पुण्यप्रसून वाजपेयी की किताब एंकर रिर्पोटर
जब कोई व्यक्ति टेलीविजन के परदे पर समाचार देख रहा होता है तो उसके जेहन में दो व्यक्ति अहम हो जाते हैं- एंकर और रिपोर्टर। एंकर टेलीविजन के परदे पर पहले-पहल किसी खबर की सूचना देता है। उसके बारे में बताता है। रिपोर्टर वह होता है जो घटनास्थल से यह बता रहा होता है कि घटनाक्रम किस प्रकार हुआ। वास्तव में किसी महत्वपूर्ण खबर के दौरान दर्शकों के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं होता कि वे कौन-सा चैनल देख रहे हैं। वह महत्वपूर्ण खबर जिस भी चैनल पर आ रही होती है, दर्शकों का रिमोट उसी चैनल पर ठहर जाता है। ऐसे में किसी भी समाचार चैनल के लिए एंकर और रिपोर्टर बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि दर्शकों को चैनल से जो़ड़ने का काम वही करते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने इन्हीं पहलुओं को विभिन्न कोणों से प्रस्तुत किया है अपनी पुस्तक 'एंकर-रिपोर्टर' में। यह पुस्तक टीवी पत्रकारिता सीखने वालों के लिए तो उपयोगी है ही, उनके लिए भी ब़ड़े काम की है, जो इन पेशों की चुनौतियों को जानना-समझना चाहते हैं। यह एक 'इनसाइडर' की 'इनसाइड स्टोरी' की तरह है। पुस्तक का राजकमल प्रकाशन, दिल्ली ने किया है। पेश हैं पुस्तक से कुछ अंश।
टेलीविजन पत्रकारिता में एंकरिंग की भूमिका को समझने की जरूरत है। सफल एंकर वही हो सकता है जो देश, समाज के सभी पहलुओं को न केवल जानता-समझता हो, बल्कि अवसरानुकूल उन पर टिप्पणी करने की क्षमता भी रखता हो।
आज के दौर में एंकरिंग पर तकनीक का प्रभाव बढ़ रहा है। इसका कारण है कि आज तकनीकी रूप से जानकार लोग तो खूब आ रहे हैं, लेकिन विषय को समझने, उसकी गहराई में जाने में उनकी दिलचस्पी नहीं है। आज काम के प्रति समर्पण तो बढ़ा है, लेकिन यह भी सचाई है कि एक प्रकार का पेशेवर भाव भी उनमें बढ़ा है। यानी जब तक काम करना है, तब तक चुस्त-चौकन्ने रहना है और उसके बाद तैयारी का काम डेस्क पर छो़ड़ दिया। याद रखिए एंकर में समाज अक्सर अपने प्रतिनिधि की तलाश करता रहता है। लेकिन इस तरह के पेशेवर एप्रोच से वह चैनल का प्रतिनिधि अधिक लगने लगता है। समाज की कोई छवि उसमें नहीं दिखाई देती।
तकनीकी जानकारी हर एंकर को जरूर होनी चाहिए। उसको ओबी वैन की संभावनाओं-सीमाओं की पूरी तौर पर जानकारी होनी चाहिए। उसको कैमरे से जु़ड़े़ पहलुओं की जानकारी होनी चाहिए। उसे साउंड की जानकारी होनी चाहिए। लाइट की जानकारी होनी चाहिए। लेकिन ये जानकारियां उसके लिए अतिरिक्त जानकारी भर ही हैं या हो सकती हैं। इसका कारण यह है कि इन सब पहलुओं के विशेषज्ञ आपके साथ होते हैं, जो आपसे बेहतर इन सब चीजों को जान-समझ रहे होते हैं।
जब दिल्ली के पहा़ड़गंज में विस्फोट हुए थे तो उसके तीन दिन बाद की बात है। दीपावली का दिन था। रात के 10 बजे से बुलेटिन पढ़ने के लिए मुझे बुलाया गया था। यों ही मेरे जेहन में खयाल आया कि आज पहा़ड़गंज से एंकरिंग करूंगा। कैमरामैन को बुलाया। उससे बात की। उसने कहा कि ओबी वैन तो ले चलते हैं, लेकिन वहां पतली-पतली गलियां हैं। प्रोड्यूसर ने कहा, मान लीजिए कुछ फेल हो गया तो। उस दिन संयोग से कोई वैकल्पिक एंकर नहीं था। इसलिए इस बात का भी डर था। लेकिन मैंने कहा कि ओबी वैन है तो सिस्टम फेल होने का सवाल नहीं उठता। अगर ऐसा हुआ तो 10 मिनट के लिए कुछ रिकार्डिंग चला दी जाएगी और इसी बीच मैं ऑफिस आ जाऊंगा। पहा़ड़गंज पास में ही है।
10 बजे जैसे ही मेरे कान में कैमरे के रोल-इन की आवाज आई, उसी के साथ पीछे से मेरे कान में फायर ब्रिगेड की आवाज आने लगी। अब कैमरे से उस माहौल की झूलती-भागती तस्वीरें स्क्रीन पर आ रही थीं और फायर ब्रिगेड की आवाज भी। शुरू के दो से तीन मिनट तक स्क्रीन पर कोई एंकर नहीं था। यही दृश्य चल रहा था और पीछे से मेरी कॉमेंट्री चल रही थी कि पहा़ड़गंज में आग लग गई है। इससे कुल मिलाकर एक ऐसा दृश्य बन रहा था कि जिसने भी 'आजतक' को ट्यून-इन किया, वह वहीं पर टिका रह गया। इस भौचक्केपन को समझने और उसे खबरों से जो़ड़ पाने का नतीजा यह रहा कि इससे खबरों में एक ऐसा पहलू जु़ड़ गया जिसने उस दिन के उस प्रोग्राम की टीआरपी बढ़ा दी।
इसलिए एंकर होने के लिए जो बात समझने की है, वह यही है कि खबरों और उसके पहलुओं को समझना और उसके अनुसार तत्काल कार्रवाई करना। अगर आप समाचार चैनल में एंकरिंग कर रहे हैं या करने की तैयारी कर रहे हैं तो मानकर चलिए कि आप इस तरह की स्थितियों से बच नहीं सकते। इसलिए आजकल के युवाओं को जिस तरह से तकनीकी पहलुओं की समझ होती है, उसी तरह से वे अगर समाचार और उसकी बारीकियों को भी समझ लें तो सचमुच समाचार प्रसारण में काफी बदलाव आ सकता है। उसमें काफी सुधार हो सकता है। इससे टीम वर्क को बढ़ावा मिलता है।
अब बात यह आती है कि हमारे नए लोग फील्ड में एंकरिंग करने, विपरीत परिस्थितियों को अनुकूल बना पाने में सक्षम हैं या नहीं। वैसे यहां सवाल सक्षम होने का नहीं है। यहां दबाव इस रूप में रहता है कि इस दिशा में जाना ही प़ड़ेगा, क्योंकि हमारे यहां का समाज बैलेंस नहीं है। हमारे राजनेता व्यवस्थित नहीं हैं।
योरोप की तरह ऐसा नहीं है कि वे एक खास जगह आकर अपना बयान देंगे। वे कहीं से कुछ भी बोल देंगे और वह देश की एक ब़ड़ी खबर बन जाएगी। हमारे नीति-निर्धारक भी जब इस रूप में आगे चलते हैं कि किसी को खबर दे देते हैं। कभी-कभी तो बोलते समय उनको भी इसका अंदाजा नहीं रहता कि खबर इतनी ब़ड़ी हो जाएगी या कि इस तरह से भी इस खबर को व्याख्यायित किया जा सकता है। ऐसे में एंकर-रिपोर्टर के रूप में आपको ही उस खबर का महत्व समझना होगा और उसके अनुरूप तत्काल निर्णय लेना होगा। अब अगर आप इस आकलन को नहीं कर पाते तो यह पत्रकारिता के लिहाज से कमी ही मानी जाएगी।
एंकर को इस बात को समझना होगा कि जिस समाज में, जिस देश में वह काम कर रहा है वह एक 'असंतुलित' समाज है। इसलिए उसमें हमेशा कुछ न कुछ अप्रत्याशित-असंभावित की संभावना मौजूद होती है। इसलिए एक एंकर के रूप में उन संभावनाओं पर नजर रखने, उनको तलाशने, उनकी खोज में जाने की बात न भी हो तो जब ऐसा मौका उपस्थित हो जाए तो तत्काल उसे समझ लेने की क्षमता का विकास करना ब़ड़ा जरूरी होता है।
समझने की बात है कि एंकर भी उसी समाज का हिस्सा होता है। वह भी उसी द्वंद्व, उसी असंतुलन को देख-समझ रहा होता है। इसलिए यह पहलू अगर उसके काम में भी दिखाई देने लगता है तो वह कुछ अधिक सहज दिखाई देने लगता है। बने-बनाए तरीके से, पूर्व तैयारी के आधार पर जो एंकरिंग की जाती है वह रोबोटिक लगती है। उसमें न तो प्रयोग की कोई संभावना होती है, न ही उसकी कोई खास गुंजाइश होती है। सब कुछ ढर्रे के मुताबिक लगने लगता है। इस तरह की एकरसता से निकलने की राह भी एंकर को ही तलाश करनी प़ड़ती है। प्रयोग करने ही प़ड़ेंगे। यह माध्यम संभावनाओं से आगे जाने का माध्यम है। इसलिए इसकी सीमाओं से भी आगे जाने की कोशिश की जानी चाहिए।
हमारे यहां टीवी अभी पूरी तौर पर प्रोफेशनल नहीं हुआ है। वह सीख रहा है। कहना चाहिए कि वह प्रोफेशनल होने की प्रक्रिया में है। अगर हम यह मान लें कि टेलीविजन वही होता है, जो दिखाई दे रहा होता है तो इसमें यह देखने की आवश्यकता है कि इससे सीधे तौर पर जु़ड़े हुए जो लोग हैं वे मैच्योर हैं कि नहीं।
सीधे तौर पर दिखाई देने वाली चीजें क्या होती हैं। सबसे पहले तो एंकर होता है। वह हमेशा दिखाई देता है। उसके बाद रिपोर्टर दिखाई देता है। इन दो से आप जैसी ही हटिएगा, आपको ग्राफिक्स दिखाई देने लगते हैं। इसके अलावा, 'सुपर्स' दिखाई देते हैं- सुपर्स यानी टीवी स्क्रीन पर नीचे पंक्ति के रूप में चलने वाली खबरें। हमारे टीवी में जो लोग सुपर लिखते हैं, वे सीनियर पत्रकार नहीं होते हैं। वहां गलतियां दिखाई देने लगती हैं। इनको प्रशिक्षण देने की दिशा में कुछ नहीं होता। एंकर्स, रिपोर्टर्स के स्तर पर इनमें किसी का भी प्रशिक्षण नहीं होता।
ऐसे में होता यह है कि इन चारों ऊपर से बताए गए हिस्सों में वह हिस्सा हमेशा भारी हो जाएगा जिस हिस्से के लोग चैनल में सीनियर स्तर पर अधिक होंगे। ऐसे वरिष्ठ लोग हमारे यहां बहुत कम हैं, जो स्क्रीन पर भी आते हों, कामकाज भी संभालते हों और जो सीनियर भी हों। जो ऐसे हैं, उनको आप देखिएगा कि वे ही थो़ड़े-बहुत प्रयोग कर भी रहे हैं। अन्यथा प्रयोग न के बराबर हो रहे हैं।
रिपोर्टिंग में भी यही है। मान लीजिए कि एक तबका ऐसा है, जो सीनियर भी है तो क्या वह टेलीविजन पत्रकारिता सीख रहा है या उसके मन में अभी भी प्रिंट बसा हुआ है। इसका कारण यह है कि समझने की जरूरत है, यह फर्क बहुत ज्यादा है। प्रिंट में जो बात आपकी खबर के आखिरी पैरे में आ रही होगी, वह यहां पहले पैरे में लानी होगी, पहले पैरे क्या, हो सकता है पहली पंक्ति में।
अब मान लीजिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के भारतीय दौरे को लेकर किसी अखबार में आप खबर लिखते हैं और उसके विरोध के बारे में लिखते हुए आखिर में आप यह कहते हैं कि अलग-अलग प्रांतों से आए हुए लोग लाल किले में भरे हुए थे और उसमें पहली बार यह नजर आया कि वामपंथी काडर समूचे देश में अब भी मौजूद है, क्योंकि समूचे देश से लोग विरोध करने पहुंचे थे।
हाथों में लाल झंडा लिए हुए थे। हाथों में तख्तियां थीं। नारे लगा रहे थे और इनके जेहन में हो सकता है कि पश्चिम बंगाल का चुनाव हो। आप चाहकर भी इस मोटी बात को टीवी में छो़ड़ नहीं सकते हैं, क्योंकि उसमें आपका कैमरा शुरू यहीं से होता है, जब आपका कैमरा शुरू होगा तो आप कौन-सा शॉट पहला लेंगे।
आप शुरू ही इससे करेंगे कि देशभर का वामपंथी काडर आज बुश का विरोध करने लाल झंडे लिए लाल किले के मैदान में इकट्ठा हुआ। उसे इस बात का आक्रोश था कि सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए रेड कार्पेट क्यों बिछा दिया है। लेकिन ऐसी खबरों को लेकर एंकर की भूमिका काफी ब़ड़ी हो जाती है। उसे पता होना चाहिए कि जब खबर का पैकेज पूरा होगा तो क्या-क्या विजुअल होंगे?
अगर ऐसा नहीं है तो एंकर महज सपाटबयानी कर देगा या विवेक-प्रदर्शन को लेकर समूची जानकारी अपने 'वक्तव्य' में दे देगा। जबकि एंकर की भूमिका को लेकर उसकी टिप्पणी करते हुए आगे की खबर को लेकर रोचकता जगाती है। साथ ही समूची जानकारी भी नहीं देनी है। तो वह कह सकता है कि 'मनमोहन सरकार गठबंधन की सरकार है। ऐसे में रेड कार्पेट और लाल झंडे का फर्क मिटता रहा है। लेकिन लाल झंडा कहीं रेड कार्पेट के नीचे खो ना जाए, इसलिए दिल्ली में ही रेड कार्पेट कहीं और बिछी और लाल झंडा कहीं और नजर आया।'
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ,भोपाल के जनसंचार विभाग के छात्रों द्वारा संचालित ब्लॉग ..ब्लाग पर व्यक्त विचार लेखकों के हैं। ब्लाग संचालकों की सहमति जरूरी नहीं। हम विचार स्वातंत्र्य का सम्मान करते हैं।
Friday, October 16, 2009
अमेरिकी पत्रकार पाक में ब्लैक लिस्टेड
इस्लामाबाद। पाकिस्तान ने कई अमेरिकी पत्रकारों और स्वयंसेवी संस्थाओं (एनजीओ) को काली सूची में डालकर उन्हें देश में प्रवेश से प्रतिबंधित कर दिया है। पाक का आरोप है कि ये राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल हैं।यह खुलासा अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत हुसैन हक्कानी की एक चिट्ठी सेहुआ है। हक्कानी ने यह चिट्ठी पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख अहमद शुजा पाशा को भेजी है। 28 जुलाई, 2009 को लिखी गई इस चिट्ठी मेंकहा गया है कि सरकार के इस कदम से पाकिस्तान की छवि खराब हो रही है।
हक्कानी ने यह भी कहा है कि अमेरिकी पत्रकारों व एनजीओ को वीजा न देने, उन्हें परेशान करने या धमकाने पर अमेरिका की संसद पाकिस्तान से जवाब-तलब कर सकती है। उस पर आर्थिक और सैन्य पाबंदियां भी लगाई जा सकती हैं। हक्कानी ने इस मामले में आईएसआई प्रमुख से सफाई मांगी है।सार्वजनिक हो चुकी इस चिट्ठीमें अमेरिकी संस्थाओं या पत्रकारों को वीजा न देने, उन्हें परेशान करने या उन पर नजर रखने के कुछ मामलों का भी उल्लेख किया गया है। हक्कानी ने शुजा पाशा से प्रतिबंधित संस्थाओं और पत्रकारों की सूची पेश करने को भी कहा है।
हक्कानी ने यह भी कहा है कि अमेरिकी पत्रकारों व एनजीओ को वीजा न देने, उन्हें परेशान करने या धमकाने पर अमेरिका की संसद पाकिस्तान से जवाब-तलब कर सकती है। उस पर आर्थिक और सैन्य पाबंदियां भी लगाई जा सकती हैं। हक्कानी ने इस मामले में आईएसआई प्रमुख से सफाई मांगी है।सार्वजनिक हो चुकी इस चिट्ठीमें अमेरिकी संस्थाओं या पत्रकारों को वीजा न देने, उन्हें परेशान करने या उन पर नजर रखने के कुछ मामलों का भी उल्लेख किया गया है। हक्कानी ने शुजा पाशा से प्रतिबंधित संस्थाओं और पत्रकारों की सूची पेश करने को भी कहा है।
इलेक्ट्रानिक मीडिया को धंधेबाजों से बचाइए

संजय द्विवेदी
मीडिया में आकर, कुछ पैसे लगाकर अपना रूतबा जमाने का शौक काफी पुराना है किंतु पिछले कुछ समय से टीवी चैनल खोलने का चलन जिस तरह चला है उसने एक अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है। हर वह आदमी जिसके पास नाजायज तरीके से कुछ पैसे आ गए हैं वह टीवी चैनल खोलने या किसी बड़े टीवी चैनल की फ्रेंचाइजी लेने को आतुर है। पिछले कुछ महीनों में इन शौकीनों के चैनलों की जैसी गति हुयी है और उसके कर्मचारी- पत्रकार जैसी यातना भोगने को विवश हुए हैं, उससे सरकार ही नहीं सारा मीडिया जगत हैरत में है। एक टीवी चैनल में लगने वाली पूंजी और ताकत साधारण नहीं होती किंतु मीडिया में घुसने के आतुर नए सेठ कुछ भी करने को आमादा दिखते हैं।
अब इनकी हरकतों की पोल एक-एक कर खुल रही है। रंगीन चैनलों की काली कथाएं और करतूतें लोगों के सामने हैं, उनके कर्मचारी सड़क पर हैं। भारतीय टेलीविजन बाजार का यह अचानक उठाव कई तरह की चिंताएं साथ लिए आया है। जिसमें मीडिया की प्रामणिकता, विश्वसनीयता की चिंताएं तो हैं ही साथ ही उन पत्रकारों का जीवन भी एक अहम मुद्दा है जो अपना कैरियर इन नए-नवेले चैनलों के लिए दांव पर लगा देते हैं। चैनलों की बाढ़ ने न सिर्फ उनकी साख गिरायी है वरन मीडिया के क्षेत्र को एक अराजक कुरूक्षेत्र में बदल दिया है। ऐसे समय में केंद्र सरकार की यह चिंता बहुत स्वाभाविक है कि कैसे इस क्षेत्र में मचे धमाल को रोका जाए। दिसंबर,2008 तक देश में कुल 417 चैनल थे जिसमें 197 न्यूज चैनल काम कर रहे थे। सितंबर,2009 तक सरकार 498 चैनलों के लिए अनुमति दे चुकी है और 150 चैनलों के नए आवेदन विचाराधीन हैं। टीवी मीडिया के क्षेत्र में जाहिर तौर पर यह एक बड़ी छलांग है। कितु क्या इस देश को इतने सेटलाइट चैनलों की जरूरत है। क्या ये सिर्फ धाक बनाने और निहित स्वार्थों के चलते खड़ी हो रही भीड़ नहीं है। जिसका पत्रकार नाम के प्राणी के जीवन और पत्रकारिता के मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है। जिस दौर में दिल्ली जैसी जगह में हजारों पत्रकार अकारण बेरोजगार बना दिए गए हों और तमाम चैनलों में लोग अपनी तनख्वाह का इंतजार कर रहे हों इस अराजकता पर रोक लगनी ही चाहिए।
यह बहुत बेहतर है कि सरकार इस दिशा में कुछ नियमन करने के लिए सोच रही है। चैनल अनुमति नीति में बदलाव बहुत जरूरी हैं। यह सामयिक है कि सरकार अपने अनुमति देने के नियमों की समीक्षा करे और कड़े नियम बनाए जिसमें कर्मचारी का हित प्रधान हो। ताकि लूट-खसोट के इरादे से आ रहे चैनलों को हतोत्साहित किया जा सके। सरकार ने ट्राइ को लिखा है कि वह उसे इसके लिए सुझाव दे कि और कितने चैनलों की गुंजाइश इस देश में है और चैनलों की बढ़ती संख्या पर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है। अपने पत्र में मंत्रालय की चिंता वास्तव में देश की भी चिंता है। पत्र में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि नए चैनल शुरू करने वालों में बिल्डर,ठेकेदार, शिक्षा क्षेत्र में व्यापार करने वाले, स्टील व्यापारी समेत तमाम ऐसे लोग हैं जिनका मीडिया उद्योग से कोई लेना देना या पूर्व अनुभव नहीं है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को यह भी शिकायत मिली है चैनल शुरू करवाने को लेकर दलाली का एक पूरा कारोबार जोर पकड़ चुका है। उल्लेखनीय है कि चैनल शुरू करने के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय के अलावा गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, वित्त मंत्रालय की अनुमति भी लेनी होती है।
हालांकि कुछ आलोचक यह कह कर इन कदमों की आलोचना कर सकते हैं कि यह कदम लोकतंत्र विरोधी होगा कि नए चैनल आने में अड़चनें लगाई जाएं। किंतु जिस तरह के हालात हैं और पत्रकारों व कर्मियों को मुसीबतों का सामना करना पड़ा रहा है उसमें नियमन जरूरी है। चैनल का लाइसेंस पाकर कभी भी चैनल पर ताला डालने का प्रवृत्ति से आम पत्रकारों को गहरा झटका लगता है। उनके परिवार सड़क पर आ जाते हैं। नौकरियों को लेकर कोई सुरक्षा न होना और पत्रकारों से अपने संपर्कों के आधार पर पैसै या व्यावसायिक मदद लेने की प्रवृत्ति भी उफान पर है। चैनल खोलने के शौकीनों से सरकार को यह जानने का हक है कि आखिर वे ऐसा क्या प्रमाण दे रहे हैं कि जिसके आधार पर यह माना जा सके कि आपके पास तीन या पांच साल तक चैनल चलाने की पूंजी मौजूद है। वित्तीय क्षमता के अभाव या मीडिया के दुरूपयोग से पैसे कमाने की रूचि से आने वालों को निश्चित ही रोका जाना चाहिए। चैनल में नियुक्त कर्मियों के रोजगार गारंटी के लिए कड़े नियमों के आघार पर ही नए नियोक्ताओं को इस क्षेत्र में आने की अनुमति मिलनी चाहिए। मीडिया जिस तरह के उद्योग में बदल रहा है उसे नियमों से बांधे बिना कर्मियों के हितों की रक्षा असंभव है। पैसे लेकर खबरें छापने या दिखाने के कलंकों के बाद अब मीडिया को और छूट नहीं मिलनी चाहिए। क्योंकि हर तरह की छूट दरअसल पत्रकारिता या मीडिया के लिए नहीं होती, ना ही वह उसके कर्मचारियों के लिए होती है, यह सारी छूट होती है मालिकों के लिए। सो नियम ऐसे हों जिससे मीडिया कर्मी निर्भय होकर, प्रतिबद्धता के साथ अपना काम कर सकें। केंद्र सरकार अगर चैनलों की भीड़ रोकने और उन्हें नियमों में बांधने के लिए आगे आ रही है तो उसका स्वागत होना चाहिए। ध्यान रहे यह मामला सेंसरशिप का नहीं हैं। पत्रकारों के कल्याण, उनके जीवन से भी जुड़ा है, सो इस मुद्दे पर एलर्जिक होना ठीक नहीं है।
( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग
Wednesday, September 9, 2009
आनेवाला समय एनीमेशन काः ईशान

जनसंचार विभाग में आयोजित एड-फिल्म मेकिंग, एनीमेशन पर केंद्रित कार्यशाला का समापन
युवा एड फिल्म निर्माता एवं मीडियाफ्रीक्स कंपनी के कम्प्यूटर ग्राफिक्स जर्नलिस्ट ईशान शुक्ला (सिंगापुर) का कहना है कि फिल्मों और विज्ञापनों में लगातार एनीमेशन का प्रयोग बढ़ रहा है। एनीमेशन आज ज्यादा प्रभावी हो रहे हैं और वे किसी भी संदेश को व्यक्त करने में समर्थ हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग द्वारा आयोजित विज्ञापन फिल्मों और उसमें एनीमेशन के प्रयोगों पर केंद्रित तीन दिवसीय कार्यशाला के समापन समारोह में उन्होंने ये बातें कहीं।
उन्होंने कहा कि आनेवाला समय एनीमेशन फिल्मों का ही है। एनीमेशन प्रस्तुति को थ्री डी (3 D) के माध्यम से ज्यादा प्रभावी और वास्तविक बनाया जा सकता है। स्पेशल इफेक्ट्स भी एनीमेशन के द्वारा सरलतापूर्वक दिखाए जा सकते हैं। ईशान का कहना था कि आनेवाला समय एनीमेशन फिल्मों का ही है जिसमें युवा बड़ी संख्या में रोजगार पा सकते हैं। उन्होंने कहा कि तकनीक की लाख प्रगति के बावजूद क्रिएटिविटी और आइडियाज की अपनी जगह बनी ही रहेगी। तीन दिन चली कार्यशाला में दुनिया की तमाम पुरस्कृत एड फिल्मों के प्रदर्शन के माध्यम से विद्यार्थियों को इसकी तकनीक, प्रयोगों और लाभ से परिचित कराया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कम्प्युटर विभाग के अध्यक्ष प्रो. चैतन्य पुरूषोत्तम अग्रवाल ने की। कार्यक्रम के प्रारंभ में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने अतिथियों का स्वागत किया। इस मौके पर छात्रों की ओर से मृणाल झा, एनी अंकिता, नितिशा कश्यप और साकेत नारायण ने कार्यशाला को लेकर अपने अनुभव बताए। आभार प्रदर्शन विश्वविद्यालय के प्लेसमेंट आफीसर डा. अविनाश वाजपेयी ने किया।
Friday, September 4, 2009
“हिंदी वाला” फेमिनिज्म से डरता क्यों है?

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
हिंदी साहित्य में औरत है किंतु उसका शास्त्र नहीं है। स्त्री शास्त्र के बिना औरत निरस्त्र है। अनाथ है, पराश्रित है। साहित्य की प्रत्येक विधा में लिखने वाली औरतें हैं, साहित्यिक पत्रिकाओं में ‘हंस’ जैसी शानदार पत्रिका है, जिसके संपादक आये दिन स्त्री का महिमामंडन करते रहते हैं, छायावाद में स्त्री की महत्ता का उदघाटन करने वाले नामवर सिंह की इसी नाम से शानदार किताब है। इसके बावजूद ‘हिंदीवाला’ (यहां लेखकों, बुद्धिजीवियों, शिक्षकों से तात्पर्य है) स्त्रीवाद को लेकर भड़कता क्यों है?
हिंदी में स्त्री शास्त्र निर्मित क्यों नहीं हो पाया? हिंदी वाला ‘फेमिनिज्म’ अथवा ‘स्त्रीवाद’ पदबंध के प्रयोग से इतना भागता क्यों है? हिंदी में कोई फेमिनिस्ट पैदा क्यों नहीं हुआ? हिंदी विभागों में अरस्तू से लेकर मार्क्सवाद तक सभी सिद्धांत पढ़ाये जाएंगे लेकिन स्त्रीवाद नहीं पढ़ाया जाता। ऐसा क्या है जो स्त्रीवाद का नाम सुनते ही हिंदी वाले की हवा निकल जाती है। स्त्री के सवाल तब ही क्यों उठते हैं जब उस पर जुल्म होता है? हिंदी में स्त्री लेखिकाओं की लंबी परंपरा के बावजूद स्वतंत्र रूप से ‘स्त्री साहित्य’ पदबंध अभी भी लोकप्रिय नहीं है। आलोचना और इतिहास की किताबों से लेकर दैनंदिन साहित्य विमर्श में स्वतंत्र रूप से ‘स्त्री साहित्य’ की केटेगरी को अभी तक स्वीकृति नहीं मिली है। हमारी ज्यादातर साहित्यिक पत्रिकाएं ‘स्त्री साहित्य’ केटेगरी को स्वतंत्र रूप में महत्व नहीं देतीं बल्कि साहित्य की केटेगरी के तहत ‘स्त्री साहित्य’ को समाहित करके चर्चा करते हैं। और वे जब ऐसा करते हैं, तो सीधे स्त्री की स्वतंत्र पहचान का अपहरण करते हैं। जाने-अनजाने स्त्री साहित्य की प्रतिष्ठा की बजाय उसकी पहचान को लेकर विभ्रम पैदा करते हैं।
हिंदी की अधिकांश स्त्री लेखिकाएं महिला अंदोलन से दूर हैं और फेमिनिज्म को एक सिरे से अपने नजरिए का हिस्सा नहीं मानतीं। हिंदी के किसी भी प्रतिष्ठित आलोचक ने स्त्रीवादी साहित्यालोचना पर एक भी शब्द क्यों नहीं लिखा?
स्त्री साहित्य के सवाल हाशिये के सवाल नहीं हैं। स्त्री जीवन के केंद्रीय सवाल हैं। स्त्री-विमर्श खाली समय या आनंद के समय का विमर्श नहीं है। हिंदी में स्त्री साहित्य और उसकी सैद्धांतिकी अभी भी अकादमिक जगत में प्रवेश नहीं कर पायी है। साहित्यिक पत्रिकाओं के स्त्री विमर्श लेखक जाने-अनजाने मांग और पूर्ति के मायावी तर्कजाल में कैद हैं। स्त्री साहित्य या स्त्री विमर्श में प्रयुक्त धारणाओं का सही नाम और सही संदर्भ में इस्तेमाल नहीं हो रहा। स्त्री से जुड़ी धारणाओं की मनमानी व्याख्याएं पेश की जा रही हैं। स्त्री साहित्य के मूल्यांकन के संदर्भ में सबसे बड़ी चुनौती है अवधारणाओं की सही समझ की। हिंदी साहित्य विमर्श में अवधारणाओं में सोचने की परंपरा का निरंतर ह्रास हो रहा है।
अंग्रेजी साहित्य में स्त्रीवादी साहित्यालोचना बेहद जनप्रिय पदबंध है। किंतु हिंदी में यह उतना जनप्रिय नहीं है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि हिंदी के समीक्षकों को इस पदबंध में कोई आकर्षण नज़र नहीं आता। इसके अलावा हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं में जो संपादक स्त्री साहित्य के पक्षधर के रूप में नजर आते हैं, वे भी इस पदबंध का प्रयोग नहीं करते।
साहित्यालोचना की परंपरा प्रत्येक समाज में बड़ी पुरानी है अत: स्त्रीवादी साहित्यालोचना हमेशा अन्य से ग्रहण करके ही अपना विकास करती है। इसमें अन्य के विचारों के प्रति तिरस्कार का भाव नहीं है। यह अन्य के विचारों को वहां तक आत्मसात करने के लिए तैयार है, जहां तक वे स्त्री के हितों, भावों, जीवन मूल्यों और यथार्थ को विकसित करने में सहायता करते हैं। स्त्रीवादी साहित्यालोचना की पूर्ववर्ती साहित्यालोचना के स्कूलों से इस अर्थ में भिन्नता है कि वे एकायामी थे। जबकि स्त्रीवादी साहित्यालोचना बहुआयामी है। वैविध्यपूर्ण है। यह समाज के किसी एक संस्थान को संबोधित करने के बजाय समाज के विभिन्न संस्थानों को संबोधित करती है। स्त्रीवादी साहित्यालोचना ने आलोचना के स्कूलों की गंभीर आलोचना के साथ साथ समाज और साहित्य के प्रति आलोचना में नये तत्वों, अवधारणाओं और समझ का भी विकास किया है।
स्त्रीवादी साहित्यालोचना का लक्ष्य है समाज में पुंसवादी प्रभुत्व की समाप्ति करना। पुंसवादी संस्कृति की संरचना को ध्वस्त करना। संस्कृति की संरचनाओं कलाएं, धर्म, कानून, एकल परिवार, पिता और राष्ट्र-राज्य के असीमित अधिकार आते हैं, वे सभी इमेज, संस्थाएं, संस्कार और आदतें आती हैं, जो यह बताती हैं कि औरत किसी काम की नहीं होती, अर्थहीन है, अदृश्य है। माया है।
स्त्रीवादी साहित्यालोचना के इस लक्ष्य को हासिल करने का हिंदुस्तान में क्या तरीका हो सकता है? इसके बारे में एक जैसी रणनीति अपनाना संभव नहीं है। हिंदुस्तान में सामाजिक वैविध्य और स्त्रीचेतना के अनेक स्तरों को मद्देनजर रखते हुए संवाद और संघर्ष के रास्ते पर साथ-साथ चलना होगा। इस क्रम में त्याग और ग्रहण की पद्धति अपनानी होगी।
स्त्रीवादी साहित्यालोचना को प्रचलित साहित्यालोचना में कुछ हेरफेर करने बाद निर्मित नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज के प्रति बुनियादी रवैयया बदलना होगा। परंपरागत दृष्टियों को ऊपरी फेरबदल के साथ स्त्रीवादी हितों के पक्ष में रूपांतरित नहीं किया जा सकता। स्त्रीवादी साहित्यालोचना क्रांतिकारी साहित्यालोचना है। उसका लक्ष्य है प्रचलित और प्रभुत्व बनाकर बैठे आलोचना स्कूलों को चुनौती देना, उन्हें अपदस्थ करना। प्रभुत्ववादी विमर्शों को चुनौती देना, उन्हें अपदस्थ करना। सभी किस्म के विमर्शों में स्त्रीवादी नजरिये से हस्तक्षेप करना। स्त्रीवादी साहित्यालोचना की हिमायत करना, उसे विस्तार देने का काम सिर्फ औरतों का ही नहीं है बल्कि इसमें पुरुषों को भी शामिल किया जाना चाहिए। स्त्री का संघर्ष सिर्फ स्त्री का नहीं उसमें पुरुषों की भी समान हिस्सेदारी होनी चाहिए।
स्त्रीवादी साहित्यालोचना में मर्दवादी नजरिये से यदि पुरुष समीक्षक दाखिल होते हैं तो वे स्त्रीवादी साहित्यालोचना का विकास नहीं कर सकते, ऐसे समीक्षकों को स्त्रीवादी समीक्षक कहना मुश्किल है। हिंदी में यह फैशन चल निकला है कि अब हरेक मर्दवादी समीक्षक स्त्री विषय पर हाथ भांज रहा है। हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में इस तरह के फैशनपरस्त या जिज्ञासु आलोचकों में अनेक मर्द संपादक और आलोचक हैं। स्त्रीवादी साहित्यालोचना का विकास मर्द समीक्षकों द्वारा फैशन, सहानुभूति या जिज्ञासा के आधार पर नहीं किया जा सकता। बल्कि इसके लिए क्रांतिकारी रवैये की ज़रूरत है। अभी तक जिन मर्दों ने स्त्रीवादी साहित्यालोचना में योगदान किया है, उनका किसी न किसी रूप में क्रांतिकारी संघर्षों, क्रांतिकारी विमर्श, आमूल परिवर्तनकामी आलोचना परंपरा से संबंध रहा है। ये लोग स्त्रीवादी नजरिये के परिवर्तनकामी रूझानों के पक्षधर रहे हैं। वे मानते हैं कि स्त्रीवादी नजरिया प्रत्येक किस्म के उत्पीड़न, शोषण, अन्याय आदि का सख्त विरोधी है। जिन पुरुषों ने स्त्रीवादी साहित्यालोचना के पक्ष में लिखा है, उनमें प्रतिबद्धता का गहरा भाव रहा है। उन्होंने जिज्ञासावश नहीं लिखा।
हिंदी में स्त्री आलोचना में जो मर्द दाखिल हो रहे हैं वे फैशन के नाम पर आ रहे हैं। उनका साहित्य के क्रांतिकारी विमर्श, समाज के क्रांतिकारी संघर्षों और विचारधाराओं से कोई संबंध नहीं है। ऐसे मर्द समीक्षकों को स्त्रीवादी विमर्श अपना अंग नहीं मानता। स्त्रीवादी साहित्यालोचना के अंदर स्त्रियां उन्हीं पुरुषों को स्वीकार करने को तैयार हैं, जो स्त्री के अधिकारों और स्त्रीवादी नजरिये के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं, आमूल सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर हैं। स्त्रीवादी साहित्यालोचना को सैद्धांतिक तौर पर वे मर्द स्वीकार्य हैं, जो सिद्धांतत: लिंग को आधार बनाकर समीक्षा का विकास कर रहे हों। स्त्री के अनुभवों को स्त्री के नजरिये से देखते हैं।
हिंदी में स्त्री के सवालों, समस्याओं, अनुभूति आदि को आलोचक मर्दवादी नजरिये से देखते हैं, इस तरह के लेखन की इन दिनों हिंदी में बाढ़ आयी हुई है। आज सारी दुनिया में स्त्रीवादी साहित्यालोचना के योगदान की कोई अनदेखी नहीं कर सकता। किंतु हिंदी में साहित्य सैद्धांतिकी में स्त्रीवादी सैद्धांतिकी का अध्ययन नहीं कराया जाता। स्त्रीवादी साहित्यालोचना पर विचार करते समय बुनियादी तौर पर यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि लिंग के रूप में पुंसवादी नजरिये की आलोचना का यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि मर्द को स्त्री का शत्रु घोषित कर दिया जाए। पुरुष को शत्रु घोषित करने वाली मानसिकता मूलत: मर्दवाद के प्रत्युत्तर में पैदा हुआ ‘स्त्रीवादी आतंकवाद’ है। इसके दृष्टिकोण से मर्द केंद्रीय समस्या है। अत: उसे बिना शर्त्त स्त्री के आगे आत्मसमर्पण कर देना चाहिए। आतंकवादी नजरिया लिंगाधारित ध्रुवीकरण करता है, यह दृष्टिकोण अंतत: ऐसी स्थिति पैदा करता है कि मर्द या तो स्त्रीवाद की उपेक्षा करे या स्त्रीवाद पर हमला करे। इस दृष्टिकोण के शिकार लोग एक-दूसरे पर हमला बोलते रहते हैं। इससे स्त्री को कोई लाभ नहीं मिलता। ‘हंस’ के संपादकीय इस तरह के नजरिये से भरे पड़े हैं।
असल में ‘स्त्रीवाद आतंकवाद’ मर्दवाद का विलोम है। यह विभाजनकारी नजरिया है। समग्रता में स्त्रीवादी आतंकवादी नजरिये से स्त्री को कोई लाभ नहीं मिलता, समाज में मर्द के प्रभुत्व में कोई कमी नहीं आती। उलटे स्त्रीवाद के प्रति संशय पैदा करता है, स्त्री के सामाजिक और बौद्धिक स्पेस को संकुचित करता है।
स्त्रीवाद आस्था नही है, बल्कि स्त्री-सत्य की खोज का मार्ग है। अकादमिक जगत में स्त्रीवाद को जब तक पढ़ाया नहीं जाएगा, उसका ज्ञानात्मक प्रसार नहीं होगा। शिक्षकों का काम है स्त्रीवाद की शिक्षा देना, न कि स्त्रीवाद पैदा करना। स्त्रीवाद के पक्ष में जो लोग लिखते हैं, उन्हें अपने लिखे की आलोचना को विनम्रतापूर्वक ग्रहण करना चाहिए और उसकी रोशनी में अपने विचारों को और भी ज्यादा सुसंगत बनाने की कोशिश करनी चाहिए। यह देखा गया है कि जब भी किसी स्त्रीवादी विचारक की आलोचना हुई है, उसने इसे स्त्रीवाद पर हमला घोषित किया है। यह रवैया सही नहीं है। स्त्रीवाद के बारे में की गयी आलोचना वैचारिक विकास की प्रक्रिया का अंग है। उसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया जाना चाहिए। स्त्रीवादी साहित्यालोचना का अकादमिक जगत में प्रवेश तब ही संभव है, जब उसे आस्था के रूप में पेश करने की बजाय नए परिवर्तनकामी विचार के रूप में पेश किया जाए। ( मोहल्ला लाइव से साभार)
Wednesday, September 2, 2009
इस बदलाव से क्या हासिल

-संजय द्विवेदी
केंद्रीय मानवसंसाधन मंत्री कपिल सिब्बल केंद्र के उन भाग्यशाली मंत्रियों में हैं जिनके पास कहने के लिए कुछ है। वे शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने का बिल पास करवाकर 100 दिन के सरकार के एजेंडें में एक बड़ी जगह तो ले ही चुके हैं और अब दसवीं बोर्ड को वैकल्पिक बनवाकर वे एक और कदम आगे बढ़े हैं। शिक्षा के क्षेत्र में इसे एक बड़ा सुधार माना जा रहा है और छात्रों पर एक और बोर्ड का दबाव कम होने की संभावना भी इस फैसले से नजर आ रही है। सीबीएसई में जहां इस साल से ही ग्रेडिंग प्रणाली लागू हो जाएगी वहीं अगले साल दसवीं बोर्ड का वैकल्पिक हो जाना नई राहें खोलेगा।
हालांकि इन फैसलों से शिक्षा के क्षेत्र में कोई बहुत क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएंगें ऐसा मानना तो जल्दबाजी होगी किंतु इससे सोच और बदलाव के नए संकेत तो नजर आ ही रहे हैं। सिब्बल अंततः तो यह मान गए हैं कि उनका इरादा अभी देश के लिए एक बोर्ड बनाने का नहीं है। शायद यही एक बात थी जिसपर प्रायः कई राज्यों ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया जताई थी। बावजूद इसके मानवसंसाधन मंत्री यह मानते हैं कि छात्रों में प्रतिस्पर्धा की भावना को विकसित किया जाना जरूरी है। जाहिर तौर शिक्षा और प्राथमिक शिक्षा का क्षेत्र हमारे देश में एक ऐसी प्रयोगशाला बनकर रह गया है जिसपर लगातार प्रयोग होते रहे हैं। इन प्रयोगों ने शिक्षा के क्षेत्र को एक ऐसे अराजक कुरूक्षेत्र में बदल दिया है जहां सिर्फ प्रयोग हो रहे हैं और नयी पीढी उसका खामियाजा भुगत रही है।
प्राथमिक शिक्षा में अलग-अलग बोर्ड और पाठ्यक्रमों का संकट अलग है। इनमें एकरूपता लाने के प्रयासों में राज्यों और केंद्र के अपने तर्क हैं। किंतु 10वीं बोर्ड को वैकल्पिक बनाने से एक सुधारवादी रास्ता तो खुला ही है जिसके चलते छात्र नाहक तनाव से बच सकेंगें और परीक्षा के तनाव, उसमें मिली विफलता के चलते होने वाली दुर्घटनाओं को भी रोका जा सकेगा। शायद परीक्षा के परिणामों के बाद जैसी बुरी खबरें मिलती थीं जिसमें आत्महत्या के तमाम किस्से होते थे उनमें कमी आएगी। बोर्ड परीक्षा के नाम होने वाले तनाव से मुक्ति भी इसका एक सुखद पक्ष है। देखना है कि इस फैसले को शिक्षा क्षेत्र में किस तरह से लिया जाता है। यह भी देखना रोचक होगा कि ग्रेडिंग सिस्टम और वैकल्पिक बोर्ड की व्यवस्थाओं को राज्य के शिक्षा मंत्रालय किस नजर से देखते हैं। इस व्यवस्था के तहत अब जिन स्कूलों में बारहवीं तक की पढ़ाई होती है वहां 10वीं बोर्ड खत्म हो जाएगा। सरकार मानती है जब सारे स्कूल बारहवीं तक हो जाएंगें तो दसवीं बोर्ड की व्यवस्था अपने आप खत्म हो जाएगी। माना जा रहा है धीरे-धीरे राज्य भी इस व्यवस्था को स्वीकार कर लेंगें और छात्रों पर सिर्फ बारहवीं बोर्ड का दबाव बचेगा। सरकार इस दिशा में अधिकतम सहमति बनाने के प्रयासों में लगी है। इस बारे में श्री सिब्बल कहना है कि हमारे विभिन्न राज्यों में 41 शिक्षा बोर्ड हैं। अभी हम सीबीएसई के स्कूलों के लिए यह विचार-विमर्श कर रहे हैं। अगले चरण में हम राज्यों के बोर्ड को भी विश्वास में लेने का प्रयास करेंगे। उधर सीबीएसई के सचिव विनीत जोशी ने कहा कि जिन स्कूलों में केवल दसवीं तक पढ़ाई होती है, वहाँ दसवीं का बोर्ड तो रहेगा, पर जिन स्कूलों में 12वीं तक पढ़ाई होती है, वहाँ दसवीं के बोर्ड को खत्म करने का प्रस्ताव है।
शिक्षा में सुधार के लिए कोशिशें तो अपनी जगह ठीक हैं पर हमें यह मान लेना पड़ेगा कि हमने इन सालों में अपने सरकारी स्कूलों का लगभग सर्वनाश ही किया है। पूरी व्यवस्था निजी स्कूलों को प्रोत्साहित करने वाली है जिसमें आम आदमी भी आज अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने के लिए तैयार नहीं है। यह एक ऐसी चुनौती है जिसका सामना हमें आज नहीं तो कल बड़े सवाल के रूप में करना होगा। यह समस्या कल एक बड़े सामाजिक संर्घष का कारण बन सकती है। दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में बैठकर नीतियां बनाने वाले भी इस बात से अनजान नहीं है पर क्या कारण है कि सरकार खुद अपने स्कूलों को ध्वस्त करने में लगी है। यह सवाल गहरा है पर इसके उत्तर नदारद हैं। सरकारें कुछ भी दावा करें, भले नित नए प्रयोग करें पर इतना तय है कि प्राथमिक शिक्षा के ढांचे को हम इतना खोखला बना चुके हैं कि अब उम्मीद की किरणें भी नहीं दिखतीं। ऐसे में ये प्रयोग क्या आशा जगा पाएंगें कहा नहीं जा सकता। बदलती दुनिया के मद्देनजर हमें जिस तरह के मानवसंसाधन और नए विचारों की जरूरत है उसमें हमारी शिक्षा कितनी उपयोगी है इस पर भी सोचना होगा। एक लोककल्याणकारी राज्य भी यदि शिक्षा को बाजार की चीज बनने दे रहा है तो उससे बहुत उम्मीदें लगाना एक धोखे के सिवा क्या हो सकता है। सच तो यह है कि समान शिक्षा प्रणाली के बिना इस देश के सवाल हल नहीं किए जा सकते और गैरबराबरी बढ़ती चली जाएगी। हमने इस मुद्दे पर सोचना शुरू न किया तो कल बहुत देर हो जाएगी।
( माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)
अध्यक्षः जनसंचार विभाग माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र)
मोबाइलः 098935-98888 e-mail- 123dwivedi@gmail.com
Web-site- www.sanjaydwivedi.com
Monday, August 24, 2009
पत्रकारिता की कक्षा से
शिशिर सिंह जनसंचार सेमेस्टर-I
पत्रकारिता की कक्षाओं को शुरु हुए एक महीने हो चुका है। पत्रकारिता की कक्षाओं में एक बहुत ही सामान्य प्रश्न पूछा जाता है कि आप ने पत्रकारिता को क्यों चुना? यह प्रश्न दिखने में जितना सहज और सरल दिखता है इसका उत्तर देना उतना ही कठिन है खासकर विकासशील पत्रकारों के लिए। विकासशील पत्रकार, पत्रकारों की वह प्रजाति है जो आने वाले समय के लिए तैयार की जाती है। एक तो यह प्रश्न इसलिए भी कठिन है क्योंकि हमारे दिमाग अभी इतने विकसित नही हुए हैं कि हम इनके साथ किए जाने वाले तर्कों (कभी-कभी कुतर्कों) के भी उत्तर दे पायें। उदाहरण के लिए अगर हमारे किसी साथी ने कहा कि वह इस क्षेत्र में इसलिए आया क्योंकि वह औरों से कुछ हटकर काम करना चाहता था तो उससे यह पूछा जाता है कि तुम सेना में क्यों नहीं गए?
समाज सेवा कहता है तो उसे फिर यह पूछा जाता है कि तुमने एनजीओ क्यों नहीं ज्वांइन किया आदि-आदि। इस तरह के सवाल जबाबों और तर्कों कि सूची काफी लम्बी है।
यह देखने में आता है कि पत्रकारिता में आने वाले अधिकतर छात्रों की प्रथम वरीयता पत्रकारिता नहीं रहती।
सच्चाई की बात की जाए तो पत्रकारिता विशेषकर हिंदी पत्रकारिता अभी भी उस धब्बे से पूरी तरह मुक्त नहीं हुई है जिसके बारे में कहा जाता है कि कोई व्यक्ति अगर कोई काम नहीं कर सकता तो उसके लिए पत्रकारिता ही उपयुक्त है। बस समय के साथ थोड़े कारण बदल गए हैं। जिन्हें कुछ करने को नहीं मिला वह या जिन्हें अपने भविष्य के बारे में कुछ समझ नहीं आया उन्होंने पत्रकारिता का कोर्स कर लिया।
भारतीय जनसंचार संस्थान में पढ़ने वाले मेरे एक साथी ने बताया कि संस्थान में आने वाले अधिकतरह छात्रों का ध्येय पत्रकारिता में आना नहीं बल्कि मात्र उसकी डिग्री हासिल करनी है। इनमें से अधिकतर वह छात्र रहते हैं जो पीसीएस या अन्य किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते हैं। कहने का सार यह है कि पत्रकरिता के स्तरीय संस्थानों को इस की तरफ ध्यान देना चाहिए कि वह संस्थानों में आने वाले छात्रों की योग्यता के साथ-साथ उनकी जर्नलस्टिक अप्रोच भी जांचे ताकि बेहतर पत्रकार सामने आये।
कुछ हल्का फुल्का....
पत्रकारिता के नए छात्रों के लिए एक नए गाने की कुछ लाइनें जो उम्मीद है कि हम पर आने वाले समय में सटीक बैठें ...
“रास्ते वहीं राही नये, रातें वहीं सपने नए, जो चल पड़े चलते गए यारों छू लेंगे हम आसमां”
पत्रकारिता की कक्षाओं को शुरु हुए एक महीने हो चुका है। पत्रकारिता की कक्षाओं में एक बहुत ही सामान्य प्रश्न पूछा जाता है कि आप ने पत्रकारिता को क्यों चुना? यह प्रश्न दिखने में जितना सहज और सरल दिखता है इसका उत्तर देना उतना ही कठिन है खासकर विकासशील पत्रकारों के लिए। विकासशील पत्रकार, पत्रकारों की वह प्रजाति है जो आने वाले समय के लिए तैयार की जाती है। एक तो यह प्रश्न इसलिए भी कठिन है क्योंकि हमारे दिमाग अभी इतने विकसित नही हुए हैं कि हम इनके साथ किए जाने वाले तर्कों (कभी-कभी कुतर्कों) के भी उत्तर दे पायें। उदाहरण के लिए अगर हमारे किसी साथी ने कहा कि वह इस क्षेत्र में इसलिए आया क्योंकि वह औरों से कुछ हटकर काम करना चाहता था तो उससे यह पूछा जाता है कि तुम सेना में क्यों नहीं गए?
समाज सेवा कहता है तो उसे फिर यह पूछा जाता है कि तुमने एनजीओ क्यों नहीं ज्वांइन किया आदि-आदि। इस तरह के सवाल जबाबों और तर्कों कि सूची काफी लम्बी है।
यह देखने में आता है कि पत्रकारिता में आने वाले अधिकतर छात्रों की प्रथम वरीयता पत्रकारिता नहीं रहती।
सच्चाई की बात की जाए तो पत्रकारिता विशेषकर हिंदी पत्रकारिता अभी भी उस धब्बे से पूरी तरह मुक्त नहीं हुई है जिसके बारे में कहा जाता है कि कोई व्यक्ति अगर कोई काम नहीं कर सकता तो उसके लिए पत्रकारिता ही उपयुक्त है। बस समय के साथ थोड़े कारण बदल गए हैं। जिन्हें कुछ करने को नहीं मिला वह या जिन्हें अपने भविष्य के बारे में कुछ समझ नहीं आया उन्होंने पत्रकारिता का कोर्स कर लिया।
भारतीय जनसंचार संस्थान में पढ़ने वाले मेरे एक साथी ने बताया कि संस्थान में आने वाले अधिकतरह छात्रों का ध्येय पत्रकारिता में आना नहीं बल्कि मात्र उसकी डिग्री हासिल करनी है। इनमें से अधिकतर वह छात्र रहते हैं जो पीसीएस या अन्य किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते हैं। कहने का सार यह है कि पत्रकरिता के स्तरीय संस्थानों को इस की तरफ ध्यान देना चाहिए कि वह संस्थानों में आने वाले छात्रों की योग्यता के साथ-साथ उनकी जर्नलस्टिक अप्रोच भी जांचे ताकि बेहतर पत्रकार सामने आये।
कुछ हल्का फुल्का....
पत्रकारिता के नए छात्रों के लिए एक नए गाने की कुछ लाइनें जो उम्मीद है कि हम पर आने वाले समय में सटीक बैठें ...
“रास्ते वहीं राही नये, रातें वहीं सपने नए, जो चल पड़े चलते गए यारों छू लेंगे हम आसमां”
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