवाजे से संसद पहुचने की मंशा नहीं जतायी। चाहते तो कोई रुकावट उनके रास्ते में आती नहीं । गोयनका को पॉलिटिकल एक्टिविस्ट के तौर पर देखा समझा जा सकता है। लेकिन उसी इंडियन एक्सप्रेस में जब कुलदीप नैयर का सवाल आता है और इंदिरा गांधी के दबाब में कुलदीप नैयर से और कोई नहीं गोयनका ही इस्तीफा लेते है तो पत्रकारिता के उस घेरे को अब के संपादक समझ सकते है कि मीडिया की ताकत क्या हो सकती है, अगर उसे बनाया जाये तो।
लेकिन कमजोर पड़ते मीडिया में अच्छे पत्रकारो के सामने क्या सिर्फ राजनीति इसीलिये रास्ता हो सकती है क्योंकि उनका पहला बाजार राजनीति ही रहा और खुद को बेचने वह दूसरी जगह कैसे जा सकते हैं। स्वप्न दास हो या पायोनियर के संपादक चंदन मित्रा या फिर एमजे अकबर। इनकी पत्रकारिता पर उस तरह सवाल उठ ही नहीं सकते हैं, जैसे अब के संपादक या पत्रकारों के राजनीति से रिश्ते को लेकर उठते हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि राजनीति में गये इन पत्रकारों की हैसियत राजनीतिक मंच पर क्या हो सकती है या क्या है, जरा इस स्थिति को भी समझना चाहिये। राजनीतिक गलियारे में माना जाता है कि उड़ीसा में नवीन पटनायक से बातचीत करने के लिये अगर चंदन मित्रा की जगह किसी भी नेता को भेजा जाता तो बीजू जनता दल और भाजपा में टूट नहीं होती। इसी तरह चुनाव के वक्त वरुण गांधी के समाज बांटने वाले तेवर को लेकर बलबीर पुंज ही भाजपा के लिये खेतवार बने। बलवीर पुंज भी एक वक्त पत्रकार ही थे और वह गर्व भी करते हैं कि पत्रकारिता के बेहतरीन दौर में बतौर पत्रकार उन्होंने काम किया है। लेकिन राजनीति के घेरे में इन पत्रकारो की हैसियत खुद को वाजपेयी-आडवाणी का हनुमान कहने वाले विनय कटियार से ज्यादा नहीं हो सकती है। तो क्या माना जा सकता है कि पत्रकारिय दौर में भी यह पत्रकार पत्रकारिता ना करके राजनीतिक मंशा को ही अंजाम देते रहे। और जैसे ही राजनीति में जाने की सौदेबाजी का मौका मिला यह तुरंत राजनीति के मैदान में कूद गये।
पत्रकार का नेता बनने का यह पिछले दरवाजे से घुसना कहा जा सकता है,क्योकि राजनीति जिस तरह का सार्वजनिक जीवन मांगती है, पत्रकार उसे चाहकर भी नहीं जी पाता। पॉलिटिक्स और मीडिया को लेकर यहां से एक समान लकीर भी खिंची जा सकती है। दोनों पेशे में समाज के बीच जीवन गुजरता है। यह अलग बात है कि पत्रकारों को राजनीतिज्ञो के बीच भी वक्त गुजारना पड़ता है और नेता भी मीडिया के जरीये समाज की नब्ज टटोलने की कोशिश करता रहता है। लेकिन संयोग से दोनो जिस संकट पर पहुचे है, उसका जबाब भी इन्ही दोनों पेशे की तरफ से उदयन को याद करने वाली सभा में उभरा। राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक के एक ब्यूरो चीफ ने सभा में साफ कहा कि पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट तत्काल को जीना है। इसमें भी बड़ा संकट गहरा रहा है क्योंकि आने वाली पीढ़ी तो उस गलती को भी नहीं समझ पा रही है, जिसे अभी के संपादक किये जा रहे हैं। यानी जो मीडिया में सत्तासीन हैं, उन्हे तमाम गलतियों के बावजूद पद छोड़ना नहीं है या उन्हें हटाने की बात करना सही नहीं है क्योंकि उनके हटने के बाद जो पीढी आयेगी, वह तो और दिवालिया है।
जाहिर है यह समझ खुद को बचाने वाली भी हो सकती है और आने वाली पीढ़ी की हरकतों को देखकर वाकई का डर भी। लेकिन पत्रकारिता में संकट के दौर में यह एक अनूठी समझ भी है, जिसमें उस दौर को मान्यता दी जा रही है जो बाजार के जरीये मीडिया को पूरी तरह मुनाफापरस्त बना चुकी है। लेकिन इस मुनाफापरस्त वक्त की पीढी की पत्रकारिता को कोई बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है य़ा फिर उसके मिजाज को पत्रकारिय चिंतन से इतर देख रहा है। यह घालमेल राजनीति में किस हद तक समा चुका है, इसे सीपीएम नेता सीताराम येचुरी के ही वक्तव्य से समझा जा सकता है। संयोग से उदयन की सभा के दिन सीपीएम सेन्ट्रल कमेटी की बैठक भी दिल्ली में हो रही थी, जिसमें चुनाव में मिली हार की समीक्षा की जा रही थी। और सीताराम येचुरी दिये गये वादे के मुताबिक बैठक के बीच में उदयन की सभा में पहुंचे, जिसमें उन्होंने माना कि वामपंथियों की हार की बड़ी वजह उन आम वोटरों को अपनी भावनाओं से वाकिफ न करा पाना था, जिससे उन्हें वोट मिलते। यानी सीपीएम के दिमाग में जो राजनीति तमाम मुद्दों को लेकर चल रही थी, उसके उलट लोग सोच रहे होगे, इसलिये सीपीएम हार गयी। लेकिन क्या सिर्फ यही वजह रही होगी। हालाकि सीपीएम के मुखपत्र में कैडर में फैलते भष्ट्राचार से लेकर कैडर और आम वोटरो के बीच बढ़ती दूरियो का भी बच बचाकर जिक्र किया गया। लेकिन सीताराम येचुरी के कथन ने उस दिशा को हवा दी, जहा राजनीति अपने हिसाब से जोड़-तोड़ कर सत्ता में आने की रणनीति अपनाती है लेकिन जनता के दिमाग में कुछ और होता है।
यहां सवाल है कि राजनीति को जनता की जरुरतों को समझना है या फिर राजनीति अपने मुताबिक जनता को समझा कर जीत हासिल कर सकती है। भाजपा ने भी लोकसभा चुनाव में वहीं गलती कि जहां उसे लगा कि उसकी राजनीति को जनता समझ जायेगी और जो मुद्दे जनता से जुड़े हैं अगर उसमें आंतकवाद और सांप्रदायिकता का लेप चढ़ा दिया जाये तो भावनात्मक तौर पर उसके अनुकुल चुनावी परिणाम आ जायेगे। हालांकि भाजपा एक कदम और आगे बढ़ी और उसने हिन्दुत्व को भी मुद्दे सरीखा ही आडवाणी के चश्मे से देखना शुरु किया। हिन्दुत्व कांग्रेस के लिये मुद्दा हो सकता है लेकिन भाजपा की जो अपनी पूरी ट्रेनिंग है, उसमें हिन्दुत्व जीवनशैली होगी। चूंकि आरएसएस की यह पूरी समझ ही भाजपा के लिये एक वोट बैक बनाती है, इसलिये अपने आधार को खारिज कर भाजपा को कैसे चुनाव में जीत मिल सकती है, यह भाजपा को समझना है। यही समझ वामपंथियो में भी आयी, जहां वह वाम राजनीति से इतर सामाजिक-आर्थिक इंजिनियरिंग का ऐसा लेप तैयार करने में जुट गयी जिसमें वह काग्रेस का विकल्प बनने को भी तैयार हो गयी और जातीय राजनीति से निकले क्षेत्रिय दलों की अगुवाई करते हुये भी खुद को वाम राजनीति करने वाला मानने लगी। इस बैकल्पिक राजनीति की उसकी समझ को उसी की ट्रेनिग वाले वाम प्रदेश में ही उसे सबसे घातक झटका लगा क्योकि उसने अपने उन्हीं आधारो को छोड़ा, जिसके जरीये उसे राजनीतिक मान्यता मिली थी।
जाहिर है यहां सवाल मीडिया का भी उभरा कि क्या उसने भी अपने उन आधारों को छोड़ दिया है, जिसके आसरे पत्रकारिता की बात होती थी। या फिर वाकई वक्त इतना आगे निकल चुका है कि पत्रकारिता के पुराने मापदंडों से अब के मीडिया को आंकना भारी भूल होगी। लेकिन इसके सामानांतर बड़ा सवाल भी इसी सभा में उठा कि मीडिया का तकनीकि विस्तार तो खासा हुआ है लेकिन पत्रकारो का विस्तार उतना नहीं हो पाया है, जितना एक दशक पहले तक पत्रकारों का होता था और उसमें उदयन-एसपी सिंह या फिर राजेन्द्र माथुर या सर्वेश्वरदयाल सक्सेना सरीखों का हुआ। मीडिया को लेकर नौकरशाह चुनाव आयुक्त एस एम कुरैशी ने भी अपनी लताड़ जानते समझते हुये लगा दी कि चुनाव को लेकर जीत-हार का सिलसिला रोक कर चुनाव आयोग ने कितने कमाल का काम किया है। एक तरफ कुरैशी साहब यह बोलने से नहीं चूके की मीडिया सर्वे के जरीये राजनीतिक दलों को लाभ पहुंचा देती है क्योंकि सर्वे का कोई बड़ा आधार नहीं होता। दूसरी तरफ राजनीति के प्रति लोगो में अविश्वास न जागे, इसके लिये मीडिया को भी मदद करने की अपील भी यह कहते हुये कि राजनेता लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है। कुरैशी साहब के मुताबिक चुनाव आयोग जिस तरह चुनावों को इतने बड़े पैमाने पर सफल बनाता है, असल लोकतंत्र का रंग यही है। हालांकि मंच के नीचे से यह सवाल भी उठा कि सत्तर करोड़ मतदाताओं में से जब पैंतीस करोड़ वोट डालते ही नहीं तो लोकतंत्र का मतलब क्या होगा। 15 वीं लोकसभा चुनाव में भी तीस करोड़ से ज्यादा वोटरो ने वोट डालने में रुचि दिखायी ही नहीं और वोट ना डालने वालो की यह तादाद राष्ट्रीय पार्टियों को मिले कुल वोट से भी ज्यादा है या कहे कांग्रेस की अगुवाई में जो सरकार बनी है, उससे दुगुना वोट पड़ा ही नहीं।
लेकिन मीडिया का संकट इतना भर नहीं है कि पत्रकार शब्द समाज में किसी को भी डरा दे। राजनीति या नौकरशाही इसके सामने ताल ठोंककर उसे खारिज कर निकल भी सकती है। उस सभा के अध्यक्ष जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष शरद यादव ने आखिर में जब अभी के सभी पत्रकारों को खारिज कर पुराने पत्रकारों को याद किया तो भी पत्रकारो की इस सभा में खामोशी ही रही। शरद यादव ने बड़े प्यार से प्रभाष जोशी को भी खारिज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि अभी के पत्रकारो में एकमात्र प्रभाष जोशी हैं, जो सबसे ज्यादा लिखते हैं लेकिन वह भी रौ में बह जाते हैं। जबकि शरद यादव जी के तीस मिनट के भाषण के बाद मंच के नीचे बैठे हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा ने टिप्पणी की- कोई समझा दे कि शरद जी ने कहा क्या तो उसे एक करोड़ का इनाम मिलेगा। असल में मीडिया की गत पत्रकारों ने क्या बना दी है, यह 11 जुलायी को उदयन की पुण्यतिथि पर रखी इस सभा में मंच पर बैठे एक मंत्री, चार नेता और एक नौकरशाह और मंच के नीचे बैठे पत्रकारों की फेरहिस्त में कुलदीप नैयर से लेकर एक दर्जन संपादकों से भी समझी जा सकती है। दरअसल, इस सभा में जो भी बहस हुई, इससे इतर मंच और मंच के बैठे नीचे लोगों से भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक पत्रकार को याद करने के लिए पत्रकारों द्वारा आयोजित सभी में ही किसे ज्यादा तरजीह मिलेगी।
लेखक पुण्य प्रसून वाजपेयी मशहूर पत्रकार हैं। उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लिया गया है।
समाज, सरकार, संसद, सर्जना, सेंसर और रविशंकर प्रसाद

♦ रवि शंकर प्रसाद
पूर्व केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने टीआरपी के धंधे पर यह भाषण सोमवार, 27 जुलाई 2009 को राज्यसभा में दिया। भाषण में टीआरपी की आड़ में देश के बड़े हिस्से को चैनल स्क्रीन से बाहर रखने की राजनीति पर उन्होंने रोशनी डाली। दूसरे सदस्यों ने भी उनका समर्थन किया और सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने भरोसा दिया कि हम इस दिशा में ज़रूर कुछ करेंगे। टीआरपी पर राज्यसभा में हुई इस बहस की रिपोर्टिंग अख़बारों में छपी, लेकिन हम रवि शंकर प्रसाद का पूरा भाषण यहां पब्लिश कर रहे हैं – ताकि पाठकों को यह पता चले कि टीआरपी को लेकर एक राजनीतिज्ञ का ग़ुस्सा कितने रचनात्मक तरीक़े से बाहर आता है-
उपसभाध्यक्ष जी, मैं अपने मन में एक सवाल पूछता हूं कि समाज, सरकार, संसद, सर्जना और सेंसर, इसके बीच में क्या रिश्ता हो ? यह सवाल एक लोकतंत्र में हमेशा उठता है। उपसभाध्यक्ष जी, मेरी समझ यह है कि सेंसर की सुई इस प्रकार से नहीं चलनी चाहिए कि सर्जना की सरिता सूख जाए। इसके साथ ही, इतना आवश्यक यह भी है कि सर्जना का अधिकार इतना उच्छृखंल नहीं होना चाहिए कि संस्कारों के सरोवर गंदे हो जाएं। यह basic bench-mark है। Censor should not kill creativity, and the Right of Creativity should not be so irresponsible that it pollutes the time-tested propriety. यह मौलिक बिंदु हमको समझना पड़ेगा, जो बहुत आवश्यक है। लेकिन कई बार लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण हो जाता है। उपसभाध्यक्ष जी, अब उसका निदान कौन करेगा, बात यहां पर आती है। मैं बहुत प्रमाणिकता से महसूस करता हूं कि सरकार की भूमिका इसमें बहुत कम होनी चाहिए। We need to respect the freedom of the media and the Right of Creativity, and the Government should have a minimum role. लेकिन समस्या तो है और जब हम संसद में हैं, अगर देश यह चिंता करता है, तो हमें इसका उत्तर ढूंढ़ना पड़ेगा, इसका क्या उत्तर होगा? इसके पीछे समस्या क्या है? मैं कुछ बातें आज खुलकर कहना चाहता हूं – मीडिया से भी, क्योंकि मीडिया के लोग हमारे मित्र हैं। आप ग़लतियों को ज़रूर निकालिए, लेकिन एक sting operation हुआ एक टीचर अरोड़ा के साथ। उस sting operation के बाद हमने उसको पिटते हुए देखा है। बाद में मालूम हुआ कि वह पूरा sting operation ग़लत था। क्या हम उसके सम्मान को रेस्टोर कर सके? यह सवाल कहीं न कहीं उठाना पड़ेगा? हम उसकी कितनी बड़ी क्षति कर गए, उसकी पूरी प्रतिष्ठा को, सम्मान को, His entire reputation stands completely destroyed before his pupils, before his students, and also before the society. उपसभाध्यक्ष जी, एक कार्यक्रम गुड़िया का था। यह एक चैनल पर आया था। वह मुस्लिम समाज से आती थी। उसका पति शायद ग़ायब हो गया था। उसकी दूसरी शादी हो गयी थी। बाद में उसका पति वापिस आ गया। उसकी शादी का असर क्या है, यह चर्चा में आ गया। अब एक चैनल उसका इंटरव्यू ले रहा है और अब वह बड़ा विषय बन गया। मुझे मेरे पत्रकार मित्रों ने बताया कि बाक़ी चैनल वाले
उस चैनल के यहां पहुंच गये, कुछ लोग एफआईआर कर रहे हैं कि हमको भी गुड़िया मिलनी चाहिए, क्योंकि इस गुडि़या को हम भी दिखाएंगे। आप उस औरत की मानसिक परेशानी को समझिए। How she feels? मुझे याद है कि पटना में हमारे कुछ मित्रों ने धरना-प्रदर्शन में बंद कर रखा था और दानापुर के पास, तारिक अनवर जी, आपने वह कहानी देखी होगी, एक महिला डिलिवरी के लिए जा रही थी और बंद के कारण उसकी डिलिवरी सड़क पर ही हो गयी। अब सुबह से शाम तक उस बेचारी महिला की तस्वीर, आपको कैसा लग रहा है, It was down right atrocious; I have not the slightest doubt in saying that. यह क्यों होना चाहिए, यह कब तक होना चाहिए ? ये बड़े सवाल हैं।
उपसभाध्यक्ष जी, जहां एक ओर मैं इस देश के टेलिविज़न के इंटरटेनमेंट और मीडिया की तारीफ करूंगा कि इसने देश में बहुत अच्छे काम किये हैं। आज लोग इंटरटेनमेंट को एप्रिसिएट करना सीख गये। मुझे याद है, मैं टेलिविज़न की डिबेट में जाता हूं। जयंती और अभिषेक हैं। हां, अभिषेक आज हैं। आज आपको मैं बहुत दिन के बाद देख रहा हूं। उपसभाध्यक्ष जी, पहले जब हम टीवी डिबेट के लिए जाया करते थे, आपको याद होगा, तो हम लोगों की कोशिश होती थी कि हम लोग दूसरे को बोलने नहीं दें। सिब्बल साहब भी हैं। He has also been an equally important face on television debates. लेकिन देश ने हमसे अपेक्षा की कि आप civilised debate करिए, अपनी पारी का इंतज़ार करिए और आहिस्ता-आहिस्ता आज देश में हर टेलिविज़न की डिबेट का स्तर बढ़ा है।
उसी प्रकार से जो प्रोग्राम्स के कंटेंट हैं, उनका भी असर बढ़ा है। अगर कोई प्रोग्राम पूअर होता है, लोग उसको लाइक नहीं करते हैं, लेकिन महोदय, दिक्कत कहां आ रही है, यह बहुत समझने की जरूरत है। दिक्कत यहां आती है कि क्या बिकता है, क्या चलता है, क्या लोग देखना चाहते हैं? अब सवाल पूछिए कि ऐसा क्यों होता है? मुझे याद है, मेरे एक बड़े अच्छे दोस्त थे, जो टेलीविजन के कॉरिस्पोंडेंट थे। वे पॉलिटिकल इस्यूज को कवर करते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि रवि जी, मैं दो सपेरों को लेकर आगरा गया था, क्योंकि मुझे दो सांप खोजने थे, जो साथ-साथ नाचते थे। मैंने कहा कि आपको क्या हो गया है? उन्होंने कहा कि क्या बोलूं, आजकल यही बिकता है, इसलिए खोज कर रहा था। उपसभाध्यक्ष महोदय, सबसे बड़ी चिंता यही है और इससे बड़ा सवाल यह उठता है, लोग कहते हैं कि ये लोग देखना चाहते हैं। इसके साथ यह सवाल उठता है कि आप दिखाना क्या चाहते हैं? आपको किसने यह अधिकार दे दिया कि देश क्या देखना चाहता है, इसकी सही समझ आपको ही है। They are important issues. We need to understand them. महोदय, जो मैंने समझा है, वह यह है कि इस पूरे घालमेल के पीछे जो एक सबसे बड़ी परेशानी है, वह है TRP की राजनीति। the politics of Television Rating Points. जो आज सबसे अधिक अन-साइंटिफिक तरीके से हो रहा है। कोई कहता है कि हमारा चैनल सबसे बड़ा तेज़ चैनल है, तो कैसे है? आज की TRP में हमारा प्वाइंट ऊपर है, तो दूसरा कहता है कि उनकी TRP का प्वाइंट एक बजे तक ऊपर था, तीन बजे के बाद हम ऊपर चले गये हैं। उपसभाध्यक्ष महोदय, मैं आज इस हाउस को बड़ी नम्रता से यह बताना चाहता हूं कि The greatest fraud is being played on the country in the management of the TRP; and I say so with full sense of responsibility. यह देश कोई 110 या 112 करोड़ का है। यहां एक या दो प्राइवेट एजेंसीज हैं। उन्होंने कहां से यह अधिकार प्राप्त कर लिया और देश में कुछ हजार मीटर्स रख लिये तथा कुछ शहरों में रख दिये। बस, उनको यह मोनोपली मिल गयी कि हम यह तय करेंगे कि इनकी रेटिंग A है और इनकी रेटिंग B है। जब आपकी रेटिंग अच्छी होगी, तो आपको विज्ञापन मिलेगा। रेटिंग अच्छी करने के लिए आई बॉल चाहिए। आई बॉल करने के लिए बस, यही बिकता है। This is the whole unfortunate nexus. मुझे मालूम है कि हमारे टेलीविजन में काम करने वाले एक से एक अच्छे लोग हैं। हमारे न्यूज़ चैनल्स में एक से एक अच्छे लोग हैं, जो देश को यह बताना चाहते हैं कि देश कैसे आगे बढ़ रहा है तथा देश कहां उलझ रहा है? उनके पास इसकी एक से एक स्टोरी है, लेकिन उनसे कहा जाता है कि आपकी स्टोरी बिकती नहीं है, क्योंकि इसमें TRP नहीं है। That is the real problem.
उपसभाध्यक्ष महोदय, मुझे आज तक याद है कि एक चैनल का एक कार्यक्रम था कि इस देश के दलितों की स्थिति कैसी है? I remember that programme, a five day programme, on the rights of our oppressed people, one symbol. उत्तर प्रदेश के किसी गांव की कहानी थी कि वह दलित साइकिल से आ रहा था और एक घर के सामने वह साइकिल से उतर गया। He would ride on that cycle even after 60 years of independence. जब वह उस घर को पार कर जाएगा, फिर वह साइकिल
चलाएगा। यह एक इतना रचनात्मक शोर्ट था, हमने कहा कि यह उन्होंने देश की एक बहुत बड़ी समस्या को किस तरीके से उठाया है। मुझे मालूम है कि हर चैनल में बहुत अच्छा काम करने वाले लोग हैं, लेकिन बिकता नहीं है। सर, आज सबसे बड़ी बात इस देश को सोचनी है, संसद को सोचनी है और मंत्री जी मैं इस पर आपका उत्तर चाहूंगा कि What steps are you taking to undo this wholly non-transparent TRP business going on in this country? What is their accountability? Who has created it? What is their legal sanctity? All these things are required to be taken note of. मैं बिहार से आता हूं और कई लोग बंगाल से आते हैं तथा यहां पर असम से भी लोग हैं। वहां पर एक भी डिब्बा नहीं है। यदि पटना में दो-तीन मिल जाएं तो बड़ी ग़नीमत होगी।
(व्यवधान)
उत्तर प्रदेश का वही हाल है, काशी में नहीं है, असम में नहीं है और लखनऊ में नहीं है, लेकिन मुंबई में होगा, दिल्ली में होगा क्योंकि विज्ञापन का सारा केंद्र मुंबई है, दिल्ली है। यहां पर विज्ञापन बनते हैं। यदि विज्ञापन चलाना है तो आई बॉल चाहिए। यदि आई बॉल चाहिए तो दिखाना है।
यह वेस्टेड नेक्सेस बन गया है। मंत्री जी, मैं स्पष्ट करना चाहूंगा, मैंने साफ कहा है कि मैं किसी सरकारी हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं हूं, But it is high time you should have a law, have an autonomous regulator to determine the TRP of all the channels in the country by a proper support of law and we are willing to support you. यह मैं आपसे कहना चाहता हूं। आज देश में हमें गर्व होना चाहिए कि हिंदुस्तान में इतने चैनल्स हैं। उनका रेट ऑफ ग्रॉथ फिफटीन परसेंट है। We are proud of that growth. आज हिंदुस्तान के टेलीविजन के अच्छे प्रोग्राम वर्ल्ड के बेस्ट प्रोग्राम्स में आते हैं। इसके बारे में ईमानदारी से सोचना पड़ेगा और देश को फैसला करना पड़ेगा कि एक ऑटोनॉमस रेग्युलेटर हो, उसमें मीडिया के भी लोग रहें, वे लोग न्याय हित में हों, वे टीआरपी तय करें। मैं सोचता हूं कि यह पूरी TRP मंथ टू मंथ तय होनी चाहिए। प्रोग्राम वाइज, डे वाइज और ऑवर वाइज नहीं तय होनी चाहिए। This creates the biggest vested interest. हम चाहेंगे कि आप इस दिशा में कुछ प्रामाणिकता से फैसला करें। एक और समस्या है..
(व्यवधान)
आप मुझे पांच मिनट का समय दीजिए, बड़ी कृपा होगी। मैं बहुत महत्वपूर्ण बात कहने जा रहा हूं। एक विज्ञापन की समस्या है। माननीय अंबिका सोनी जी, आपका जो रूल है, आपको याद होगा कि केबल कंडक्ट्स रूल के अंतर्गत आप एक घंटे में सिर्फ बारह मिनट का विज्ञापन दिखा सकते हैं। आपको पता है कि विज्ञापन कितनी देर दिखाया जाता है। अक्सर विज्ञापन का जो मामला है – मुझे याद है, मैं उन दिनों पद पर था, दो-तीन विज्ञापनों को लेकर बहुत चिंता हुई। वह मैंने नोटिस किया, उन्होंने कहा कि एडवरटाइजमेंट कौंसिल, उनकी एक अंदर की बॉडी है, वह इसे देखती है। जब यह विषय अख़बार में आया तो एडवरटाइजमेंट कौंसिल के एक अवकाशप्राप्त सचिव ने मुझे पत्र लिखा कि मंत्री जी, एडवरटाइजमेंट कौंसिल कुछ नहीं करती। जब तक वह नोटिस करती है, जवाब आता है, तब तक विज्ञापन का एक साल का कोर्स ख़त्म हो जाता है। Some of the advertisements are very good. जो मुझे सबसे ज्यादा भाता है, वह एक फोन कंपनी का विज्ञापन है, जिसमें एक छोटा कुत्ता, एक छोटी लड़की के साथ होता है, यह हाइट ऑफ क्रिएटिविटी है। उसके साथ ही साथ कितने भद्दे विज्ञापन आते हैं, जो भारतीय महिलाओं के प्रति कितना बड़ा अन्याय है, मैं उनके लिए शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकता हूं। इन विज्ञापनों में कोई क्रिएटिविटी नहीं होती है। मंत्री जी आप जानती होंगी कि It is plain and simple commerce to promote good. इसलिए उसके बारे में जरूर विचार करना पड़ेगा।
उपसभाध्यक्ष जी, मुझे आपसे दो-तीन बातें और कहनी हैं। यह जो ऑब्सेनिटी की बात करते हैं, समय बदला है तो हमें समय के अनुसार बदलना पड़ेगा। जैसे इस देश में लगभग सिक्स्टी परसेंट से प्लस यूथ हैं। यूथ हैं तो उनके पांव थिरकेंगे और संसद में बैठ कर हम कभी यह न सोचें कि हम नौजवानों को उनके पांव थिरकने से रोकेंगे, लेकिन इससे बड़ा एक और विषय है कि यह देश क्या सोचता है।
मैं आपको एक उदाहरण देना चाहता हूं कि 1995-96 के दशक में हिंदी फिल्मों में डबल मीनिंग वाले गानों को लिखने का एक चलन हो गया था। वे गाने इतने फूहड़ हैं कि मैं उनको सदन के पटल पर रखने की हिम्मत नहीं कर सकता हूं। अच्छे-अच्छे गीतकार इंदीवर सरीखे गीतकार भी खटिया सरका रहे थे, ऐसे गाने लिख रहे थे। उसी समय जावेद अख्तर साहब ने 1942 ए लव स्टोरी में एक गाना लिखा, एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, जैसे खिलता गुलाब। It was the height of romantic creativity. वह गाना देश में लोकप्रिय हो गया। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि पूरे देश में लोग इसे गुनगुना रहे थे। मैं अपने मित्रों से कहूंगा कि यही हिंदुस्तान है। इस हिंदुस्तान के सही मर्म को समझना ज़रूरी है। मैं आजकल देखता हूं कि नये प्रोग्राम आते हैं, नये टीवी आते हैं, नया चैनल आता है तो कहते हैं कि आप हमारे यहां रामायण देखिए, दूसरा चैनल कहता है आप हमारे यहां कृष्ण देखिए, उनकी टीआरपी बढ़ती है। विज्ञापन भी मिलता है। एक चैनल अपने यहां मीराबाई को दिखाने की कोशिश कर रहा है, लोग देख रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में spiritual चैनल्स आये हैं, उनकी रेटिंग कितनी बढ़ी है। आज रामदेव बाबा योग दिखाते हैं, उनकी रेटिंग कितनी बढ़ी है। लेकिन होता क्या है कि टेलीविजन की पूरी डिबेट has gone haywire. आप कभी सार्थक चर्चा भी कीजिए, तो आप मीडिया के राइट को कंट्रोल कर रहे हैं, आप फ्रीडम ऑफ प्रैस को कंट्रोल कर रहे हैं। मेरे ख़याल से यह दृष्टिकोण ठीक नहीं है। मैं बहुत विनम्रता से अपने मीडिया के लोगों से कहना चाहूंगा कि हम उनके पूरे अधिकारों का सम्मान करते हैं, लेकिन जब हम संसद में बैठते हैं तो हमारी जवाबदेही देश के प्रति बनती है। हो सकता है कि आज मेरी कई टिप्पणियां तीखी लगी होंगी, हो सकता है कि शाम को कई चैनल्स पर मेरा चेहरा दिखाया जाएगा, लेकिन शायद मेरी जवाबदेही देश के प्रति भी बनती है और अगर हमारे मीडिया के मित्र, एंटरटेनमेंट के मित्र उस जवाबदेही को समझेंगे तो मैंने चिंतन के लिए जो बात
बलात्कारियों का बलात्कार क्यों ना हो . चलो बेशर्मी की हद पार की जाये

-अतिका अहमद फारुकी
मैं सुबह उठती हूं तो अमूमन अच्छी बातें सुनना और देखना पसंद करती हूं . खुदा को याद करने के बाद मैं हमेशा टीवी खोल देती हूं क्योंकि ऑफिस पहुंचने के बाद टीवी जर्नलिस्ट होने के बावजूद टीवी देखना नसीब नहीं हो पाता. एक बड़ा चैनल दृश्य दिखा रहा था. एक औरत के जिसको पटना की सड़कों पर खुलेआम इधर उधर से छुआ जा रहा था औऱ कई सारे लड़के उसे हर तरफ से घेर कर बेइज्जत कर रहे थे और कपड़े खींच रहे थे . मैंने देखा कि दूर खड़े लोग हंस रहे थे औऱ नामर्दों की तरह तमाशा देख रहे थे . देख कर आखे फंटी रह गई औऱ कुछ सेकंड में ही आंसूं फूंटने लगे . हैरत हुई ये देखकर कि अहम मर चुका है , खून ठंडा हो चुका है औऱ बुजदिली छा गई है . ऐसा लगा जैसे किसी ने जोर से मेरे मुंह पर तमाचा मारकर मेरी औकात बताई हो क्योंकि मैं भी एक लड़की हूं . देख कर बहुत तकलीफ हुई और चिंता हुई कि जब तक हमारी औलादें होंगी औऱ बड़ी होंगी तब तक कहीं इससे भी बदतर हालात ना हो जायें .
मुंबई में कई साल रहने के बाद जब मैं दिल्ली ट्रांसफर हुई तो काफी परेशान रहती थी, ना तो ड्राइवर , ना सड़क पर चलने वाला आम आदमी, ना थाने के बाहर बैठा सिपाही औरतों की इजज्त करता था . मैं समझती हूं कि यहां की लड़कियां घूरती आखों की आदि हो गई है. शाम हो जाये तो सड़क पर चलते हुये हाथ अपने आपसे इस तरह चिपक जाते हैं जैसे अपनी हिफाजत करना चाह रही हों पर मालूम हो कि कहीं ना कहीं से कोई ना कोई हाथ लगा ही जायेगा . ये बेबसी मुझे अच्छी नहीं लगती. खौफ से मुझे सख्त नफरत है. औरत की ऐसी बेइज्जती क्यों वो भी दुर्गा के देश में.
मैं अगर पत्रकार नहीं होती तो आइएएस में होती या पुलिस में होती . या फिर 1947 से पहले पैदा हुई होती तो हर हालत में क्रांतिकारी होती और अंग्रेजों की 2 – 3 गोलियां खा चुकी होती, पर समझ में नहीं आता कि साल 2009 में कैसे क्रांति लाउं . किसी भी समाज की सभ्यता का अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि वो अपनी औरतों से कैसा बरताव करता है . पटना जैसा शहर पुरानी संस्कृतियों में से एक है, और मेरा ससुराल भी है . मेरे पति सय्यद फैसल अली एक मशहूर वॉर जर्नलिस्ट हैं . जान की बाजी लगा कर अपनी गाड़ी में ईराक वॉर के दौरान मिड्ल ईस्ट के कई देश घूम चुके है. लेकिन मानते हैं कि औरते दुनिया के किसी भी कोने में सुरक्षित नहीं रह गई हैं. एक दिन मैंने नॉयडा की सड़कों का हाल बताया तो परेशान होकर कहने लगे कि तुम्हे एक लायसेंसी पिस्तौल खरीद दूं .. मैं हंसने लगी औऱ बोला अरे नहीं . पटना मे कहीं जाते वक्त एक पिस्तौलधारी सिपाही साथ होता है पर दिल्ली में क्यों ... कुछ घंटों तक इसी बात पर सोचने के बाद समझ में आया कि वो सही कह रहे थे. औऱतें दुनिया के किसी भी कोने में सुरक्षित नहीं. क्या करूं. किस किस को गोली मारूं, कैसे क्रांति लाउं.
आजकल रेप की खबर ऐसी आम हो गई है जैसे बढ़ती कीमतें. पहले बलत्कार औऱ रेप लफ्ज ही अजीब लगता था पर अब बेशर्मी से हरदम बोला जाता है . सोचिये जिस औऱत का बलात्कार होता होगा उसके आत्मसम्मान की क्या हालत होती होगी. क्या हमारे समाज में मर्दों की कमी हो गई है, जो सरे आम सिर्फ तमाशबीन ही दिख रहे हैं. ऐ खुदा अब ऐसे मर्द ईजाद कर जिनके सिर्फ नाम में ही नहीं , सोच में भी मर्दानगी हो औऱ वो रिएक्ट करने की जगह ऐक्ट करने की भी कैफियत रखते हों. वक्त के हाथों मुड़ना ही नहीं वक्त को मोड़ना भी जानते हों.
इन दृश्यों को मैंने उस दिन कई बार देखा और बार बार तकलीफ होती रही. अब से बाहर साल पहले लिखी वो कविता याद आ गई जो मैने एक फिल्म में ऐसा ही एक द्रश्य देखकर स्कूल में लिखी थी.
उस खुदा ने जहां बनाया
अरमानों से उसे सजाया
फिर नीचें इंसा को लाया
देख उन्हें फिर वो मुस्काया
आदम हउआ थे कहलाते
मर्द और औरत जाने जाते
खुले आसमां में थे गाते
हमें खुदा ने एख बनाया
दिन बीते औऱ गया वो कहना
हम तुम इक दूजे का गहना
औऱत को पर्दे में रहना
घर का मालिक मर्द कहलाया
ख्वाहिशे आसूं में बहतीं
फिर भी औऱत कुछ ना कहती
जंजीरों में कैद थी रहती
उन्हें पर अपना सरता़ज बताया
सदियां बींती वही नजारा
कोने में औरत का गुजारा
कायम है पर आदम का नारा
खुदा जंमीं का हमें बनाया
औरत बोली मुझे रोको मत
आगे बढ़ना है टोको मत
जहन्नुम में मुझे झोंको मत
सदियों तुमने मुझे रुलाया
मर्द बोला इतराती क्यों हो
हमसे कदम मिलाती क्यों हो़
हो ज़र्रा , ये भूल जाती क्यों हो
और फिर अपना जोर जताया
कब तक ये जंग जारी रहेगी
कब तक औऱत बेचारी रहेगी
आदंम से कब तक हारी रहेगी
औरत ने है ये सवाल उठाया
(लेखिका हिंदी न्यूज़ चैनल न्यूज़24 / E 24 में सीनियर क्रिएटिव प्रोड्यूसर और एंकर हैं और नई दिल्ली में रहती हैं)
फायदे में है जी न्यूज
खेल टीआरपी का
सप्ताह 29वां, 12 से 18 जुलाई 09 तक : इस हफ्ते कोई खास उतार-चढ़ाव नहीं है। सबसे ज्यादा जी न्यूज को फायदा हुआ है। उसने 1.3 अंक जोड़े हैं। पिछले हफ्ते इतने ही अंक कम हुए थे। मतलब, टैम वालों ने इस हफ्ते जी न्यूज का हिसाब बराबर कर दिया। टाप थ्री में इंडिया टीवी और स्टार न्यूज गिरे हैं तो आज तक ने मामूली बढ़त हासिल की है। समय ने न्यूज24 से अपना फासला और बढ़ा लिया है। समय को 0.7 का फायदा हुआ है तो न्यूज24 को 0.7 का नुकसान। तेज अब न्यूज24 के बराबर हो चला है।
इस हफ्ते की रेटिंग इस प्रकार है--
आज तक- 17.5 (चढ़ा 0.2), इंडिया टीवी- 15.7 (गिरा 0.6), स्टार न्यूज- 14.9 (गिरा 0.7), जी न्यूज- 10.9 (चढ़ा 1.3), एनडीटीवी इंडिया- 9.4 (गिरा 0.2), आईबीएन7- 8.5 (यथावत), समय- 5.9 (चढ़ा 0.7), न्यूज24 - 4.2 (गिरा 0.7), तेज- 4.2 (चढ़ा 0.3), डीडी न्यूज- 3.6 (चढ़ा 0.2), लाइव इंडिया- 1.9 (गिरा 0.4), इंडिया न्यूज- 1.6 (चढ़ा 0.21), सीएनईबी- 1 (गिरा 0.2), पी7न्यूज- 0.5 (यथावत), जन संदेश- 0.3 (यथावत)
स्रोत : टैम, समयावधि : सप्ताह 29वां, 12 से 18 जुलाई 09 तक,
मार्केट- एचएसएम, टीजी- सीएस-15+
सप्ताह 29वां, 12 से 18 जुलाई 09 तक : इस हफ्ते कोई खास उतार-चढ़ाव नहीं है। सबसे ज्यादा जी न्यूज को फायदा हुआ है। उसने 1.3 अंक जोड़े हैं। पिछले हफ्ते इतने ही अंक कम हुए थे। मतलब, टैम वालों ने इस हफ्ते जी न्यूज का हिसाब बराबर कर दिया। टाप थ्री में इंडिया टीवी और स्टार न्यूज गिरे हैं तो आज तक ने मामूली बढ़त हासिल की है। समय ने न्यूज24 से अपना फासला और बढ़ा लिया है। समय को 0.7 का फायदा हुआ है तो न्यूज24 को 0.7 का नुकसान। तेज अब न्यूज24 के बराबर हो चला है।
इस हफ्ते की रेटिंग इस प्रकार है--
आज तक- 17.5 (चढ़ा 0.2), इंडिया टीवी- 15.7 (गिरा 0.6), स्टार न्यूज- 14.9 (गिरा 0.7), जी न्यूज- 10.9 (चढ़ा 1.3), एनडीटीवी इंडिया- 9.4 (गिरा 0.2), आईबीएन7- 8.5 (यथावत), समय- 5.9 (चढ़ा 0.7), न्यूज24 - 4.2 (गिरा 0.7), तेज- 4.2 (चढ़ा 0.3), डीडी न्यूज- 3.6 (चढ़ा 0.2), लाइव इंडिया- 1.9 (गिरा 0.4), इंडिया न्यूज- 1.6 (चढ़ा 0.21), सीएनईबी- 1 (गिरा 0.2), पी7न्यूज- 0.5 (यथावत), जन संदेश- 0.3 (यथावत)
स्रोत : टैम, समयावधि : सप्ताह 29वां, 12 से 18 जुलाई 09 तक,
मार्केट- एचएसएम, टीजी- सीएस-15+
हरिंदर बवेजा के केसीके अवार्ड

पत्रकारिता के क्षेत्र में टीम भावना और उत्कृष्ट कार्य को बढ़ावा देने के लिए पत्रिका समूह का प्रतिष्ठित कर्पूरचन्द्र कुलिश (केसीके) इंटरनेशनल अवार्ड फोर एक्सीलेंस इन प्रिंट जर्नलिज्म इस बार वरिष्ठ पत्रकार हरिन्दर बवेजा और उनकी टीम को प्रदान किया जाएगा। "पत्रिका" के संस्थापक कर्पूरचन्द्र कुलिश की स्मृति में पिछले वर्ष शुरू किए गए इस अवार्ड का द्वितीय पुरस्कार समारोह 31 जुलाई को नई दिल्ली के होटल ताज पैलेस में होगा। पुरस्कार के तहत 11 हजार अमरीकी डॉलर और ट्रॉफी प्रदान की जाएगी। समारोह में लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार मुख्य अतिथि होंगी, अध्यक्षता राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत करेंगे।
पिछले साल हिन्दुस्तान टाइम्स पाकिस्तान के समाचार पत्र डॉन के साथ इस पुरस्कार का संयुक्त विजेता बना। इसके अलावा पत्रिका समूह पिछले एक दशक से सामाजिक क्षेत्र से जुड़े श्रेष्ठ विज्ञापनों के लिए देश का बहुप्रतिष्ठित कन्सन्र्ड कम्युनिकेटर पुरस्कार भी प्रदान कर रहा है। यह अवार्ड राशि भी अब 11000 अमरीकी डॉलर है। इस बार केसीके पुरस्कार की थीम "आतंक एवं समाज" रखी गई। इसके लिए 1 जनवरी से 31 दिसम्बर 2008 तक प्रकाशित खबरों को पुरस्कार चयन में शामिल किया गया। केसीके पुरस्कार के लिए "वेलकम टू द हेडक्वार्टर्स ऑफ लश्कर-ए-तोएबा" शीर्षक वाली न्यूज सीरिज को चुना गया है। ये खबरें तहलका मैग्जीन की वरिष्ठ पत्रकार हरिन्दर बवेजा एवं उनके सहयोगियों ने लिखी थीं। इनका प्रकाशन हिन्दुस्तान टाइम्स में दिसम्बर 2008 में हुआ। इस एक्सक्लूजिव सीरिज के जरिए पाकिस्तान में लश्कर-ए-तोएबा मुख्यालय की गतिविघियों एवं इसकी विचारधारा से वहां के लोगों के जुड़ाव तथा मुम्बई आतंककारी हमले के एकमात्र जीवित आरोपी कसाब के इस संगठन से सम्बंधो का खुलासा किया गया। किसी भारतीय पत्रकार को पहली बार लश्कर-ए-तोएबा मुख्यालय के भीतर जाने की अनुमति मिली थी। इस बार अमरीका, फ्रांस, सर्बिया, मॉरिशस, मिश्र, श्रीलंका, अफगानिस्तान और पाकिस्तान समेत दुनिया भर के मीडिया संस्थानों से 173 प्रविष्ठियां प्राप्त हुईं। इनमें देश के 48 समाचार पत्रों से 145 एवं अन्तरराष्ट्रीय मीडिया के 11 समाचार पत्रों से 28 प्रविष्ठियां आईं।
विजेता का चयन चार सदस्यीय चयन मण्डल की राय के आधार पर किया गया। चयन मण्डल में द हिन्दू के एडीटर इन चीफ एन. राम, आईआईएम इंदौर के निदेशक एन. रविचन्द्रन, प्रमुख समाजसेवी मेग्सेसे पुरस्कार विजेता अरूणा रॉय और पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी शामिल हैं। विजेता के अलावा दस श्रेष्ठ प्रविष्टियों को मेरिट पुरस्कार के लिए चुना गया है। इनमें हिन्दुस्तान टाइम्स, नई दिल्ली की रिपोर्ट "इण्डियाज पोरस बोर्डर्स", हिन्दुस्तान, लखनऊ की "इस आतंकवादी की खता क्या थी", अमर उजाला, वाराणासी की " अब शुरू हुआ ऑपरेशन आजमगढ़", दैनिक जागरण, नई दिल्ली की "आतंक का अर्थशास्त्र", न्यूयॉर्क टाइम्स, अमरीका की वायलेंस इन इण्डिया, इण्डियन एक्सप्रेस, चण्डीगढ़ की "मुम्बईज टेरर मेक्स मोहाली ब्लीड", द ट्रिब्यून, चण्डीगढ़ की " आजमगढ़: डिस्ट्रिक्ट इन डिस्कम्फर्ट", हिन्दुस्तान टाइम्स, नई दिल्ली/कोलकाता की "ही लव्ड हॉलीवुड कॉप वर्सेज बडीज मूवीज", द ट्रिब्यून की "लंच ऑवर्स, इवनिंग आर चूजन फॉर टेरर स्ट्राइक्स" और डेली मिरर, श्रीलंका की "वाट ब्रांचेज ग्रो इन दिस स्टोनी रबिश" खबरों को चुना गया है।
साभार : पत्रिका डाट
Saturday, July 25, 2009
प्रिंटिंग टेक्नालाजी पर 315 करोड़ रुपये निवेश कर रहा दैनिक भास्कर

देश के भीमकाय मीडिया हाउसों में से एक भास्कर समूह टेक्नालाजी के मामले में खुद को बड़े पैमाने पर अपग्रेड करने की योजना बना चुका है। खासकर प्रिंटिंग टेक्नालजी के मामले में वह भाषाई अखबारों में नंबर वन बनना चाहता है। इसके लिए पूरे 315 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। भास्कर ग्रुप के निदेशकों में से एक गिरीश अग्रवाल ने एक लिखित वक्तव्य जारी कर समूह की इस योजना का खुलासा किया है। सूत्रों का कहना है कि 315 करोड़ रुपये में से करीब दो तिहाई हिस्सा केबीए (Koenig & Bauer AG) प्रिंटिंग मशीनों की खरीद में व्यय होगा। हर घंटे अखबार की 85 हजार कापियां छापने वाली यह मशीन जर्मनी में निर्मित हैं। यह मशीन भास्कर समूह जयपुर में लगा चुका है और अब अहमदाबाद में लगाने की तैयारी है।
केबीए मशीनों की कीमत करीब 70 करोड़ रुपये है। इस मशीन की कई खासियत है। एक तो यह परंपरागत मशीनों से करीब 60 फीसदी ज्यादा रफ्तार से प्रिंटिंग करती है। नंबर दो- परंपरागत मशीनों की तुलना में करीब 80 फीसदी कम जगह में इसकी स्थापना हो जाती है। रद्दी निर्माण कार्य परंपरागत मशीनों की तुलना में 10 फीसदी कम करती है। और सबसे बड़ी बात कि बिजली व्यय में 58 फीसदी की बचत करती है। यह मशीन पैकिंग, फोल्डिंग व इनसर्ट करने के काम को भी बखूबी अंजाम देती है। इस काम को अभी तक बड़े-बड़े मीडिया हाउस मैनुवली कराते हैं लेकिन केबीए मशीनों में यह सुविधा आटोमेटेड है। केबीए मशीन करीब 64 पेज के टैबलायड अखबार को छापने की कूव्वत रखती है।
गिरीश अग्रवाल ने अपने वक्तव्य में कहा है कि भास्कर समूह हमेशा से इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रौद्योगिकी में निवेश करने में यकीन रखता रहा है और यह भास्कर समूह के बिजनेस का अभिन्न अंग है। भास्कर समूह अपने पाठकों और विज्ञापनदाताओं को सर्वोत्तम देना चाहता है, इसीलिए उन्नत प्रौद्योगिकी को हमेशा वरीयता दी जाती है। ज्ञात हो कि भास्कर समूह के चीफ टेक्नालाजी आफिसर आरडी भटनागर हैं और उन्हीं की देखरेख में भास्कर समूह प्रिंटिंग टेक्नालजी को अपग्रेड कर रहा है। अपग्रेडेशन का काम अक्टूबर महीने तक पूरा होने के आसार हैं। सूत्रों का कहना है कि भास्कर समूह केबीए मशीनों के अलावा कई अन्य प्रतिष्ठित निर्माताओं की मशीनों को भी खरीद रहा है। इन मशीनों को भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन, इंदौर, रायपुर आदि बड़े केंद्रों पर स्थापित किया जाएगा।
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